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अध्याय-5 दिशाएँ

बिहार बोर्ड वर्ग-6 Geography Solution

अध्याय-5 दिशाएँ



अध्याय-5 दिशाएँ

अध्याय-5 दिशाएँ

अभ्यास

1. सही विकल्प चुनें।

(i) प्रमुख दिशाएँ कितनी होती हैं?

(क) चार

(ख) छह

(ग) तीन

(घ) बारह

उत्तर- (क) चार

(ii) कुल दिशाओं की संख्या कितनी है?

(क) 5

(ख) 7

(ग) 4

(घ) 10

उत्तर- (घ) 10

(iii) बंगाल की खाड़ी भारत के किस दिशा में है?

(क) उत्तर-पश्चिम

(ख) दक्षिण-पश्चिम

(ग) उत्तर-पूर्व

(घ) दक्षिण-पूरब

उत्तर- (ग) उत्तर-पूर्व

2. खाली जगहों को भरें।

(i) हिमालय पर्वत भारत के उत्तर दिशा में है।

(ii) उत्तर तथा पूरब के बीच उत्तर-पूरब दिशा होती है।

(iii) अरब सागर, बंगाल की खाड़ी से दक्षिण दिशा में है।

3. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दें।

(i) आपके स्कूल के उत्तर दिशा में क्या है?

उत्तर- मेरे स्कूल के उत्तर दिशा में पान की खेती है।

(ii) ध्रुवतारा किस दिशा में नजर आता है?

उत्तर- ध्रुवतारा एक अकाशीय  पिंड अर्थात तारा है, जो हमेशा उत्तर दिशा में नजर आता है। रात्रि के समय आकाश में उत्तर की तरफ देखने पर जो सबसे चमकता हुआ तारा नजर आता है, उसे ही ध्रुवतारा कहा जाता है।

(iii) दिशासूचक यंत्र से दिशा की जानकारी कैसे करते हैं?

उत्तर- दिशासूचक यंत्र में एक सूई लगी रहती है, जिसके दोनों छोर में चुम्बकीय शक्ति होने के कारण ये हमेशा उत्तरी ध्रुव और दक्षिणी ध्रुव के तरफ घुमता है जो कि दिशा को दर्शाता है। अतः दिशासूचक यंत्र का उपयोग कर हम दिशा की वास्तविक ज्ञान प्राप्त करते हैं।

(iv) आपका घर विद्यालय से किस दिशा में है?

उत्तर- हमारे घर विद्यालय से दक्षिण दिशा में स्थित है।

(v) आपके मित्रों के घर विद्यालय से किन-किन दिशाओं में है?

उत्तर- हमारे मित्रों का घर विद्यालय से दक्षिण, पश्चिम तथा दक्षिण-पश्चिम दिशाओं में स्थित है। 

(vi) आपके विचा से आपके गाँव/मुहल्ले को सुंदर बनाने के लिए किस-किस परिवर्तन की जरूरत है?

उत्तर- छात्र शिक्षक की मदद से स्वयं करने का प्रयास करें


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अध्याय-4 पृथ्वी के प्रमुख स्थल रुप

बिहार बोर्ड वर्ग-6 Geography Solution

अध्याय-4 पृथ्वी के प्रमुख स्थल रुप


अध्याय-4 पृथ्वी के प्रमुख स्थल रुप

अध्याय-4 पृथ्वी के प्रमुख स्थल रुप

अभ्यास

1. सही विकल्प को चुनें।

1. बिहार में सोन नदी किस तरह के क्षेत्र से होकर गुजरती है?

(क) पहाड़ी क्षेत्र

(ग) मैदानी क्षेत्र

(ख) पठारी क्षेत्र

(घ) रेगिस्तानी क्षेत्र

उत्तर- (ग) मैदानी क्षेत्र

ii. बाल्मीकीनगर बिहार के किस क्षेत्र में अवस्थित है?

(क) पश्चिमी क्षेत्र

(ख) पूर्वी क्षेत्र

(ग) दक्षिणी क्षेत्र

(घ) उत्तरी क्षेत्र

उत्तर- (घ) उत्तरी क्षेत्र

iii. धान की फसल के लिए उपयुक्त मिट्टी है-

(क) बलुआही मिट्टी

(ख) चिकनी मिट्टी

(ग) पर्वतीय मिट्टी

(घ) दोमट मिटटी

उत्तर- (ख) चिकनी मिट्टी

iv. पठार के ऊपर की सतह होती है-

(क) नुकीला

(ग) संर्कीण

(ख) सपाट

(घ) ढालदार

उत्तर- (ख) सपाट

2. खाली स्थानों को भरें

i. बिहार का अधिकतर भाग गंगा नदी के दोनों ओर मैदानी भाग के रूप में फैला है।

ii. पामीर पठार को संसार का छत कहा जाता है।

iii. पहाड़ों की लम्बी श्रृंखला को पर्वत श्रेणी कहते हैं।

iv. शिमला और कश्मीर देश के प्रमुख केंद्र पर्यटन स्थल के उदाहरण हैं।

v. प्राकृतिक वातावरण के बदलते स्वरूप के मुख्य कारण बढ़ती आबादी है।

3. बताइए-

(i) मैदानी क्षेत्र की क्या-क्या विशेषताएँ होती हैं?
उत्तर- प्रायः समतल भूमि का प्रदेश मैदान कहलाता है। मैदानों की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वे समुद्र से ऊँचे या नीचे हो सकते हैं परंतु अपने समीपवर्ती पठार तथा पर्वत से ऊँचे नहीं हो सकते हैं। मैदान प्रायः एक ही मिट्टी के बने होते हैं।

⇒ वे मैदान जिनकी रचना में अपरदन की क्रिया का प्रमुख स्थान होता है, अपरदन मूलक मैदान कहलाते हैं।

⇒ निक्षेपण के क्रिया द्वारा नदियों, हिमानी, वायु तथा सागरीय तरंगों से जो मैदान बनते हैं उन्हें निक्षेपण के मैदान कहते हैं।

(ii) सड़क-निर्माण का कार्य किस क्षेत्र में आसान होगा और क्यों?
उत्तर- सडक-निर्माण का कार्य मैदानी क्षेत्र में आसानी से होगा क्योंकि मैदानी क्षेत्र प्रायः समतल भूमि का प्रदेश होता है। मैदानों की वजह से प्रायः एक ही प्रकार की मिट्टी पायी जाती है। इन क्षेत्रों को आसानी से उपयोग करके सड़क का निर्माण किया जा सकता है, जिससे यहाँ परिवहन की सुविधाएँ आसानी से उपलब्ध होंगी और सड़क का निर्माण करने में भी बहुत कम खर्च लगेगा और सड़क का कार्य जल्दी ही पूरा हो जाता है।

(iii) पर्वत, पठार और मैदान के दोहन से इस पर क्या प्रभाव पड़ा है?
उत्तर- बढ़ती जनसंख्या के कारण ही पर्वत, पठार और मैदानी क्षेत्रों का दोहन हो रहा है। वनों को काटा जा रहा है, इससे प्रदूषण की समस्या भी बढ़ी है। सड़क निर्माण में इन्हीं पठारों, पहाड़ों को काटा जा रहा है, जिससे यह विलुप्त होते जा रहे हैं। मैदानी क्षेत्रों में परिवहन, जल, समतल भूमि होने के कारण कल-कारखाने बन रहे हैं जिससे आबादी काफी घनी हो गई है। कारखानों के लिए खनिजों की उपलब्धता पठारों से है। इसलिए पठारों का दोहन हो रहा है, जिससे प्राकृतिक सुंदरता घटी हैं और प्रदूषण बढ़ा है।

        रचनात्मक मैदान का निर्माण पृथ्वी के आंतरिक हलचलों के द्वारा होता है। मैदानी क्षेत्रों में जीवन-यापन के लिए भोजन, जल, आवास परिवहन की सुविधाएँ आसानी से हो सकती है। यहाँ सड़क मार्ग, रेलमार्ग एवं अन्य सुविधाएँ आसानी से प्रदन की जा सकती हैं। बिहार का अधिकतर भाग गंगा नदी के दोनों तरफ मैदानी भाग के रूप में फैला हुआ है। इसमें कृषि कार्य होता है। ऐसे मैदानी क्षेत्र अन्न उत्पादन के लिए प्रसिद्ध है। मैदानी क्षेत्र पश्चिम में पंजाब से लेकर पूरब में आसम तक ये इलाके सतलज, गंगा और ब्रह्मपुत्र का मैदान कहलाते हैं। ये सभी क्षेत्र कृषि के लिए सर्वोत्तम माने जाते हैं।

(iv) मैदान में ही अधिक लोग क्यों बसते हैं?
उत्तर- मैदान में ही अधिक लोग बसते हैं क्योंकि मैदान की भूमि समतल होती है। जिससे लोग यहाँ कृषि-कार्य आसानी से करते हैं। इसमें लोग धान, गेहूँ, चना इत्यादि उपजाकर अपना जीवन-यापन कर सकते हैं। मैदानी क्षेत्रों में जीवन के लिए सभी सुख-सुविधा उपलब्ध हैं। भोजन, जल, आवास, परिवहन की सुवधिा आसानी से उपलब्ध होती है। ऐसे क्षेत्रों में संडक मार्ग आसानी से प्रदान हो जाती हैं। मैदानी क्षेत्र अन्न उत्पादन के लिए प्रसिद्ध हैं। 

(v) पर्वत कितने प्रकार के होते हैं? सभी के नाम लिखें।
उत्तर- पर्वत निम्नलिखित तीन प्रकार के होते हैं:-

(क) वलित पर्वत- इनकी सतह ऊबड़-खाबड़ एवं शिखर शंक्वाकार होती है। जैसे-भारत का हिमालय पर्वत एवं दक्षिण अमेरिका का एन्डीज पर्वत।

(ख) भ्रंशोत्थ पर्वत- पृथ्वी के आंतरिक हलचलों के कारण पृथ्वी पर दरारें पड़ जाती हैं और उन दो दरारों के बीच का भाग ऊपर उठ जाता है, इस ऊँचे उठे भाग को ही भ्रंशोत्थ पर्वत कहा जाता है। भारत का सतपुड़ा पर्वत इसका उदाहरण है।

(ग) ज्वालामुखी पर्वत- ज्वालामुखी से निकले लावा एवं अन्य पदार्थों के ठंडा होकर जम जाने से जिन पर्वतों का निर्माण होता है उसे ज्वालामुखी पर्वत कहते हैं। इटली का विसुवियस पर्वत इसका उदाहरण है। भारत के अण्डमान निकोबार के बैन द्वीप में सक्रिय ज्वालामुखी पर्वत पाए जाते हैं। कम ऊँचाई के पर्वतों को पहाड़ी कहा जाता है।


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अध्याय-3 पृथ्वी के परिमंडल

बिहार बोर्ड वर्ग-6 Geography Solution

अध्याय-3 पृथ्वी के परिमंडल


अध्याय-3 पृथ्वी के परिमंडलअध्याय-3 पृथ्वी के परिमंडल

अभ्यास

1. सही विकल्प को चुनें।

(i) जीवन पनपता है-

(क) स्थलमंडल पर

(ख) जलमंडल पर

(ग) वायुमंडल पर

(घ) जैवमंडल पर

उत्तर- (क) स्थलमंडल पर

(ii) अंतरिक्ष में जाने वाले पहले भारतीय थे-

(क) अशोक शर्मा

(ख) राकेश शर्मा

(ग) रमेश वर्मा

(घ) रवीश मलहोत्रा

उत्तर- (ख) राकेश शर्मा

(iii) जलडमरु मध्य जोड़ता है-

(क) दो बड़े भू-स्थलों को

(ख) दो बड़े जल-भागों को

(ग) दो झीलों को

(घ) दो नदियों को

उत्तर- (ख) दो बड़े जल-भागों को

(iv) समतापमंडल होता है-

(क) जलमंडल में

(ख) स्थलमंडल में

(ग) वायुमंडल में

(घ) जैवमंडल में

उत्तर- (ग) वायुमंडल में

2. खाली जगहों को भरिए-

(i) स्थल का एक संकरा भाग जो दो बड़े स्थलीय भागों को जोड़ता है स्थल संधि कहलाता है।

(ii) पानी का संकरा भाग जो दो बड़ी जलराशियों को एक-दूसरे से जोड़ता है जलडमरू मध्य या जल संधि कहलाता है।

(iii) चंद्रमा पर हवा और पानी नहीं होने से वहाँ जीवन सम्भव नहीं है।

3. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दें।

1. पृथ्वी पर जीवन का क्या कारण है?

उत्तर- पृथ्वी के चारों ओर घिरे हुए आवरण को वायुमंडल कहते हैं। वायुमंडल पृथ्वी पर जीवों के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण है। सभी जीवों को जीवित रहने के लिए भोजन, पानी और हवा की आवश्यकता होती है। इन्हें ये तीनों चीजें स्थलमंडल, जलमंडल और वायुमंडल से मिलती हैं। हमारी पृथ्वी पर ये तीनों मंडल उपस्थित होने के कारण ही जीवन पनपता है। यही कारण है कि पृथ्वी पर जीवन पाया जाता है।

i. पृथ्वी पर प्रमुख परिमण्डल कौन-कौन से हैं?

उत्तर- पृथ्वी पर प्रमुख परिमण्डल स्थलमंडल, जलमंडल और वायुमंडल है।

iii. पृथ्वी के प्रमुख महाद्वीपों के नाम लिखिए।

उत्तर- पृथ्वी के प्रमुख महाद्वीपों के नाम निम्नलिखित है-

1. एशिया

2. यूरोप

3 . अफ्रिका

4 . उत्तरी

5 . दक्षिणी अमेरिका

6 . अंटार्कटिका

7. 3. आस्ट्रेलिया।

iv. पृथ्वी को नीला ग्रह क्यों कहते हैं?

उत्तर-  हमारी पृथ्वी जिस पर हम रहते हैं पृथ्वी पर ही जीवन मिलता है क्योंकि वहाँ जल एवं जीवन के लिए आवश्यक गैसें मौजूद है। अंतरिक्ष से देखने पर यह नीली नजर आती है। क्योंकि वायुमंडल में प्रकाश की किरणें परावर्तित होती हैं तथा समुद्र की सतह से नीले रंग का परावर्तन सर्वाधिक है। हमारी पृथ्वी पर लगभग 71% भू-भाग जल से घिरा है तथा मात्र 29% स्थल मंडल है, अतएव जलीय भाग के अधिक रहने के कारण परावर्तन अधिक होता है, फलतः यह नीला दिखाई देता है। इसलिए इसे नीला ग्रह भी कहते हैं।

v. पृथ्वी के प्रमुख महासागरों के नाम लिखिए।

उत्तर- पृथ्वी के प्रमुख महासागरों के नाम निम्नलिखित हैं-

1. हिंद महासागर

2. प्रशांत महासागर

3. अटलांटिक महासागर

4. आर्कटिक महासागर।

vi. जैवमण्डल किसे कहते है? इसका विस्तार कहाँ है?

उत्तर- जैवमण्डल पृथ्वी के चारों तरफ फैले लगभग 30 किमी मोटी वायु, जल, स्थल, मृदा, तथा शैल युक्त एक जीवनदायी परत होती है। इसके अंतर्गत सभी पेड़-पौधों एवं जीव-जन्तुओ का जीवन सम्भव होता है। अर्थात जैवमण्डल में पृथ्वी के स्थलमंडल, जलमंडल और वायुमंडल के हर उस अंग का समावेश है जहाँ जीवन पनपता है।

vii. जीवन के लिए वायुमंडल आवश्यक है। कैसे?

उत्तर- पृथ्वी के चरों ओर फैले हुए विभिन्न गैसों के आवरण को ही वायुमंडल कहते हैं। वायु के बिना तो हमलोग एक पल भी जीवित नहीं रह सकते हैं। वायुमंडल पृथ्वी पर जीवों के लिए अति आवश्यक है। इसकी उपस्थिति के कारण ही हमलोग सांस लेते हैं और पेड़-पौधे भी अपना भोजन इसकी मदद से बनाते हैं।

हमलोग जो सर्दी-गर्मी महसूस करते हैं वह हवाओं के माध्यम से ही करते हैं। ये वायु ही बादलों को गतिशील बनाती हैं जिससे वर्षा होती है। सभी जीवों को जीवित रहने के लिए वायु की जरूरत होती है जो हमें वायु वायुमंडल से प्राप्त होती है। जलचर भी पानी में घुलनशील हवाओं के द्वारा ही जीवित रहते हैं। इस प्रकार जीवन के लिए वायुमंडल आवश्यक है।

viii. स्थलमंडल किसे कहते है ? यह क्यों उपयोगी है?

उत्तर- पृथ्वी का वह ऊपरी ठोस भाग जिसमें मिट्टी, कंकड़, पत्थर, पहाड़, मैदान, पठार आदि सम्मिलित है, वह स्थलमंडल कहलाता है। इस स्थलमंडल पर ही सारे जीव-जन्तु, मनुष्य, अपना घर बनाकर अपना जीवन-यापन करते हैं।

             स्थलमंडल पर ही मनुष्य खेती-बाड़ी करके अपनी जीविकोपार्जन करते हैं। स्थलमंडल के बिना हम जीवन की कल्पना भी नहीं कर सकते हैं। स्थलमंडल हमारे जीवन का अस्तित्व है। स्थलमंडल पर ही पेड़-पौधे का भी जीवन पाया जाता है। इस प्रकार स्थलमंडल हमारे लिए अति उपयोगी है।

ix. जलीय क्षेत्रों के जीव-जंतु एवं पौधे कौन-कौन से हैं? सूची बनाइए।

उत्तर- जलीय क्षेत्रों के जीव-जन्तु- कछुआ, साँप, मगमच्छ, मछली, मेढ़क, हंस, बतख इत्यादि हैं। जलीय क्षेत्रों के पौधे- कमल, केला का पौधा इत्यादि है।


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अध्याय-2 पृथ्वी एवं उसकी गतियाँ

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अध्याय-2 पृथ्वी एवं उसकी गतियाँ


अध्याय-2 पृथ्वी एवं उसकी गतियाँ

अभ्यास

1. सही विकल्प को चुने-

(i) समदिवा रात्रि होते हैं-

(क) 22 जून एवं 21 सितम्बर

(ख) 25 दिसम्बर

(ग) 21 मार्च एवं 23 सितम्बर

(घ) ध्रुवों पर

उत्तर- (ग) 21 मार्च एवं 23 सितम्बर

(ii) सबसे बड़ा दिन होता है-

(क) 21 जून
(ख) 22 जून
(ग) 25 दिसम्बर
(घ) 22 दिसम्बर
उत्तर- (क) 21 जून और (घ) 22 दिसम्बर

(iii) पृथ्वी अपने अक्ष पर झुकी है-

(क) 32½°
(ख) 33½°
(ग) 67½°
(घ) 23½°
उत्तर- (घ) 23½°

(iv) शीतोष्ण कटिबंध में-

(क) बहुत गरमी पड़ती है

(ख) कम गरमी पड़ती है

(ग) बहुत बरसात होती है

(घ) अधिक ठंड एवं कम गरमी पड़ती है

उत्तर- (घ) अधिक ठंड एवं कम गरमी पड़ती है

(v) जहां सालों भर गरमी पड़ती है वह क्षेत्र कहलाता है-

(क) शीतोष्ण कटिबंध

(ख) उष्ण कटिबंध

(ग) ध्रुव

(घ) विषुवत रेखा पर

उत्तर- (ख) उष्ण कटिबंध

(vi) पृथ्वी आकार में चंद्रमा से-

(क) छोटी है

(ख) बड़ी है

(ग) समान है

उत्तर- (ख) बड़ी है

(vii) चांद पर पहुंचने वाले पहले व्यक्ति कौन थे?

(क) राकेश शर्मा

(ग) तेन सिंह

(ख) यूरी गागरिन

(घ) नील आर्मस्ट्रांग

उत्तर- (घ) नील आर्मस्ट्रांग

2. खाली जगहों को भरिए-

(i) उत्तरी ध्रुव से दक्षिणी ध्रुव को मिलाने वाली काल्पनिक रेखा अक्ष कहलाती है।

(ii) पृथ्वी की  दैनिक या घूर्णन गति के कारण दिन-रात होते हैं।

(iii) विषुवतीय प्रदेश में सूर्य की किरणें सालों भर सीधी पड़ती हैं।

(iv) पृथ्वी पश्चिम से पूरब की ओर घूमती है।

3. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दें।

(i) ध्रुवों पर छह महीने लगातार दिन और रात क्यों होते हैं?

उत्तर- जब उत्तरी ध्रुव पर सूर्य का प्रकाश लगातार 6 महीने पड़ता है तो यहाँ छ: महीने लगातार दिन होते हैं और ठीक उसी समय दक्षिणी ध्रुव में अंधेरा होने के कारण ही दक्षिणी ध्रुव में लगातार 6 महीने रात होती हैं। ठीक इसी प्रकार जब दक्षिणी ध्रुव पर सूर्य का प्रकाश लगातार 6 महीने पड़ता है तो यहाँ छ: महीने लगातार दिन होते हैं और ठीक उसी समय उत्तरी ध्रुव में अंधेरा होने के कारण ही उत्तरी ध्रुव में लगातार 6 महीने रात होती हैं।

(ii) दैनिक गति और वार्षिक गति में क्या अंतर है?

उत्तर- दैनिक गति- जिस हिस्से पर सूर्य का प्रकाश पड़ता है वह हिस्सा हमें दिखाई देता है अर्थात वहाँ दिन होता है और जहाँ प्रकाश नहीं पड़ता है वहाँ दिखाई नहीं पड़ता और वहाँ रात होती है। पृथ्वी को इस तरह का चक्कर पूरी करने में 24 घंटे अर्थात एक दिन का समय लगता है। पृथ्वी की इस गति को घूर्णन गति या दैनिक गति कहते हैं। इस गति के कारण ही दिन और रात होते हैं।

वार्षिक गति- घूर्णन गति से ही पृथ्वी की परिभ्रमण गति भी जुड़ी हुई है। इसके कारण ही पृथ्वी पर ऋतु परिवर्तन होता है। पृथ्वी अपने अक्ष पर घूमती हुई 365 दिन अर्थात एक वर्ष में धीरे-धीरे खिसकते हुए सूर्य का एक चक्कर पूरा कर लेती है। पृथ्वी की इस वार्षिक गति को ही परिभ्रमण गति कहा जाता है।

(iii) ‘अक्ष’ किसे कहते हैं?

उत्तर- पृथ्वी पश्चिम से पूरब घूमती रहती है। उत्तरी ध्रुव से दक्षिणी ध्रुव को मिलाने वाली काल्पनिक रेखा अक्ष कहलाती है। इसी अक्ष पर पृथ्वी घूम रही है। लेकिन पृथ्वी पर ग्लोब की तरह उत्तरी ध्रुव से दक्षिणी ध्रव को मिलाने वाली कोई रेखा नहीं है। ग्लोब पृथ्वी का नमूना हैं इसलिए ग्लोब अपने अक्ष पर सीधी नहीं खड़ी होकर एक ओर झुकी हुई है क्योंकि पृथ्वी अपने अक्ष पर 23½° झुकी हुई है।

(iv) पृथ्वी किस दिशा में घूमती है?

उत्तर- पृथ्वी पश्चिम दिशा से परब दिशा की ओर घूमती है।

(v) पृथ्वी के किस भाग में सबसे कम गर्मी पड़ती है और क्यों?

उत्तर- पृथ्वी के ‘शीतोष्ण कटिबंधीय क्षेत्र’ में जैसे-जैसे उत्तर या दक्षिण में बढ़ते हैं सूर्य की किरणें तिरछी होती जाती हैं और बड़े हिस्से में फैल जाती है जिसके कारण कम गर्मी पड़ती है।

(vi) पृथ्वी पर कितने कटिबंध हैं? कटिबंधों में सूर्य के प्रकाश की क्या स्थिति होती है?

उत्तर- पृथ्वी पर तीन कटिबंध निम्नलिखित हैं-

(क) उष्ण कटिबंध- कर्क एवं मकर रेखाओं के बीच अन्य अक्षांशों की तुलना में सबसे अधिक गर्मी पड़ती है जिसके कारण इसे उष्णकटिबंध कहा जाता है। यहाँ दिन और रात की स्थितियाँ सालों भर होती है तथा सूर्य की किरणें लम्बवत् पड़ती हैं।

(ख) समशीतोष्ण कटिबंध- कर्क एवं मकर रेखा के बाद उत्तरी गोलार्द्ध में उत्तरी ध्रुव वृत्त तथा दक्षिणी गोलार्द्ध में दक्षिणी ध्रुव वृत्त के बीच वाले क्षेत्र में तापमान मध्यम रहता है। यहाँ जाड़े में सर्दी पड़ती है तथा गर्मी में तापमान अधिक रहता है। इसे सम शीतोष्ण कटिबंध कहते हैं। दिन और रात की स्थितियाँ होती हैं परन्तु सूर्य की किरणें कभी लम्बवत् नहीं पड़ती हैं।

(ग) शीत कटिबंध- यहाँ छ: महीने का दिन एवं छः महीने की रात होती है। ध्रुवों के निकट सूर्य की किरणें अत्यधिक तिरछी पड़ती हैं यही कारण है कि छह महीने का दिन होने के बावजूद ये किरणें वहां के धरातल एवं वातावरण को गर्म नहीं कर पातीं। अतः यहाँ वर्षभर बर्फ जमी रहती है। इस क्षेत्र को शीत कटिबंध’ की पेटी कहा जाता है।

4. पता कीजिए।

(i) विषुवत रेखा किन-किन देशों से होकर गुजरती है?

उत्तर- विषुवत रेखा कुल 13 देशों से गुजरती है, जो इस प्रकार हैं-

⇒ दक्षिण अमेरिका महाद्वीप के देश- इक्वाडोर, कोलम्बिया एवं ब्राजील

⇒ अफ्रीका महाद्वीप के देश- गैबन, कांगो गणराज्य, कांगो लोकतांत्रिक गणराज्य, युगांडा, केन्या, सोमालिया

⇒ एशिया महाद्वीप के देश- मालदीव, इंडोनेशिया, किरिबाती, साओटोम और पिंसिप

(ii) शीत कटिबंध में स्थित कुछ देशों के नाम-

उत्तर- शीत कटिबंध में स्थित देश उत्तरी यूरोप के देश है जिसमें डेनमार्क, जर्मनी, नार्वे, स्वीडन, फिनलैंड, लिथुआनिया तथा रूस एवं कनाडा हैं। दक्षिणी गोलार्द्ध में न्यूजीलैंड, ऑस्ट्रेलिया का दक्षिणी हिस्सा तथा दक्षिणी अमेरिका के चिल्ली देश है।

(iii) शीतोष्ण कटिबंध में स्थित कुछ देशों के नाम-

उत्तर- शीतोष्ण कटिबंध में स्थित कुछ देशों के नाम- संयुक्त राज्य अमेरिका, कनाडा और यूरोप, मध्य एशिया, दक्षिणी अमेरिका के दक्षिणी देश और दक्षिणी ऑस्ट्रेलिया शामिल हैं। यह क्षेत्र कर्क रेखा और मक रेखा के बीच स्थित हैं।

5. दिए गए चित्र में सही स्थान पर कटिबंधों के नाम लिखिए।

उत्तर-


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अध्याय-1 हमारा सौरमंडल

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अध्याय-1 हमारा सौरमंडल


अध्याय-1 हमारा सौरमंडल

अभ्यास

1. सही विकल्प को चुनें-

(i) राशियों की कुल संख्या कितनी है?

(क) 5

(ग) 8

(ख) 12

(घ) 27

उत्तर- (ख) 12

(ii) सूर्य की आकृति कैसी है?

(क) गोल

(ख) चिपटी

(ग) वर्गाकार

(घ) आयताकार

उत्तर- (क) गोल

(ii) सौर परिवार का मुखिया कौन है?

(क) पृथ्वी

(ख) चन्द्रमा

(ग) सूर्य

(घ) नक्षत्र

उत्तर- (ग) सूर्य

(iv) ग्रहों की कुल कितनी संख्या है?

(क) 8

(ख) 9

(ग) 12

(घ) 27

उत्तर- (क) 8

(v) सप्तर्षि कितने तारों का समूह है?

(क) 27

(ख) 8

(ग) 12

(घ) 7

उत्तर- (घ) 7

2. खाली जगहों को भरिए-

(i) पृथ्वी एक नक्षत्र को 14 दिनों में पार करती है।

(ii) विषुवत रेखा पर ध्रुवतारा क्षितिज पर दिखाई पड़ता है।

(iii) मंगल और बृहस्पति ग्रह के बीच क्षुद्रग्रह पाए जाते हैं।

(iv) वृहस्पति के 63 उपग्रह हैं।

(v) सूर्य का प्रकाश पृथ्वी तक लगभग 8 मिनट में पहुँचता है।

3. निम्न प्रश्नों के उत्तर लिखिए-

(i) सूर्य से दूरी के अनुसार विभिन्न ग्रहों के नाम लिखिए।
उत्तर- सूर्य से दूरी के अनुसार बुध, ग्रह, शुक्र ग्रह, पृथ्वी ग्रह, मंगल ग्रह, वृहस्पति ग्रह, शनि ग्रह, यूरेनस, नेप्ट्यून हैं।

(ii) सूर्य से सबसे नजदीकी ग्रह क्या नाम है?
उत्तर- बुध सूर्य के सबसे नजदीकी ग्रह है।

(iii) सौर मंडल का सबसे बड़ा ग्रह कौन है?
उत्तर- सौर मंडल का सबसे बड़ा वृहस्पति ग्रह है।

(iv) पृथ्वी के निकटवर्ती ग्रह कौन-कौन हैं?
उत्तर- पृथ्वी के सबसे नजदीक सूर्य और चन्द्रमा हैं।

(v) उस ग्रह का क्या नाम है जिसके चारों ओर छल्ले पाये जाते हैं?
उत्तर- उस ग्रह का नाम शनि है जिसके चारों ओर छल्ले पाये जाते हैं।

(vi) सौर मंडल का कौन-सा ग्रह आपको सबसे अलग लगा और क्यों?
उत्तर- सौर मंडल का पृथ्वी ग्रह हमें सबसे अलग लगता है क्योंकि यही वह ग्रह है जहाँ जीवन मिलता है। यहाँ जल एवं जीवन के लिए आवश्यक गैसें मौजूद हैं और अंतरिक्ष से देखने पर यह नीली दिखाई देती है। यही है हमारी पृथ्वी जिस पर हम रहते हैं।

(vii) पृथ्वी के उपग्रह का क्या नाम है? का क्या नाम है?
उत्तर- पृथ्वी के उपग्रह का नाम चाँद है।

(viii) वे कौन-कौन से ग्रह हैं जो पृथ्वी के घूमने की विपरीत दिशा में घूमते हैं?
उत्तर- शुक्र तथा अरुण ग्रह जो पृथ्वी के घूमने की विपरीत दिशा में घूमते हैं।

(ix) आकाशगंगा क्या है?

उत्तर- आकाशगंगा लाखों तारों का एक समूह है।

4. अकाशीय पिण्ड एवं दी गई विशेषताओं का मिलान कीजिए-

                          उत्तर-

(i) बुध- (ग) सबसे छोटा ग्रह

(ii) पृथ्वी- (घ) नीला ग्रह

(iii) चन्द्रमा- (ख) पृथ्वी का उपग्रह

(iv) उल्कापिंड- (ड़) सूर्य के चारों ओर चक्कर लगाने वाले पत्थरों के छोटे टुकड़े

(v) आकाशगंगा- (च) लाखों तारों का समूह

(vi) ब्रह्माण्ड- (क) लाखों आकाश गंगा का समूह

5. आपस में चर्चा कीजिए एवं लिखिए।

(i) कई तारे सूर्य से बड़े हैं फिर भी छोटे क्यों दिखाई देते हैं?
उत्तर- कई तारे सूर्य से बड़े हैं फिर भी छोटे दिखाई देते हैं क्योंकि यह पृथ्वी से काफी दूर हैं।

(ii) तारे आकाश में ही हैं फिर भी दिन में क्यों नहीं दिखाई देते?
उत्तर- तारे आकाश में ही हैं फिर भी दिन में सूर्य की रोशनी के कारण हमें दिखाई नहीं देते हैं।

(iii) चन्द्रमा तारों से छोटा है फिर भी हमें बड़ा क्यों दिखाई देता है?
उत्तर- चन्द्रमा तारों से छोटा है फिर भी हमें बड़ा दिखाई देता है क्योंकि पृथ्वी से चन्द्रमा की दूरी कम होने के कारण वह हमें तारों से बड़ा दिखाई देता है।

(iv) अगर किसी आकाशीय पिण्ड में प्रकाश न हो तो क्या वह हमें नजर आएगा? अपने उत्तर के पक्ष में तर्क दीजिए।
उत्तर- अगर किसी आकाशीय पिण्ड में प्रकाश न हो तो वह हमें दिखाई नहीं देगा क्योंकि हम प्रकाश के बिना किसी भी वस्तु को देख नहीं सकते हैं।

6. इनमें किन-किन अकाशीय पिंडों के नाम छुपे हैं-

हमारा सौरमंडल

उत्तर-

(i) बुध

(ii) शुक्र

(iii) पृथ्वी

(iv) मंगल

(v) वृहस्पति

(vi) शनि

(vii) अरुण

(viii) वरुण

(ix) टाइटन

(x) सिरस।

7. सौमंडल का मॉडल/चित्र बनाकर कक्षा में प्रदर्शित कीजिए।
उत्तर-

हमारा सौरमंडल


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12. अजब-गजब

12. अजब-गजब


 अजब-गजब⇒

            इस देश में सब कुछ अजब-गजब हो रहा है। हमको तो लगता है कि यह देसे है अजब और गजब लोगों का।

         तो, हम कह रहे थे… कह कहाँ रहे थे। कहेंगे तो अब। देखिये जी, यहाँ नेता और जनता का संबंध वैसा है, जैसा दूध के साथ पानी का पगार के साथ घूस का। बाजार के साथ महँगाई का। आलू के साथ झुलसा रोग का…। अब ये एक-दूसरे से पूछकर तो अपना काम नहीं करेगा न।

          झुलसा रोग आलू से पूछकर आयेगा क्या? न महँगाई बाजार से पूछकर आया करेगी और न ही घूस पगार के बारे में पूछताछ करेगी। और पानी तो दूध का लंगोटिया यार है, फिर पूछने की क्या जरूरत है?

अजब-गजब

         लेकिन नहीं…नेतागिरी में ऐसा नहीं होता। आप वाले जनता से पूछकर ही हर्र-हुर्र कर रहे हैं। कहाँ झाडू मारना है कहाँ नहीं, जनता से ही पूछेंगे। जनता ने सरकार बनाने के लिए थोड़े न वोट दिया, वो तो सिर्फ राइट टू पूछने के वास्ते दिया था। सरकार बनाएँ कि नहीं, बड़ी कोठी तथा सुरक्षा लें कि नहीं, लाल बत्ती जलाएँ कि नहीं-सब काम केजरीवाल ने जनता से पूछकर ही किया न। जनता भी ‘पुछवाकर तृप्त। उधर, राहुल गांधी की सारी उमर मम्मी से पूछने में ही घिस रही है।

          गरीब के घर का खाना पचा लेंगे, लेकिन जब गरीब को अपने घर खाने पर बुलाना हो तो मम्मी से ही पूछेंगे। तो, प्रधानमंत्री पद की उम्मीदवारी लेनी है कि नहीं, यह भी तो मम्मीजी से पूछकर ही तय करेंगे न। लेकिन सबका गुरु निकले नरेन्द्र भाई। गुरुई में तो उन्होंने अपने ‘गुरुओं’ का गुड़ गोबर का दिया। और पूछने के मामले में सबको पछाड़ डाला। इसलिए कि खुद ही जनता से पूछते हैं और खुदहि जवाब देते परन्तु मंच पर से पूछते जरूर हैं, ताकि जनता ये न बूझे कि पूछा नहीं…।

       तो, है न यह अजब-गजब? अब तो घोड़ा भी घास से पूछकर ही चरा करेगा। चोर कोतवाल से पूछेगा कि चोरी कर लें? और तो औ, राजा प्रजा से पूछेगा कि हम भी थोड़ा-बहुत ‘अराजक’ हो लें-तुम्हारी तरह?

स्रोत: दे दे राम, दिला दे राम !, (विरेन्द्र नारायण झा)

11. सकारात्मक विचारों का प्रभाव

11. सकारात्मक विचारों का प्रभाव


सकारात्मक विचारों का प्रभाव⇒

           सकारात्मक विचारों का भी मन, मस्तिष्क, शरीर तथा समस्याओं के हल की दिशा में इतना अनुकूल प्रभाव पडता है कि वह चमत्कार जैसा ही लगता है। विधेयक विचार यदि ईश प्रार्थना से संयुक्त हो जाए तो यह दैवी शक्ति का प्रवाह बन जाता है, जिसमें चिंताएं, व्याकुलताएं, रोग, शोक, आधि- व्याधि सभी प्रवाहित हो जाते हैं।

              सकारात्मक विचार ईश प्रार्थना से संयुक्त हो या दृढ़ मनोबल से- दोनों का शुभ फल अवश्य मिलता है। प्राकृतिक चिकित्सा के प्रसिद्ध विद्वान डॉ. हेनरी लिट्ठर ने भी अपनी पुस्तक ‘प्रैक्टिस ऑफ थेराप्यूटिक्स’ में लिखा है-‘मनोभावों में इतना सामर्थ्य है कि उनके द्वारा कोई रोगी स्वयं को पूर्ण स्वस्थ और कोई स्वस्थ व्यक्ति विकृत विचार आरोपण व निषेधात्मक चिंतन द्वारा अपने को अशक्त, असमर्थ तथा रुग्ण बना सकता है।

सकारात्मक विचारों का प्र

             श्रीमती मर्टिल फिल्मोर प्रायः बीमार रहा करती थी। दवा खाते-खाते टूट चुकी थी। डॉक्टर भी अब और कुछ कर सकने में अपने को असक्षम समझ रहे थे। एक बार श्रीमती मर्टिल अपने पति चार्ल्स फिल्मोर के साथ एक आध्यात्मिक भाषण सुनने गई।

          भाषण के एक वाक्य को उसके मन ने दृढ़ता से पकड़ लिया ‘I am child of God and therefore I do not inherit sickness.’ ‘मैं ईश्वर की संतान हूं, अतः मुझमें कोई रोग नहीं।’ मन हमेशा इस बात की आवृत्ति करता रहता। इस बात पर उसे इतना अधिक विश्वास हो गया कि उसका जीवन बदल गया। वह स्वास्थ्य के लिए ईश्वर से प्रार्थना करती और पोषक (Positive) विचारों के द्वारा अपने में शक्ति भी भरती रहती। फलतः वह पूर्ण स्वस्थ हो गई।

             श्री कैस्के जन्म से पंगु था। वह चल नहीं सकता था। श्रीमती मर्टिल फिल्मोर से प्रेरित होकर वह ईश्वर विश्वास से अभिभूत हो पोषक विचारों को पोषित करने लगा। वह बारंबार इस विचार की आवृत्ति करता कि उस पर परमात्मा की असीम कृपा बरस रही है। प्रभु कृपा से अब वह स्वस्थ होता जा रहा है, उसके पैर अच्छे होते जा रहे हैं। उसके पैर सभी कार्य करने में सक्षम हो गए हैं, वह चल सकता है, दौड़ सकता है इत्यादि। फलतः वह भी स्वस्थ हुआ।

         प्रसिद्ध चिकित्सक हीलर अलबई क्लिक की पुरानी पेट पीड़ा मन की शुभ भावनाओं ने शांत कर दी।

        प्रसिद्ध चिकित्सक रिबेका ने मधुमेह (डायबिटिज) रोग को निर्मूल करने की दवा बताई ‘सकारात्मक विचार।’ रिबेका के शब्दों में, ‘इस रोग को निर्मूल करने की एकमात्र दवा है प्रेम और मन का सदा निश्चित और प्रसन्न रहना।’

      एलिस न्यूटन नाम की स्त्री पेट के कैंसर से बुरी तरह पीड़ित थी, उसका उदर फूला हुआ था। डॉक्टरों ने जवाब दे दिया था। वह ईश प्रार्थना के साथ पोषक विचारों में जुट गई और अंततः रोगमुक्त हुई। भारत में तो ऐसे उदाहरण आए दिन देखने को मिलते हैं।

        अब तो यह स्पष्ट परिलक्षित हो गया कि शुभ औ विधेयक विचारों की शुभ परिणति एवं अशुभ और निषेधात्मक विचारों के घातक परिणाम होते हैं।

        आप चिंतन की प्रक्रिया द्वारा प्रभु की शांति, निर्विकारिता, प्रज्ञावानतादि को निश्चय ही अपने में उभार सकते हैं। व्यक्ति का चिंतन उसके शरी, स्वास्थ्य और क्रियाशक्ति पर आश्चर्यजनक ढंग से प्रभाव डालता है। चिंतन से अंतर्मन के साथ-साथ बाह्य जगत भी प्रभावित और परिवर्तित होता है। अतएव स्वसंकेत (ओटो सजेशन) द्वारा अपने भीतर स्थित ईश्वरीय गुणों को उभारें, प्रकट करें।

स्रोत: चिंता क्यों?

10. नकारात्मक विचारों से कैसे उबरें?

10. नकारात्मक विचारों से कैसे उबरें?


नकारात्मक विचारों से कैसे उबरें?

                यह तो नकारात्मक विचारों का प्रभाव हुआ। अतः आप नकारात्मक विचारों को अपने पर हावी न होने दें। जब कभी आपको लगे कि आप पर नकारात्मक विचारों का आक्रमण हो रहा है, तब आप तत्काल सावधान हो जाएं। नकारात्मक विचारों को हटाने के एक-दो सुझाव प्रस्तुत हैं-

1. आप दो-चार गहरा श्वास लें और छोड़ें। इन श्वासों का अनुभव करें। तदुपरांत आंखें बंद कर लें और आते-जाते श्वासों को गहराई से अनुभव करें। श्वासों से भली प्रकार जुड़ जाएं। आपके मन की आंखों को धोखा देकर एक भी श्वास आने-जाने न पाए। आप सावधानीपूर्वक हर आते-जाते श्वास का अनुभव और आनंद लें। यदि कोई विचार आपको परेशान कर रहा हो तो आत्मविश्वास के साथ मन को आदेश दे, ऐ मन! चुप हो जाओ। शांत हो जाओ। अभी मैं आनन्द सरोवर में तैराकी कर रहा हूं। ॐ शांति! ॐ आनंद! ॐ प्रसन्नता! ॐ आह्लाद !

2. नकारात्मक भाव संवेग यथा-क्रोध, चिढ़, द्वेष, नफरत, क्षोभ, आक्रोश आदि पर नियंत्रण भी जरूरी है। आप सावधान रहें कि ये दुष्ट संवेग आपके भीतर प्रवेश न कर पाएं और यदि प्रवेश कर भी जाएं तो ठहर न पाएं। इसके लिए एक दो पहलू पर ध्यान दें। याद रखें, सभी व्यक्तियों की सोच, रूचि व आदतें भिन्न-भिन्न होती है। अतः जो जैसा है, उसे वैसा ही स्वीकार करें। यदि आप उसकी सोच या आदतों पर अपने विचार थोपने का प्रयत्न करेंगे तो वह कुछ ऐसा कह सकता है, जिससे आप क्षुब्ध हो जाएं। अतः शांति और रिश्तों में मधुरता के लिए शांत मौन ही बेहतर है।

नकारात्मक विचारों से

3. दूसरों के अपशब्दों को नजर अंदाज करना सीखे, इससे व्यर्थ के कलह-अशांति से सहज ही बच जाएंगे।

4. जहां तर्क-वितर्क में बहसा-बहसी की संभावना हो रही हो तो वहां से कुछ समय के लिए हट जाएं, इससे नकारात्मक भाव-संवेगों से आपका बचाव हो सकेगा।

5. नकारात्मक भाव-संवेगों के उभार पर भी आप हिम्मत न हारें, इससे मुक्त होने के लिए आप अपने ध्यान को अन्यत्र लगाने का प्रयास करें। नाक से लम्बा श्वास लेकर झटके के साथ मुंह से श्वास फेंक दें। ऐसा आठ-दस बार करें।

6. जहां जाने से, जिसके साथ रहने से, जिसकी बात सुनने से तनाव बढ़ता हो, वहां से नम्रतापूर्वक दूरी बनाए रखना ही बुद्धिमत्ता है।

7. याद रखें, दुख – तनाव अभाव में कम और स्वभाव में अधिक होता है। स्वभाव को विधेयक बनाएं और दुख-तनाव से मुक्ति पाएँ।

8. चिंता या तनाव के उद्रेक में किसी पुरानी और आनंददायक घटना या बात याद करें। ऐसा अनुभव करें, जैसे वह वर्तमान में ही घटित हो रही है। घटना इस तरह सिलसिलेवार याद करें कि चिंता-तनाव का मन में प्रवेश पाना असम्भव हो जाए।

9. तनाव का अहसास होते ही श्वासों के साथ प्रभु सुमिरण में लग जाएं। प्रभु की स्नेहिल छत्रछाया सदैव आपके सिर पर है, इसे बार-बार बोलें और इसका अनुभव करें। जैसे प्रह्लाद के सिर पर नरसिंह भगवान बड़े ही प्रेम और ममता से अपना हाथ फेरे थे, उसी तरह दयालु प्रेमिल प्रभु बड़े ही लाड़-दुलार से आपके सिर पर हाथ फेर रहे हैं, इसे अनुभव कर भावविभोर हो जाएं। ज्ञान, वैराग्य, भक्ति भरा कोई भजन गुनगुनाने लगें।

कहा भी गया है-

महाविपत्तौ संसारे यः स्मरन्मधुसूदनम्।

विपत्तौ तस्य सम्पत्तिर्भवेदित्याह शंकरः।।     देवी भा. पु. ९/४०/४१

             अर्थात् ‘जो पुरुष महाविपत्ति के अवसर पर भगवान का स्मरण करता है, उसके लिए वह विपत्ति संपत्ति हो जाती है, ऐसा शंकर जी का वचन है।’

स्रोत: चिंता क्यों ?

9. नकारात्मक विचारों का दुष्प्रभाव

9. नकारात्मक विचारों का दुष्प्रभाव


नकारात्मक विचारों का दुष्प्रभाव⇒

            नकारात्मक विचारों का शरीर पर क्या प्रभाव पड़ता है, इसका स्पष्ट रूप उजागर हुआ फ्रांस में मृत्युदंड पाए एक व्यक्ति पर इसका परीक्षण किया गया। उसे एक स्थान पर लिटाकर उसकी आंखों पर पट्टी बांध दी गई। उसे सुनाकर कहा गया, तुम्हारे शरीर की नसों को काटकर इतना अधिक रक्तस्राव कराया। जाएगा कि स्वतः तुम्हारी मृत्यु हो जाएगी।

नकारात्मक विचारों

            किसी नुकीली वस्तु को हाथ की नसों पर इस तरह फेरा गया की लगे नसें काट डाली गई हैं, साथ ही शीतोष्ण जल की धारा को धीरे-धीरे हाथ के पास इस प्रकार गिराया जाने लगा कि लगे कि सारा शरीर खून से भींगकर लथ-पथ हो रहा हो। कहा जाने लगा-‘ओह! कितना अधिक रक्त स्राव हो रहा है। लग रहा है जैसे शरीर खून के ही सैलाब में पड़ा हुआ हो। संपूर्ण शरीर रक्त से लाल होता जा रहा है। हाय-हाय ! शरीर के चारों ओर खून ही खून दीख रहा है।’

            जैसे-जैसे इन बातों को दुहराया जाता, तदनुरूप चिंतन करते हुए कैदी की छटपटाहट भी बढ़ती जाती। कुछ देर बाद पुनः कहा गया, ‘ओह! शरीर का तो लगभग सारा खून निकल चुका है। चेहरा स्याह पड़ता जा रहा है। अब यह नहीं बच सकता। किसी हालत में नहीं बच सकता।’ इतना सुनना था कि सचमुच कैदी तड़पकर मर गया।

         आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि न व्यक्ति की नसें काटी गई थी, न खून बहा था। निषेधात्मक विचारों का मानव पर प्रभाव जानने के लिए बिना कुछ हुए ही उसे अहसास कराने का प्रयत्न किया गया था कि नसें काट डाली गई हैं और काफी मात्रा में खून बह रहा है। इसके लिए व्यक्ति को बार-बार झूठ ही कहा जा रहा था कि अत्यधिक खून बह जाने के कारण वह मरणासन्न होता जा रहा है। व्यक्ति ने इसे सत्य समझा औ असका अंतस् निषेधात्मक विचारों से भता गया। फलतः उसने दम तोड़ दिया।

स्रोत: चिंता क्यों

8. चिंतन का चमत्कार

8. चिंतन का चमत्कार


चिंतन का चमत्कार⇒

             चितन में इतनी अद्भुत क्षमता है कि इसके द्वारा व्यक्ति अपने-आपको आसमान से धरती पर, धरती से पाताल तक तथा पाताल से धरती पर एवं धरती से आसमान की अगम ऊंचाइयों तक पहुंचा सकता है। इस रहस्य को जानकर उत्कृष्ट एवं विधेयक चिंतन को ही प्रश्रय दें।

चिंतन का चमत्कार

              चिंतन मस्तिष्क, मन और शरीर सभी को प्रभावित करता है। अगर तीन व्यक्तियों, जिसमें एक क्रोध से थर-थर कांप रहा हो या किसी चिंता से हाल-बेहाल हो, दूसरा शांत और प्रसन्न हो तथा तीसरा परमात्मा के गंभीर ध्यान में मग्न हो, के मस्तिष्क का E.E.G. लिया जाए तो तीनों के मस्तिष्क में उठने-गिरने वाली तरंगों में स्पष्ट विभिन्नता परिलक्षित होगी।

शरीर के विभिन्न अंगों की भिन्न-भिन्न अंतःस्त्रावी ग्रंथियां- चिंता, क्रोध, घृणा, लोभ, कामुकता, द्वेष, तनाव आदि के समय एक विशेष प्रकार के जहर का स्राव करने लग जाती हैं। यह स्राव स्वस्थ शरीर और स्वस्थ चिंतन दोनों के लिए घातक है।

             इस पर वैज्ञानिकों ने खोज किया। प्रसन्नता की अधिकता में गिरे हुए अश्रुओं तथा दुख तनाव में बहे अश्रुओं, दोनों का निरीक्षण किया गया तो पाया गया कि दुख एवं तनाव में बहे अश्रु गर्म थे तथा उसमें शरीर के लिए हानिकाक तत्त्व भारी मात्रा में विद्यमान थे। सके विपरीत प्रसन्नता में गिरे अश्रु अपेक्षाकृत ठंढे थे तथा उसमें शरीर एवं स्वास्थ्य की दृष्टि से उपयोगी तत्त्वों का समावेश था।

स्रोत: चिंता क्यों

7. परिस्थितियां परिवर्तनशील

7. परिस्थितियां परिवर्तनशील


परिस्थितियां परिवर्तनशील

      याद रखें, परिस्थितियां परिवर्तनशील हैं। भगवान राम को देखें, जब उन्हें वनवास मिला तो संपूर्ण अयोध्यावासी रो उठे। सीता और लक्ष्मण के साथ राम वन की ओर प्रस्थान कर रहे हैं, यह सुनकर संपूर्ण अयोध्या में हाहाकार मच गया। सब-के-सब उनके रथ के पीछे रोते-कलपते चलने लगे। शोकविह्वल प्यारे प्रजावासियों को जब राम ने काफी समझाया बुझाया, तब कहीं सब वापस लौटे।

परिस्थितियां परिवर्तनशी

         परिस्थितियां बदलीं। राम जानकी जी को रावण से छुड़ाकर लक्ष्मण के साथ अयोध्या लौट आए हैं। कल जिस अयोध्यावासियों के लिए भगवान राम, सीता और लक्ष्मण प्राण थे-आज निंदनीय हैं। एक धोबी मां जानकी पर आक्षेप लगा रहा है, यह सुनकर मर्यादा पुरूषोत्तम राम ने गुप्तचरों को ज्ञात करने भेजा, ‘इस संबंध में अन्य प्रजाजनों की क्या प्रतिक्रिया है?’ गुप्तचरों ने सूचना दी- ‘बहुसंख्यक जनता धोबी की बातों से सहमत है।’

          देखिए, वह मान जो वन जाते समय था, आज नहीं है। पुनः दृश्य बदला। मां जानकी धर्म और सत्य के प्रताप से भूगर्भ में समा गईं। अयोध्यावासी पश्चात्ताप और ग्लानि से भर उठे। अंततः उन्होंने सीताजी को देवी समझ अपने हृदयासीन किया। जो अपमान था, वह भी गुजर गया।

दुःख लेने जावै नहीं, आवा आचाबूच।

सुख का पहरा होयगा, दुःख करेगा कूच।।     (कबीर साखी दर्पण, भाग-२)

         अर्थात् ‘दुख लेने कोई जाता नहीं। वह अचानक ही आता है, किंतु वह स्थायी नहीं है। जब सुख का पहरा आएगा, तब दुख स्वतः चला जाएगा।’

महाभारत के शांति पर्व १७४/१९ में भी कहा गया है-

सुखस्यानन्तरं दुख दुखस्यानन्तरं सुखम्।

सुखदुखं मनुष्याणां चक्रवत् परिवर्तते ।।

         अर्थात् ‘सुख के पश्चात् दुख औ दुख के पश्चात् सुख होता है। यह शाश्वत नियम है। मनुष्यों के सुख-दुख पहिये की भांति घूमते रहते हैं।

     इस रहस्य को जानकर अहंकार और तनाव दोनों से ऊपर उठकर शांत और आनंदमग्न जीवन जीने की कला सीख लें। याद रखें, समस्या का समाधन चिंता नहीं है। जिंदगी के किसी मोड़ पर यदि आप किसी समस्या से घिर गए हों, विकट परिस्थितियां सामने खड़ी हो, अपमान, गरीबी, दुख, रोग, कष्ट से आप परेशान हों, फिर भी न घबराएं। पुनः याद रखें, ‘यह भी गुजर जाएगा।’

         व्यावहारिक दृष्टि से भी सोचें तो किसी समस्या का समाधान चिंता नहीं है। चिंता से समस्याएं बढ़ती हैं, घटती नहीं। यदि आप चिंताग्रस्त रहते हों तो न आप सही तरीके से कुछ सोच सकते हैं, न अच्छी योजना बना सकते हैं, न ही अपनी कार्यशक्ति को समस्याओं से उबरने के मार्ग में सही ढंग से नियोजित कर सकते हैं । इतनी हानि उठाने के बाद भी तो समस्याएं ज्यों-की -त्यों बनी रहती है।

          जैसे मान लिया किसी प्रतिकूल व्यक्ति, वस्तु परिस्थिति से आपको सामना करना पड़ रहा हो और आप काफी परेशान हों, चिंतित हों, व्यथित हों, उद्विग्न हों, रोते-रोते आंखें सूजा ली हों, रात की नींद उड़ा ली हों, भोजन न रुचता हो, किसी काम में मन न लगता हो, मन-मस्तिष्क चिड़चिड़ा सा हो गया हो, थकावट और सुस्ती ने आ घेरा हो तो आप ही बताइए इससे फायदा क्या हुआ?

        क्या परिस्थितियां बदल गई? ऋण चुक गया? समस्याएं मिट गई? कुछ भी तो नहीं हुआ। यदि ऐसा हो तो खूब चिंतित होइए, खूब परेशान होइए, रात-रात भर जागिए, खाना-पीना छोड़ दीजिए, खूब रोइए, सिर पटक-पटक कर फोड़ डालिए, दो-चार टांके भी लगेगें तो क्या हर्ज है शायद परिस्थितियां बदल जाएं, समस्याएं टल जाएं।

            सोचिए, सिर फोड़ लेने से, रोने से, चिंतित होने से न तो परिस्थितियां बदलती हैं और न ही समस्यों का समाधान ही होता है तो फिर चिंता क्यों? तनाव क्यों, परेशानी क्यों? लाभ क्या? कुछ भी नहीं बस हानि-ही-हानि । एक तो बाहर चिंता का कारण ज्यों-का-त्यों बना रहा और दूसरा अंदर से अशांत, विक्षिप्त, दुखी हुआ गया सो अलग।

             ठीक ही कहा गया है- ‘मनुष्य के जीवन में अनुकूल एवं प्रतिकूल परिस्थितियां आती रहती हैं। इसके लिए शोक या चिंता करना उचित नहीं, क्योंकि परिस्थितियों को अनुकूल करने की शक्ति न शोक में है न चिंता में है, यह युक्तियुक्त उद्योग से ही अनुकूल होती है।’-शातातप

          वणिकों से शिक्षा लें। एक चीज में घाटा होने पर वे सभी चीजों को घाटा में नहीं बेच देते। मान लिया जाय, किसी दुकानदार को गेहूँ में घाटा लग रहा है तो वह दाल, मसाला, चावल, चीनी इत्यादि को शौक से घाटा में नहीं बेच देता। उसी तरह अगर बाहर प्रतिकूल परिस्थितियों से सामना करना पड़ रहा है तो इसका अर्थ यह नहीं कि अंदर की शांति को भी खोकर दुगुनी क्षति उठाने की मूर्खता की जाय। आप कम-से-कम अंदर की क्षति को तो रोकने में पूर्ण समर्थ हैं।

            बाहर के सुख-दुख, लाभ-हानि, अनुकूलता-प्रतिकूलता भले ही भाग्य के खेल हों, परंतु अंदर की अशांति, चिंता-तनाव आदि आपकी नासमझी है। आप इससे उबरकर हर परिस्थिति में शांत और प्रसन्न रहकर मुस्करा सकते हैं।

              जो व्यक्ति समस्याओं के सामने आने पर भी मुस्कराता रहता है और अपना साहस नहीं छोड़ता, उसे छोड़कर समस्याएं भाग खड़ी होती हैं। इसके विपरीत जो समस्याओं के समक्ष हिम्मत हार बैठता है और अपनी सूरत रोनी-सी बना लेता है, समस्याएं उस पर चारों तरफ से आक्रमण करती रहती है।

             किसी ने ठीक ही कहा है, ‘तुम उदास रहते हो तो दुख तुम्हें चारो तरफ से घेर कर तुम पर टूट पड़ता है। तुम मुस्करा देते हो तो दुख तुम्हें छोड़कर कमरे से बाहर दरवाजे के पास ठिठक कर खड़ा हो जाता है। अगर तुम खिलखिला कर हंस पड़ते हो तो दुख तुम्हें छोड़कर दूर भाग जाता है। अतः दुखमुक्त होना चाहो तो प्रसन्न हने की कला सीखो।

स्रोत: चिंता क्यों

6. यह भी गुजर जाएगा

6. यह भी गुजर जाएगा


यह भी गुजर जाएगा

              एक राजा था। उसने अपने राज्य में ढिंढोरा पिटवाया कि कोई ऐसा सूत्र बतलावे जो दुःख-सुख, लाभ-हानि, जीवन-मरण, आया, जीत-हार, अपने-पराये सभी परिस्थितियों में समान लाभदायी हो। महीनों बीत गए। किसी के दिमाग में ऐसा सूत्र नहीं जो सभी परिस्थितियों में समान लाभदायी हो। राजा जंगल की ओर बढ़ गया। कुछ दूर जाने पर एक संत एक पेड़ के नीचे बैठे दिखाई दिए। राजा की आंखों में आशा की ज्योति चमकी। उन्होंने संत के चरणों में नतमस्तक हो नम्रतापूर्वक अपने प्रश्न को श्रीचरणों में निवेदन किया।

यह भी गुजर जाएगा

            महात्मा हंसे। एक कागज पर कुछ लिखकर उसे एक ताबीज में बंद कर राजा के गले में पहनाते हुए बोले-‘वत्स! यह सूत्र सभी अवसरों में समान लाभदायी है। जब कभी अवसर आए, इससे लाभ ले लेना। ‘

          संतचरणों में नतमस्तक हो राजा अपने राज्य लौट आया। ताबीज गले में लटकती रही और राजा राज्यकार्य में व्यस्त रहा। समय व्यतीत होता गया। दो वर्ष बीत गए। एक बार पड़ोसी देश के राजा ने उसके राज्य पर आक्रमण कर दिया। सेनाएं तैयार न थीं, अतः घबराए हुए उसके सैनिकों को रौंदती हुई पड़ोसी देश की सेना राजमहल में प्रवेश कर गई। परेशान राजा भयभीत हो प्राण रक्षा के उद्देश्य से भाग निकला। पीछे-पीछे शत्रु सेना और आगे-आगे घोड़े पर सवार राजा।

           किंकर्तव्यविमूढ राजा बेतहाशा घोड़े को दौडाए जा रहा था। अचानक घोड़ा बिदका और ठिठककर रूक गया। सामने एक गहरा खड्ड था। खड्ड लांघना कठिन था। भयभीत राजा शीघ्रता से पास की झाड़ी में जा छुपा। पसीने से लथपथ वह थर-थर कांप रहा था कि सहसा उसे ताबीज का ख्याल आया। ताबीज खोला तो उसमें रखे पूर्जे में एक छोटा सा वाक्य लिखा था-‘यह भी गुजर जाएगा।’

            पढ़कर राजा सोचने लगा- ‘सचमुच आज तक न जाने जीवन में क्या-क्या आया, क्या-क्या देखा, क्या-क्या पाया- लेकिन कुछ भी ठहरा नहीं, गुजरते चला गया। मान-अपमान, सुख-दुख, अच्छा-बुरा कितना कुछ आया, किंतु सब-के-सब गुजरते चला गया। घबराहट कुछ कम हुई। उसे विश्वास हो गया, निश्चय ही ‘यह भी गुजर जाएगा।’

             अब तक वह परेशान था, भयभीत था, घटना का नायक भोक्ता था, अब वह द्रष्टा है, शांत, निश्चित, प्रसन्न। सचमुच कुछ ही देर बाद दुश्मन के घोड़ों की टापों की आवाज कम होने लगी। शायद दुश्मन रास्ता भटक गए थे। राजा श्रद्धा-भक्तिपूर्वक ताबीज पहना और वहाँ से निकल पड़ा। कुछ दिन बाद पुनः सैन्य संगठन कर वह शत्रुओं पर धावा बोल दिया और अंततः विजयी हुआ।

दृश्य का परिवर्तन

           अब उसके राज्य में चारों ओर खुशियाँ मनाई जा रही है। दीपमालाएँ सजाई गई हैं। राजमहल सजाया गया है। चारो ओर उत्सव का-सा वातावरण है। विजयी राजा अपने महल की ओर लौट रहा है। सभी उनपर फूलों की वर्षा कर रहे है। महल के पास आकर राजा सहसा रुक गया। ताबीज निकाला और पढ़ा-‘यह भी गुजर जाएगा।’ राजा हंसने लगा।

लोग पूछे-‘आप हंस क्यों रहे हैं?”

राजा ने कहा-‘हंसने की ही तो बात है। यहाँ कुछ भी नहीं ठहरता, सभी गुजर जाते हैं। काल की वेगवती धारा में सब बहे जा रहे हैं लेकिन… !” सहसा राजा कुछ गंभीर हो गया और सोचने लगा-‘क्या इस गुजरने वाली भीड़ में न गुजरने वाला कोई स्थायी तत्त्व नहीं है? और यदि है तो उसे ढूंढना चाहिए।’

         राजा पुनः संत के पास गया और अपनी जिज्ञासा को संत चरणों में निवेदित किया।

संत बोले, ‘न गुजरने वाला स्थायी तत्त्व कहीं खो नहीं गया है, जो उसे ढूंढोगे। वह तो नित्य प्राप्त है। गुजरने वाली वस्तु से संबंध न जोड़, इसका भोक्ता न बन, द्रष्टा बन जा, स्वयं अविनाशी तत्त्व का बोध हो जाएगा। वह अविनाशी न गुजरने वाला तत्त्व तू ही है।’

          राजा सुखी हो गया। राज्य किया पर द्रष्टा बनकर। ‘यह भी गुजर जाएगा’– इस बोध को पाकर वह सुख में ‘अहंकार और राग’ तथा दुख में ‘तनाव और द्वेष’ दोनों से ऊपर उठकर ‘स्व’ में स्थित हो आनंदमग्न हो गया।

        ठीक ही कहा गया है, ‘यदि जीवन है तो सुख एवं दुख, उन्नति या विपत्ति का क्रम बना ही रहता है। इस विश्व में कोई ऐसा नहीं हुआ, जिस पर विपत्ति नहीं आई हो। अतः इस पर चिंता करना व्यर्थ है विपत्ति का निस्ताण धैर्य एवं युक्तिपूर्ण पौरुष से होता है, चिंता से नहीं।’– महात्मा विदूर

         इसलिए सद्गुरु कबीर साहब कहते हैं-

कबीर मैं तबही डरूँ, जो मुझ ही में होय।

मीच बुढ़ापा आपदा, सब काहु को जोय।।       – (कबीर साखी दर्पण, भाग-२)

         अर्थात् ‘ कबीर साहब कहते हैं, मैं तब डरूं जब केवल मुझमें ही होता हो, परंतु मृत्यु, बुढ़ापा, आपदा तो सब किसी में देखा जाता है। फिर दुख और डर कैसा?”

स्रोत:चिंता क्यों

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