4. लाप्लास की निहारिका परिकल्पना (Nebular Hypothesis of Laplace)

4. लाप्लास की निहारिका परिकल्पना

(Nebular Hypothesis of Laplace)


लाप्लास की निहारिका परिकल्पना

लाप्लास की निहारिका

              फ्रान्सीसी विद्वान लाप्लास ने अपना मत सन् 1796 ई० में व्यक्त किया, जिसका वर्णन उन्होंने अपनी पुस्तक ‘Exposition of the World System’ में किया है। यह परिकल्पना काण्ट के विचार से कुछ साम्य रखती है। लाप्लास ने काण्ट की कुछ गलतियों को दूर करके अपना संशोधित विचार व्यक्त किया।

            काण्ट की परिकल्पना के मुख्य तीन दोष थे:-

(1) निहारिका अथवा आद्य पदार्थ के कणों के टकराव से पर्याप्त ताप उत्पन्न नहीं हो सकता है।

(2) कणों के टकराव से गति नहीं हो सकती है।

(3) आकार में वृद्धि के साथ गति में वृद्धि नहीं हो सकती है।

            इन अशुद्धियों को दूर करने के लिए लाप्लास ने कुछ कल्पनायें की हैं, जिन पर आधारित होकर उनका सिद्धान्त आगे चलता है:-

(1) प्रथम समस्या अर्थात् निहारिका के ताप की समस्या हल करने के लिये उन्होंने यह मान लिया कि ब्रह्माण्ड में पहले से एक विशाल तप्त निहारिका (नेबुला ) थी।

(2) यह निहारिका प्रारम्भ से ही गतिशील थी।

(3) यह निहारिका निरन्तर शीतल होकर आकार में सिकुड़ती गयी।

            इस प्रकार उपर्युक्त तीन स्वयं के माने हुये तथ्यों के अनुसार अतीत काल में ब्रह्माण्ड में एक गतिशील एवं तप्त महापिण्ड था, जिसको लाप्लास ने निहारिका नाम दिया है। निहारिका की गति के कारण विकिरण द्वारा उष्मा का ह्रास होने लगा जिस कारण इसका बहिर्भाग शीतल होने लगा।

           इस प्रकार निहारिका के निरन्तर शीतल होने के कारण उसमें संकुचन होने लगा। परिणामस्वरूप निहारिका के आकार अथवा आयतन में ह्रास होने लगा। आयतन में कमी के कारण निहारिका की गति में निरन्तर वृद्धि होने लगी। यहाँ पर काण्ट की तृतीय गलती भी दूर हो जाती है। अत्यधिक गति के कारण केन्द्रापसारित बल (centrifugal force) के कारण निहारिका के मध्यवर्ती भाग के पदार्थ भारहीन होने लगे तथा मध्य भाग बाहर की ओर उभरने लगा।

               ऊपरी भाग निरन्तर शीतल होने के कारण अत्यधिक घना हो गया, परन्तु यह ऊपरी भाग निचले भाग के साथ भ्रमण नहीं कर सका। इस प्रकार ऊपरी भाग, निरन्तर शीतल होते तथा सिकुड़ते मध्य भाग से, छल्ला के रूप में पृथक होने लगा। कुछ समय बाद यह गोल छल्ला निहारिका से अलग होकर बाहर निकल आया तथा निहारिका का चक्कर लगाने लगा।

              लाप्लास के अनुसार निहारिका से केवल एक ही छल्ला बाहर निकला तथा बाद में यह छल्ला नौ छल्लों में विभाजित हो गया। (जबकि काण्ट के अनुसार निहारिका से ही नौ छल्ले निकले थे) तथा प्रत्येक छल्ला एक-दूसरे से दूर हटता गया। प्रत्येक छल्ले के समस्त पदार्थ ने एक स्थान पर गांठ के रूप में एकत्रित होकर ‘गर्म वायव्य ग्रन्थि’ (Hot gaseous agglomeration) का रूप धारण किया, जो आगे चलकर  शीतल होकर ठोस बन कर ग्रह बन गया।

           इस प्रकार नौ ग्रहों का निर्माण हुआ। इसी क्रिया की पुनरावृत्ति के कारण ग्रहों से उपग्रहों का आविर्भाव हुआ। निहारिका का अवशिष्ट भाग सूर्य बना।

लाप्लास की निहारिका परिकल्पना

          उन्नीसवीं शताब्दी के मध्य में फ्रान्सीसी विद्वान रॉस “(Roche) ने लाप्लास की परिकल्पना में संशोधन प्रस्तुत किया। लाप्लास के अनुसार निहारिका से निकले एक भारी छल्ले से कई पतले छल्ले बाहर निकल गये परन्तु रॉस ने बताया कि मुख्य निहारिका से ही कई पतले छल्ले क्रमश: अलग हो गये। प्रत्येक छल्ला घनीभूत होकर ग्रह बन गया। इसी क्रम के जारी रहने से समस्त ग्रहों की उत्पति हुई।

मूल्यांकन

      अपने सरल रूप के कारण लाप्लास की परिकल्पना को प्रारम्भ में पर्याप्त समर्थन मिला तथा लगभग 150 वर्षों तक इसका समादर (आदर) होता रहा। परन्तु सौर्य-मंडल सम्बन्धी नवीन वैज्ञानिक तथ्यों एवं सिद्धान्तों के प्रकाश में आने के कारण इस परिकल्पना का समर्थन जाता रहा।

          इस परिकल्पना में न केवल पृथ्वी की उत्पत्ति की समस्या ही हल की गयी है, वरन् उसकी रचना तथा स्वभाव का भी वर्णन किया गया है। इसके अनुसार ग्रह प्रारम्भ में मौलिक रूप में वायव्य अवस्था में थे। तत्पश्चात् शीतल होते समय तरल अवस्था में आये एवं अन्त में ठोस भूपटल (solid crust) का निर्माण हुआ। परन्तु इस मत के विपरीत कुछ विद्वानों ने यह बताया है कि पृथ्वी अपनी उत्पत्ति एवं वृद्धि-काल से ही एक ठोस रूप में रही होगी।

          अधिकांश विद्वानों के अनुसार पृथ्वी के इतिहास में एक तरल अवस्था अवश्य रही होगी। अत: ‘निहारिका परिकल्पना’ का इस सम्बन्ध में पर्याप्त महत्व है। इस परिकल्पना के विरोध में निम्नांकित तथ्य प्रस्तुत किये जा सकते हैं-

(1) सौर्य-मण्डल के विभिन्न ग्रहों का वर्तमान ‘कोणीय आवेग’ (angular momentum), जो कि प्रारम्भ में मौलिक निहारिका में व्याप्त था, भ्रमण की अधिकता से निहारिका को तोड़ने के लिए पर्याप्त नहीं है। दूसरे शब्दों में यह कहा जा सकता है कि निहारिका के मौलिक कोणीय आवेग से पदार्थ निहारिका से अलग नहीं हो सकता था।

             ‘कोणीय आवेग की स्थिरता के सिद्धान्त’ (laws of conservation of angular momentum) के अनुसार मौलिक निहारिका का कोणीय आवेग, वर्तमान सूर्य एवं उसके सदस्य ग्रहों के कुल कोणीय आवेग के बराबर होना चाहिये, जबकि ऐसा न होकर सम्पूर्ण कोणीय आवेग का 98 प्रतिशत भाग ग्रहों तथा शेष 2 प्रतिशत भाग वर्तमान सूर्य में है। इस प्रकार यह परिकल्पना गणितीय सूत्रों के विपरीत है।

(2) निहारिका से 9 छल्ले ही क्यों निकले? नौ से अधिक भी छल्ले निकल सकते थे। इस समस्या का निदान लाप्लास की तरफ से नहीं मिलता है। घनीभवन के कारण एक छल्ले का सारा पदार्थ एक ही गोल पिण्ड के रूप में नहीं बदल सकता है। वस्तुत: छल्ला छोटे-छोटे कई टुकड़ों में टूट जायेगा तथा एक ही छल्ले से कई छोटे-छोटे स्वतंत्र ग्रह बनेंगे।

(3) निहारिका के कणों की ”अल्प पारस्परिक संलग्नता” (small degree of cohesion between the particles of nebula) के द्वारा छल्लों के निकलने का क्रम जारी रहेगा तथा उस क्रिया में अवकाश नहीं हो सकता।

(4) यदि ग्रहों की उत्पत्ति निहारिका से हुई तो प्रारम्भ में वे द्रवित अवस्था में रहे होंगे। परन्तु द्रवित अवस्था में ग्रह निर्बाध रूप से परिभ्रमण तथा परिक्रमा नहीं कर सकते क्योंकि द्रव के विभिन्न स्तरों की गति समान नहीं होती और उनमें घर्षण होता रहता है। केवल ठोस पिण्ड ही पूर्णरूपेण  परिभ्रमण तथा परिक्रमा कर सकता है।

(5) इस परिकल्पना के अनुसार सभी ग्रहों के उपग्रहों को अपने पिता ग्रहों की दिशा में ही घूमना चाहिए। इस तथ्य के विपरीत शनि तथा वृहस्पति के उपग्रह अपने पिता-ग्रह के विपरीत दिशा में भ्रमण करते हैं। सम्भवत: लाप्लास की परिकल्पना के समय तक केवल ऐसे ही उपग्रहों का पता लग पाया था जो अपने पिता ग्रह के चारों तरफ घूमते थे। बाद में चलकर ऐसे अन्य उपग्रहों की खोज हुई जो कि अपने पिता-ग्रह के विपरीत दिशा में घूमते हैं।

(6) यदि सूर्य, निहारिका का ही एक भाग है तो तरल अवस्था में होने के कारण इसके बीच में उभार होना चाहिए जिससे यह मालूम पड़ता हो कि एक नवीन छल्ला पृथक् होकर बाहर निकलने ही वाला है। पर ऐसा नहीं देखा जाता है।

(7) लाप्लास यह मानकर चलते हैं कि प्रारम्भ में एक गतिशील तथा तप्त निहारिका थी, पर यह निहारिका कहाँ से आयी? उसमें उष्मा तथा गति कैसे पैदा हुई? इन प्रश्नों का उत्तर इस परिकल्पना से नहीं मिल पाता है।

            इस प्रकार यह कहा जाता है कि लाप्लास की यह परिकल्पना कल्पना मात्र ही है। उपर्युक्त त्रुटियों के आधार पर यह प्रमाणित किया जाता है कि यह ‘निहारिका परिकल्पना’ पृथ्वी की उत्पति के विषय में गलत धारणा तो प्रस्तुत करती ही है, साथ ही साथ पृथ्वी के इतिहास तथा उसके भूगर्भ के विषय में भी गलत तथ्यों का प्रचार करती है। वर्तमान समय में यह परिकल्पना मान्य नहीं है।

3. काण्ट की वायव्य राशि परिकल्पना (Kant’s Gaseous Hyphothesis)

3. काण्ट की वायव्य राशि परिकल्पना

(Kant’s Gaseous Hyphothesis)


काण्ट की वायव्य राशि परिकल्पना 

काण्ट की वायव्य राशि

      पृथ्वी की उत्पत्ति के सम्बन्ध में जर्मन दार्शनिक काण्ट ने सन् 1755 ई० में अपनी ”वायव्य राशि परिकल्पना” का प्रतिपादन किया जो कि न्यूटन के गुरुत्वाकर्षण के नियमों पर आधारित थी। प्रारम्भ में इस मत की सराहना हुई, परन्तु बाद में इसे तर्कहीन प्रमाणित कर दिया गया, क्योंकि यह मत गणित के गलत नियमों पर कल्पित किया गया था।

       प्रस्तुत परिकल्पना काण्ट द्वारा कल्पित अनेक तथ्यों पर आधारित है। सर्वप्रथम काण्ट ने यह मान लिया कि प्राचीन काल में (अतीत काल में) ब्रह्माण्ड में दैवनिर्मित आद्य पदार्थ (Premordial matter) बिखरे हुए थे। प्रारम्भ में ये पदार्थ अत्यन्त कठोर, शीतल तथा गतिहीन थे।

       पुनः काण्ट ने यह मान लिया कि आपसी आकर्षण के कारण ये कण (आद्य पदार्थ) एक-दूसरे से टकराने लगे। इस आपसी टकराव के कारण ताप तथा भ्रमण गति का आविर्भाव हुआ। ताप में निरन्तर वृद्धि होती गयीं, जिस कारण आद्य पदार्थ एक वायव्य राशि में परिवर्तित होने लगे। ताप तथा भ्रमण गति (Rotation) के परिणामस्वरूप प्रारम्भिक शीतल तथा गतिहीन वायव्य पदार्थ एक तप्त तथा गतिशील निहारिका (Nebula) में परिवर्तित हो गया। निहारिका ताप के आविर्भाव के साथ ही घूमने लगी, उसके आकार में वृद्धि होने लगी, जिस कारण ताप में वृद्धि से निहारिका की परिभ्रमण गति में भी वृद्धि होने लगी।

       इस प्रकार निहारिका इतनी तीव्र गति से घूमने लगी कि केन्द्रापसारित बल (केन्द्र से बाहर की ओर जाने वाला बल-Centrifugal force) के प्रभाव से निहारिका के मध्य भाग में उभार आने लगा तथा इस क्रिया की तीव्रता के कारण (अर्थात् केन्द्रापसारितल की तीव्रता के कारण) पदार्थ का एक छल्ला निहारिका से बाहर निकल गया।

      इसी क्रिया की पुनरावृत्ति (Repetition) के कारण पदार्थ के नौ (9) गोल छल्ले निहारिका से अलग हो गये। धीरे-धीरे एक छल्ला के सभी पदार्थ एक स्थान पर एकत्रित होकर एक गाँठ के रूप में शीतल होकर जमकर ठोस हो गये। इस तरह नौ छल्लों से (गाँठ के रूप में) नौ ठोस पदार्थों का निर्माण हुआ, जो कि आगे चलकर नौ ग्रह के रूप में बदल गये।

काण्ट की वायव्य राशि

            इस प्रकार काण्ट के अनुसार पृथ्वी की उत्पत्ति, केन्द्रापसारित बल द्वारा निहारिका से अलग हुये छल्ले के पदार्थों के एक स्थान पर गाँठ के रूप में जमकर ठोस होने से हुई। मौलिक निहारिका का जो भाग अवशिष्ट रह गया, वह सूर्य के रूप में परिवर्तित हो गया।

         उपर्युक्त प्रक्रिया की पुनरावृत्ति के कारण ग्रहों से उनके उपग्रहों का निर्माण हुआ अर्थात् नव-निर्मित गतिशील ग्रहों से केन्द्रापसारित बल के प्रभाव से पदार्थों के वलयाकार छल्ले अलग हो गये, जिनमें से प्रत्येक छल्ला के सभी पदार्थ एक स्थान पर घनीभूत होकर उपग्रह (Satellite) बन गये। इस तरह सम्पूर्ण सौर्य-मंडल का आविर्भाव हुआ।

आलोचना (Criticism):-

           यद्यपि काण्ट महोदय ने पृथ्वी की उत्पत्ति की समस्या के समाधान के लिए विज्ञान के तथ्यों का सहारा लिया था तथापि इनका मत वर्तमान समय में आधारहीन प्रमाणित कर दिया गया है, क्योंकि इस पकिल्पना के निम्नलिखित कई तथ्य गणित के नियमों के विपरीत हैं:-

(1) सर्वप्रथम यह आरोप लगाया जाता है कि कणों के आपसी टकराव से भ्रमण गति पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता है। इस प्रकार निहारिका की निरन्तर गति-वृद्धि त्रुटिपूर्ण है।

(2) काण्ट की यह परिकल्पना कि आद्य पदार्थ में गति कणों के आपसी टकराव से हुई, जो कि ”कोणीय आवेग की स्थिरता के सिद्धान्त” (Laws of conservation of angular momentum) के विपरीत है, क्योंकि आपसी टकराव से गति नहीं उत्पन्न हो सकती है।

(3) काण्ट की यह धारणा कि निहारिका के आकार में वृद्धि के साथ गति भी बढ़ती गयी जो कि इस सिद्धान्त के विपरीत है, क्योंकि ‘कोणीय आवेग की स्थिरता के सिद्धान्त’ के अनुसार यदि किसी पिंड का आकार बढ़ता है तो गति घटती है और यदि आकार बढ़ता है तब गति घटती है।

निष्कर्ष:

          निष्कर्षत: कहा जा सकता है की वह मूल आधार ही, जिस पर काण्ट की परिकल्पना आधारित है, गलत प्रमाणित किया जाता है। काण्ट की परिकल्पना का महत्व इस बात में है कि उन्होंने इस क्षेत्र में प्रयास करके आगे आने वाले विद्वानों के लिए मार्ग प्रशस्त कर दिया। यह परिकल्पना आगे चलकर लाप्लास की निहारिका परिकल्पना की आधारशिला बनी।

1. Nature and Scope of ​​Geomorphology (भू-आकृति विज्ञान की प्रकृति और विषय क्षेत्र)

1. Nature and Scope of ​​Geomorphology  

(भू-आकृति विज्ञान की प्रकृति और विषय क्षेत्र)



             स्थलमण्डल के दृश्य भागों अर्थात् स्थलरूपों का वैज्ञानिक अध्ययन भू-आकृति विज्ञान में किया जाता है, इसलिए भू-आकृति विज्ञान को स्थलरूपों का विज्ञान कहते हैं। भू-आकृति विज्ञान के लिए अंग्रेजी में प्रयुक्त किये जाने वाले Geomorphology शब्द की उत्पत्ति ग्रीक भाषा से हुई है, जिसका शाब्दिक अर्थ (Geo-पृथ्वी, morphi-रूप और logos-वर्णन) भी स्थलरूपों के अध्ययन से सम्बन्धित है।

Nature and Scope of ​​Geomorphology

      इस विज्ञान के अन्तर्गत अध्ययन किये जाने वाले उच्चावचनों को तीन श्रेणियों में रखा जाता है-

(i) प्रथम श्रेणी के उच्चावचन-

        इसके अन्तर्गत महाद्वीप तथा महासागरीय बेसिन को सम्मिलित करते हैं। इनके वितरण, वर्तमान प्रारूप तथा उत्पत्ति का अध्ययन किया जाता है।

(ii) द्वितीय श्रेणी के उच्चावचन–

       इसके अन्तर्गत पृथ्वी के अन्तर्जात बलों द्वारा उत्पन्न रचनात्मक स्थलाकृतियों यथा पर्वत, भ्रंश, पठार, मैदान तथा झीलों का अध्ययन सम्मिलित है। इन स्थलाकृतियों के अध्ययन के लिए पृथ्वी के अन्तर्जात बलों तथा प्रक्रमों के स्वरूप तथा क्रियाविधि का अध्ययन भी आवश्यक होता है।

(iii) तृतीय श्रेणी के उच्चावचन-

      इसके अन्तर्गत बहिर्जात प्रक्रमों (वायुमंडल से उत्पन्न यथा– जल, सरिता, सागरीय जल, भूमिगत जल, पवन, हिमनद एवं परिहिमानी) द्वारा अपक्षय, अपरदन एवं निक्षेपण द्वारा जनित स्थलरूपों की आकारिकी, उत्पत्ति एवं विकास का गहन अध्ययन किया जाता है इन स्थलरूपों को निर्मित्त, प्रभावित एवं परिमार्जित करने वाले प्रक्रमों को सम्मिलित रूप में अनाच्छादनात्मक प्रक्रम (Denudational Processes) कहते है जिसके अंतर्गत अपक्ष्य (Weathering) तथा अपरदन (Erosion, निक्षेपण भी) को सम्मिलित करते है।

थार्नबरी के अनुसार- भू-आकृति विज्ञान स्थलरूपों का विज्ञान है, परन्तु इसमें अन्तः सागरीय रूपों के अध्ययन को सम्मिलित किया जाता है।

स्ट्राहलर के अनुसार- भू-आकृति विज्ञान भौतिक भूगोल का एक प्रमुख अंग है जो सभी प्रकार के स्थलरूपों की उत्पत्ति तथा उनके व्यवस्थित एवं क्रमबद्ध विकास की व्याख्या करता है।

ए. एल. ब्लूम के अनुसार- भू-आकृति विज्ञान स्थलाकृतियों तथा उन्हें परिवर्तित करने वाले प्रक्रमों का क्रमबद्ध वर्णन एवं विश्लेषण करता है।

बारसेस्टर महोदय ने इसे पृथ्वी के उच्चावचों का व्याख्यात्मक वर्णन करने वाला विज्ञान कहा है। यह भू-पटल के विभिन्न रूपों, उनकी उत्पत्ति, इतिहास तथा विकास की व्याख्या करता है।

       निष्कर्षतः भू-आकृति विज्ञान में स्थलरूपों का व्यवस्थित एवं वैज्ञानिक अध्ययन किया जाता है। इसमें न केवल स्थलरूपों के आकार (आकृति) का अध्ययन किया जाता है अपितु इन स्थलरूपों पर क्रियाशील अपरदनात्मक एवं निक्षेपणात्मक प्रक्रमों की भी व्याख्या समयानुसार क्रमबद्ध विकास के आधार पर की जाती है।

           ज्ञातव्य है कि भू-आकृति विज्ञान में पृथ्वी सतह पर विद्यमान स्थलरूपों का, उनके ऐतिहासिक विकास क्रम का तथा उन प्रक्रमों का अध्ययन किया जाता है जिनसे स्थलरूपों का निर्माण होता है। इन प्रक्रमों में विवर्तनिक शक्तियाँ (उत्थान, अवतलन) अपक्षय, अपरदन, परिवहन और निक्षेपण महत्वपूर्ण हैं।

          भौतिक भूगोल और भूविज्ञान (Earth Sciences) दोनों से ही भू-आकृति विज्ञान घनिष्ठ रूप से सम्बन्धित है। भू-आकृति विज्ञान में स्थलरूपों का स्थानिक पैमाने पर (उर्मिकाओं से लेकर पर्वतों तक) और कालिक पैमाने पर (सैकण्ड से लेकर लाखों वर्षों तक) अध्ययन किया जाता है। वस्तुतः स्थलरूप, जिन पदार्थों से बने हैं (शैल और आवरण सामग्री) तथा जो प्रक्रम एवं बल इन पदार्थों पर क्रियाशील रहते हैं, के बीच सन्तुलन के प्रतीक हैं।

           अपक्षय और अपरदन के प्रक्रम सम्मिलित रूप से क्रियाशील रहकर जहां एक ओर स्थलरूपों का विनाश करते हैं वहीं दूसरी ओर वे स्थलरूपों का सृजन अथवा निर्माण करते हैं। उल्लेखनीय है कि पृथ्वी सतह पर तल शैल अथवा आधार प्रस्तर (Bedrock) और मिट्टी जैसे निष्क्रिय पदार्थों पर जलवायु और भूपृष्ठीय गतियां (Crustal Dynamics) जैसे क्रियाशील कारकों के सक्रिय होने से स्थलरूपों का निर्माण होता है। विभिन्न प्रकार के भू-आकृति प्रक्रमों में गुरुत्व बल महत्वपूर्ण चालक शक्ति होती है।

           गुरुत्व बल के अतिरिक्त सूर्यताप तथा पृथ्वी के आन्तरिक भाग में विद्यमान ऊर्जा भी भू-आकृतिक प्रक्रमों के संचालन में सहायक होती है। पृथ्वी के आन्तरिक भाग में विद्यमान ऊर्जा भ्रंशन क्रिया को जन्म देती है। इस दृष्टि से पृथ्वी की उत्पत्ति, आकार, सौरमण्डलीय सम्बन्धों, गतियों, शक्तियों तथा प्रक्रियाओं का अध्ययन भी भू-आकृति विज्ञान में किया जाता है।

         भूदृश्य या दृश्यभूमि के मानव कल्याणकारी उपयोग हेतु स्थलरूपों का अध्ययन एवं उनका सम्यक ज्ञान एक व्यावहारिक आवश्यकता बन गई है, विशेषकर वर्तमान समय में जबकि भूदृश्य में होने वाले कुछ परिवर्तन मानव एवं प्राकृतिक पर्यावरण के लिए विपत्तिकारक बन चुके हैं। इसी कारण से वर्तमान में मानवीय कार्यों के भू-आकृतिक प्रक्रमों पर पड़ने वाले प्रभावों का अध्ययन भी इसके अन्तर्गत किया जाने लगा है।

विषय क्षेत्र:-

         विकासवादी भू-आकृति विज्ञान में स्थलरूपों के विकास क्रम का व्यवस्थित अध्ययन किया जाता है। इसी के अन्तर्गत क्षेत्र के भू-आकृतिकीय विकास की प्रमुख घटनाओं का तिथिकरण किया जाता है।

         डेविस ने स्थलरूपों के विकास क्रम को अपरदन चक्र के द्वारा समझाया है, जिसमें तीव्र ढाल समय के साथ अन्ततः धीमे ढाल वाले पेनीप्लेन में बदल जाता है। अन्य भू-आकृति विज्ञानवेत्ताओं, जिन्हें अनाच्छादन कालक्रम विज्ञानवेत्ता (Denudation Chronologists) कहा जाता है, ने बताया है कि किस तरह प्रादेशिक स्थलरूप समय के साथ हुए अपरदन एवं भूपृष्ठीय सतह के उत्थान की तीव्रता अथवा दर के अनुरूप विकसित हुए हैं। इन्होंने भूतकाल की अपरदनात्मक सतहों पर तिथिकरण द्वारा स्थलरूपों के विकास को समझाने का प्रयास किया।

         कुछ भू-आकृति विज्ञानवेत्ताओं ने परिवर्तित जलवायु के प्रभावों द्वारा स्थलरूपों के विकास को समझाया है। जलवायवीय भू-आकृति विज्ञान में स्थलरूपों और उनके ऊपर क्रियाशील भू-आकृतिक प्रक्रमों को प्रादेशिक जलवायवीय दशाओं से सम्बन्धित कर अध्ययन किया जाता है। जैसे ठण्डे क्षेत्रों में विद्यमान जलवायवीय दशाओं में हिमनद एक प्रभावी भू-आकृतिक प्रक्रम है जो भूदृश्य में परिवर्तन लाता है। इसी प्रकार वनस्पति विहीन रेगिस्तानी क्षेत्रों में पवन प्रमुख भू-आकृतिक प्रक्रम है।

           चट्टानों के प्रकार और भूगर्भिक संरचना (जैसे भ्रंश और वलन) के स्थलरूपों पर प्रभावों का अध्ययन संरचनात्मक भू-आकृति विज्ञान में किया जाता है। अधिकांश भू-आकृतिक प्रक्रमों की क्रियाशीलता चट्टानों की कठोरता और कोमलता से प्रभावित होती है। इसी तरह अधिकांश ढाल रूप चट्टानों की कठोरता और विन्यास (Disposition) के अनुरूप विकसित होते हैं। स्थलरूपों पर क्रियाशील प्रक्रमों (जैसे अपक्षय, अपरदन) की तीव्रता और प्रकृति का अध्ययन प्रक्रम भू-आकृति विज्ञान में किया जाता है। इसी में नदी बेसिनों और पहाड़ी ढालों पर होने वाले शैल पुंज प्रवाह (Mass Wasting) का अध्ययन किया जाता है। इन गतिशील प्रक्रमों की क्रियाविधि पर मानव के क्रियाकलापों से उत्पन्न प्रभावों का अध्ययन जैव-भू-आकृति विज्ञान में किया जाता है।

        मानव ने अपनी गतिविधियों के द्वारा विभिन्न भू-आकृतिक प्रक्रमों की क्रियाविधि में परिवर्तन ला दिया है। भूमि उपयोग में परिवर्तन तथा वन विनाश से मृदा अपरदन बढ़ा है। इसी प्रकार अम्ल वर्षा से शैलों के विघटन की प्रक्रिया तीव्र हुई है। मानव जीवन को बेहतर बनाने के लिए भू-आकृति विज्ञान के व्यावहारिक ज्ञान के उपयोग का अध्ययन व्यावहारिक भू-आकृति विज्ञान में किया जाता है।

        आज सम्पूर्ण विश्व में तटीय भागों में अपरदन, हिमनदों का पिघलना और उनकी गति का तीव्र होना, भूस्खलन, जल संयोजकों का अपरदन, बांधों में अवसादों का जमाव, मरुद्यानों और परिवहनों मार्गों पर बालुका स्तूपों का विस्तार, उत्खात भूमि का विस्तार, आदि जैसे समस्याओं की मॉनीटरिंग, पहचान और प्रबन्धन में व्यावहारिक भू-आकृति विज्ञान की महत्वपूर्ण भूमिका है।

प्रश्न प्रारूप

1. भू-आकृति विज्ञान को परिभाषित कते हुए इसके विषय क्षेत्र की विवेचना कीजिये।

11. संथाल जनजाति के वास स्थान, सामाजिक, आर्थिक एवं सांस्कृतिक विशेषताएँ

11. संथाल जनजाति के वास स्थान, सामाजिक, आर्थिक एवं सांस्कृतिक विशेषताएँ


संथाल जनजाति के वास स्थान, सामाजिक, आर्थिक एवं सांस्कृतिक विशेषताएँ

संथाल जनजाति

                   भारतीय जनजातियों में संथाल अपने परम्परावादी सामाजिक संगठन, हिन्दू रीती-रिवाज के अनुसार मृतक एवं शादी संस्कार और अनेक प्रकार के आर्थिक कार्यों के कारण अपनी पहचान बनाये हुए हैं। ये कृषि, पशुपालन, वन, वस्तु-संग्रह, आखेट और नौकरी अनेक आर्थिक कार्य करते हैं। श्रमिक के रूप में इनका मौसमी स्थानान्तरण दूर-दराज के मैदानी भागों में होता है जहाँ वे कृषि और अन्य निर्माण कार्यों में काम करते हैं और पुनः अपने क्षेत्र में लौट आते हैं। इससे प्रकट होता है कि इन्हें अपनी मिट्टी से बहुत लगाव होता है।

            संथाल बारह गोत्रों में बँटे हुए हैं यथा-हल्डाक, विस्कृ, भरमू, हेमब्रायी, भारण्डी, सरेन, टूड, बैसर, वास्के, बेडिंम, चोरे तथा पैरिया। प्रत्येक गोत्र की अपनी परम्परा होती है और बहुधा एक गोत्र के लोग एक गाँव में रहते हैं। अनुमानतः संथालों की संख्या 30 लाख से अधिक है जिसका अधिकांश झारखंड के संथाल परगना में निवास करते हैं। अपने रूप-रंग भाषा और परम्परा से ये मलाया, जावा और हिंदेशिया के आदिवासियों से मिलते जुलते हैं। कहा जाता है कि संथाल यहाँ के आदिवासी हैं।

               इनका काला रंग, औसत कद, सामान्य नाक-नक्शा द्रविड़ प्रजाति के निकट है जिसे कोल के नाम से जाना जाता है। ये शरीर से चुस्त और मन से भोले-भाले किन्तु सच्चे और सहिष्णु होते हैं। यही कारण है कि मैदानी भागों में आसानी से खप जाते हैं। अपनी रोटी के लिए संथाल बड़ी संख्या में बिहार, बंगाल, उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश में स्थानान्तरण करते हैं। इनका पूरा परिवार साथ-साथ प्रवास करता है।

निवास क्षेत्र:-

            संथाल जनजाति के लोग बंगाल की वीर-भूमि उड़ीसा के कटक और झारखंड के पलामू, हजारीबाग, राँची और संथाल परगना आदि जनपदों में पाये जाते हैं। इनके निवास का प्रमुख क्षेत्र बिहार का संथाल परगना राँची पठार का भाग है जिसकी औसत ऊँचाई 200 से 250 मी० के मध्य है। यह पठारी भाग उत्तर एवं दक्षिण में राजमहल की पहाड़ियों से घिरा हुआ है।

          पठार लावा निक्षेपण के कारण लगभग समतल है। लेकिन बीच-बीच में पहाड़ियों और नदी घाटियों के कारण एकबद्ध नहीं हैं। ब्राह्मणी, युआनी, अजय एवं मोर प्रमुख नदियाँ हैं जिनकी तलहटी जलोढ़ के कारण काफी उपजाऊ है। पठार एवं पहाड़ी ढाल वनों से आच्छादित है क्योंकि वहाँ पर्याप्त वर्षा होती है जिसका औसत 150 से०मी० से अधिक है। ऐसे भौगोलिक परिवेश में संथाल उपयुक्त भूमि पर कृषि करते हैं जहाँ कृषि भूमि नहीं है वहाँ वन वस्तु-संग्रह आखेट और पशुपालन से अपना जीवन-यापन करते हैं।

शारीरिक लक्षण:-

          संथाल जनजाति का कद औसतन कम, इनका मुँह बड़ा, मोटे होठ, लम्बा सिर, चौड़ी नाक तथा बाल घुंघराले होते हैं।

अर्थव्यवस्था:-

      आदिवासी लोग आज के विज्ञान के युग में भी अधिकांशतया प्रकृति पर  ही आश्रित हैं। हजारों वर्षों से उनकी सम्पत्ति के मुख्य स्रोत जंगल, पहाड़, घाटियाँ एवं नदियाँ ही रही हैं। जंगलों तथा पहाड़ों से खाद्य-संग्रह करना, नदियों तथा तालाबों से मछली पकड़ना तथा कहीं-कहीं घाटियों व अन्यत्र पहाड़ी ढालों पर कृषि करना ही उनकी आजीविका के प्रमुख साधन रहे हैं।

       संथाल लोगों का मुख्य व्यवसाय कृषि है। कृषि उत्पादन की कमी को आखेट द्वारा पूरा किया जाता है। ये मुख्यतः मोटे अनाजों की फसलें उगाते हैं। ये लोग वनों को काटकर खेती योग्य भूमि प्राप्त करते हैं तथा उनका प्रयोग बसने के रूप में भी करते हैं। पूर्णतः कृषि से जीवन-निर्वाह न चलने के कारण ये लोग चाय के बागों, मिलों तथा खानों में मजदूरी करते हैं।

संथाल जनजाति में विवाह:-

          संथालों में विवाह शब्द ‘बाप्ला’ नाम से जाना जाता है। अपने हो वंश में विवाह इन लोगों में निषेध है। ये किसी भी अन्य वंश में विवाह कर सकते हैं। यह प्रचलित प्रथा है कि तीन पीढ़ी के बाद आपस में विवाह सम्पन्न किया जा सकता है। लेकिन कभी-कभी कुछ वंशों में विवाह परम्परागत संघर्षो की वजह से निषिद्ध माना जाता है, जिसका ये लोग आज भी पालन करते हैं। अक्सर विवाह में लड़कियों को वरण का अवसर मिलता है।

          विवाह विशिष्ट दो प्रकारों से ही सम्पन्न होता है। प्रथम, वह जिसमें विवाह ‘रैबर’ (Marriage Maker) के द्वारा तय किया जाता है, जिसका प्रचलन आजकल बढ़ गया है। दूसरी प्रथा, जिसमें विवाह बिना ‘रैबर’ की सहायता के लड़के तथा लड़की के माता-पिता अथवा स्वयं लड़के-लड़की निश्चय करते हैं।

धर्म एवं जादू:-

         संथालों में धर्म का महत्वपूर्ण प्रभाव रहा है, जिसने सम्पूर्ण जनजाति को सामाजिक एकता के सूत्र में रखने का प्रयत्न किया है। जादू के द्वारा उस अज्ञात रहस्यमय शक्ति पर नियंत्रण तथा प्रभुत्व रखा जाता है जो कि हानिकारक सिद्ध हो सकती है। विभिन्न प्रकार के धार्मिक प्रकार्यों के लिये अलग-अलग व्यक्ति होते हैं जिन्हें भिन्न-भिन्न नामों से सम्बोधित किया जाता है जैसे- ओझा, जगुरु, कामरुगुरु, रेरेनिक, अतोनेक, कुदामनेक तथा देहरी।

            प्राकृतिक कारणों से बीमार व्यक्ति का उपचार करने वाला व्यक्ति रेरेनिक कहलाता है अथवा जड़ी-बूटी वाला डाक्टर कहा जाता है। जब यह व्यक्ति उपचार करने में सफलता नहीं प्राप्त कर सकता है तो फिर उन लोगों को उपचार करने के लिये बुलाया जाता है जिन्हें ‘बोंगा’ का समर्थन प्राप्त होता है तथा जनगुरु अथवा ओझा को भी बुलाया जाता है, जो जड़ी-बूटी के अतिरिक्त जादुई शक्ति से बीमार व्यक्ति को ठीक करने का प्रयत्न करते हैं।

 

प्रश्न प्रारूप

1. संथाल जनजाति के वास स्थान, सामाजिक, आर्थिक एवं सांस्कृतिक विशेषताओं का वर्णन कीजिए।

10. गोंड जनजाति के निवास तथा आर्थिक-सामाजिक क्रिया-कलाप

10. गोंड जनजाति के निवास तथा आर्थिक-सामाजिक क्रिया-कलाप



 गोंड जनजाति के निवास तथा आर्थिक-सामाजिक क्रिया-कला

गोंड जनजाति

          गोंड मध्य प्रदेश की सबसे महत्त्वपूर्ण जनजाति है जो प्राचीनकाल में उस क्षेत्र में रहती थी जिसे गोंडवानालैण्ड कहते हैं। यह एक स्वतंत्र जनजाति थी।

निवास क्षेत्र:-

           गोंड जनजाति के वर्तमान निवास स्थान मध्य प्रदेश के पठारी भाग (जिसमें छिन्दवाड़ा, बैतूल, सिवनी और मांडला के जिले सम्मिलित है) छत्तीसगढ़ मैदान के दक्षिणी दुर्गम क्षेत्र (जिसमें बस्तर जिला सम्मिलित है), छत्तीसगढ़ और गोदावरी एवं वेनगंगा नदियों के पर्वतीय क्षेत्रों के अतिरिक्त बालाघाट, बिलासपुर, दुर्ग, रायगढ़ एवं रायसेन जिलों में है। इनका सर्वाधिक जमाव मध्य प्रदेश में मध्यवर्ती पहाड़ी एवं वनाच्छादित पठारों तथा सतपुड़ा पर्वत के पूर्वी और दक्षिणी अगम्य क्षेत्रों में पाया जाता है। इनका निवास क्षेत्र 17°46′ से 23°22′ उत्तरी अक्षांश और 80°15′ तथा 82°15′ पूर्वी देशान्तरों के बीच है।

वातावरण सम्बन्धी परिस्थितियाँ:-

           गोंडों का निवास क्षेत्र पूर्णतः पहाड़ी और वनाच्छादित है। ऊँची-नीची भूमि, वनस्पति एवं पशुओं का गोंडों के जीवन पर बड़ा प्रभाव पड़ता है। एकान्त में रहने से ये पिछड़े हुए किन्तु ईमानदार और सरल चित्त, उदार, साहसी एवं चतुर और स्पष्टवादी होते हैं। ये आलसी नहीं होते किन्तु परिस्थितियों ने इन्हें निष्क्रिय अवश्य बना दिया है। वनों से जंगली कन्दमूल फल, गृह निर्माण और टोकरियाँ बनाने के लिए अनेक प्रकार की बेंते एवं शराब बनाने के लिए महुआ, ताड़, खजूर आदि का रस प्राप्त किया जाता है। पहाड़ी क्षेत्रों में लोहा मिलने से ये उसे पिघलाकर सामान्य औजार भी बना लेते हैं।

शारीरिक गठन:- 

            गोंड लोग काले तथा गहरे रंग के होते हैं। उनका शरीर सुडौल होता है किन्तु अंग भद्दे होते हैं। बाल मोटे, गहरे और घुंघराले, सिर गोल, चेहरा अण्डाकार, आँखे काली, नाक चपटी, ओठ मोटे, मुँह चौड़ा, नथुने फैले हुए, दादी एवं मूँछ पर बाल कम कद 165 सेमी० होता है। गोंडों की स्त्रियाँ पुरुषों की तुलना में कद में छोटी, शरीर सुगठित एवं सुन्दर रंग पुरुषों की अपेक्षा कुछ कम काला, होठ मोटे, आँखें काली और बाल लम्बे होते हैं। 

 

बस्तियाँ और घर:-

           गोंडों के घर और बस्तियों के बसाव में सामान्यतः दो बातों का ध्यान रखा जाता है-भौगोलिक अनुकूल स्थिति एवं जल प्राप्ति की सुविधा।

         ये पठारों, मैदानों, ऊँचे-नीचे पहाड़ी ढालों तथा निम्न मैदानी भागों में बनाये जाते हैं जहाँ प्राकृतिक रूप से सुरक्षा मिल सके। इनके खेतों के निकट ही जल के स्रोत उपलब्ध हों। गाँव की स्थिति में वनों की निकटता का महत्व अधिक होता है क्योंकि इसी से इन्हें लकड़ियों, कन्द-मूल फल एवं शिकार की प्राप्ति करने की सुविधा होती है।

         गोंडों की सभी झोंपड़ियाँ आँगन के चारों ओर बनायी जाती हैं। नयी झोपड़ियाँ फसल कटाई के बाद और पुरानी झोंपड़ियों की मरम्मत वैशाख महीने में की जाती है।

भोजन:-

            गोंड अपने वातावरण द्वारा प्रस्तुत भोजन-सामग्री पर अधिक निर्भर रहते हैं। इनका मुख्य भोजन कोदों और कुटकरी मोटे अनाज होते हैं जिन्हें पानी में उबालकर झोल (Broth) या राबड़ी अथवा दलिये के रूप में दिन में तीन बार खाया जाता है-प्रातःकाल, मध्यान्ह और राधि में।

          रात्रि में चावल अधिक पसन्द किये जाते हैं। कभी-कभी कोदों और कुटकी के साथ सब्जी एवं दाल का भी प्रयोग किया जाता है। कोदों के आटे से रोटी (गोदाला) भी बनायी जाती है। महुआ, टेंगू और चर के ताजे फल भी खाये जाते हैं। आम, जामुन, सीताफल और आँवला तथा अनेक प्रकार के कन्द-मूल भी खाने के लिए काम में लाये जाते हैं। रोटी को तेल से चुपड़ते हैं। सब्जियों में कद्दू, ककड़ी, चने की पत्तियाँ, रतालू, इमली तथा आम मुख्य होते हैं। बाँस की कॉपल कुकरमुत्ता, प्याज, लहसुन, मिर्च आदि का भी उपयोग किया जाता है। चावल, उबली हुई दाल और मसाले मुख्यतः उत्सवों व दावतों के अवसर पर ही अधिक काम में लेते हैं। कन्द-मूल और लाल चीटियाँ इनके प्रिय खाद्य पदार्थ हैं।

          मैदानी क्षेत्रों में शिकार से प्राप्त सुअर, गाय, बकरी, बतख, कुत्ते, हिरण, मगरमच्छ, साँप, कबूतर आदि का माँस बड़े शौक से खाया जाता है। ये लोग चूहे, गोह, गिलहरी का माँस भी खाते हैं। जिन क्षेत्रों में मछलियाँ मिल जाती हैं, वहाँ मछलियाँ भी खायी जाती हैं। ये लोग भोजन में कन्द-मूल, पशु-पक्षी, सभी का उपयोग करते हैं। इनमें मद्यपान का प्रचलन अधिक है। विवाह और उत्सवों के अवसर पर विशेष रूप से शराब पी जाती है।

             महुआ के फूलों से मंडिया, ताड़ और खजूर के रस से ताड़ी (Toddy) और चावल से लोंगा शराब का प्रचलन अधिक है। गाँजा, भाँग, तम्बाकू, पान, सुपारी खाने का भी काफ रिवाज है। तम्बाकू मिट्टी या पत्तों से बनी चिलम से पी जाती है। गाय, भैंस और बकरी का दूध भी पिया जाता है। वनों से प्राप्त शहद का भी प्रयोग करते हैं।

वस्त्राभूषण:-

        आरम्भ में गोंड लोग या तो पूर्णतः नंगे रहते थे अथवा पत्तियों से अपने शरीर को ढँक लेते थे। अब वे वस्त्रों का प्रयोग करने लगे हैं किन्तु वस्त्र कम ही होते हैं। अधिकांश पुरुष लंगोटी से अपने गुप्तांगों एवं जांघों को ढँक लेते हैं। कभी-कभी सिर पर एक अंगोछे प्रकार का कपड़ा भी बाँध लेते हैं। कुछ लोग पेट और कमर ढँकने के लिए अलग से पिछ लपेट लेते हैं। स्त्रियाँ धोती पहनती हैं जिससे शरीर के ऊपर और नीचे का भाग ढँक जाता। ये चोली नहीं पहनतीं छातियाँ खुली रहती हैं। 7-8 वर्ष तक के बालक नंगे रहते हैं तथा 5-6 साल की लड़कियाँ लंगोटी बाँधे रहती हैं। वर्षा से बचाव के लिए बरसाती कोट और टोप भी उपयोग किया जाता है जो पतियों और बाँस की खपच्चियों का बना होता है।

                सर्दियों में शरीर को ढँकने के लिए ऊनी कम्बल काम में लाया जाता है। अपने शरीर को सजाने के लिए राख तथा रंगों से इसे पोत लेते हैं। अनेक प्रकार के पशुओं और बतखों के पंखों को सिर पर लगा लेते हैं। पुरुषों के बाल लम्बे होते हैं। बैलों के सींगों से भी सिर को सजाया जाता है। पुरूष गले में सफेद या लाल मोतियों की माला और कानों में बालियाँ पहनते हैं तथा बालों में कंघी खोंसे रहते हैं। स्त्रियाँ अपने चेहरे, जाँघों तथा हाथों पर गोदने गुदवाती हैं। ये नकली बालों के जूड़े में फूल लगाती हैं तथा उसमें सीगों की कंघियाँ अनिवार्य रूप से लगाती हैं। कमर में पीतल की छोटी-छोटी घण्टियों वाली कमरधनी पहनी जाती है, कानों में बालियाँ पहनी जाती हैं। हाथों में काँच की चूड़ियाँ या चाँदी के दस्तबन्द पहने जाते हैं।

           उत्सव अथवा पर्व के समय स्त्री-पुरुष आकर्षक रूप से अपने शरीर को प्राकृतिक वस्तुओं द्वारा सजाते हैं। नृत्य के समय विशेष प्रकार की पोशाक पहनी जाती हैं। ढोल, नगाड़े, बाँसुरी इनके प्रमुख वाद्य यंत्र होते हैं।

आर्थिक क्रियाकलाप:-

            गोंडों का प्राचीन व्यवसाय शिकार करना और मछली मारना था किन्तु अब पशुओं के शिकार पर रोक लगा दिये जाने से चोरी-छिपे शिकार किया जाता है। पहले चीतों, जंगली भैसों, हिरणों और चिड़ियों का शिकार अधिक किया जाता था, अब प्रायः हिरणों, खरगोशों और जंगली भैसों का ही शिकार अधिक किया जाता है। सामान्यतः शिकार के लिए विष बुझे तीरों का प्रयोग किया जाता है, केवल खरगोश आदि के लिए जालों और फन्दों का उपयोग किया जाता है। गोंडों को जंगली पशु-पक्षियों के विभिन्न रूपों और आदतों का पूरा ज्ञान होता है। अतः उन्हें शिकार में पूरी सफलता मिलती है। स्त्रियाँ शिकार को शोर-गुल मचाकर नदियों की घाटियों में खदेड़ लाने का काम करती हैं।

           अन्य बड़े जंगली पशुओं को फँसाने के लिए कई तरकीबें की जाती हैं। खेतों के चारों ओर बाँस का घेरा खींच दिया जाता है और एक स्थान पर मुख्य द्वार छोड़ देते हैं और दूसरे स्थान पर सँकरा रास्ता जिसके सामने एक लम्बा गड्ढ़ा खोदकर उसे टहनियों, पत्तियों, घास-फूस से पाटकर उस पर बालू मिट्टी डाल देते हैं। रात्रि में जब पशु खेत में घुस जाता है तो रक्षा करते हुए खेत का मालिक चिलाता है जिससे पशु घबड़ाकर सँकरे मार्ग की ओर भागता है और वहाँ बने गढ्ढे में गिर जाता है। चूहों और बन्दरों को भी मारा जाता है।

          मछलियाँ सामान्यतः तालाबों और नदियों में मुख्यतः मारिया गोंड़ों द्वारा टोकरियों, जाल और बाँसों के सहारे पकड़ी जाती हैं। मछली पकड़ने का कार्य सभी वयस्कों द्वारा व्यक्तिगत तथा सामूहिक रूप से किया जाता है। अनेक बार नदियों के जल को जहरीला कर दिया जाता है जिससे मछलियाँ मर जाती हैं और स्त्रियाँ उन्हें निकाल लेती हैं।

            वनों से जंगली कन्द-मूल, फल, गाँठदार सब्जियाँ, जड़ी-बूटियाँ, शहद, फूल-पत्तियाँ, गूलर, महुआ, सेमल की रूई, चिरौंजी, कचनार, अमलतास, हारसिंगार, खजूर, ताड़ के फल, लाख, इमली, जामुन, साबूदाना एकत्रित कर उसे निकटवर्ती बाजारों में बेच दिया जाता है। इन्हें खाया भी जाता है। वनों से पशुओं की खालें भी एकत्रित की जाती हैं। गोंड लोग दूध के लिए गाय, भैंस, बकरी, बोझा ढोने के लिए बैल तथा माँस के लिए सुअर, बतखें और कबूतर भी पालते हैं।

      अब अधिकांश गोंड़ खेती भी करते हैं जिसे स्थानान्तरित कृषि कहा जाता है। इस प्रकार की खेती में वृक्षों अथवा झाड़ियों को काटकर जला दिया जाता है, फिर 2-3 वर्ष उस पर खेती करने के बाद अन्यत्र दूसरे खेत तैयार किये जाते हैं। इस प्रकार की कृषि को डिप्पा (Dippa) या परका (Parka) कहा जाता है। परका कृषि में वृक्ष जलाये जाते हैं, जबकि डिप्पा में झाड़ियाँ। इस प्रकार की कृषि में फावड़े से खोदकर बीज बोया जाता है। बीज बो देने पर वन देवी एवं देवताओं को अच्छी फसल की प्राप्ति हेतु पशुओं की बलि चढ़ायी जाती है।

         जब पहाड़ी ढालों पर सीढ़ीनुमा आकार के खेत बनाकर कृषि की जाती है तो उसे पेंडा कृषि कहते हैं। यह सामान्यत: बस्तर में की जाती है। इसमें खेत बिना जोते ही बोये जाते हैं। दो-चार फसलें लेने के उपरान्त खेत खुले छोड़ दिये जाते हैं जिससे उन पर जब पुनः घास-फूस उग आती  है तो उसे जला दिया जाता है। ढाल के निचले भागों की ओर लट्ठों या मिट्टी-पत्थर की मेंड़ बनाकर मिट्टी रोकी जाती है।

          स्थानान्तरण खेती आज भी मांडला के वैगाचाक, बस्तर के अबूझमाड़, सरगुजा, बिलासपुर और रायगढ़ के कुछ आदिवासी क्षेत्रों में की जाती है। खेती करने के ढंग पुराने हैं। लोहे के कुदाली और कुल्हाड़ी ही उनके औजार होते हैं। खाद, अच्छे बीज और सिंचाई की सुविधा न होने से उत्पादन कम होता है।

        खेती सामान्यतः घरों के पास ही की जाती है। खेती में स्त्री-पुरुष सभी का सहयोग मिलता है। अनाज मांडने, उड़ाने और साफ करने का कार्य पुरूष और लड़के करते हैं। स्त्रियाँ खेतों को तैयार करने का कार्य करती हैं। खेती हेर-फेर के साथ भी की जाती है। यह क्रम इस प्रकार होता है-मोटे अनाज, मक्का, दाल और फलियाँ। घर के निकट कुछ ऊँची सामने वाली भूमि पर बाड़ियाँ होती हैं जिसमें पशुओं के गोबर तथा विष्टा का खाद देकर उसमें तम्बाकू, ककड़ी, चना, कद्दू आदि सब्जियाँ पैदा की जाती हैं।

           खेती के अतिरिक्त गोंड लोग निर्माण कार्यों में मजदूरी, लकड़ी काटने, ग्वाले, कुम्हार, बढ़ई, लुहार, पालकियाँ उठाने तथा अन्य प्रकार के कार्य करते हैं। कुछ गोंड स्त्रियाँ टोकरियाँ और रस्सियाँ बनाती हैं। ये अन्य घरेलू काम भी करती हैं।

सामाजिक व्यवस्था:-

            गोंड लोग अनेक छोटे-छोटे समूहों में विभक्त होते हैं। समूहों का वर्गीकरण सामान्यतः उस क्षेत्र के नाम पर होता है जिसमें गोंड लोग रहते हैं। बस्तर जिले में इन्हें मुरिया या मारिया कहते हैं। मुरिया तीन विभागों में बाँटें गये हैं- जगदलपुर मुरिया, झोरिया मुरिया और घोटुल मुरिया।

         मुरिया(मारिया) लोगों के दो उप-विभाग हैं- पहाड़ी मारिया (Hill Marias) तथा सॉंग लगाने वाले मारिया (Bisan Horn Marias)। मण्डला जिले में गोंडों के चार उप-विभाग पाये जाते है-देव गोंड, राज गोंड, सूर्ववंशी देवगाड़िया गोंड और रावणवंशी गोंड। अन्तिम प्रकार के गोंडों का समाज व्यवस्था में सबसे निम्न स्थान होता है, जबकि अन्य तीन अपने को क्षत्रियों के समवर्ती मानते हैं।

        झारखण्ड में तीन उप-विभाग हैं-राजगोंड, जो उच्च वर्ग की श्रेणी में आते हैं; धूरगोंड, जो कृषक श्रेणी अथवा सामान्य श्रेणी के होते हैं और कमिया जो श्रमिक श्रेणी के होते हैं।

       राजगोंडों के अन्तर्गत मालगुजार, पटेल और गाँव की भूमि के स्वामी, गाँव का प्रधान मण्डल आते हैं। कृषक वर्ग पहले वर्ग से भूमि किराये या लगान पर लेकर खेती करता है, तीसरे वर्ग में श्रमिक आते हैं, इसमें ओझा, बैगा, गुनिया, लोहार आदि आते हैं जो विभिन्न वर्गों की सेवा करते हैं।

गोत्र:-

       अधिकांश गोंड गोत्र पर आधारित होते हैं जो बहिर्विवाही हैं अर्थात् ये लोग अपने मित्र समूह के बाहर ही विवाह करते हैं। गोंडों के गोत्र पशुओं अथवा वृक्षों के नाम पर होते हैं। उदाहरणार्थ, तुमरीहावीका गोत्र तेंदू के वृक्ष से, टीकम गोत्र टीकम वृक्ष से, नाग से सम्बन्धित नागवान, बकरी से सम्बन्धित किटीमरबी, सुअर से सम्बन्धित पडीमरबी।

        गोत्र का निर्धारण पिता के गोत्र से होता है। एक गोत्र के समस्त सदस्यों में एक सम्बन्ध माना जाता है तथा पारस्परिक विवाह निषिद्ध होता है। प्रायः एक गाँव में एक ही गोत्र के लोग रहते हैं।

          गोंडों में संयुक्त परिवार और वैयक्तिक परिवार दोनों ही प्रथाएँ मिलती हैं। संयुक्त परिवार को भाईबन्द कहा जाता है। एक भाईबन्द में पति पत्नी, उनके अवयस्क लड़के-लड़कियाँ, विवाहित पुत्र एवं उनकी पत्नियाँ और बच्चे होते हैं। ये सब मिलकर एक सामाजिक और आर्थिक इकाई बनाते हैं। कृषि, शिकार, गृहनिर्माण आदि कार्यों में सभी सदस्य सामूहिक रूप से काम करते हैं। इनका मुखिया सरदार कहलाता है। इसके निर्देशानुसार सारी क्रियाएँ की जाती हैं और इसी का पारिवारिक अधिकार प्राप्त होते हैं।

        इस परिवार की सम्पत्ति संयुक्त सम्पत्ति मानी जाती है। वैयक्तिक परिवार में पति, पत्नी और उनके अवयस्क पुत्र-पुत्रियाँ सम्मिलित होते हैं। परिवार पितृसतात्मक होती है। स्त्री-पुरुष का कार्य विभाजन स्पष्ट होता है। स्त्रियाँ घरेलू कार्य (सफाई झांडू-पोंछा, भोजन बनाना, पशुओं की देखभाल करना), कृषि कार्यों में सहयोग देना तथा वन से लकड़ियाँ और अन्य वस्तुएँ एकत्रित कर लाने का काम करती हैं। पुरुष खेती, शिकार, व्यापार आदि करने का कार्य करते हैं।

विवाह:-

         गोंडों में विवाह पद्धति विकसित अवस्था में पायी जाती है। बाल-विवाह प्रायः नहीं होते। जब तक लड़की रजस्वला न हो और जब तक उसने यौन-क्रियाओं का आनन्द न लिया हो, सामान्यतः विवाह नहीं किया जाता। लड़का 24-25 वर्ष की उम्र में विवाह करता है। जीवन-साथी का चुनाव वयस्क लड़के-लड़कियाँ स्वयं करते हैं। सामान्यतः एक विवाह की प्रथा प्रचलित है किन्तु सम्पन्न गोंड एक से अधिक पत्नियाँ रख सकते हैं। बहु-पत्नी प्रथा बाँझपन से छुटकारा पाने के लिए, यौन शक्ति का अतिरिक्त आनन्द उठाने के लिए तथा सम्पन्नता और सामाजिक श्रेष्ठता प्रदर्शित करने के लिए प्रचलित है।

        गोंडों में मामा, बुआ की लड़की से विवाह करना (Cross-cousin marriage) सर्वश्रेष्ठ माना जाता है। ऐसे विवाह को ‘दूध लौटाना’ कहते हैं। यदि किसी कारणवश ऐसा न हो तो दोषी पक्ष को हर्जाना देना पड़ता है जिसे ‘दूध बुँदा’ कहा जाता है। विवाह की दूसरी प्रथा पारस्परिक सम्पत्ति द्वारा विवाह करने की है जिसमें लड़की अपनी पसन्द के लड़के पर कुछ व्यक्तियों की मौजूदगी में हल्दी घोलकर डाल देती है और तब लड़का उसे घर ले जाकर बिरादरी को भोज दे देता है। जिससे विवाह वैध हो जाता है। विवाह की तीसरी प्रथा सेवा द्वारा पत्नी प्राप्त करने (लमसेना, लमना) की होती है जिसमें लड़का, लड़की के पिता के यहाँ 5 वर्षों तक खेती-बाड़ी और घर का काम करता है। इसके बाद दोनों का विवाह हो जाता है।

             कभी-कभी लड़का अपने साथियों के साथ, अवसर पाकर लड़की को उसके गाँव से भगा लाता है और वह उस पर हल्दी का पानी घोलकर डाल देता है जिससे लड़की उसकी पत्नी बन जाती है। बाद में अन्य रस्में लड़के के दरवाजे पर पूरी की जाती हैं। एक अन्य पद्धति में लड़की अपने पसन्द के लड़के के घर में जा बैठती है, विशेषतः जब वह उससे गर्भवती हो जाती है।

             इस प्रकार गोंडों के विवाह में इतनी विभिन्नता और लचीलापन पाया जाता है कि यह कहना प्रायः कठिन होता है कि कौन-सा विवाह नियमित और कौन-सा अनियमित और अस्वीकृत है। सभी प्रकार के विवाह के रूप यौन क्रियाओं के बाद पूरे हो जाते हैं और बिरादरी को दावत देकर स्त्री-पुरूष के सभी प्रकार के यौन सम्बन्धों को वैध बना दिया जाता है। विवाह की क्रियाओं में खम्भे के चारों ओर घूमना, लड़के-लड़की पर हल्दी का पानी डालना, तेल लगाना, नाच-गाना, मदिरापान करना मुख्य होते हैं।

          पति या पत्नी दोनों में कोई भी विवाह विच्छेद कर सकता है किन्तु सामान्यतः तलाक बहुत ही कम होते हैं। चरित्रहीनता, झगड़ालूपन, यौन व्याधियाँ आदि तलाक के मुख्य कारण होते हैं। तलाक में गाँव पंचायत के समक्ष यदि पत्नी तलाक देती है तो नये पति को उसके पूर्व पति को पर्याप्त हर्जाना तथा बिरादरी को भोज देना पड़ता है। एक वर्ष बाद विधवा दूसरा विवाह कर सकती है। प्रायः बड़े भाई की विधवा पत्नी का विवाह छोटे भाई के साथ ही होता है किन्तु यदि विधवा किसी अन्य पुरुष को चाहे तो उस पर हल्दी और तेल लगा देती है और पुरूष उसे माला पहना देता है या अँगूठी अथवा चूड़ियाँ किन्तु उस पुरुष को बिरादरी को भोज देना आवश्यक होता है।

ग्रामीण संस्थाएँ:-

          प्रत्येक गाँव में एक पंचायत अथवा अनेक गाँवों को मिलाकर (एक पंचायत) होती है जिसके प्रमुख को मण्डल पटेल या मुकद्दम कहते हैं। पंचायत का कार्य गाँव की सुख-सुविधाओं का ध्यान रखना, समस्याओं और विवादों को सुलझाना है। पंचायत के अन्य पदाधिकारी प्रमुख पुजारी (भूमा-गैत), जाति के पुजारी (वदाई) और गुनिया या वैध होते हैं। पुजारी का काम धार्मिक क्रियाओं को सम्पन्न करना होता है। गुनिया जड़ी-बूटियों से गाँव के लोगों की चिकित्सा करता है तथा झाड़-फूंक द्वारा भूत-प्रेत सम्बन्धी व्याधियों को दूर करता है।

नोट:

निवास क्षेत्र (Residential area)

वातावरण सम्बन्धी परिस्थितियाँ (Environmental conditions)

शारीरिक गठन (Physical structure)

बस्तियाँ और घर (Settlements and houses)

भोजन (Food)

वस्त्राभूषण (Clothes and ornaments)

आर्थिक क्रियाकलाप (Economic activities)

सामाजिक व्यवस्था (Social system)

गोत्र (Clan)

विवाह (Marriage)

ग्रामीण संस्थाएँ (Rural institutions)

प्रश्न प्रारूप @

1. गोंड जनजाति के निवास तथा आर्थिक-सामाजिक क्रिया-कलापों पर प्रकाश डालें।

अथवा गोंड के अधिवास, सामाजिक-आर्थिक और सांस्कृतिक विशेषताओं की विवेचना कीजिए।


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9. एस्किमों के निवास तथा सामाजिक-आर्थिक अध्ययन

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एस्किमों के निवास

                 70° या 80º के उत्तरी अक्षांश के निकट एस्किमो लोगों का निवास स्थान है। अति शीतल जलवायु का प्रभाव इनके जीवन पर प्रत्यक्ष दिखलाई पड़ता है। प्रकृति की इन कठिन परिस्थितियों में रहकर जीवन निर्वाह करने वाले मानव की कल्पना भी करना कठिन कार्य होगा। यहाँ मनुष्य ने प्रकृति की प्रतिकूलता पर विजय पाने में कमाल कर दिखाया है।

                  सैकड़ों वर्षों से ऐसे जगह एस्किमों इतनी कठोर जलवायु के प्रदेश में रहते चले आ रहे हैं। जहाँ भूमि लगभग वर्ष भर बर्फ से ढँकी रहती है। शरद ऋतु में यह बर्फ अधिक मोटी और कठोर हो जाती है। जनवरी मास का औसत तापमान -45 सेन्टीग्रड होता है। ग्रीष्म ऋतु बहुत छोटी होती है। इस ऋतु में दिन का ताप कभी-कभी 10° सेन्टीग्रेड तक पहुँच जाता है। यहाँ मिट्टी की परत बहुत पतली है और यह भी सदैव बर्फ से ढकी रहती है।

शारीरिक बनावट:-

            एस्किमो नाम से अभिप्राय कच्चा माँस खाने वाले व्यक्ति से है। यह  नाम अमरीकन इण्डियों द्वारा दिया गया था। एस्किमो अपने आपको ‘इनुइत’ अर्थात् ‘मानव’ कहते हैं। सम्भवतः ये लोग संसार के अन्य निवासियों को मानव नहीं अपितु किसी अन्य वर्ग के जीव समझते हैं।

           एस्किमो कुछ भूरे एवं पीले रंग के होते हैं। इनका चेहरा गोल और चौड़ा होता है। किन्तु शरीर का डौल सुन्दर नहीं होता। इनका कद मध्यम होता है। शरीर मजबूत और गोश्तदार होता है। शरीर के ऊपरी भाग की अपेक्षा कमर से नीचे का भाग दुर्बल होता है। ये लोग संसार में अपनी प्रसन्नचित मुद्रा के लिए विख्यात हैं। ये लोग भूखे रह सकते हैं किन्तु बिना मुस्कराए नहीं रह सकते। यह प्रसन्नता एस्किमो के आन्तरिक सुख की सूचक है।

निवास क्षेत्र:-

          एस्किमों का निवास-क्षेत्र ग्रीनलैण्ड, बेफिन द्वीप के चारों ओर तथा कनाडा के उत्तरी भाग में मुख्यतः पाया जाता है। यह क्षेत्र लगभग 5000 किलोमीटर लम्बा है। एस्किमो की संख्या इतने विस्तृत क्षेत्र में केवल 30,000 के लगभग है। प्रकृति की क्रूरता इन लोगों को यहाँ से भगा न सकी, किन्तु ये लोग प्रकृति का सामना करते हुए अधिकाधिक बल प्राप्त कर रहें हैं। एस्किमो ने यह सिद्ध कर दिया है कि मनुष्य कठोरतम वातावरण में भी अपने आपको उसके अनुकूल बना सकता है।

           इन लोगों के लिये यदि कोई कठिन कार्य है तो वह कठोर वातावरण से बाहर निकलना। विश्व के अन्य आदिवासी की भाँति इन लोगों के लिए भी सभ्य लोगों का सम्पर्क घातक सिद्ध हुआ। जिस जाति को ध्रुवीय आंधियों और कठोर शीत और भोजन की कमी विचलित न कर सकी उसे सभ्य समाज के सम्पर्क द्वारा हानि का भय प्रतीत हुआ।

         सभ्य लोगों को पहुँच के बाहर सुरक्षित निवास प्राप्त करके ही ये लोग अपने आपको बचा पाये हैं। एस्किमो जिस क्षेत्र में रहते हैं वहीं चारों ओर बर्फ ही बर्फ दिखाई पड़ती है। पेड़-पौधे कहीं दृष्टिगोचर नहीं होते। कोहरा, धुन्ध और अन्धकार सदैव छाया रहता है। सूर्य के दक्षिण की ओर पलायन कर जाने के पश्चात् यह महीनों तक दिखलाई नहीं पड़ता। शीतकाल में शरीर को चुभती हुई असह्य बर्फीली आंधियाँ बहुत तीव्रगति से चलती हैं।

जीव-जन्तु:-

          यहाँ के बर्फीले वातावरण में श्वेत भालू, रेण्डियर, समूर वाले विभिन्न पशु पाये जाते हैं। समुद्र में बर्फ की तह के नीचे मछलियाँ पाई जाती हैं जैसे- वालरस, ह्वेल, सील, वेलुगा आदि। स्थल पर आर्कटिक खरगोश, कैरिबा, मुस्क और चिड़ियाँ प्राप्त होती है जिनसे भोजन प्राप्त होता है। जीव-जन्तुओं से न केवल खाने के लिये माँस किन्तु चमड़ा और खालें भी प्राप्त होती हैं जिनका प्रयोग वस्त्रों के रूप में किया जाता है।

वस्त्र:-

      आखेट की क्रिया इस प्रदेश में ग्रीष्म ऋतु में अधिक की जाती है। इसलिये एस्किमो इस ऋतु में आखेट से प्राप्त खालों द्वारा वस्त्र तैयार करते हैं। एस्किमो के वस्त्र उनकी कुशल कारीगरी को प्रदर्शित करते हैं। इनके वस्त्र बहुत ही अच्छे कटे तथा सिले होते हैं। जल और आर्द्रता से बचाव के लिये ‘वाटर प्रूफ’ वस्त्रों को तैयार किया जाता है। इनको बनाने का कार्य स्त्रियाँ करती हैं। सील, कैरिबो की खाल सील की खाल से हल्की और गर्म होती है। उत्तरी ग्रीनलैंड में कैरिबो नहीं प्राप्त होता। यहाँ ध्रुवीय भालू के रूएँ से वस्त्र बनाये जाते हैं।

            एस्किमो स्त्री-पुरुषों का पहनावा लगभग समान होता है। पुरुषों की बाहदार जर्सी को ‘तिमियार’ कहा जाता है। सिर पर एक प्रकार की टोपी पहनी जाती है। कालर और बांहों के किनारों पर कुत्ते की बालदार खाल लगी होती है। तिमियार के ऊपर एक और वस्त्र भी पहनते हैं जिसे ‘अनोराक’ कहा जाता है।

             पैरों को ढंकने के लिये ये लोग ऊनी पाजामा या सील की खाल पहनते हैं। जूते भी सील की खाल के बनाए जाते हैं जिन्हें ‘कामिर’ कहते हैं। यह जूते दोहरे बनाये जाते हैं ताकि इनमें पानी न जा सके। स्त्रियों और पुरुषों की पोशाक अवश्य एक सी होती है किन्तु स्त्रियों की पोशाक में कुछ सजावट कार्य अधिक होता है। स्त्रियों के वस्त्र रेशमी पट्टियों और रंगीन मनकों से सजाए हुए होते हैं। माताएँ एक प्रकार का वस्त्र ओढ़ती है जिसे ‘अमाउत’ कहते हैं। पीठ की ओर इनमें एक बड़ा थैला होता है जिसमें यह अपने बच्चे को रखकर काम काज करती है।

गृह:-

           जलवायु का प्रतिकूल होना, कृषि के लिए मिट्टी का अभाव और लकड़ी न प्राप्त होना एस्किमो लोगों के स्थायी गृहों के निर्माण में बहुत बाधा पहुँचाता है। इसलिए अधिकांश लोग एक स्थान से दूसरे स्थान को भ्रमण किया करते हैं। स्थानान्तरण इन लोगों को अपने शिकार की तलाश में भी करना पड़ता है अथवा जब एक स्थान पर शिकार की कमी पड़ जाती है।

             एस्किमों का जीवन भौगोलिक वातावरण द्वारा पूर्णतया सीमित है। अपने गृह निर्माण के लिए इन लोगों को लकड़ी तथा अन्य उपयुक्त पदार्थ प्राप्त नहीं होते। समुद्र की लहरों द्वारा बहकर आई लकड़ी तथा स्थानीय पत्थर का ये लोग गृहनिर्माण में प्रयोग करते हैं। पशुओं की हड्डी तथा चमड़े का भी प्रयोग गृह-निर्माण में किया जाता है।

             जाड़े की भयानक ऋतु से बचाव के लिये बड़े-बड़े गुम्बजनुमा घर बनाए जाते हैं जिन्हें ‘इग्लू’ कहते हैं। बर्फ की शिलाएं काटकर इन्हें ईंटों के पत्थरों की तरह एक-दूसरे पर रखकर गुम्बज जैसी आकृति की एक गुफा बना ली जाती है। मकान में एक ही बड़ा कमरा होता है। कमरे में लोग बर्फ की शिलाओं पर ही खालों की कई परतें बिछाकर सोते व उठते-बैठते हैं। इग्लू में से निकलने तथा घुसने के लिए एक ही लम्बा सुरंग जैसा ढकाँ हुआ मार्ग होता है।

               इग्लू में प्रकाश तथा गर्मी के लिए दिन-रात चर्बी के दिये जलाये जाते हैं। सील की चर्बी का एक टुकड़ा जिसे ‘ब्लवर’ कहते हैं, दीपक की शिखा के ऊपर लटका दिया जाता है ताकि पिघलकर लटकी हुई चर्बी दीपक की शिखा को प्रज्ज्वलित करती रहे। दीपक का पात्र पत्थर से बनाया जाता है।

औजार:-

         शरद ऋतु में एस्किमो बर्फ के ऊपर और ग्रीष्म ऋतु में टुन्ड्रा की चिकनी काई के ऊपर अपनी स्लेज नामक गाड़ी और कुत्ते को साथ लेकर चलते हैं। स्लेज गाड़ी या तो व्हेल मछली की हड्डी की बनायी जाती है या जहाँ लकड़ी पायी जाती है वहाँ उसके निर्माण में लकड़ी का उपयोग किया जाता है। इस गाड़ी को कुते खींचते हैं जो कि बहुत मजबूत होते हैं।

           ग्रीष्मकाल में जब ये लोग नदियों, झीलों और तटीय जल की ओर मुड़ते हैं उस समय कयाक नामक गाड़ी का उपयोग करते हैं। व्हेल मछली की हड्डी या लकड़ी के बने ढाँचों को जो लम्बी संकरी नाव के समान होते हैं, सील मछली के चमड़े से बने तांतों द्वारा बांधा जाता है, जो कि ढक्कन का कार्य करता है।

व्यवसाय:-

         शीतकाल के होते-होते एस्किमो परिवार तट के समीप एकत्र होने लगते हैं। यहाँ ये लोग मार्च-अप्रैल तक रहते हैं ये लोग तट के निकट सील मछली को पालते हैं। तैरते हुये बर्फ के टुकड़ों में ये लोग छिद्र बना देते हैं जिसके द्वारा सील मछली सांस लेती है। जब यह छिद्र बर्फ की पतली पर्त से ढँक जाती है तो इनके कुत्ते सूँघते हुये यहाँ पहुँचकर इसे खुरच देते हैं।

      एस्किमी शिकारी सील मछली के आने की आहट पाकर अपने हारयून से उसके मुख को काट देता है और इस प्रकार आखेट करता है। इस प्रकार के आखेट को एस्किमो ‘माउपाक’ कहते हैं। सील मछली के माँस को खाया जाता है, साथ ही साथ इसकी चर्बी को जलाकर शीतकाल में मकानों को गर्म करते हैं एवं रोशनी भी प्राप्त करते हैं।

        ग्रीष्मकाल में बेरी, कन्दमूल तथा अन्य प्रकार की वनस्पति उपयोग के लिये स्त्रियाँ एकत्रित करती हैं। ग्रीष्म ऋतु के अन्त में एस्किमो पुनः तटवर्ती भागों में आ जाते हैं। मार्च के आते-आते जब दिन बड़े होने लगते हैं तो एस्किमो परिवार सील मछली के आखेट के लिये निकल पड़ते हैं। जब सील मछली साँस लेने के लिये अपने छिद्र से बाहर आकर धूप लेने लगती हैं तो उसका शिकार बहुत ही आसानी से किया जाता है। एस्किमी शिकारी अपनी स्लेज गाड़ी और अपनी पार्टी को छोड़कर एवं शिकारी कुत्ते के साथ आगे बढ़ता है और सील मछली के झुण्डों का शिकार करता है।

          ग्रीष्म ऋतु के मध्य जब बर्फ पिघलती है और नाना प्रकार की वनस्पतियाँ उगने लगती है उस समय वहाँ के लोगों का प्रमुख व्यवसाय जंगली जानवरों का शिकार होता है। जब ये प्रदेश के भीतर की ओर अग्रसर होते हैं तो कैरिबाऊ के बड़े-बड़े झुण्डों और रेण्डियर के झुण्डों को ढूँढते हुये आगे बढ़ते हैं। कभी-कभी एस्किमो इन शिकारों की तलाश में 300-300 किमी० तक दक्षिणी प्रदेश की ओर बढ़ जाते हैं। कैरिबाऊ और रेन्डियर के अतिरिक्त गीदड़ एवं खरगोश भी जालों द्वारा पकड़े जाते हैं। वैसे मछली पकड़ना ही यहाँ के लोगों का प्रमुख व्यवसाय है। सामन एवं ट्राउन मछलियाँ विशेष रूप से पकड़ी जाती है।

भोजन एवं शिकार:-

             एस्किमी का भोजन सील, ह्वेल, बालरस आदि जल जीव हैं। इनको ये लोग शिकार करके प्राप्त करते हैं। कैरिबो नामक बारहसिंगा का भी शिकार किया जाता है। काफी मांस तो एस्किमो लोग कच्चा ही खा जाते हैं। कभी-कभी मांस को उबालकर तथा सुखाकर खाते हैं। समुद्री वनस्पति भी खाये जाते हैं।

              भोजन की अधिक तंगी के समय तम्बुओं की खाल के टुकड़े उबाल कर शोरधा पी जाते हैं। एस्किमो के भोजन का निश्चित समय नहीं होता है। जब भी इन्हें भूख लगती है तभी खाने बैठ जाते हैं। एस्किमी का उत्तम भोजन समुद्री जीवों पर निर्भर होता है। इसलिये ये लोग आखेट की खोज में समुद्रतट पर जाते हैं। आर्कटिक सागर में आखेट ग्रीष्म ऋतु में किया जाता है। सागर में कायक (Kayak) नामक नौकाओं का प्रयोग आखेट के लिए किया जाता है।

               शीत ऋतु में कुत्ता या बारहसिंगा द्वारा खींची जाने वाली स्लेज गाड़ी पर ये बर्फीले भागों में आखेट की खोज करते हैं। कायक नाव का प्रयोग केवल शिकार के लिए होता है। इस पर पुरुष ही बैठते हैं बाकी लोग साधारण नावों पर ही चढ़े होते हैं। नावें समुद्रों में पाई गई लकड़ी से बनाई जाती हैं। इनके ऊपर खाल मढ़ी होती है जिससे इनके अन्दर पानी न घुसे।

            आखेट के लिए हार्पून (Harpoon) या बर्छी का प्रयोग करते हैं। ये शस्त्र सील व अन्य पशुओं की हड्डियों से बने होते हैं। सागरों में प्रयोग करने के लिए एस्किमों के शस्त्र ऐसे होते हैं कि पानी पर दूर फेंके जाने पर शिकार के साथ खो न जाएँ। हथियारों में डोरी बँधी होती है। उसके एक छोर पर पशु की खाल की हवा भरी तुम्बी बँधी होती है ताकि वह पानी पर तैरती रहे और हथियार डूब न सके।

             भोजन एकत्रित करने का कार्य पुरुषों द्वारा होता है। घर और बच्चों की देखभाल स्त्रियाँ करती हैं। शिकार को काटना व बनाना भी स्त्रियों द्वारा होता है। खाल तैयार करना, सुखाना, चमड़े की पोशाक बनाना और झोपड़ी बनाने का कार्य स्त्रियाँ ही करती हैं।

           पुरुष तो सुबह होते ही आखेट की खोज में घर से बाहर चल देते हैं। कौन-सा आखेट कहाँ मिलता है इसका एस्किमो को बहुत ज्ञान होता है। वे लोग अपने शिकार को बाँट कर खाते हैं। कुछ अस्त्र और वस्त्रों को छोड़कर एस्किमो की अपनी व्यक्तिगत सम्पत्ति नहीं होती। ये लोग अतिथि सत्कार बहुत करते हैं।

           सील मछली का आखेट और उसका भोजन एस्किमो लोगों को बहुत रुचिकर होता है। ये लोग बर्फ में छेद बना देते हैं जिनके द्वारा सील मछली श्वास लेने आती है। जब यह छेद पतली बर्फ से ढक जाता है तो एस्किमो का कुत्ता इसे सूंघ कर ढूँढ़ लेता है और फिर खुरच कर छेद को खोल देता है। एस्किमो शिकारी सील मछली के आने की आहट पाकर अपने हार्पून से उसके मुँह को नाथ देता है और इस प्रकार आखेट पकड़ लिया जाता है। इस प्रकार के आखेट को एस्किमो लोग ‘मउपाक’ कहते हैं।

प्रश्न प्रारूप @

1. एस्किमों के निवास तथा सामाजिक आर्थिक कार्यकलापों का वर्णन करें।

अथवा, एस्किमों के सामाजिक- सांस्कृतिक, निवास एवं आर्थिक पक्षों को प्रस्तुत कीजिए।

8. बुशमैन की शारीरिक तथा सामाजिक-आर्थिक विशेषताओं का वर्णन

8. बुशमैन की शारीरिक तथा सामाजिक-आर्थिक विशेषताओं का वर्णन



बुशमैन की शारीरिक तथा सामाजिक-आर्थिक विशेषताओं का वर्णन

बुशमैन की शारीरिक

                    दक्षिणी अफ्रीका के कालाहारी मरुस्थल के निवासी बुशमैन मरुस्थल में ही भ्रमण करने वाली एक खानाबदोश जनजाति है। इन लोगों को बुशमैन नाम से सम्बोधन हालैंड निवासियों ने 17वीं शताब्दी में किया था। उस समय यह लोग दक्षिणी-पश्चिमी संघ के उत्तरी-पश्चिमी भाग की बंजर भूमि में विस्तारपूर्वक फैल हुए थे। इनका विस्तार वास्तव में उत्तर तथा पूर्व में बसूटोलैंड, नैटाल और दक्षिण रोडेशिया तक था। इनका जीवन-निर्वाह आखेट पर पूर्णतया आधारित था।

              हालैंड वासियों ने इनके क्षेत्र पर आक्रमण करके इनको निश्चित भू-भागों में बसने के लिए बाध्य किया। इन प्रदेशों पर धीरे-धीरे अफ्रीका में अन्य लोगों का अधिकार हो गया। बांटू भाषा वाले नीत्री लोगों ने इन्हें पूर्वी तटीय प्रदेश, रोडेशिया, ट्रांसवाल और बेचुआनालैंड के मध्य पठारों से हटाया। दक्षिण-पश्चिम से होटेनटोट लोगों ने इन्हें उत्तर की ओर खदेड़ दिया। बांटू जाति की प्रगति एवं यूरोपीय निवासियों के आवास के कारण बुशमैन लोगों की संख्या बहुत कम रह गई है।

जलवायु:-

        यहाँ तापमान प्रायः ऊँचा रहा करता है। जनवरी का तापमान 30º से 32º सेंटीग्रेड तक रहता है। शीतकाल में तापमान 15° सेंटीग्रेड तक पहुँच जाता है। मरुस्थल होने के कारण यहाँ दैनिक तापमान में काफी अन्तर होता है। दिन के समय तापमान 45° सेंटीग्रेड तक पहुँच जाता है और रात्रि के समय तापमान गिरकर केवल 10° सेंटीग्रेड रह जाता है। इस प्रकार तापान्तर 30º सेंटीग्रेड या 35° सेंटीग्रेड देखा जाता है। यहाँ ग्रीष्मकाल का मौसम अधिक लम्बा होता है और शीतकाल का मौसम छोटा होता है। शीतकाल में रात्रि के समय ठण्ड इतनी अधिक पड़ती है जो कि बुशमैन को भी असह्ज होती है।

         इस क्षेत्र के उत्तरी किनारे पर स्थित गामी झील के निकट वर्षा लगभग 30 से०मी० होती है। दक्षिण में मोलामो नदी के निकट वर्षा होती है। साधारण वर्षा के फलस्वरूप यहाँ की कुछ भूमि वनस्पति से ढँक जाती है, जो कि पशुओं के लिए उत्तम चराने के स्थान होते हैं। कुछ चारागाहों में घास एक-एक मीटर से भी लम्बी होती है। वन यहाँ बिल्कुल नहीं पाये जाते हैं। दक्षिण में वनस्पति का बहुत अभाव है। यहाँ के निवासियों में मलेरिया और पेचिस की बीमारियाँ अधिक प्रचलित हैं। वर्षा की ऋतु छोटी होने के कारण यहाँ के लोगों को विभिन्न चरागाहों में प्रवास करना पड़ता है।

शारीरिक लक्षण:-

            बुशमैन देखने में नीग्रोइड जाति से मिलते-जुलते हैं किन्तु इनका जबड़ा उनके समान बाहर को निकला हुआ नहीं होता और न ही इनके होठ बाहर की ओर उलटे हुए होते हैं। इनकी आँखें चौड़ी होती हैं जो कि नीग्रो एवं नेग्रीटो के मुख्य लक्षण हैं। इनकी स्त्रियों की शारीरिक रचना में एक विशेषता होती है। इनके नितम्ब पर वसा होने की प्रवृति होती है। इस कारण इनके नितम्ब काफी मोटे और विकसित होते हैं। इन्हें आंग्ल भाषा में ‘स्टीटो पिगमी’ कहते है।

आखेट:-

        बुशमैन आखेट करने में बहुत निपुण होते हैं। इस प्रदेश में शाकाहारी और मांसाहारी दोनों प्रकार के पशु पाये जाते हैं। गामी और औकाबांगो क्षेत्रों में वर्षा के पश्चात् कीचड़ हो जाती है तथा कहीं-कहीं जल पाया जाता है। इन आर्द्र भू-भागों के समीप बहुत से पौधे उग आते हैं जो कि पशुओं की भोजन पूर्ति करते हैं। शाकाहारी पशु एन्टीलोप, ब्लेसवाक, जेन्सबाक, जेब्रा, जिराफ आदि यहाँ भोजन की खोज में घूमते हैं। इन पशुओं पर आधारित मांसाहारी पशु मिलते हैं जैसे शेर, चीता, जंगली बिलाउ, लिंक्स, हैना, गीदड़ आदि।

             यहाँ हर प्रकार की दीमक पाई जाती है जिसे ‘बुशमैन का चावल’ कहा जाता है जो कि इन लोगों के भोजन का मुख्य अंग है। बुशमैन का यदि घायल शिकार किसी दूसरे क्षेत्र में पहुँच जाता है तो उसे यहाँ हिस्सा देना पड़ता है।

गृह एवं परिवार:-

            बुशमैन एक खानाबदोश जाति है। इसलिये इनके निवास स्थान स्थायी नहीं होते। इनके गृह झोपड़े होते हैं जो कि डेढ़ मीटर ऊँचे खम्भों पर तैयार किये जाते हैं। झोपड़ों का निर्माण स्त्रियाँ करती है। झोपड़ों की दीवारें घास की बनायी जाती हैं। फर्श पर भी घास के गद्दे बनाकर बिछाये जाते हैं। झोपड़ों के निर्माण की व्यवस्था गामी क्षेत्र के निकट उत्तम मिलती है। झोंपड़े का दरवाजा सुरक्षा के उद्देश्य से छोटा रखा जाता है। सर्दियों में मौसम से बचने के लिए बुशमैन गुफायें बनाकर रहते हैं। इन गुफाओं के ऊपर घास या चमड़े के छप्पर डालते हैं। गुफा के मुख के समीप रात्रि के समय आग जलती रहती है ताकि हिंसक पशुओं से सुरक्षा हो सके।

           बुशमैन सामाजिक टुकड़ियों अथवा दलों में रहते हैं जिसमें 20 से लेकर 100 व्यक्ति तक होते हैं। इनमें विवाह-सम्बन्ध एक अन्य टुकड़ी के मध्य होते हैं। बुशमैन उष्ण प्रदेश का प्राणी है, इसके उपर वातावरण का प्रभाव स्पष्ट दृष्टिगत होता है। ये लोग भोजन और जल के अभाव में कई दिनों तक बिना भोजन और जल के रह सकते हैं। पुरुष का मुख्य कार्य आखेट करना है जिससे इन लोगों को भोजन प्राप्त होता है। घूमते-फिरते समय पुरुष अपने साथ हथियार सदैव रखते हैं क्योंकि उसे शिकार की सदैव चिन्ता रहती है। स्त्रियाँ बोझा ढोने का कार्य करती हैं और बच्चों को पीठ पर लाद लेती हैं।

वस्त्र:-

          ये लोग वस्त्रों का बहुत कम प्रयोग करते हैं। वस्त्र पशुओं के चमड़े से बने होते हैं। पुरुष एक तिकोना लंगोट पहनते हैं स्त्रियाँ भी चमड़े के टुकड़ों को पहनती हैं जो कि कमर से लेकर पैर तक लटका रहता है। इनके सिर खुले रहते हैं। स्त्रियाँ चमड़े या छाल के जूतों का प्रयोग करती हैं। स्त्रियों के वस्त्र का मुख्य भाग एक चोगा होता है जिसे ‘कारोस’ कहा जाता है। यह चोगा वस्त्र एवं होल्ड दोनों के काम आता है। इस कारोस द्वारा स्त्रियाँ भोजन की सामग्री और नवजात शिशुओं को लपेटे रहती है। बुशमैन के कुछ दल चमड़े की टोपी और जूते भी पहनते हैं।

भोजन-संग्रह:-

         प्रायः सभी आदिवासियों की तरह बुशमैनों को भी अपना अधिकांश समय भोजन-संग्रह में ही लगाना पड़ता है। प्रत्येक परिवार को अपना भोजन स्वयं संग्रह करना पड़ता है। स्त्रियाँ कन्दमूल, मेढक, छिपकली, गोह और कछुवों आदि का संग्रह करती हैं। पुरुष बड़े पशुओं का शिकार करते हैं। इस कार्य के लिए उन्हें नित्य बाहर जाना पड़ता है। वे लोग या तो अकेले जाते हैं या कभी-कभी अपने सम्बन्धी अथवा पुत्र को साथ ले जाते हैं जिसे शिकार की शिक्षा देनी होती है।

               ये लोग शिकार में पालतू कुत्तों की भी सहायता लेते हैं। शिकार प्रायः तीर-कमान से किया जाता है। इनके तीर विष बुझे होते हैं। विष या तो साँपों की विषैली थैली से निकालते हैं या विषैले वृक्षों के रस से प्राप्त करते हैं। इसी विष में तीरों को डूबोकर उन्हें विषैला बनाते हैं, लेकिन यह विष इतना तीव्र नहीं होता है कि किसी पशु के बाण लगते ही वह तुरन्त मर जाय। इसका परिणाम यह होता है कि शिकार के घायल हो जाने के बाद बुशमैन को शिकार का मीलों पीछा करना पड़ता है।

           बुशमैनों में जो व्यक्ति खाद्य सामग्री के स्रोतों का पता लगा लेता है, उन पर उसका विशेषाधिकार हो जाता है। बुशमैनों के लिए पानी की समस्या प्रायः बनी रहती है। पानी लेने के लिए उन लोगों को डेरे से प्रायः मीलों दूर जाना पड़ता है। पानी लाने का कार्य प्रायः औरतें करती हैं।

 

बुशमैनों का शिल्प:

          बुशमैन शिल्प और कला-कौशल की दृष्टि से बहुत ही सामान्य स्तर पर होते हैं। उनके क्षेत्र में जो साधन उपलब्ध हैं, उनका भी वे समुचित उपयोग नहीं जानते हैं। उनके हथियार और औजार मुख्य रूप से लकड़ी के बने होते हैं। लकड़ी से धनुष, भाले, आग जलाने की अरणी बनाते हैं। घास की रस्सियाँ बनाना भी जानते हैं।

             जब पानी का अभाव हो जाता है और पानी जमीन से निकालना होता है, तो वे नर कुल की पीली नली के एक सिरे पर काफी घास बाँध देते हैं और इस घास वाले हिस्से को ऐसी जमीन में घुसा देते हैं, जहाँ पानी मिलने की सम्भावना होती है, जिससे नीची सतह का पानी घास में (फिल्टर) साफ होकर मुँह में आता है।

बुशमैनों का सामुदायिक संगठन-

            बुशमैन छोटे-छोटे सामाजिक समूहों में रहते हैं। प्रत्येक समूह में 20 से लेकर 100 तक व्यक्ति हो सकते हैं। ये लोग रक्त से सम्बन्धित होते हैं। एक समूह का अपना क्षेत्र निर्धारित होता है। इसी के अन्तर्गत वह अपना शिकार करता है। किसी समूह का व्यक्ति दूसरे समूह के क्षेत्र में शिकार करने नहीं जा सकता है। यदि कोई व्यक्ति पहुँच जाता है, तो दूसरे समूह के व्यक्ति उस पर आक्रमण करते हैं।

             यदि कभी कोई घायल शिकार दूसरे के क्षेत्र में पहुँच जाय तो शिकारी को इस बात की सूचना दूसरे समूह के सदस्यों को देनी होती है और उसे शिकार से उन लोगों को हिस्सा भी देना पड़ता है। कई समूह परस्पर बहुत कम मिलते हैं। जब जाड़े के दिनों में शिकार बहुत मिलता है, तब दो या तीन समूह मिलकर सामूहिक रूप से कभी-कभी शिकार करते हैं।

               एक समूह के व्यक्ति की शादी दूसरे समूह में हो सकती है और वह व्यक्ति अपने बच्चों और स्त्री को लेकर अपने सास-ससुर से मिलने कुछ दिन के लिए जा सकता है। वस्तुओं की अदला-बदली के लिए भी कभी-कभी एक समूह के व्यक्ति दूसरे समूह में जा सकते हैं।

बुशमैनों का राजनीतिक संगठन:-

              बुशमैनों का कोई राजनीतिक संगठन नहीं होता, और न राजनीतिक इकाई होती है। उनका न कोई शासन होता है, और न कोई शासन करने वाला। इस प्रकार बुशमैन कला, व्यवसाय, राजनीति और संस्कृति की दृष्टि से पर्याप्त पिछड़े हुए लोग हैं। लेकिन इसके लिए इनकी भौगालिक परिस्थितियाँ ही उत्तरदायी हैं। इन्हें ऐसी विषम परिस्थितियों में रहना पड़ता है, जिनमें इनका सारा समय और शक्ति केवल भोजन-संग्रह में ही नष्ट हो जाती है और अन्य किसी कार्य के लिए अवसर ही नहीं मिल पाता है।

प्रश्न प्रारूप

 1. बुशमैन जाति के निवास क्षेत्र, अर्थव्यवस्था तथा सामाजिक जीवन का विवरण दीजिए। 

अथवा, बुशमैन की शारीरिक तथा सामाजिक-आर्थिक विशेषताओं का वर्णन करें।

अथवा, बुशमैन के जीवन शैली का वर्णन कीजिए।

7. मानसून क्षेत्र की मुख्य विशेषताओं का वर्णन

7. मानसून क्षेत्र की मुख्य विशेषताओं का वर्णन


  मानसून क्षेत्र की मुख्य विशेषताओं का वर्णन

मानसून क्षेत्र           

       मानूसन क्षेत्र की निम्न विशेषताएँ होती हैं:-

अक्षांशीय स्थिति:-

       मानसूनी जलवायु का विस्तार भूमध्य रेखा के दोनों ओर 5º से 36° अक्षांशों के मध्य पाया जाता है। वास्तव में ये प्रदेश व्यापारिक हवाओं की पेटी में आते हैं, जिनमें ऋतुवत उत्तर तथा दक्षिण की ओर खिसकाव होता रहता है; जिस कारण मानूसन प्रकार की विशिष्ट जलवायु की उत्पत्ति होती है, जिसमें 6 महीने तक हवायें सागर से स्थल की ओर तथा शेष 6 महीने में स्थल से सागर की ओर चला करती हैं। इस जलवायु के अन्तर्गत पाकिस्तान, भारत, बांगलादेश, बर्मा, थाइलैण्ड, कम्बोडिया, लाओस, उ० तथा द० वियतनाम, पू० द्वीप समूह, आस्ट्रेलिया के उत्तरी भाग आदि को शामिल किया जाता है।

तापक्रम:-

        तापक्रम वर्ष भर ऊँचा बना रहता है, परन्तु सूर्य की उत्तरायण तथा दक्षिणायन की स्थितियों की वजह से ग्रीष्मकाल तथा शीतकाल का आविर्भाव होता है। कुल मिलाकर यहाँ पर तीन मौसम होते हैं-

(i) ग्रीष्मकाल

(ii) वर्षाकाल और

(iii) शीतकाल

        इनमें ग्रीष्मकाल मार्च से जून, वर्षाकाल जुलाई से अक्टूबर और अन्तिम शीतकाल नवम्बर से फरवरी तक रहता है। ग्रीष्मकाल का औसत तापक्रम 80° से 90° फ० रहता है, परन्तु मई तथा जून में तापक्रम कई स्थानों पर 105° से 120° फा० तक पहुँच जाता है। उत्तरी भारत में तो मई और जून में कई बार गर्म हवायें चलने लग जाती हैं। तटीय भागों में तापक्रम 80° से 950 फ० के बीच आंका जाता है। इस प्रकार स्पष्ट है कि उच्च तापक्रम पर धरातलीय प्रभाव की छाप है।

        शीतकाल में औसत तापक्रम 50º से 80º फा० के बीच होता है। सूर्य की स्थिति दक्षिणायण हो जाती है, जिस कारण वह मकर रेखा पर लम्बवत चमकता है, परिणामस्वरूप इस भाग का तापक्रम गिर जाता है। इस तरह वार्षिक तापान्तर अधिक हो जाता है। वार्षिक तापान्तर पर सागर से दूरी तथा वर्षा की मात्रा का पर्याप्त प्रभाव होता है। तट से दूर शुष्क भागों में वार्षिक तापान्तर बढ़ता जाता है। दैनिक तापान्तर 10° से 20° फा० के बीच रहता है। वर्षाकाल में तापक्रम ग्रीष्मकाल की अपेक्षा कुछ कम हो जाता है।

वायु दाब तथा हवायें:-

        ग्रीष्म तथा शीतकाल के कारण मानसूनी प्रदेश क्रमशः निम्न तथा उच्च दाब से प्रभावित होता रहता है। ग्रीष्म काल में 21 मार्च से सूर्य उत्तरायण होने लगता है तथा 21 जून को कर्क रेखा पर लम्बबत् चमकता है, परिणामस्वरूप उच्च तपक्रम के कारण निम्न वायुदाब का निर्माण हो जाता है जिस कारण सागर से स्थल की ओर हवायें चलने लगती है जो द०-पू० मानसून होती है।

        23 सितम्बर के बाद सूर्य की स्थिति दक्षिणायण हो जाती है और वह 24 दिसम्बर को मकर रेखा पर लम्बवत् चमकता है, जिस कारण उत्तरी गोलार्द्ध के मानसूनी प्रदेशों में शीतकाल के कारण उच्च वायुदाब का निर्माण होता है। परिणामस्वरूप स्थल से सागर की और हवायें चलने लगती है। ये हवायें ‘उ०-पू० मानसून’ कही जाती है।

          वास्तव में उ०-पू० मानसूनी हवायें व्यापारिक हवायें होती है, जो कि सूर्य की दक्षिणामण स्थिति के कारण वायुदाब की पेटियों के द० की ओर खिसकाव के कारण द०-पू० एशिया आदि पर स्थापित हो जाती है। चूँकि ये हवायें स्थल से होकर आती है, अतः ये शुष्क होती हैं, परन्तु जहाँ कहीं भी ये सागर के ऊपर से चलती हैं, नमी धारण कर लेती है तथा वर्षा कर बैठती हैं। मानसून की तापीय उत्पत्ति के सिद्धांत के समर्थकों के अनुसार द०-प० मानसूनी हवायें भी द०-पू० व्यापारिक हवायें ही होती है।

          सूर्य की उत्तरायण स्थिति के कारण वायुदाब की पेटियों के उत्तर दिशा में खिसकने के कारण द०-पू० व्यापारिक हवायें भूमध्य रेखा को पार कर लेती हैं तथा ‘फेरल के नियम’ के अनुसार उनकी दिशा द०-प० हो जाती है, चूँकि ये हवायें सागर से होकर आती है। अतः आर्द्र होने के कारण वर्षा करती हैं।

             मानसून की गतिक उत्पत्ति के समर्थकों के अनुसार सूर्य की उत्तरायण स्थिति के समय डोलड्रम की पेटी का द०-पू० एशिया पर विस्तार हो जाता है तथा उसमें प्रवावित होने वाली विषुवत रेखीय पछुवा ही द०-पू० मानसून हवा होती है। डोलड्रम के साथ द०-पू० एशिया पर चक्रवातीय दिशायें व्याप्त हो जाती है। ये उष्ण कटिबन्धीय चक्रवात प्रायः पूर्व से पश्चिम दिशा की ओर चलते हैं तथा पर्याप्त वर्षा प्रदान करते हैं। विभिन्न स्थानों पर इन्हें “टाइफून” चक्रवात तथा “हरीकेन” नाम से पुकारा जाता है।

वर्षा:

      मानसून प्रदेशों में वर्षा मुख्यतः चक्रवातीय तथा पर्वतीय प्रकार की होती हैं। परन्तु कुछ वर्षा संवहनीय प्रकार की होती है। अर्द्ध मानसून हवायें जब पर्वतीय अवरोध का सामना करती हैं तो उन्हें ऊपर उठना पड़ता है परिणामस्वरूप पर्याप्त वर्षा हो जाती है। हिमालय के दक्षिणी ढाल पर आसम से लेकर काश्मीर तक इन हवाओं से पर्याप्त वर्षा होती है परन्तु जैसे-जैसे ये हवायें आगे बढ़ती जाती है वर्षा की मात्रा घटती जाती है। जून से अक्टूबर तक द०-पू० मानसून हवाओं से वर्षा प्राप्त होती है। शरद काल में पश्चिम से आने वाले चक्रवातों से कुछ वर्षा होती है।

         वर्षा के वार्षिक वितरण में पर्याप्त विषमता पाई जाती है। वर्षा का अधिकांश भाग केवल चार महीनों (जून, जुलाई, अगस्त, सितम्बर) में प्राप्त हो जाता है। यहाँ वर्षा भी लगातार नहीं होती है। बीच-बीच में सूखा भी पड़ जाता है। वर्षा के प्रादेशिक वितरण में भी पर्याप्त अन्तर होता है। उदाहरणार्थ भारत के चेरापूँजी में वार्षिक वर्षा 426″ तक होती है जबकि थार के रेगिस्तान में 10″ से भी कम होती है। इस तरह मानसून वर्षा की मात्रा, वितरण, समय आदि सभी अनिश्चित होते हैं जिस कारण कृषि कार्य भी अनिश्चित हो जाती है।

वनस्पति:-

       मानसूनी प्रदेशों में वर्षा की मात्रा में विषमता के कारण कई प्रकार की वनस्पति मिलती है। 200 से० मी० से अधिक वर्षा वाले भागों में सदाबहार वन मिलते हैं। उदाहरणार्थ भारत के पश्चिमी घाट क्षेत्र में 100 से 200 से० मी० वर्षा वाले क्षेत्रों में पतझड़ वृक्ष मिलते हैं। 50 से 100 सेमी० वर्षा वाले भागों में घास पर्णपाती वन मिलते हैं। शुष्क भाग में झाड़ियाँ आदि  मिलती है।

प्रश्न प्रारूप

1. मानसूनी भूमि की स्थिति, जलवायु तथा वनस्पति के विषय में आप क्या जानते हैं? संक्षेप में लिखिये।

अथवा, मानसून क्षेत्र की मुख्य विशेषताओं का वर्णन करें।

6. समशीतोष्ण घास के मैदानों में मानवीय क्रिया-कलाप

6. समशीतोष्ण घास के मैदानों में मानवीय क्रिया-कलाप


 समशीतोष्ण घास के मैदानों में मानवीय क्रिया-कलाप

समशीतोष्ण घास

                 प्रकृति के विस्तृत आँगन पर अनेकों प्रकार की वनस्पतियाँ सृष्टि के आरम्भ से ही उगती बढ़ती आई हैं। इन वनस्पतियों का समय विशेष पर विनाश हो जाता है और उसके स्थान पर पुनः उसी तरह की वनस्पति उग आती है। संसार के ग्लोव पर नजर डालने पर हमें ज्ञात होता है कि वनस्पति चारों ओर एक सी नहीं है। कहीं पर विस्तृत सघन वन है तो कहीं पर घास के मैदान, कहीं कांटेदार झाड़ियाँ हैं, तो कहीं फूलदार वनें।

                 अतः स्थान-स्थान पर तरह-तरह की वनस्पतियाँ दिखाई देती हैं। इन विभिन्नता के कारण तापमान की दशा, वर्षा की मात्रा, मिट्टी की प्रकृति, प्रकाश प्राप्ति, पवन आदि की प्राप्ति की विभिन्नता है। संसार में घास के मैदानों को प्राकृतिक दशाओं के अनुसार दो भागों में विभक्त कर सकते हैं।:-

1. उष्ण घास के मैदान तथा

2. समशीतोष्ण/शीतोष्ण घास के मैदान।

1. ऊष्ण घास के मैदान:-

         भूमध्य रेखा के उत्तर व दक्षिण में 10° से 20° अक्षांशों के बीच भूमध्य रेखीय वनों को घेरे हुए विस्तृत घास के मैदान फैले हुए हैं। ये घास के मैदान उष्ण मरुस्थलों और मानसूनी प्रदेशों के बीच फैले हैं। इस प्रकार की जलवायु अफ्रीका के सूडान राज्य में अधिक होने से इन प्रदेशों को सूडान तुल्य जलवायु वाले प्रदेश कहते हैं। वेनेजुएला में इन घास के मैदानों में ‘लानोज’, ब्राजील में कम्पास तथा इन्हीं अक्षांशों के बीच मध्य आस्ट्रेलिया के भाग शामिल हैं।

अफ्रीका के सवाना प्रदेश:

          अफ्रीका में भूमध्य रेखा के उत्तर और दक्षिण में ये घास के मैदान फैले हैं। इन घास के मैदानों की घास 3 मीटर तक लम्बी है। यहाँ प्रमुख धंधा पशुपालन है। सूडान का सबसे प्रसिद्ध नगर तुम है। अधिक वर्षा वाले भागों में गाय, बैल और शुष्क भागों में भेड़, बकरियां और ऊँट पाले जाते हैं।

          नील और श्वेत नील के दोआब कपास के लिये प्रसिद्ध है। खजूर, मूंगफली और बाजरा तथा बबूल के पेड़ों से अरबी गोंद प्राप्त होता है। पश्चिमी सूडान का प्रसिद्ध नगर टिम्बकटू है।

           दक्षिणी अफ्रीका के सवाना प्रदेश में न्यासालैंड, उत्तर रोडेशिया और अंगोला सम्मिलित हैं। इन घास के मैदानों में अन्य जानवर बहुत रहते हैं। अतः यहाँ के लोग अपने निवास के चारों ओर ऊँचे-ऊँचे बाड़े बनाकर उनके बीच में अपनी भेड़, बकरियाँ और अन्य पशुओं को रात के समय रखते हैं।

             यहाँ टिसीटिसी मक्खी, जो जहरीली होती है पाई जाती है, जो घोड़ों और पशुओं को हानि पहुँचाती है। यहाँ की घास लम्बी और सघन होने के कारण यहाँ तापमान और वर्षा की अधिकता है। यहाँ घास नदियों के पास तो बहुत ही सघन और लम्बी-लम्बी होती है।

दक्षिणी अमरीका के सवाना प्रदेश

ओरिनिको बेसिन के लानोज:

         ओरिनिको के बेसिन में विस्तृत घास के मैदान मिलते हैं। इन्हें बेनेजुएला के ‘लानोज’ कहा जाता है। पशुपालन भी यहाँ अधिक होता है। गायें यहाँ खूब पाली जाती हैं। यहाँ मच्छरों की भरमार है और जलवायु गर्म है अतः यहाँ पशुओं की दशा अच्छी नहीं हैं। यहाँ मांस का व्यापार घरेलू खपत के लिये हैं।

ब्राजील के कैम्पास:

           इस क्षेत्र में भी पशु पाले जाते हैं, परन्तु गर्म जलवायु परिवहन की कठिनाई और मांस के जल्दी खराब होने के कारण यहाँ पशुपालन महत्वपूर्ण नहीं हैं। कहबे की कृषि के कारण इस भाग की बहुत उन्नति हुई है। साओपाली और रियोडिजेनेरी कहवा की उपज के मुख्य क्षेत्र हैं। इस प्रदेश का पूर्वी भाग लोहा, ताँबा, हीरे, सोना, मैगनीज आदि खनिज पदार्थों से सम्पन्न है।

आस्ट्रेलिया का सवाना प्रदेश:

            आस्ट्रेलिया का सवाना प्रदेश उत्तरी प्रान्त और क्वीसलैंड के मध्य में फैला हुआ है। इस प्रदेश के उत्तर में मानसूनी खण्ड, दक्षिण में शुष्क मरुस्थल और पूर्व में ग्रेट डिवाइडिंग रेंज पर्वत है। इस प्रदेश का प्रमुख धन्धा पशुपालन है। पानी की कमी के कारण यहाँ भेड़ें अधिक पाली जाती है।

            जहाँ कहीं पानी की सुविधा है, वहीं गेहूँ की कृषि की जाती है। सवाना घास के मैदानों में वार्षिक मध्यमान 30° सेन्टीग्रेड और वार्षिक ताप परिसर 120° सेन्टीग्रेड है। ये घास के मैदान ध्रुवों की ओर तो मरुस्थलों में बदलकर झाड़ियाँ मात्र रह जाते हैं और भूमध्य रेखा की ओर वनों में परिणत हो जाते हैं। इन प्रदेशों में ग्रीष्म ऋतु में वर्षा होती है।

2. समशीतोष्ण/शीतोष्ण घास के मैदान:-

           ये घास के मैदान 30° से 45° अक्षांशों के बीच महाद्वीपों के मध्य भागों में पाये जाते हैं। इस प्रदेश के भाग विभिन्न देशों में अलग-अलग नामों से पुकारे जाते हैं। ये भाग पूर्णतया घास के मैदान हैं।

        समशीतोष्ण घास के मैदान में छोटी-छोटी झकड़ेदार घासों की हरीतिमा सर्वव्याप्त होती है। कम तापमान और साधारण नमी से इस क्षेत्र में घास के विकास के लिए आदर्श परिस्थिति उपलब्ध होती है। यहाँ की अधिकांश वर्षा ग्रीष्म काल में होती है तथा शीतकाल ठण्डा और कम आर्द्र होता है। घासों के साथ झाड़ियाँ और बौने वृक्ष भी उगते हैं। ऐसे परिवेश में शाकाहारी और मांसाहारी जीव-जन्तुओं का साम्राज्य पाया जाता है। मानव के लिए ये आदर्श पशुपालन की स्थिति है। यही कारण है कि युगों से यहाँ पशुपालन मुख्य पेशा रहा है।

                मध्य एशिया के किरगीज न जाने कब से इस पेशे से अपना जीवन-यापन करते चले आ रहे हैं। इनकी अधिकांश आवश्यकताएँ पशु उत्पादों से पूरी हो जाती हैं। पर्वतों के ऊँचे भागों पर भी इस प्रकार की घास पाई जाती है, जहाँ पशुपालन प्रचलित पेशा है।

                 जिन भागों में कृषि का विस्तार हुआ है, वहाँ समशीतोष्ण घास के मैदान लुप्त हो गये हैं, जैसे यूरोप और उत्तरी अमेरिका के पूर्वी और मध्यवर्ती भागों में ऐसे घास के मैदानों पर अब व्यापारिक पशुपालन का विकास भी किया गया है, जैसे संयुक्त राज्य अमेरिका के पश्चिमी भाग, आस्ट्रेलिया और न्यूजीलैण्ड, दक्षिण अफ्रीका, दक्षिण अमेरिका और साइबेरिया में। यहाँ सिंचाई और उर्वरक का प्रयोग कर घास के मैदानों को अधिक उपजाऊ बनाया गया है।

            ये क्षेत्र आज पशु उत्पादों के प्रधान क्षेत्र हैं। आल्पस और रॉकी क्षेत्रों में अल्पाइन घास के मैदान आदर्श पशुपालन के क्षेत्र हैं। हिमालय में कश्मीर, हिमाचल प्रदेश और उत्तराखण्ड की पहाड़ियों में अल्पाइन घास के मैदान आदर्श पशुपालन के आधार हैं।

         समशीतोष्ण घास के मैदानों में आदिवासी जातियों का अर्थतंत्र पशुपालन पर आधारित होता है। पशुओं से प्राप्त दूध, मांस उनका भोजन, ऊन, चमड़ा, हड्डी उनका वस्त्र, तम्बू और हथियार और कुछ पशु उत्पाद व्यापार के आधार होते हैं, जिन्हें बेचकर वे अपनी आवश्यकता की अन्य वस्तुएँ खरीदते हैं।

              पशुओं के साथ घूमते रहने के कारण तम्बू इनके गृह का काम करता है। कभी-कभी ये अपनी बस्ती भी बनाते हैं, जहाँ बहुधा जाड़े के मौसम में निवास करते हैं। अब विकसित चारागाहों पर स्थायी निवास भी बनाये गये हैं और अतिरिक्त पेशा के रूप में कृषि करने का रिवाज भी बढ़ता जा रहा है। रूसी सरकार द्वारा किरगीज चरवाहों के लिए इस प्रकार की व्यवस्था की गई है।

               व्यावसायिक पशुपालन वाले घास के मैदानों में विशेषकर आस्ट्रेलिया, न्यूजीलैण्ड, संयुक्त राज्य अमेरिका, कनाडा, जर्मनी, फ्रांस, आस्ट्रिया, स्विट्जरलैण्ड, अर्जेण्टाइना आदि में विकसित नस्ल के पशु और रोपित घास का प्राधानता पाया जाता है। रूस के साइबेरिया क्षेत्र में भी ऐसे घास फार्मों का विकास किया गया है। स्पष्ट है कि जीवन-पद्धति के निर्धारण में घास की भूमिका प्रधान है। ऐसे क्षेत्रों में आदिवासी, जीवन-पद्धति का आदर्श रूप साइबेरिया के किरगीज में पाया जाता है।

            जनवरी का मध्यमान 10° सेन्टीग्रेट और जुलाई का 20° सेन्टीग्रेड है। उन भागों में बर्फ पिघलने से घास और फूलों के उगने के लिए पर्याप्त आर्द्रता मिल जाती है। यहाँ बौछार के रूप में थोड़ी वर्षा भी हो जाती है जो घास के लिये पर्याप्त है। संसार में इन घास के मैदानों का वितरण निम्नलिखित प्रकार है-

यूरेशिया के स्टेपीज:

         अजरबेजान, जोर्जिया और जार्मिनिया तीन एशियायी राज्य जो कैस्पियन, अरब सागर तटीय भाग सम्मिलित है। यहाँ शीत ऋतु में तापमान गिर जाता है और वर्षा नहीं होती है। ग्रीष्म ऋतु में पठार के गर्म हो जाने पर दोनों सागरों पर अपेक्षाकृत अधिक दबाव होता है, जिससे वर्षा होती है। काकेशस पर्वत उत्तर की ओर से आने वाली बर्फीली पवनों को रोक लेते हैं। वर्षा पश्चिम से पूर्व की ओर घटती जाती है। यह भाग रूस के लिये बड़े महत्त्व का है।

           क्यूबान के स्टैपी प्रदेश में मुख्यतः गेहूँ उगाया जाता है, जलवायु मृदु होने के कारण काले सागर के सामने वाली पर्वत श्रेणियों के निचले ढलानों पर अंगूरों और चाय के वृक्ष लगे हैं। ग्रीष्म ऋतु गर्म होती है। पूर्वी भाग में पशुचारण का काम होता है। सम्पूर्ण रूस का 90 प्रतिशत तेल यूरेशिया के इन्हीं भागों से प्राप्त होता है।

उत्तरी अमेरिका के प्रेरीज:

            उत्तरी अमेरिका में प्रेरीज प्रदेश का विस्तार मिसीसिपी नदी और उसकी सहायक नदियों के बेसिन में फैला है। यदि ओहियो और मिसीसिपी नदियों के संगम स्थान को दक्षिण आकोटा राज्य की ब्लैक पर्वत श्रेणियाँ और मेक्सिको देश के सियरा मोद्र पर्वत के पूर्वी भाग की तली पर स्थित मोन्टेरे नगर से मिला दिया जाये तो इस प्रदेश की सीमा बन जायेगी।

          यहां वर्षा थोड़ी बहुत वर्ष के हर माह में हो जाती है। अधिकतम वर्षा 70 सेन्टीमीटर और न्यूनतम 5 सेन्टीमीटर होती है। मुख्य उपज घास है, पश्चिम की ओर से ग्रेट प्लेन में घास भी कम पाई जाती है। आजकल इन प्रदेश का मुख्य धन्धा कृषि हो चला है। गेहूँ की प्रधानता है। यहाँ संसार का सबसे अधिक तेल निकाला जाता है।

दक्षिणी अमेरिका के पैम्पाज:

            अर्जेन्टाइना में घास के समतल मैदानों को पैम्पाज कहते हैं। आरम्भ में चमड़ा और चर्बी बिक्रय धन्धा बहुत उन्नति कर गया था वहाँ से आज भी संसार का सबसे अधिक गोमांस निर्यात होता है। यहाँ गेहूँ की कृषि पर्याप्त होती है। पश्चिम के शुष्क भाग में भेड़ें पाली जाती हैं, जिनसे ऊन और चमड़ा प्राप्त हो जाता है।

आस्ट्रेलिया के डार्लिंग डाउन्स:

           डार्लिंग नदी के पूर्वी पर्वतों तक के चरागाहों को आस्ट्रेलिया में डाउन्स कहते हैं। इस मैदान के पूर्वी भाग में वर्षा की मात्रा पर्याप्त होती है, जिससे गेहूँ की कृषि पर्याप्त होती है। पश्चिम की ओर का भाग शुष्क होने से भेड़ों के चराने योग्य है।

अफ्रीका के वेड:

             अफ्रीका में इन घास के मैदानों को ‘बेल्ड’ कहा जाता है। यहाँ भी पशुचारण का महत्व अधिक है। अब कृषि का भी पर्याप्त विस्तार हो चला है। इन घास के मैदानों में घास की कम सघनता और कृषि के उपयुक्त जलवायु होने से घास के मैदानों को साफ करके कृषि की जाने लगी है।

प्रश्न प्रारूप

1. उष्ण घास एवं शीतोष्ण घास प्रदेश में आर्थिक विकास की सम्भावनाओं का परीक्षण कीजिए।

अथवा, समशीतोष्ण घास के मैदानों में मानवीय क्रिया-कलापों की विवेचना करें।

अथवा, शीतोष्ण घास के मैदान में मानवीय कार्यकलापों का परीक्षण कीजिए।

5. विषुवतरेखीय प्रदेशों में मानवीय क्रिया-कलाप

5. विषुवतरेखीय प्रदेशों में मानवीय क्रिया-कलाप


विषुवतरेखीय प्रदेशों में मानवीय क्रिया-कलाप

विषुवतरेखीय प्रदेश

                      भूमध्य रेखीय क्षेत्रों में मानवीय क्रियाओं का अध्ययन करने से पूर्व निम्न तथ्यों का ज्ञान आवश्यक है।

भौगोलिक स्थिति:-

          यह जलवायु प्रदेश भूमध्यरेखा के दोनों तरफ 5º उत्तरी व 5º दक्षिणी अक्षाशों के मध्य फैला हुआ है। यहाँ दिन में सूर्य की सीधी एवं तीव्र गर्मी से वायु हल्की होकर ऊपर उठती है। वायु ऊपर उठकर फैल जाती है, जिससे उसमें जलवाष्प ग्रहण करने की शक्ति क्षीण हो जाती है अर्थात् वायु ठण्डी हो जाती है। वायु ठण्डी होने से वर्षा होने लगती है। यह वर्षा कम समय के लिए परन्तु प्रतिदिन होती है।

              जलवायु के इस कटिबन्ध को शान्त कटिबन्ध भी कहते हैं- यह जलवायु अमेजन बेसिन, कांगो बेसिन, घाना व जंजीबार का तट, दक्षिणी-पूर्वी एशिया के द्वीपों (हिन्देशिया व मलेशिया) सहित एशिया महाद्वीप के कुछ भाग व आस्ट्रेलिया के कुछ भागों में पायी जाती है। इस जलवायु प्रदेश में हर ऋतु में दिन व रात बराबर होते हैं। सालो भर गर्मी पड़ती है लेकिन तापक्रम अधिक नहीं होता। वर्षा प्रत्येक महीने में होती है।

जलवायु:-

      भूमध्य रेखा प स्थित होने के कारण यहाँ वर्ष भर सूर्य की किरणें लगभग सीधी पड़ती हैं। यहाँ औसत वार्षिक तापक्रम 27° सेन्टीग्रेड रहता है। ताप में मौसमी परिवर्तन बहुत कम होता है इसलिए वार्षिक ताप परिसर अधिक-से-अधिक 3º सेन्टीग्रेड रहता है। औसत वार्षिक वर्षा 200 सेमी० से अधिक होती है। यहाँ किसी-किसी क्षेत्र में 250 से 500 सेमी० तक वार्षिक वर्षा नापी जाती है।

प्राकृतिक वनस्पति:-

          विषुवतीय प्रदेश की उष्णार्द्र जलवायु में घने वन पाये जाते हैं। वनों में वृक्ष की इतनी अधिक सघनता होती है कि सूर्य का प्रकाश भी आसानी से भूमि पर नहीं पहुँच पाता है। इन वृक्षों के अतिरिक्त लताएँ व झाड़ियाँ भी उगती हैं। इन वनों से होकर गुजरना बहुत कठिन है। जंगली जानवरों के लिए यह उपयुक्त क्षेत्र हैं। इन वनों में महोगनी, सिनकोना, गटापार्चा, सीडर, चन्दन, रोजवुड, आबनूस, ताड़, रबड़, बाँस व बेंत आदि प्रमुख वृक्ष पाये जाते हैं।

मिट्टियाँ:-

         यहाँ पुरानी लाल रंग की मिट्टी पायी जाती है। यह मिट्टी कम उपजाऊ होती है। इस क्षेत्र में वर्षा की अधिकता के कारण खनिज पदार्थ भूमि के नीचे की ओर खिसक जाते हैं। इस प्रकार मिट्टी की उत्पादकता कम हो जाती है। यहाँ की मिट्टियों में लोहे व ऐल्यूमिनियम के कण अधिक पाये जाते हैं।

जीव-जन्तु:-

       यहाँ के वनों में अनेक प्रकार के पशु-पक्षी व कीड़े-मकोड़े पाये जाते हैं। खुले जंगलों में हाथी, गैंडा, भैंस, हिरन, जंगली सुअर आदि पाये जाते हैं। नदियों में मगर, घड़ियाल व दरयाई घोड़े पाये जाते हैं। पेड़ों पर रहने वाले जीवों में चिड़ियाँ, साँप, बन्दर, छिपकली गिरगिट आदि प्रमुख हैं। इसके अतिरिक्त भी असंख्य जहरीले कीड़े-मकोड़े व जीव पाये जाते हैं।

भूमध्य रेखीय क्षेत्रों में मानवीय क्रियायें:-

          कांगो बेसिन के ‘पिग्मी’ लोगों की अर्थव्यवस्था से यह स्पष्ट होता है कि कांगो तथा अमेजन बेसिन क्षेत्र में घने जंगलों की प्रतिकूल जलवायु में मानवीय विकास रूक गया है। इस क्षेत्र में बीमारियों के कारण यहाँ के लोगों की लम्बाई 90 से०मी० से 150 से०मी० तक होती है।

             ये लोग आखेट करने में बहुत चतुर होते हैं। जंगली जानवरों के मांस, मछलियाँ, फल, कन्दमूल व पत्तियाँ आदि इनका भोजन है। ये लोग तोड़ की पत्तियों या वृक्षों की छाल को कमर से नीचे लटकाये रहते हैं। इन लोगों का स्थायी निवास नहीं होता, ये घूमते-फिरते रहते हैं।

            इस क्षेत्र में लकड़ी-व्यवसाय अधिक उन्नति इसलिये नहीं कर पाया है। क्योंकि यहाँ प्रतिकूल जलवायु परिवहन मार्गों की कमी, उपयोगी वृक्षों का असमान वितरण एवं वनों को काटने के लिये साधनों की कमी आदि की सुविधा नहीं है। लकड़ी-व्यवसाय ने उन्नति केवल समुद्र तटीय भागों में की है।

            इन वनों में महत्त्वपूर्ण वृक्षों के अतिरिक्त रबड़, गोंद, आइवरी नट, ताड़, तेल, कुनेने आदि वस्तुओं को भी एकत्र किया जाता है। दलदली भूमि, घने जंगलों में प्रतिकूल जलवायु के कारण ये क्षेत्र शक्तिहीन प्रदेश कहलाते हैं। इस क्षेत्र में विश्व की कुल जनसंख्या का केवल 10% भाग निवास करता है। इस क्षेत्र में वनों को साफ करके आदिम ढंग से मकई, ज्वार व बाजरा आदि की खेती की जाती है।

           इण्डोनेशिया व मलेशिया के द्वीपीय क्षेत्रों में जलवायु अनुकूल पायी जाती है। इस क्षेत्र में यूरोपीय लोग पहाड़ी ढालों और समुद्र तटीय भागों के वनों को साफ करके रबड़, ताड़, कहवा, चाय, नारियल व गन्ने आदि की बागानी कृषि करते हैं।

          इस क्षेत्र में बागानी कृषि वैज्ञानिक ढंग से की जाती है, इसलिए बागानी फसलों के उत्पादन में यह क्षेत्र विश्व प्रसिद्ध है। संसार की कुल रबड़ उत्पादन का लगभग दो-तिहाई रबड़ इसी क्षेत्र से उत्पादित किया जाता है। रबड़ के अतिरिक्त इस क्षेत्र में गन्ना, कहवा व चावल आदि खाद्यान्न फसलों का भी उत्पादन किया जाता है।

        मलेशिया व इण्डोनेशिया में टिन व पेट्रोलियम का उत्पादन भी किया जाता है। संसार का लगभग 50% दिन उत्पादन इस क्षेत्र में किया जाता है। इस प्रदेश में जावा द्वीप का विकास अन्य द्वीपों की में अधिक हुआ है। यहाँ मत्स्यपालन भी समुद्र तटीय भागों में अधिक विकसित हुआ है।

          इक्वेडोर तुल्य उच्च पठारी क्षेत्रों में कृषि, पशुचारण, उत्खनन, लकड़ी काटना आदि प्रमुख व्यवसाय हैं। यहाँ की प्रमुख फसलें चावल, गन्ना, कपास, गेहूँ, तम्बाकू, फल, चाय व कहवा आदि हैं। इक्वेडोर व कोलम्बिया के पठारी क्षेत्र में सोने-चाँदी, मैगनीज व ताँबे की खानें पायी जाती हैं।

           सोने, चाँदी, ताँबे, नमक, ग्रेफाइट टिन आदि के भण्डार पूर्वी अफ्रीका के पठारी क्षेत्रों में मिलते हैं। इस क्षेत्र में परिवहन के साधन भी अच्छी तरह से विकसित हैं।

           इस प्रदेश के अधिकांश नगर तटीय क्षेत्रों में समुद्री मार्गों पर बसे हुए हैं। मनाओस, बेलमपारा, बगोटा, नैरोबी, एका, लैगोस, स्टेनलेविले, लियोलिविले, लियोपोल्डविले, जकार्ता व सिंगापुर आदि प्रमुख नगर हैं।

प्रश्न प्रारूप

1. विश्व के विषुवतरेखीय प्रदेशों या भूमध्य रेखीय प्रदेशों के मानवीय कार्य-कलापों का विवरण दीजिये।

अथवा, विषुवतरेखीय क्षेत्रों में मानवीय क्रियाकलापों का परीक्षण कीजिए। 

4. मरूस्थलीय वातावरण में मानवीय क्रिया-कलाप

4. मरूस्थलीय वातावरण में मानवीय क्रिया-कलाप


मरूस्थलीय वातावरण में मानवीय क्रिया-कलाप

मरूस्थलीय वातावरण

                 मरुस्थलीकरण एक ऐसी भौगोलिक प्रक्रिया है, जिसमें समतल मैदानी उपजाऊ क्षेत्रों में भी मरुस्थल जैसी विशिष्टताएँ विकसित होने लगती हैं। जिसका मुख्य कारण जलवायु परिवर्तन तथा मानवीय गतिविधियाँ है। इससे शुष्क, अर्द्ध-शुष्क, निर्जल इलाकों की मिट्टी रेगिस्तान में बदल जाती है तथा मिट्टी की उत्पादन क्षमता ह्रास होने लगता है। मरुस्थलीकरण से प्राकृतिक वनस्पतियों का ह्रास तो होता ही है, साथ ही कृषि उत्पादकता, पशुधन एवं जलवायवीय घटनाएँ भी प्रभावित होती हैं।

अक्षांशीय स्थिति:-

           यह प्रदेश भूमध्य रेखा के दोनों ओर 20° से 30° अक्षांशों के बीच अर्थात् उष्ण कटिबन्ध में महाद्वीपों के पश्चिमी भागों में फैला हुआ है।

सम्मिलित क्षेत्र:-

         अफ्रीका में सहारा तथा कालाहारी मरुस्थल हैं। एशिया में भारत एवं पाकिस्तान का थार मरुस्थल तथा अरब मरुस्थल आस्ट्रेलिया में पश्चिमी आस्ट्रेलिया का मरुस्थल। उत्तरी अमेरिका में कोलोरेडी ऐरीजीना तथा दक्षिणी कैलीफोर्निया के मरुस्थल। दक्षिणी अमेरिका में चिली तथा दक्षिणी पेरू का एटाकामा मरुस्थल।

तापमान एवं वर्षा:-

             ग्रीष्म ऋतु अत्यधिक गर्म और शीत ऋतु कम गर्म होती है। इस प्रदेश में संसार के उच्चतम तापमान वाले स्थान स्थित हैं। इस प्रदेश में वर्षा बहुत कम होती है। वर्ष भर में 25 सेन्टीमीटर से भी कम वर्षा होती है।

वनस्पति:-

           अति गर्म एवं शुष्क जलवायु के कारण यहाँ वनस्पति बहुत ही कम होती है। इस प्रदेश में वह वनस्पति है जो गर्मी तथा शुष्कता सहन कर सके, जिनकी जड़ें लम्बी हो ताकि भूमि के भीतर दूर गहराई से जल ले सकें, जिनकी पत्तियाँ मोटी हों ताकि वाष्पीकरण द्वारा उनमें जल की कमी न हो।

आर्थिक विकास:-

             आर्थिक विकास की दृष्टि से यह प्रदेश बहुत पिछड़ा हुआ है। इसके पिछड़ेपन के कारण निम्नलिखित हैं-

(1) भूमि के अधिकतर भाग में रेत फैली हुई हैं।

(2) वर्षा नहीं होती।

(3) गर्मी बहुत पड़ती है।

(4) अति शुष्क पवनें चलती हैं।

(5) आंधियाँ आती हैं।

(6) जल की कमी है।

(7) यातायात के साधनों की कमी है।

(8) जनसंख्या बहुत कम है।

कृषि:-

         इस प्रदेश के अधिकतर भाग में रेत फैली हुई है जिसके कारक कृषि योग्य भूमि बहुत कम है। अत्यधिक गर्मी, शुष्क पवनों तथा जल की कमी के कारण कृषि का विकास अधिक नहीं हो सकता है। नदी घाटियों में सिंचाई द्वारा कृषि की जाती है। मिस्र तथा सूडान की नील घाटी में इस प्रकार की कृषि की जाती है। गेहूँ, ज्वार, बाजरा, कपास तथा तम्बाकू यहाँ की मुख्य फसलें हैं।

उद्योग:-

         अरब तथा कैलिफोर्निया में तेल साफ करने के कारखाने हैं। थार तथा कैलिफोर्निया में झीलों से नमक प्राप्त करने का उद्योग है। लोग भेड़ एवं बकरियाँ पालकर ऊन प्राप्त करते हैं जिससे ऊन उद्योग चलता है। चारों ओर रेत फैले होने के कारण यातायात के साधनों की कमी तथा जनसंख्या कम होने के कारण उद्योग का विकास नहीं हो सका है।

          यहाँ दो प्रकार के लोग निवास करते हैं। एक तो वे जो कि यूरोप के उन्नतशील लोगों के सम्पर्क में आने से पर्याप्त प्रगति कर गये हैं। उदाहरणार्थ अरब के लोग कैलिफोर्निया तथा पश्चिमी आस्ट्रेलिया में भी यूरोप के उन्नतशील लोग बसे हैं। अतः यहाँ पर लोगों का रहन-सहन आधुनिक ढंग का है।

प्रश्न प्रारूप

1. मरुस्थलों में मानव जीवन तथा कार्यकलापों पर वातावरण के प्रभाव की विवेचना कीजिये।

अथवा, मरूस्थलीय पर्यावरण की विशेषताओं का वर्णन कीजिए।

अथवा, मरूस्थलीय वातावरण में मानवीय क्रियाओं का वर्णन कीजिए।

अथवा, मरूस्थलीय क्षेत्र की विशेषताओं और मानवीय कार्यकलाप का विवरण दीजिए।


3. पर्वतीय वातावरण में मानवीय क्रिया-कलाप

3. पर्वतीय वातावरण में मानवीय क्रिया-कलाप


पर्वतीय वातावरण में मानवीय क्रिया-कलाप

पर्वतीय वातावरण

                भूपृष्ठ की बनावट मानव जीवन को अत्यन्त प्रभावित करती है। भूपृष्ठीय रचना के अनुरूप स्थलरूपों को मोटे तौर पर तीन भागों में बाँटा गया है- पर्वत, पठार और मैदान। मानव पर प्रभाव डालने में प्रत्येक की अपनी अलग-अलग विशेषताएँ हैं।

(1) पर्वत और मानव जीवन:-

          पर्वतों पर मानव जीवन के सामने अनेक तरह की कठिनाइयाँ आती हैं जिनका आभास समतल मैदानी भागों में नहीं होता। पर्वतीय क्षेत्रों में समतल भूमि अत्यन्त सीमित होती है। तीव्र ढाल की अपेक्षा साधारण ढाल वाले क्षेत्र मानव के लिए अधिक उपयोगी होते हैं। साधारण ढाल भूमि पर सीढ़ीनुमा खेत बनाकर कृषि की जाती है किन्तु ऊपरी डालों पर सिंचाई की सुविधा प्रदान नहीं की जाती, वहाँ केवल शुष्क कृषि की जाती है।

         अधिक ऊँचाई पर तापमान गिर जाता है या बर्फ गिरने की वजह से मानव का रहना सम्भव नहीं होता। इसके अलावा ऊँचाई बढ़ने के साथ-साथ वायुदाब घटता जाता है। 6000 मीटर से अधिक ऊँचाई पर मनुष्य को साँस लेने में कठिनाई होती है। अतः ऐसे स्थानों पर मानवीय कार्य-कलाप नगण्य मिलता है।

      पर्वतों की ऊँची नीची भूमि पर परिवहन के साधनों को बनाया जाना भी काफी कठिन होता है।

(2) पर्वत एवं जलवायु:-

          एक देश की जलवायु पर पर्वतों का भी प्रभाव पड़ता है। ऊँचाई पर जाते हुए तापमान कम होता जाता है। लगभग 160 मीटर की ऊँचाई पर 90 से०ग्रे० ताप कम हो जाता है। उष्ण देशों में जहाँ पर्वत स्थित है वहाँ, पर्वतों पर स्वास्थ्यवर्धक जलवायु मिल जाती है। पर्वत-शिखरों पर पर्यटक केन्द्र बन जाते हैं। भारत में शिमला, मंसूरी, दार्जिलिंग, उटकमण्ड आदि इस सम्बन्ध में उल्लेखनीय नगर हैं।

         पर्वतीय प्रदेश आर्द्रतापूर्ण पवनों को रोकने में पूर्ण सक्षम होते हैं इसलिए वर्षा भी मैदानों की अपेक्षा अधिक होती है। साथ ही पर्वत श्रेणियाँ एक देश को ठंडी पवनों से सुरक्षा भी प्रदान करती है। भारत के उत्तर में हिमालय स्थित होने के कारण मध्य एशिया की ठंडी पवनें भारत में प्रवेश नहीं कर पाती जबकि यही ठंडी पवनें चीन के आधे से अधिक भाग को प्रभावित करती हैं। इसी प्रकार उत्तरी अमेरीकी में कनाडा की ठंडी पवनें संयुक्त राज्य अमेरीका के दक्षिण तक पहुँच जाती है और तापमान को पर्याप्त गिरा देती है।

(3) पर्वत एवं वनस्पति:-

        पर्वतों पर ऊँचाई के अनुसार वनस्पति के प्रकार में काफी भिन्नता पाई जाती है। अत: भूमि उपयोग भी प्रभावित होता है। पर्वतों पर एक विशिष्ट ऊँचाई से ऊपर वृक्ष नहीं उगते, केवल घास के मैदान पाये जाते हैं। यहाँ पशुओं के लिए अनुकूल परिस्थितियाँ मिलती हैं।

            ग्रीष्मकाल में यह क्षेत्र चरागाहों के रूप में बहुत उपयोगी होते हैं। पशुओं में भेड़, बकरियाँ ही ज्यादा पाई जाती हैं क्योंकि इनमें ठंड सहने की शक्ति ज्यादा होती है। चरागाहों के नीचे शंकुधारी वनों का कटिबन्ध मिलता है जहाँ मुलायम लकड़ी के अधिक उपयोगी वृक्ष उगे हुए पाये जाते हैं। शंकुधारी वनों से नीचे पर्णपाती वनों का कटिबन्ध मिलता है, इन दोनों के बीच मिश्रित वनों का कटिबन्ध मिलता है।

           पर्वतीय क्षेत्रों में वनों की अधिकता की वजह से लकड़ी काटने का धन्या अत्यन्त लोकप्रिय होता है किन्तु यहाँ की ढालू भूमि पर लकड़ी काटना, छाँटना तथा लट्ठों को लकड़ी के चीरने वाले कारखानों तक पहुँचाना अत्यन्त कठिन काम होता है। इन कामों के लिये सरल उपाय खोज निकाले गये हैं। नार्वे और स्वीडन में लकड़ी के लट्ठों को बर्फ पर फिसलाकर जमी हुई नदियों तक पहुँचाया जाता है। हिमालय क्षेत्र के वृक्ष को काटकर तनों को नदियों में बहा दिया जाता है। संयुक्त राज्य अमेरिका में पक्की सड़कें बना दी गई हैं। लट्ठों को ढोने का काम मोटर ठेलों से लिया जाता है। कहीं-कहीं पर बाँधकर लट्ठों को खिसकाकर ले जाया जाता है।

          लकड़ी का उपयोग अनेक उद्योगों में कच्चे माल के रूप में किया जाता है। अतः लकड़ी की माँग दिन-प्रतिदिन बढ़ती जा रही है, इसलिए वनों को निर्दयतापूर्वक काटा जा रहा है। वन केवल उच्च क्षेत्रों में ही शेष रह गये हैं।

(4) पर्वत एवं कृषि:-

           पर्वतीय क्षेत्रों में कृषि कार्य केवल सीमित मात्रा में सम्भव है। यहाँ किसानों को अनेक समस्याओं से जूझना पड़ता है, जैसे-

(क) समतल भूमि की कमी,

(ख) मिट्टी का अधिक क्षरण,

(ग) मिट्टी का कम गहरा होना, तथा

(घ) जलवायु की बाधाएँ।

              कृषि के काम के लिए समतल भूमि की जरूरत होती है। समतल भूमि पर ही पूर्ण सिंचाई का लाभ प्रदान किया जा सकता है तथा कृषि यंत्रों का भी उपयोग सम्भव होता है। इसलिए पर्वतीय क्षेत्रों में कृषि मानव के कठिन परिश्रम पर ही टिकी है। यहाँ खेत जोतने से लेकर फसल काटने तक समस्त कार्य हाथों से ही करने होते हैं कहीं-कहीं तो मनुष्य को हल भी स्वयं ही चलाना पड़ता है, इसीलिए पहाड़ी भागों में हल्के किस्म के हलों का प्रचलन है।

             कृषि योग्य समतल खण्ड बनाने के लिए पर्वतीय ढालों पर सीढ़ियाँ काटकर सोपानी कृषि की जाती है। ऐसा करने से खेतों में वर्षा या सिंचाई का जल कुछ समय तक रूकने में समर्थ होता है। स्पष्ट है कि पर्वतीय क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर कृषि नहीं की जा सकती।

        सीढ़ीनुमा, लम्बाकार तथा कम चौड़े खेत पर्वतों के चारों तरफ गोलाई में स्थित मिलते हैं। इस प्रकार के खेत विश्व के अधिकांश पर्वतीय क्षेत्रों में, जहाँ जलवायु अनुकूल होती है, पाये जाते हैं। किन्तु जापान का उदाहरण इस सम्बन्ध में उल्लेखनीय है। यहाँ किसानों ने अत्यधिक मेहनत करके जगह-जगह भूमि को सीढ़ीनुमा खेतों में तब्दील कर दिया है। मिट्टी को उपजाऊ बनाने के लिए अनेक तरह की खादों को प्रयोग में लाया गया है। अतः प्रतिकूल परिस्थितियों के बावजूद प्रति हैक्टेयर उत्पादन अत्यधिक है।

           पर्वतीय क्षेत्रों में ढालू भूमि होने के कारण मिट्टी का क्षरण भी तीव्र गति से होता है। वर्षा के समय मिट्टी तेजी से कट कटकर जल के साथ बहती रहती है। पहाड़ी भागों में वर्षा भी अधिक होती है। निरन्तर मिट्टी के क्षरण से मिट्टी की गहराई कम रह जाती है और पथरीली भूमि उभर जाती है। कहीं-कहीं पर गहरी नालियाँ बन जाती हैं जहाँ भविष्य में कृषि सदा के लिए असम्भव हो जाती है। वैसे पर्वतीय क्षेत्रों में स्वभावतः मिट्टी की गहराई कम पाई जाती है। मिट्टियाँ अधिकतर कठोर होती हैं जो कृषि के लिए अधिक उपयोगी नहीं होती।

        पर्वतों पर कृषि के लिए सभी स्थानों की जलवायु अनुकूल नहीं होती। विषुवत रेखा से 30° अक्षांशों तक 2500 से 3000 मीटर की ऊँचाई तक 30° और 45° अक्षांशों के मध्य 2000 से 3000 मीटर की ऊँचाई तक 45° से 55° अक्षांशों के मध्य 1500 से 2000 मीटर की ऊँचाई तक 55° अक्षांशों के निकट लगभग 200 मीटर की ऊँचाई तक कृषि सम्भव होती है।

            ऊँचाई अथवा अक्षांशों के अन्तर का प्रभाव तापमान पर पड़ता है। पर्वतीय क्षेत्रों में वर्षा द्वारा वांछित लाभ नहीं उठाया जा सकता, जबकि वर्षा काफी होती है। ढालू भूमि होने के कारण वर्षा का जल जल्दी बह जाता है।

           पर्वतों का सबसे ज्यादा लाभ यह है कि उनकी चट्टानों से बहुमूल्य खनिज सम्पत्ति का भण्डार मिलता है। प्राचीन पर्वतों में खनिज पदार्थ ज्यादा मिलते हैं। इसकी वजह यह है कि प्रकृति की क्षरण करने वाली शक्तियाँ ऊपर की परतों को बहाकर ले जाती हैं और खनिज पदार्थ भूपृष्ठ के ऊपरी भाग में उभर आता है।

            इसके अतिरिक्त अन्तर्जात बलों के प्रभाव में जब भूमि की परतें मुड़ती हैं तो खनिज पदार्थ भी मुड़कर ऊपर पहुँच जाते हैं। इन्हीं कारणों के फलस्वरूप यूराल पर्वतों पर सभी खनिज पदार्थों का भण्डार है। अपलेशियन पर्वतों पर कोयला, लोहा और मिट्टी के तेल का भण्डार पाया जाता है। दक्षिणी भारत के प्राचीन पठार पर मैगनीज, लोहा, सोना, कोयला और अभ्रक आदि खनिज बहुतायत से मिलते हैं।

            वर्तमान सभ्यता का आधार खनिज पदार्थों पर टिका हुआ है। खनिज पदार्थों का अधिक-से-अधिक उत्पादन और उपयोग किया जा रहा है। मानव खनिजों की खोज में दूर पर्वतीय भागों में कठिनाइयों का सामना करते हुए भटकना मंजूर कर लेता है। पर्वतों पर खान खोदना भी अत्यन्त मुश्किल का कार्य है।

       अधिक ऊँचाई पर वायुदाब की कमी की वजह से श्रमिकों को कार्य करने में भी कठिनाई होती है। भारी मशीनों को ले जाकर स्थापित करना भी कठिन होता है क्योंकि उत्तम किस्म के सड़कों के निर्माण में कठिनाई होती है। इसके अलावा खानों से निकले पदार्थ को ढ़ोने की समस्या भी अत्यन्त जटिल होती है क्योंकि परिवहन के साधन अपर्याप्त होते हैं। पर्वतीय क्षेत्रों में अपनी-अपनी अलग समस्याएँ हैं।

        पर्वतीय क्षेत्रों में औद्योगिक केन्द्रों की स्थापना भी सरल नहीं उद्योगों की स्थापना के लिए तरह-तरह की वस्तुएँ जुटानी पड़ती हैं। कच्चे माल, श्रमिकों की व्यवस्था, शक्ति के साधनों की सफलता तथा परिवहन के साधनों की व्यवस्था करना आवश्यक है।

प्रश्न प्रारूप

1. पर्वतीय वातावरण मानवीय क्रियाओं को किस प्रकार प्रभावित करता है? संक्षेप में लिखिए।

अथवा, पर्वतीय वातावरण में मानवीय क्रिया-कलापों का वर्णन कीजिए।


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