12. प्रायद्वीपीय भारत की संरचना

12. प्रायद्वीपीय भारत की संरचना

         दक्षिण भारत को प्रायद्वीपीय भारत कहा जाता है क्योंकि इसके तीन ओर से समुद्र का विस्तार है। जैसे- पश्चिम में अरब सागर, पूरब में बंगाल की खाड़ी और दक्षिण में हिन्द महासागर अवस्थित है। प्रायद्वीपीय भारत के किनारे-2 तटीय मैदान का विस्तार हुआ है। सम्पूर्ण प्रायद्वीपीय भारत का क्षेत्रफल 7 लाख वर्ग किमी० है। इसका आकार एक  त्रिभुज के समान है। यह 1600 km हिन्द महासागर में प्रक्षेपित है। इसका औसत ऊँचाई 300-750मी० मानी गयी है।

           प्रायद्वीपीय भारत के उत्तर में अरावली, विन्ध्याचल, राजमहल तथा गारो, खाँसी और जयन्तिया पर्वत सीमा का निर्माण करती है। जबकि पश्चिमी सीमा का निर्माण पश्चिमी घाट और पूर्वी सीमा का निर्माण पूर्वी घाट करते हैं। ये दोनों श्रृंखलाएँ दक्षिण की ओर मिलकर नीलगिरि के पास में एक त्रिभुज का आकार दे देती है। प्रायद्वीपीय भारत पर कई छोटी-2 पर्वतीय श्रृंखलाएँ मिलती है। इन श्रृंखलाओं ने प्रायद्वीपीय भारत को कई छोटे-2 पठारों में विभक्त कर दिया है। इसलिए इसे पठारों का पठार भी कहा जाता है।

प्रायद्वीपीय भारत की संरचनात्मक विशेषताएँ                

     प्रायद्वीपीय पठार प्राचीनतम गोंडवाना भूखण्ड का एक भाग है। इसके गर्भ में आज भी पेंजिया के चट्टानें पायी जाती है। प्रायद्वीपीय भारत की संरचनात्मक विशेषता का अध्ययन नीचे किया जा रहा है।

(i) दक्षिण भारत को जिसके चतुर्दिक मैदानी भूभाग है। भूगर्भवेताओं ने इसे प्रायद्वीपीय भारत से संबोधित किया है। जबकि इसके बाहर वाले क्षेत्र को अतिरिक्त प्रायद्वीपीय भारत (Extra peninsular India, प्रायद्वीपेत्तर भारत) से संबोधित किया है।

(ii) प्रायद्वीपीय भारत प्राचीनतम दृढ भूखण्डों से निर्मित है। इसका निर्माण मूलतः पृथ्वी की गैसीय अवस्था से ठोस अवस्था में परिणत होने की प्रक्रिया से जुड़ा है।

(iv) सम्पूर्ण प्रायद्वीपीय भारत समप्राय सतह का उदाहरण प्रस्तुत करता है। इस सतह पर मोनैडनॉक, शंकु पहाड़ी, वलित पर्वत, ब्लॉक पर्वत, अवशिष्ट पहाड़ी, भ्रंश घाटी, ज्वालामुखी उदगार, उबड़-खाबड़ भूमि इत्यादि का प्रमाण मिलता है।

(v) दक्षिण भारत प्रायद्वीप के रूप में क्रिटेशियस कल्प में बना क्योंकि गोंडवाना लैण्ड में भ्रंशन की क्रिया से अफ्रीका, आस्ट्रेलिया और अण्टार्कटिका महाद्वीप विलग हो गये।

(vi) प्रायद्वीपीय भारत के मूल या मौलिक चट्टानों का निर्माण आर्कियोजोइक महाकल्प में हुआ था। इस महाकल्प के चट्टानों में ग्रेनाइट और नीस प्रकार के चट्टान मिलते हैं। इन चट्टानों के रूपान्तरण से शिष्ट एवं चारकोनाइट चट्टानों का निर्माण हुआ है।

(vii) प्रायद्वीपीय भारत अधिकांश क्षेत्र कभी भी समुद्र के अन्दर नहीं गया है। प्रायद्वीपीय भारत को ‘भूकम्प रहित क्षेत्र’ माना जाता है। इस पर दीर्घकालिक अपरदन के कारण चट्टानों के जब‌ड़दस्त अपरदन हुआ है।

(viii) कर्नाटक, उड़ीसा, तमिलनाडु इत्यादि में धाड़वाड़ की चट्टानें मिलती है जो प्राचीनतम परतदार चट्टानों का उदाहरण है। यह धात्विक ‘खनिजों’ के लिए विश्व प्रसिद्ध है।

(ix) प्रायद्वीपीय भारत में कुडप्पा एवं विन्ध्यन क्रम की कई चट्टानें मिलती है। इस क्रम की चट्टानों में चुना पत्थर और  बलुआ पत्थर की चट्टानें सबसे प्रमुख है।

(x) कार्बोनीफेरस कल्प में आये हिमयुग का प्रमाण भी दक्षिण भारत में मिलता है। इनका प्रमाण भी दक्षिण भारत में मिलता है। इसका प्रमाण दामोदरी, महानदी, गोदावरी नदी घाटी में देखा जा सकता है।

(xi) प्रायद्वीपीय भारत का दक्षिणी भूभाग दक्कन का पठार कहलाता है। इसका निर्माण क्रिटेशियस कल्प में हुए ज्वालामुखी उद्‌गार से हुआ है। क्रिटेशियस कल्प में दरारी ज्वालामुखी उद्भेदन की क्रिया होने के कारण भूगर्भ से क्षारीय प्रकार की लावा बड़े पैमाने पर बाहर की ओर निकला जो फैलकर एवं ठण्डा होकर दक्कन के पठार का निर्माण किया। आज इसी लावा के ऋतुक्षरण से दक्कन के पठार पर काली मिट्टी का प्रमाण मिलता है।

        क्रिटेशियस कल्प में कुछ केन्द्रीय उद्‌गार भी हुए थे जिससे छोटे-2 शंकु पहाड़ियों का भी निर्माण हुआ है। इनके मुख से जब लावा निकलना बंद हो गया तो अनेक क्रेटर और कॉल्डेरा का निर्माण हुआ है। इसी क्रेटर और कोल्डेरा में जल के जमाव से दक्षिण भारत में अनेक तालाबों का विकास हुआ है।

(xii) प्रायद्वीपीय भारत की संरचना पर भूसंचलन का भी प्रभाव पड़ा है। जैसे- भूसंचलन के ही कारण नर्मदा, ताप्ती और दामोदर नदी भ्रंश घाटी से होकर प्रवाहित होती है। सतपुड़ा जैसे ब्लॉक पर्वत का निर्माण हुआ है। यहाँ तक की पश्चिमी घाट का पश्चिमी ढाल धँसकर तीव्र ढाल का निर्माण करती है।

(xiii) कार्बोनिफेरस कल्प में हुए भूसंचलन के कारण सतह पर स्थित वनस्पति भूगर्भ के अंदर दब गये जिसके कारण कोयला जैसे संरचना का निर्माण हुआ है।

(xiv) विगत 20 करोड़ वर्ष से पठारीय भारत में कोई नवीन भूगर्भिक संरचना का विकास नहीं हुआ है। केवल 7 करोड़ वर्ष पहले जब हिमालय के निर्माण हो रहा था तो उस वक्त प्रायद्वीपीय भारत के उत्तर में केवल उत्थान का प्रमाण  मिलता है।

प्रायद्वीपीय भारत की संर

चित्र: प्रायद्वीपीय भारत की संरचना

        इस तरह स्पष्ट है कि प्रायद्वीपीय भारत जटिल भूगर्भिक संरचना रखने वाला एक भूखण्ड है।

प्रश्न प्रारूप 

1. प्रायद्वीपीय भात की संचना का संक्षिप्त रूप में चर्चा करें।

10. उत्तर भारत का विशाल मैदानी क्षेत्र

       10. उत्तर भारत का विशाल मैदानी क्षेत्र


उत्तर भारत का विशाल मैदानी क्षेत्र

              प्रायद्वीपीय पठार और हिमालय के बीच ‘उत्तर भारत का विशाल मैदान’ अवस्थित है जिसका क्षेत्रफल 7.5 लाख वर्ग किमी० है। उत्तर भारत का मैदानी क्षेत्र मूलत: उत्तर में हिमालय, दक्षिण में विन्ध्याचल पर्वत, पश्चिम में किर्थर और सुलेमान तथा पूरब में पूर्वांचल हिमालय से घिरा हुआ है। भारतीय क्षेत्र में इसकी लम्बाई 2400 km है। पश्चिम में इसकी चौ० लगभग 500Km और पूरब में 150km है।

उत्तर भारत का विशाल

चित्र: उत्तर भारत का विशाल मैदान

        यह मैदान मूलत: सिन्धु, गंगा, यमुना और ब्रह्मपुत्र नदी और उनके सहायक नदियों द्वारा लायी गई मलवा के निक्षेपण से बना है। उत्तर के मैदानी क्षेत्र को कई भौगोलिक इकाई में वर्गीकृत कर अध्ययन किया जा सकता है। जैसे-

(A) सिन्धु सतलज का मैदान

(B) थार मरुस्थलीय क्षेत्र

(C) गंगा-यमुना का मैदान

(D) ब्रह्मपुत्र का मैदान

(A) सिन्धु-सतलज का मैदान

          इसे “पंजाब का मैदान” भी कहते हैं। इसका निर्माण सिन्धु और उसके पाँच सहायक नदी जैसे- सतलज, व्यास, चिनाब, रावी, झेलम नदी के द्वारा लायी गयी मलवा के निक्षेपण से बना है।

       पंजाब के मैदान का विस्तार भारत के पंजाब, हरियाणा और उत्तरी राजस्थान में हुआ है। इस क्षेत्र की समुद्र तल से औसत ऊँचाई 200m से भी कम है। इसका निर्माण प्लोस्टोसीन कल्प में हुआ है। इस क्षेत्र में कहीं-कहीं शुष्क नदियाँ और शुष्क क्षारीय झील पायी जाती हैं जिसे स्थानीय लोग “धांड़” के नाम से जानते हैं। कहीं-2 पुराने नदियों के सँकरे घाटी का प्रमाण मिलता है जिसे स्थानीय लोग ‘घोरोस’ या ‘तल्ली’ से सम्बोधित करते हैं। इस मैदानी क्षेत्र में कई नदी-दोआब का विकास हुआ है। यहाँ दोआब का तात्पर्य दो नदियों के बीच वाला क्षेत्र से है। कुछ दोआब के उदाहरण निम्नलिखित है:-

(1) बिस्त दोआब (व्यास और सतलज)

(2) बारी दोआब (व्यास और रावी)

(3) रचना दोआब (रावी और चिनाव)

(4) चाझ दोअब (चिनाव और झेलम)

(5) सिन्धु सागर दोअब (सिन्धु, चिनाव और झेलम)

       सिन्धु की सहायक नदियाँ जब शिवालिक पर्वत को पार करती है तो उसे कई जगह अपरदन कर काट डालती है। इस कटे हुए भूभाग को स्थानीय लोग ‘चो’ कहते हैं। इस मैदान में नदियाँ जब आगे की ओर बहती हैं तो अपने किनारे को काटकर ‘ब्लफ’ का निर्माण करती है। स्थानीय लोग ब्लफ को ‘धाया’ से सम्बोधित करते हैं। इस मैदान का ढाल मूलत: उत्तर-पूरब से दक्षिण-पश्चिम की ओर है। इस तरह स्पष्ट है कि सिन्धु सतलज का मैदान की एक अलग पहचान है। इसकी पहचान का दूसरा कारण उर्वर भूमि पर बड़े पैमाने पर कृषि कार्य किया जाना है। इस मैदान को ‘अन्न  के भण्डार’ नाम से सम्बोधित करते हैं।

(B) थार मरुस्थल

         यह भारत के उत्तर के मैदान का ही एक भाग है। थार मरुस्थल का विस्तार भारत और पाकिस्तान के सीमावर्ती क्षेत्रों में हुआ है। इसकी लम्बाई 640 km और चौड़ाई 160 km है। अरावली पर्वत के दक्षिण-पश्चिम से उत्तर-पूर की ओर स्थित होने के कारण यह प्रदेश शुष्क क्षेत्र में बदल चुका है। इस क्षेत्र में सरस्वती नदी कभी मुख नदी के रूप में प्रवाहित होती थी। लेकिन, अब मरुस्थलीय वातावरण के कारण यह विलुप्त हो चुकी है। इस क्षेत्र का ढाल दक्षिण-पक्षिम की ओर है।

         थार मरुस्थलीय क्षेत्र मिसोजोइक कल्प तक अरब सागर में डूबा हुआ था। होलोसीन कल्प के प्रारंभ में हुए भूसंचलन के कारण अरब सागर का उत्तरी भाग ऊपर की ओर उठ गया और दक्षिण वाला भाग धँस गया जिसके कारण उत्तर का जल दक्षिण की ओर प्रवाहित हो जाने से समुद्री भूखण्ड ऊपर की ओर आ गये। आज भी इस क्षेत्र में खारे पानी की कई झीलों का प्रमाण मिलता है। जैसे- साँभर झील, डीडवाना झील, पिछौला झील (उदयपुर)।

         शुष्क प्रदेश के कारण चट्टानों के ऋतुक्षरण से बालू का विकास बड़े पैमाने पर हुआ है। इस क्षेत्र में बरखान, गारा, बालुका स्तूप जैसे कई मरुस्थलीय स्थलाकृति मिलते हैं। छोटी-2 नदियों के द्वारा लायी गई मलवा के निक्षेपण से निर्मित मैदान को स्थानीय लोग ‘रोही’ के नाम से सम्बोधित करते हैं।

(C) ब्रह्मपुत्र का मैदान

          इसका विस्तार भारत के उत्तरी-पूर्वी भाग में हुआ है। इसका विस्तार उत्तर में हिमालय, दक्षिण में गारो, खाँसी, जयन्तिया की पहाड़ी, पूरब में पटकोईबुम की पहाड़ी तथा पश्चिम में तिस्ता नदी के मध्य हुआ है।

          यह मैदान असम के मैदान के नाम से भी जाना जाता है। यह मैदान मूलत: ब्रह्मपुत्र और उसके सहायक नदी जैसे दिहांग, बराक, धनश्री, सुवर्णश्री और तिस्ता नदी के द्वारा लायी मलवा के निक्षेपण से हुआ है। यह मैदान मूलत: रैम्प घाटी में अवस्थित है। इसका निर्माण कार्य आज भी चल रहा है। भारत का आज भी यह बाढ़ प्रभावित इलाका है। इसका ढाल पूरब से पश्चिम की ओर है। बंगलादेश में इसकी ढाल उत्तर से दक्षिण की ओर है। समुद्रतल से इसकी ऊँचाई 50m से 200m हो जाती है।

         कम ऊँचाई होने के कारण जगह-2 दलदली भूमि का विकास हुआ है। ब्रह्मपुत्र नदी अपने मार्ग में विश्व की सबसे बड़ी नदी द्वीप माजुली का निर्माण करती है।

(D) गंगा-यमुना का मैदान

             गंगा-यमुना के मैदान का विस्तार भारत के उत्तरी भाग में हुआ है। इसके उत्तर में हिमालय, दक्षिण में विन्ध्याचल, पूरब में राजमहल की पहाड़ी और पश्चिम में अरावली की पहाड़ी है। इस मैदान में गंगा नदी रीढ़ की हड्‌डी के समान प्रवाहित होती है। हिमालय और प्रायद्वीपीय भारत से निकलने वाली नदियाँ गंगा नदी में ही आकर मिलती है। इस मैदान का सामान्य ढाल पश्चिम से पूर्व की ओर है। यह समुद्रतल से 0-300m ऊँचा है। गंगा नदी इस मैदान को दो भागों में बाँट डालती है।- प्रथम उत्तरी गंगा का मैदान और द्वितीय दक्षिणी गंगा का मैदान।

           उत्तरी गंगा के मैदान का ढाल उत्तर से दक्षिण की ओर है जबकि दक्षिणी गंगा के मैदान का ढाल दक्षिण से उत्तर की ओर है। उत्तरी गंगा का मैदान स्थानीय आधार पर कई उपविभागों में विभक्त है। जैसे:-

(1) रोहिलखण्ड का मैदान,

(2) अवध का मैदान,

(3) गोरखपुर-देवरिया का मैदान,

(4) मिथलांचल का मैदान

         इसी तरह दक्षिणी गंगा के मैदान भी स्थानीय आधार पर निम्न भागों में विभक्त हैं:-

(1) बुंदेलखण्ड का मैदान

(2) इलाहाबाद का मैदान

(3) भोजपुर का मैदान

(4) मगध का मैदान

(5 ) अंग का मैदान

गंगा-यमुना मैदान की उत्पत्ति

         गंगा-यमुना मैदान की उत्पत्ति के संबंध में कई विचार प्रकट किये गये हैं। जैसे:-

(1) ओल्डहम:- “संरचनात्मक दृष्टिकोण से यह मैदान हिमालय के आगे का गर्त (Fore Deep) है, जिसमें नदियों के द्वारा लाये गये अवसाद का औसतन 500m गहरा निक्षेपण से बना है।”

(2) एडवर्ड स्वेस:- “हिमालय निर्माण के समय यहाँ पर एक गर्त था जिसे भूसन्नति (Geo-syncline) कहा जाता था। इसी भूसन्नति में हिमालय और प्रायद्वीपीय भारत की नदियों के द्वारा लायी गयी मलवा के निक्षेपण से इस मैदान का निर्माण हुआ है।”

(3) बुरार्ड:- “इसका निर्माण हिमालय और प्रायद्वीपीय पठार के बीच में स्थित रिफ्ट घाटी में नदियों के द्वारा लायी मलवा के विक्षेपण से हुआ है। इन मैदान के निर्माण पर प्लीस्टोसीन काल हुए भूसंचलन का भी प्रभाव पड़ा है। आज भी हिमालय से निकलने वाली नदियाँ मलवा का निक्षेपण कर रही हैं जिससे इसका निर्माण कार्य जारी है।” यह मान्यता आज भी सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण है।

चित्र: गंगा-यमुना मैदान की संरचना

        संरचनात्मक दृष्टिकोण से गंगा-यमुना के मैदान को चार भागों में बाँटकर अध्ययन करते हैं। जैसे-

(1) भावर प्रदेश

           भावर का विस्तार शिवालिक पर्वत के दक्षिण में हुआ है। यह पश्चिम में पोटवार के पठार से लेकर पूरब में तिस्ता नदी तक विस्तृत है। इसकी चौड़ाई 8 से 16km है। इसकी औसत ऊँचाई समुद्रतल से 150-250m है।

भावर की उत्पत्ति

         इसका निर्माण हिमालय से निकलने वाली नदियों के द्वारा लायी गई बोल्डर क्ले के निक्षेपण से हुआ है।

चित्र: गंगा-यमुना मैदान की संरचना

भावर की विशेषता

(1) यह बोल्डर क्ले नामक कंकड़-पत्थर से निर्मित है।

(2) इसका निर्माण शिवालिक पर्वत के पदस्थली में हुआ है क्योंकि मंद ढाल के कारण बड़े-2 और मोटे चट्टानों का निक्षेपण सबसे पहले होता है।

(3) हिमालय से निकलने वाली नदियाँ इस क्षेत्र में आकर विलुप्त हो जाती है जिससे खण्डित नदी प्रवाह का विकास होता है।

(4) कहीं -2 जल जमाव वाले क्षेत्रों में द‌लदली भूमि का विकास हुआ है।

(5) भावर क्षेत्र में कई जलोढ़ पंख और जलोढ़ शंकु का भी प्रमाण मिलता है।

(6) भावर प्रदेश पर्वत और मैदान के बीच संक्रमण पेटी का क्षेत्र है।

(2) तराई प्रदेश

         भाँवर के दक्षिण में तराई प्रदेश का विकास हुआ है। इसका निर्माण नमी युक्त चिपचिपी मिट्टी के निक्षेपण से हुआ है। इसकी औसत ऊँचाई 150-200m और चौड़ाई 15-30Km है। यह अत्याधिक नमीयुक्त वाला क्षेत्र है। जहाँ पर्याप्त मात्रा में वर्षा होती है। यह घने जंगलों से ढका हुआ है। कहीं-2 दलदली भूमि का भी विकास हुआ है। भावर क्षेत्र में जो नदियाँ विलुप्त हो गयी थी वे इस प्रदेश (तराई प्रदेश) में दिखाई देने लगती है।

          उष्णार्द्र वातावरण के कारण तराई क्षेत्र मलेरिया के लिए प्रसिद्ध है। इसी प्रदेश में थारू जनजाति के लोग सदियों से निवास करते आ रहे हैं। लेकिन, भारत विभाजन के बाद तराई प्रदेश में सिखों के बसाए जाने के कारण थारूओं की भूमि को हड़प लिया है। तराई प्रदेश में ही मुजफ्फरपुर से मुजफ्फर नगर तक विश्व प्रसिद्ध गन्ना की पेटी अवस्थित है।

(3) बाँगर प्रदेश

       इसे पुरानी जलोढ़ मिट्टी के नाम से जानते हैं। यहाँ बाढ़ की समस्या उत्पन्न नहीं होती है। इसकी औसत ऊँचाई 100-15om है। बाँगर का विस्तार ऊपरी गंगा के मैदान और दक्षिणी गंगा के मैदान में हुआ है। मुरादाबाद के पास बागर क्षेत्र में बालू के बड़े-2 टीले मिलते हैं। जिसे भूर कहते हैं। जबकि पश्चिम बंगाल में बांगर के साथ लैटेराइट मिट्टी से युक्त मैदान मिलता है जिसे बारिन्द्र कहते हैं। बांगर प्रदेश भारत में ‘खाद्यान्न फसल पेटी’ के रूप में प्रसिद्ध है।

(4) खादर प्रदेश

         इसे नवीन जलोढ़ मिट्टी कहते हैं। पंजाब के लोग इसे “बेट भूमि” से सम्बोधित करते हैं। इसका निर्माण नदियों के द्वारा लायी गयी महीन और चिकनी मिट्टी के निक्षेपण से हुआ है। ये आज भी बाढ़ से प्रभावित क्षेत्र हैं। नदियों के मुहानों पर खादर के निक्षेपण से ही डेल्टा का निर्माण हुआ है।

निष्कर्ष

         उपरोक्त तथ्यों से स्पष्ट है कि उत्तर भारत का विशाल मैदानी क्षेत्र अपनी विशिष्ट भौगोलिक संरचना के लिए प्रसिद्ध है। इसकी संरचनात्मक विशेषताएँ और विस्तार ही इसे विश्व का सबसे बड़ा जलोढ़ का मैदान के रूप में मान्यता दिलवाता है।

प्रश्न प्रारूप

1. भारत के मुख्य भूआकृति विभाग के नाम लिखे। सिंधुगंगा-ब्रह्मपुत्र मैदान का वर्णन करे।

2. भावर तथा तराई से आप क्या समझते हैं? संक्षिप्त में उनकी विशेषता बताये।

3.  भावर क्या है? शिवालिक की पदस्थली के बराबर इसका विकास क्यों हुआ?

4. भारत का उत्तरी मैदान हिमालय और प्रायद्वीपीय पठार से नदियों के द्वारा लायी उत्कृष्ट जलोढ़ का उदाहरण है। इस तथ्य की सत्यता की जाँच करें।

26. मानसून के विकास में हिमालय तथा तिब्बत के पठार का योगदान

26. मानसून के विकास में हिमालय तथा तिब्बत के पठार का योगदान


          द०-प० मानसून की उत्पत्ति से संबंधित कई सिद्धांत प्रस्तुत किये गए हैं। इन सिद्धांतों में सबसे महत्वपूर्ण सिद्धांत “जेट स्ट्रीम सिद्धांत” है। इस सिद्धांत में मानसून की उत्पत्ति में हिमालय एवं तिब्बत के पठार की केन्द्रीय भूमिका निर्धारित की गई है।

         जेट स्ट्रीम सिद्धांत के अनुसार द०-प० मानसून की उत्पत्ति पूर्वी जेट हवा के कारण होती है। सूर्य का उत्तरायण होने के बाद तिब्बत का पठार दो कारणों से हिटर के समान गर्म एवं तप्त हो जाता है।

(1) समुद्रतल से 5000m की ऊँचाई के कारण मैदानी क्षेत्रों की तुलना में पहले सूर्याताप प्राप्त करता है और गर्म हो जाता है।

(2) तिब्बत के पठार का बर्फ पिघलता है तो गुप्त ऊष्मा का परित्याग किये जाने के कारण तिब्बत के पठार की धरातलीय हवा गर्म होकर ऊपर उठने लगती है जिससे धरातल पर LP का निर्माण होता है। यही हवा तिब्बत के पठार के ऊपर उठकर ऊपर में प्रतिचक्रवात की स्थिति उत्पन्न करती है। इस प्रतिचक्रवातीय क्षेत्र से दो तरफ हवाएँ चलती है। एक शाखा चीन की ओर चली जाती है और दूसरी शाखा भारत के ऊपर से गुजरते हुए विषुवत रेखा की ओर अग्रसारित होती है। विषुवत रेखा की ओर जाने वाली हवा धीरे-2 ठंडी होकर अरब सागर के उपर बैठकर HP का निर्माण करती है। जिससे द०-प० मानसून की उत्पत्ति होती है।

             भारत के उत्तरी भाग में हिमालय पर्वत के अवस्थित होने के कारण साइबेरिया की ओर से आने वाली ठंडी हवा भारत में प्रविष्ट नहीं कर पाती है जिसके कारण चीन के समान यहाँ शीत ऋतु का आगमन नहीं होता है पुनः उत्तर की ओर से भारत में साईबेरिया हवा नहीं पहुंचने के कारण सूर्य के उत्तरायण होते ही थार मरुस्थलीय क्षेत्र और गंगा के मैदानी क्षेत्र तेजी से गर्म होकर L.P. का निर्माण करते हैं। धीरे-2 उत्तर का मैदानी क्षेत्र ITCZ का एक हिस्सा बन जाता है। यही क्षेत्र मानसूनी हवाओं को अपनी ओर आकर्षित करने का कार्य करती है।

मानसून के विकास

चित्र: द०-प० मानसून की उत्पत्ति

         हिमालय पर्वत की भूमिका मानसून के यांत्रिकी के रूप में भी देखी जा सकता है। जैसे- राजस्थान के ऊपर से गुजरने वाली द०-प० मानसून की अरेबियन शाखा को कुल्लू-मनाली के पास रोककर वहाँ बादल फटने की घटना को जन्म देती है। पुन: बंगाल की खाड़ी वाली शाखा को पुरब से पश्चिम दिशा में अग्रसारित होने के लिए बाध्य करती है।

निष्कर्ष

      इस तरह ऊपर के तथ्यों से स्पष्ट है कि भारतीय मानसून की उत्पत्ति एवं क्रियाविधि को निर्धारित करने में तिब्बत के पठार और हिमालय पर्वत की महत्वपूर्ण भूमिका है।

प्रश्न प्रारूप

1. द०-प० मानसून के विकास में हिमालय तथा तिब्बत के पठा का कैसे महत्वपूर्ण योगदान है? इसका वर्ण करें।

8. भारत के उच्चावच/भू-आकृतिक इकाई

8. भारत के उच्चावच/भू-आकृतिक इकाई


भारत के उच्चावच/भू-आकृतिक इकाई

               भारत दक्षिण एशिया में अवस्थित एक विशाल देश है जिसका क्षेत्रफल 32,87,263 वर्ग किमी० है। इसका अक्षांशीय विस्तार भारत के मुख्य भूमि से 8°4’N से 37°6’N के बीच एवं देशांतरीय विस्तार 68°7’E से 97°25’E के मध्य है। भारत एक उत्तरी गोलार्द्ध का देश है जो प्राचीनकाल के गोंडवाना भूखण्ड के ऊपर अवस्थित है। यह एक ऐसा देश है। जिसके दक्षिण में तीन सागर जैसे अरब सागर, हिन्द महासागर तथा बंगाल की खाड़ी स्थित हैं। जबकि उत्तरी भाग में हिमालय जैसे विशालकाय पर्वत स्थित है। पुन: भारत एक ऐसा देश है जिसकी संरचनात्मक विशेषता को नीचे के मॉडल में देखा जा सकता है।

भारत के उच्चावच

चित्र: भारत की भूगर्भिक संरचना

              भूगोलवेत्ताओं ने भारत को धरातलीय संरचना एवं उच्चावच के आधार पर मुख्यतः चार भू-आकृतिक इकाईयों में बाँटकर अध्ययन करते हैं। जैसे:-

(1) उत्तर भारत का पर्वतीय क्षेत्र

(2) उत्तर भारत का मैदानी क्षेत्र

(3) दक्षिण भारत का पठारी क्षेत्र

(4) तटीय मैदानी क्षेत्र एवं द्वीपीय क्षेत्र

चित्र: भारत की भौतिक इकाई

(1) उत्तर का पर्वतीय क्षेत्र           

         सम्पूर्ण भारत के 10.7% भूभाग पर पर्वतीय क्षेत्रों का विकास हुआ है। भारत के उत्तर में विशालकाय मोड़दार पर्वतों की कई श्रृंखलाएँ मौजूद है जिसका विस्तार लगभग 5 लाख वर्ग किमी० पर हुआ है। इसी क्षेत्र में विश्व की कई ऊँची-2 चोटियाँ पायी जाती है। सुविधा के दृष्टिकोण से उत्तर के पर्वतीय क्षेत्र को तीन भागों में बाँटकर अध्ययन करते हैं।

1. ट्राँस हिमालय (ट्राँस = उस पार)

2. हिमालय

3. पूर्वांचल हिमालय

1. ट्राँस हिमालय

         मुख्य हिमालय के उत्तर में जितने भी पर्वतीय श्रृंखलाएँ हैं उन्हें ट्राँस हिमालय से संबोधित करते हैं। भारतीय भूभाग पर ट्राँस हिमालय की तीन श्रृंखलाएँ मौजूद हैं:-

(i) काराकोरम श्रेणी

(ii) लद्दाख श्रेणी

(iii) जास्कर श्रेणी।

          उपरोक्त तीन श्रृंखलाओं के अतिरिक्त चीन में स्थित टिएन्सान और क्यूनलून पर्वत और पाकिस्तान में स्थित हिन्दूकुश पर्वत ट्राँस हिमालय के उदाहरण हैं। ये सभी श्रृंखलाएँ मिलकर कश्मीर के उत्तरी भाग में एक गाँठ का निर्माण करती हैं जिसे पामीर का पठार कहते हैं। इसे ‘दुनिया के छ्त’ से भी सम्बोधित करते है। इसकी ऊँचाई समुद्रतल से 4500 मीटर से अधिक है। भारत में अवस्थित ट्रांस हिमालय श्रृंखलाओं की संक्षिप्त चर्चा नीचे की जा रही है।

(i) काराकोरम श्रेणी 

       सिन्धु नदी के उत्तर में भारत और चीन के सीमा पर स्थित है जो पामीर के पठार से निकलकर उत्तर-पश्चिम से द०- पूरब की ओर विस्तृत है। इसका प्राचीन नाम ‘कृष्णा गिरि’ है। इसकी औसत ऊँचाई 6000 मीटर है। इसकी सबसे ऊँची चोटी K-2 (केल्विन-2 या (गॉडविन ऑस्टिन) है जिसकी ऊँचाई 8611 मीटर है। यह विश्व की दूसरी सबसे ऊँची चोटी है। काराकोरम पर्वत की चौड़ाई  80 किमी० है।

            सालों भर बर्फ से ढका रहता है। इस पर्वत पर कई हिमानी मिलते हैं। जैसे:- बटुरा, हिस्पार, स्कामरी, बियाफो, बल्टोरा, सियाचीन हिमानी आदि। काराकोरम पर्वत पर हिमानी के अपरदन से कई दर्रे बने हैं। जैसे- खंजरेब, इन्दिरा कॉल, अगहिल इत्यादि। हिमानी के अपरदन से इसका ढाल सीढ़ीनुमा बन चुका है। यह विशुद्ध रूप से अर्द्ध मरुस्थलीय भूदृश्य प्रस्तुत करता है।

(ii) लद्दाख श्रेणी

        काराकोरम श्रेणी और जास्कर श्रेणी के बीच स्थित है। इसकी औसत ऊँचाई 5300 मीटर है। हिमानी के अपरदन के कारण यह पठार के रूप में तब्दील हो चुका है। इसका दक्षिणी-पूर्वी भाग चीन में जाकर कैलाश पर्वत के नाम से जाना जाता है। इस श्रृंखला पर प्रसिद्ध पुगा की घाटी मिलती है जो भूतापीय ऊर्जा का विशाल स्रोत है। इस पठार पर सिन्धु की सहायक नदी श्योक नदी बहती है। लद्दाख श्रेणी के उत्तर-पूरब में सोड्डा का मैदान और देप्सांग का मैदान स्थित है।

(iii) जास्कर श्रेणी  

    लद्दाख श्रेणी के दक्षिण में समान्तर रूप से फैला हुआ है। यह पर्वत 76°E देशान्तर रेखा के पास महान हिमालय से निकलती है। इस पर्वत की वहीं विशेषताएँ है जो लद्दाख एवं काराकोरम श्रेणी की है।

चित्र: ट्रांस हिमालय

2. हिमालय

     ‘हिमालय’ दो शब्दों के मिलने से बना है प्रथम- हिम, दूसरा- आलय। हिम का तात्पर्य बर्फ से है जबकि आलय का तात्पर्य घर से है, अर्थात हिमालय एक ऐसा नवीन मोड़दार पर्वत है जहाँ लाखों वर्षों से हिम स्थायी रूप से निवास करता है। वस्तुतः यह पर्वत भारत के उत्तरी भाग में एक चाप के समान है जिसका विस्तार सिन्धु गॉर्ज से लेकर ब्रह्मपुत्र गॉर्ज तक है। इसकी कुल लम्बाई 2500Km. है जबकि इसकी चौड़ाई अलग-अलग स्थानों पर अलग-अलग है। जैसे अरुणाचल प्रदेश में इसकी चौ० 150 km. है जबकि जम्मू कश्मीर में इसकी चौड़ाई 450 Km. है।

          हिमालय पर्वत में तीन प्रमुख श्रृंखलाएँ हैं जो महान हिमालय, लघु हिमालय, तथा शिवालिक हिमालय के नाम से प्रसिद्ध है। इसकी उत्पत्ति की व्याख्या हेतु कई सिद्धांत प्रस्तुत किये गये है उनमें सबसे वैज्ञानिक सिद्धांत प्लेट विवर्तनिकी सिद्धांत है।

हिमालय की उत्पत्ति

     ‘प्लेट विवर्तनिकी सिद्धांत’ के अनुसार हिमालय एक नवीन मोड़दार पर्वत है। आज जहाँ पर हिमालय अवस्थित है वहाँ पर प्लीस्टोसीन कल्प तक एक विशाल सागर अवस्थित था जो टेथिस सागर के नाम से प्रसिद्ध था। टेथिस सागर के उत्तर में अंगारालैण्ड और दक्षिण में गोंडवाना लैण्ड था। अंगारालैण्ड एक स्थिर भूखण्ड था क्योंकि उसके नीचे संवहन तरंग नहीं चल रही थी। जबकि गोंडवानालैण्ड एक ऐसा भूखण्ड था जिसके नीचे संवहन तरंग चल रही थी। इन संवहन तरंग के कारण ही गोंडवानालैण्ड का खिसकाव उत्तर-पूर्व एवं उत्तर दिशा में हो रही थी।

          टेथिस सागर का निर्माण कार्बोनीफेरस कल्प में एक महान भूसंचलन के कारण हुआ था। यह सागर एक भूसन्नति गर्त के समान है। इस भूसन्नति में लाखों वर्षों तक अंगारालैण्ड और गोंडवाना लैण्ड के ऊपर बहने वाली नदियों के द्वारा मालवा का निक्षेपण होता रहा। जब भूसन्नति में अत्याधिक मलवा का जमाव हो गया तो गोंडवाना लैण्ड में उत्तर की ओर खिसकने की प्रवृति प्रारंभ हो गयी।

        चूँकि गोंडवाना लैण्ड की उत्तरी सीमा पर विन्ध्याचल पर्वत स्थित था। जब गोंडवाना लैंड उत्तर की ओर खिसका तो गोंडवाना का अग्र भाग बुलडोजर का काम करने लगा। जिसके परिणामरूवरूप टेथिस सागर में जमे मलबा या अवसाद में वलन की क्रिया प्रारंभ हो गयी जिसके कारण टेथिस सागर के मलवो में वलन एवं उत्थान की क्रिया से हिमालय जैसे विशाल पर्वत का निर्माण हुआ।

चित्र: हिमालय पर्वत की उत्पत्ति

         हिमालय पर्वत को तृतीयक काल का पर्वत भी कहा जाता है क्योंकि इसका निर्माण का कार्य तृतीयक काल में ही सम्पन्न हुआ था। इस काल में महान भू-संचलन की किया सम्पन्न हुई थी जिसे अल्पाइन भू-संचलन के नाम से जानते है। हिमालय पर्वत का निर्माण भी अल्पाइन भूसंचलन से हुआ, इसीलिए हिमालय को अल्पाइन पर्वत के नाम से जानते हैं।

हिमालय पर्वत का विकास 

        अल्पाइन भू-संचलन के फलस्वरूप टेथिस सागर के अवसादों में वलन के फलस्वरूप अचानक हिमालय का निर्माण नहीं हुआ बल्कि इसके विकास में करोड़ों वर्ष का समय लगा है। हिमालय का विकास आज भी जारी है क्योंकि आज भी गोंडवाना लैण्ड के द्वारा हिमालय के भूगर्भ में दबाव लगाये जाने के कारण प्रतिवर्ष 4 से 5 सेमी० हिमालय का उत्थान हो रहा है।

      भूगर्भशास्त्रियों के अनुसार, हिमालय में स्थित दोनों श्रृंखलाओं का विकास अलग-2 अवस्था (समय) में हुआ है। दूसरे शब्दों में हिमालय पर्वत के निर्माण तीन अवस्थाओं में हुआ है।

        प्रथम अवस्था में महान हिमालय का निर्माण हुआ है। महान हिमालय के निर्माण का कल्प मुख्यतः ओलिगोसीन निर्धारित किया गया है क्योंकि उसके भूगर्भ से भी ओलीगोसिन के अवसादों का प्रमाण मिलता है।

       द्वितीय अवस्था लघु हिमालय का निर्माण मयोसीन कल्प में माना जाता है लेकिन कुछ क्षेत्रों का निर्माण प्लायोसीन कल्प तक जारी रहा।

     तीसरी अवस्था में शिवालिक पर्वत का निर्माण कार्य प्लायोसीन में प्रारंभ हुआ और प्लीस्टोसीन में उसका निर्माण कार्य पूरा हुआ।

       शिवालिक पर्वत के बारे में कहा जाता है कि जब महान हिमालय और लघु हिमालय का निर्माण हो गया तो उसके बाद लघु हिमालय के दक्षिणी भाग में टेथिस सागर का अवशिष्ट भाग बचा रहा गया जो शिवालिक नदी या इण्डो ब्रह्मा नदी के नाम से प्रसिद्ध हुआ। इस नदी में महान हिमालय और लघु हिमालय के द्वारा लाई गई मलवा का निक्षेपण लाखों वर्षों तक होता रहा। पुन: गोंडवाना लैंड के उत्तर की ओर खिसकने से या मलवा पर दबाव पड़ने से शिवालिक पर्वत का विकास हुआ।

हिमालय की संरचना

         संरचनात्मक दृष्टिकोण से हिमालय को तीन श्रृंखला में बाँटते हैं-

(1) महान हिमालय

(2) लघु/मध्य हिमालय

(3) शिवालिक हिमालय

         महान हिमालय पूर्व से पश्चिम की ओर एक लगातार श्रृंखला के रूप में है। कहीं-2 पूर्ववर्ती नदी (जैसे- सिन्धु, सतलज, कोशी, ब्रह्मपुत्र) के कारण दर्रों का विकास हुआ है। दूसरी ओर लघु हिमालय में महान हिमालय की तुलना में अधिक विखण्डन देखा जा सकता है। पुनः शिवालिक हिमालय एक ऐसा पर्वत है जो पूर्ण रूप से विखण्डित हो चुकी है। पुनः इसका विस्तार पश्चिम में पोटवार के पठार से लेकर पूरब में अरुणाचल प्रदेश तक हुआ है। प्रत्येक हिमालय के श्रृंखलाओं की संरचना की चर्चा नीचे के शीर्षक में की जा रही है:-

(1) महान हिमालय/हिमाद्री-

         इसका विस्तार सिन्धु गॉर्ज से नामचा बरबा गॉर्ज तक हुआ है। इसकी औसत ऊँचाई 6000m है। इसका आकार एक चाप के समान है। सालोंभर इसकी चोटियाँ बर्फ से ढकी रहती है। गंगोत्री, यमुनोत्री जैसी कई हिमानी पायी जाती है। इसका उत्तरी ढाल मंद और दक्षिणी ढाल तीव्र है।

         महान हिमालय पर विश्व की कई ऊँची-ऊँची चोटियाँ पायी जाती है। जैसे- माउंट एवरेस्ट (8850m) विश्व की सबसे ऊँची चोटी है। कंचनजंघा (8598m) हिमालय की दूसरी सबसे ऊँची चोटी है। इसके अलावे नंगा पर्वत, कामेट, केदारनाथ (6945m), धौलागिरी, गौरीशंकर, गोसाईथान इत्यादि भी ऐसी चोटियाँ है जिसकी ऊँचाई 6000m से भी अधिक है।

महान हिमालय की प्रमुख चोटियाँ:

(i) एवरेस्ट (8850m)

(ii) कंचनजंघा (8598m)

(iii) मकालू  (8481m)

(iv) चोयू (8201m)

(v) धौलागिरी (8172m)

(vi) मंसालू (8156m)

(vii) नंगा पर्वत (8126 m)

(viii) अन्नपूर्णा (8078m)

(ix) नंदादेवी (7817m)

(x) नामचाबरबा (7756m) 

(xi) कामेत (7756m) 

(xii) गौरीशंकर (7145m)

(xiii) बद्रीनाथ (7138m)

(xiv) एपी (7132m)

(xv) नीलकंठ (7073m) 

       हिमालय पर्वत को कई नदियों एवं हिमानियों ने काटकर कई दर्रों एवं कॉल का निर्माण किया है। उतराखंड में अवस्थित माना और नीति दो प्रसिद्ध कॉल के उदाहरण है। जबकि कश्मीर का जोजीला और बुर्जिला, हिमाचल प्रदेश का शिपकीला, उत्तराखण्ड का पिथौरागढ़, थागला और लिपुलेख, अरुणाचल प्रदेश का बोमडिला, सिक्किम का जेलेप्ला और नाथुला प्रमुख दर्रों के उदाहरण है।

        महान हिमालय अवसादी और कांग्लोमरेट चट्टानों से निर्मित है। जिसके कारण नदियों द्वारा अपरदन का कार्य तेजी से किया जा रहा है जिससे कई गौण स्थलाकृतियों का विकास हो रहा है। महान हिमालय की संरचना में कई क्षेत्रीय विषमताएँ भी देखी जा सकती है। जैसे कश्मीर में स्थित महान हिमालय की ऊँचाई कम है जबकि पूर्वी एवं मध्यवर्ती भाग में इसकी अधिक ऊँचाई है। पुन: उत्तरांचल में अत्याधिक दबाव बल के कारण अतिवलन और नेपी का प्रमाण मिलता है।

(2) लघु / मध्य हिमालय / हिमाचल हिमालय

          इसे हिमाचल / लघु हिमालय के नाम से जानते हैं। इसे कश्मीर में पीरपंजाल, हिमाचल प्रदेश में धौलाधर, नेपाल में “महाभारत श्रेणी”, अरुणाचल प्रदेश में “मिश्मी और डाफला” के नाम से जानते हैं। इस पर्वत का भी उतरी  ढाल मंद और दक्षिणी ढाल तीव्र है। यह पर्वत अवसादी और कांग्लोमरेट चट्टानों के अलावे रूपान्तरित चट्टानों से निर्मित है। रूपान्तरित चट्टानों का निर्माण अत्याधिक दबाव एवं ताप के कारण हुआ है।

       मध्य हिमालय की औसत ऊँचाई 4500m है। इसमें कई अनुप्रस्थ घाटियों का विकास हुआ है। जैसे- कुल्लू-मनाली की घाटी इसका प्रसिद्ध उदा० है। इस पर्वत पर मसूरी, नैनीताल, दार्जीलिंग, शिमला जैसे कई पर्यटक नगर अवस्थित है।

       महान हिमालय और लघु हिमालय के बीच में लगभग 200Km की दूरी है। कश्मीर में इन दोनों श्रृंखलाओं के बीच में जो स्थिर जल बच गया था वह करेवा झील के नाम से प्रसिद्ध था। डल एवं वुलर झील इसी महान झील का अवशिष्ट भाग है, करेवा झील में मलवा के निक्षेपण से ही कश्मीर घाटी का विकास हुआ है।

    महान हिमालय और लघु हिमालय के बीच में एक विशाल दरार या भ्रांश घाटी स्थित है जिसे Main Central Thrust कहते है।

(3) शिवालिक पर्वत/ उप हिमालय

       शिवालिक पर्वत की औसत ऊँचाई 600 मी० है। इसका विस्तार पूरब में कोशी नदी से पश्चिम में पाकिस्तान के पोटवार पठार तक हुआ है। यह पूर्णत विखंडित श्रृंखला है। कहीं-2 पर इसकी ऊँचाई पर्वतीय मान्यता से भी कम है। शिवालिक पर्वत अवसादी और काँग्लोमरेट चट्टानों से निर्मित है।

    इस तरह ऊपर के तथ्यों से स्पष्ट है कि हिमालय क्षेत्र अपनी विशिष्ट संरचनात्मक विशेषता के कारण एक विशिष्ट भूदृश्य प्रस्तुत करता है।

3. पूर्वांचल हिमालय

        पूर्वांचल हिमालय का विस्तार नामचाबरबा गॉर्ज से लेकर वर्मा के अराकान योमा पहाड़ी तक हुआ है। अराकानयोमा पहाड़ी के दक्षिण में अवस्थित द्वीपीय क्षेत्र (अंडमान निकोबार द्वीप समूह) पूर्वांचल हिमालय का ही अवशिष्ट भाग के रूप में है। पूर्वांचल हिमालय का विस्तार भारत के अरुणाचल प्रदेश, नागालैण्ड, मणिपुर एवं मिजोरम राज्य में हुआ है। यह मूलत: उ०-पूर्वी भारत और म्यानमार के बीच में सीमा का निर्माण करती है। वर्मा में इसी पर्वत को ‘अराकान योमा’ के नाम से जानते हैं।

पूर्वांचल हिमालय की उत्पत्ति

          पूर्वांचल हिमालय का निर्माण संरक्षी प्लेट सीमा के सहारे हुआ है। पूर्वांचल हिमालय का विस्तार उत्तर से दक्षिण दिशा की ओर हुआ है। भूगर्भिक अध्ययन से यह स्पष्ट हो चुका है कि गोंडवाना प्लेट तथा अंगारा प्लेट की संरक्षी सीमा इसी पर्वत के सहारे विकसित हुआ है। इन दो प्लेटों के रगड़ के कारण कुछ चट्टानें धरातल से ऊपर उठ गयी जिनसे पूर्वांचल हिमालय का निर्माण हुआ है। इसकी औसत ऊँचाई 2000 से 3000 मी० है। इसकी उत्पत्ति की क्रिया नीचे के चित्र में भी देखा जा सकता है।

पूर्वांचल हिमालय की स्थलाकृतिक विशेषता

          नागचा बरबा के पास हिमालय अचानक दक्षिण की ओर मुड़ जाती है। नामचा बरबा के पास हिमालय और पूर्वांचल हिमालय मुड़कर Syntaxis मोड़ का निर्माण करती है। उत्तर से दक्षिण की ओर जाने पर पूर्वांचल हिमालय में पर्वतों का निम्नलिखित क्रम पायी जाती है। अरुणाचल प्रदेश में पटकोईबुम, नागालैण्ड में नागा की पहाड़ी, मणिपुर में मणिपुर पहाड़ी, मिजोरम में मिजों की पहाड़ी या लुशाई की पहाड़ी, त्रिपुरा में अगरतल्ला की पहाड़ी कहलाता है।

         पुन: मेघालय में  जयंतिया की पहाड़ी और मणिपुर की पहाड़ी एक छोटी-सी पहाड़ी से जुड़ जाती है जिसे बैरल की पहाड़ी कहते हैं। पूर्वांचल हिमालय का एक छोटा-सा भाग बंगलादेश में भी है जिसे चटगाँव की पहाड़ी कहते हैं। पूर्वांचल हिमालय का विस्तृत भाग ही म्यांमार में जाकर अराकानयोमा की पहाड़ी कहलाती है। पूर्वांचल हिमालय की सबसे ऊँची चोटी का‌ पटकोईबुम (3826 मी०) है जो नागा की पहाड़ी पर स्थित है। मिजो पहाड़ी की सबासे ऊँची चोटी ‘द ब्लू माऊण्टेन’ (2157 मी०) हैं। 

चित्र: पूर्वांचल हिमालय की पहाड़ियाँ

        पूर्वांचल हिमालय में कई छोटी-छोटी दर्रे भी पाये जाते हैं जैसे दिफू, कुमजावती, हफूंगान, चौकन और पांगशू। पूर्वांचल हिमालय में कई अनुवर्ती घाटियों का विकास हुआ है जिसमें बराक की घाटी, कोहिमा की घाटी सबसे प्रसिद्ध हैं।

प्रश्न प्रारूप

Q. हिमालय के विकास एवं संरचना की विवेचना करें। अथवा हिमालय की उत्पत्ति की व्याख्या प्लेट विवर्तनिकी सिद्धांत के माध्यम से करें।

27. भारत के आर्थिक जीवन पर मानसून का प्रभाव

भारत के आर्थिक जीवन पर मानसून का प्रभाव

भारत के आर्थिक

               भारत एक मानसूनी जलवायु प्रधान देश है। यहाँ मानसून की उत्पति तिब्बत का पठार, हिमालय पर्वत, उत्तर का मैदानी क्षेत्र, वायुसंचरण और हिन्द महासागर के सम्मिलित प्रभाव के कारण होता है। भारत में मानसून से ग्रीष्म ऋतु में वर्षण का कार्य होती है। यहाँ दक्षिण-पश्चिम मानसून से 80% वर्षा होती है जबकि 20% वर्षा  उ०-पू० मानसून एवं पछुआ विक्षोभ से होती है।

        भारत के आर्थिक जीवन पर मानसून का प्रभाव निम्नलिखित क्षेत्रों पर पड़ता है:-

(1) कृषि पर प्रभाव:-

        भारत एक कृषि प्रधान देश है। यहाँ की अर्थव्यवस्था कृषि पर आधारित है। भारत में कृषि मानसून पर निर्भर करती है। जिस वर्ष मानसून भारत में समय पर आती है और मानसून सामान्य रहती है तो उस वर्ष भारतीय किसानों के घर अन्न से भर जाते हैं। यदि मानसून समय पर नहीं आती है और अनावृष्टि या अतिवृष्टि होती है तो फसलें बर्बाद हो जाती है जिससे हमारे भारतीय किसानों को काफी क्षति उठानी पड़ती है। इसीलिए कहा भी जाता है कि-“भारतीय किसान मानसून के साथ जुआ खेलते है।”

(2) उद्योगों पर प्रभाव:-

       भारत के कई उद्योग कृषि पर आधारित हैं; जैसे- चीनी उद्योग, वस्त्र उद्योग, कागज उद्योग, जूट उद्योग, चावल मील, इत्यादि। यदि भारतीय मानसून गन्ना, कपास, धान आदि फसलों को बर्बाद करती है तो इन उद्योगों में कच्चे माल की कमी हो जाती हैं। जब मानसून का प्रभाव अच्छा रहता है तो आसानी से इन उद्योगों को पर्याप्त कच्चे माल मिल जाते हैं।

(3) मत्स्य पालन पर प्रभाव:-

          भारतीय मानसून से पर्याप्त वर्षा होती हैं तो यहाँ के छोटे-बड़े तालाबों में पर्याप्त जल संग्रहित कर लिये जाते हैं जिससे इन जलाशयों में मत्स्य पालन का कार्य किया जाता है।

(4) पशुपालन पर प्रभाव:-

     भारतीय मानसून से अतिवृष्टि या अनावृष्टि होने से फसलें नष्ट हो जाती है। चारागाह पर चारे की फसले नष्ट हो जाती है जिसके कारण पशुओं के लिए चारा की कमी हो जाती है। फलस्वरूप पशुपालन पर नकारात्मक प्रभाव पड़ने लगता है। यदि मानसून सामान्य प्रका की होती है तो पशुपालन पर सकारात्मक प्रभाव पड़ता है। फलतः दुध एवं माँस के उत्पादन में वृद्धि होती हैं।

प्रश्न प्रारूप

1. भात के आर्थिक जीवन पर मानसून का प्रभाव का वर्णन करें

28. भारत में शीतकालीन वर्षा का आर्थिक जीवन पर प्रभाव

28. भारत में शीतकालीन वर्षा का आर्थिक जीवन पर प्रभाव

भारत में शीतकालीन वर्षा

          भारत में जाड़े की ऋतु में होने वाली वर्षा को शीतकालीन वर्षा कहते हैं। यह वर्षा दो प्रकार की होती है। एक- पछुआ विक्षोभ के कारण होने वाली वर्षा और दूसरा- उ०-पू० मानसून की वर्षा। पछुआ विक्षोभ के कारण उ०-पू० भारत में वर्षा होती है। जबकि उ०-पू० मानसून से भारत के पूर्वी तटीय क्षेत्रों में वर्षा होती है। इन दोनों प्रकार की वर्षा से भारत के आर्थिक जीवन की कई क्षेत्रों पर प्रभाव पड़ता है। जैसे-

(1) कृषि पर प्रभाव⇒

          भारत में पछुआ विक्षोभ के कारण जाड़े की ऋतु में वर्षा होती है। यह वर्षा गेहूँ एवं अन्य रबी फसल के लिए फायदेमंद होती है। पंजाब में यह वर्षा जनवरी या फरवरी महीने में होती है। यहाँ की कृषि के लिए यह वर्षा काफी महत्व रखती है क्योंकि वहाँ की रबी फसल की सफलता इस वर्षा पर निर्भर करती है।

       उ०-पूर्वी मानसून से मुख्यतः भारत के पूर्वी तटीय भागों में वर्षा होती है। यह वर्षा विशेष रूप से तमिलनाडु में होती है। इस वर्षा से मुख्यतः रबी फसलों की सिंचाई होती है, जिसके कारण उसके उत्पादन में वृद्धि होती है। उत्पादन में वृद्धि होने से किसानों की आमदनी बढ़ती है। शीतकालीन वर्षा का कृषि पर कुछ नकारात्मक प्रभाव पड़ते है। जैसे:- यदि एक सप्ताह तक शीतकालीन वर्षा के कारण मौसम गड़बड़ रहती है तो मौसम खराब रहने के कारण आलू, प्याज, मसूर आदि फसलों को पाला लग जाती है। इसके कारण उत्पादन में कमी हो जाती है और किसानों को काफी हानि उठानी पड़ती है।

प्रश्न प्रारूप

1. भात में शीतकालीन वर्षा का आर्थिक जीवन प प्रभाव बतायें।

7. प्राचीनतम कल्प के धारवाड़ क्रम की चट्टानों का आर्थिक महत्त्व

7. प्राचीनतम कल्प के धारवाड़ क्रम की चट्टानों का आर्थिक महत्त्व


प्राचीनतम कल्प के धारवाड़ क्रम की चट्टानों का आर्थिक महत्त्व       

          भारत में प्राचीनतम कल्प से लेकर नवीनतम कल्प की चट्टानें पायी जाती हैं। प्राचीनतम कल्प में एक प्रमुख चट्टान धारवाड़ समूह की है। इसका निर्माण 2500 मिलियन वर्ष पूर्व से 1500 मिलियन वर्ष पूर्व के बीच मानी जाती है। यह मूलत: प्री कैम्ब्रीयन  कल्प की चट्टान है जिसका खोज सर्वप्रथम राबर्ट ब्रशफुट महोदय ने कर्नाटक के धारवाड़ जिला से किया था।

धारवाड़ क्रम के चट्टानों की विशेषताएँ

      धारवाड़ चट्टान की निम्नलिखित विशेषताएँ हैं। जैसे- 

(1) यह भारत का सबसे प्राचीनतम परतदार चट्टान का उदाहरण है।

(2) लम्बे समय के कारण इसका काफी रूपान्तरण हो चूका है।

(3) धारवाड़ क्रम  के चट्टानों से किसी भी प्रकार का जीवाश्म नहीं मिलता है क्योंकि उस वक्त पृथ्वी पर जीवों की उत्पत्ति हुई ही नहीं थी।

(4) धारवाड़ समूह की चट्टानों में नीस और शिस्ट प्रकार की चट्टानें मिलती हैं।

(5) प्री कैम्ब्रीयन कल्प में भूपटल के फैलाव और सिकुड़न से कई महासागरों और प्राचीन मोड़दार पर्वतों का निर्माण हुआ है। राजस्थान की अरावली की पहाड़ी इसका सर्वोत्तम उदाहरण है।

(6) भारत में इसका विस्तार 15600 वर्ग किमी० क्षेत्र में हुआ है।

(7) भारत में धारवाड़ प्रकार की चट्टान कर्नाटक के धारवाड़ जिला, विशाखापत्तनम के पास कूदोराइट श्रेणी की चट्टान, रीवा & हजारीबाग के बीच में गोंडाइट क्रम की चट्टान, जम्मू-कश्मीर की सेलखाला क्रम की चट्टान, राजस्थान के अरावली क्षेत्र में, झारखण्ड और उड़ीसा के सीमा पर लौहक्रम की चट्टान, धारवाड़ समूह के चट्टान माने जाते हैं।

प्राचीनतम कल्पआर्थिक महत्व

         धारवाड़ क्रम की चट्टानें भारत में धात्विक खनिजों के लिए विश्व प्रसिद्ध है। इस चट्टान से लोहा, सोना, मैगनीज, यूरेनियम, ताम्बा, जिंक, क्रोमियम जैसे- धात्विक खनिज प्राप्त किये जाते हैं। राजस्थान की खेतरी का खान ताम्बा के लिए प्रसिद्ध रही है।

         कर्नाटक, गोआ, झारखण्ड, उड़ीसा इत्यादि से हेमाटाइट और मैग्नेटाइट जैसे लौह अयस्क प्राप्त किये जाते है।मध्य प्रदेश के छिंदवाड़ा, बाला घाट, उड़ीसा के कालाहांडी और बोलांगिर क्षेत्र से मैंग्नीज प्राप्त किया जाता है।

        धारवाड़ क्रम की चट्टानों से एस्बेस्ट, कोबाल्ट, अभ्रक, प्लेटीनम, सूरमा, सीसा, फ्यूराइट, इल्मेनाइट (नाभिकीय खनिज का स्रोत), गारनेट, संगमरमर, कोरंडम जैसे खनिज भी प्राप्त किये जाते हैं। 

    धारवाड़ क्रम चट्टानें भारत में लाल और लैटेराइट मिट्टी के निर्माण में भी सहायक रहा है जो विभिन्न प्रकार के वनस्पतियों के लिए आधार का कार्य करती है।

निष्कर्ष

       इस ऊप के तथ्यों से स्पष्ट है कि धावाड़ क्रम की चट्टानें अपनी विशिष्टता एवं आर्थिक महत्व के लिए विश्व प्रसिद्ध रही हैं।

6. भारत में गोण्डवानाक्रम के चट्टानों के निर्माण का आधार, वितरण एवं आर्थिक महत्व

6. भारत में गोण्डवानाक्रम के चट्टानों के निर्माण का आधार, वितरण एवं आर्थिक महत्व


भारत में गोण्डवानाक्रम के चट्टानों के निर्माण का आधार, वितरण एवं आर्थिक महत्व

         भारत में विभिन्न भूगर्भिक काल में निर्मित अनेक प्रकार की चट्टानें पायी जाती हैं। इसका संबंध पैलियोजोइक महाकल्प के कार्बोनीफेरस कल्प से लेकर मीसोजोइक कल्प के मध्य रहा है।

भारत में गोण्डवाना क्रम की चट्टानें

        ‘गोंडवाना’ शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग 1872 ई० में एच०बी० मेडलीकॉट और 2876 ई० में ओ० फीस्टमेंटल महोदय ने किया था। इस शब्द की उत्पत्ति मध्य प्रदेश के गोंड क्षेत्र से हुआ है क्योंकि सबसे पहले गोण्ड जनजातियों के निवास क्षेत्र से ही गोंडवानाक्रम की चट्टानों की खोज की गई थी। बाद में इस प्रकार की चट्टानें जहाँ कहीं भी प्राप्त हुआ उसे गोडवाना क्रम के चट्टानों से सम्बोधित किया।

         वस्तुत: विन्ध्यन क्रम की चट्टानों का निर्माण हो जाने के बाद प्रायद्वीपीय भारत का भूखण्ड लम्बे समय तक भूगर्भिक हलचल/भूकंप से मुक रहा है। लेकिन, कार्बोनीफेरस के पूर्वार्द्ध में भयंकर भूसंचलन हुआ जिसे हर्सीनियन भू-संचलन के नाम से जानते हैं।

      हर्सीनियन भू-संचलन भूसंचलन का प्रभाव लगभग सम्पूर्ण पृथ्वी पर पड़ा। इस समय जल और स्थल के वितरण में भारी परिवर्तन हुआ। +जैसे: पेन्जिया रूपी विशालकाय भूखण्ड के मध्यवर्ती भाग में धंसान की क्रिया से एक विशाल टेथिस सागर का निर्माण हुआ। इसका विस्तार पश्चिम में भूमध्यसागर से लेकर पूरब में प्रशान्त महासागर तक था। टेथिस सागर के उतरी भाग अंगारालैण्ड कहलाया जबकि दक्षिणी भाग गोण्डवानालैण्ड कहलाया।

भारत में गोण्डवानाक्रम

         कार्बोनीफेरस कल्प में ही पृथ्वी पर कुछ क्षेत्रों में हिमयुग का आगमन हुआ था। पर्वतीय क्षेत्रों / पर्वतों के ऊँचाई वाले भाग में हिम के जमने और हिमस्खलन के कारण पर्वतीय क्षेत्रों का अपरदन होने लगा। अपरदित सामाग्री गोंडवाना भूखण्ड के विभिन्न नदी घाटियों और गर्तों में जमा कर दिये जाने से उपजाऊ समतल मैदान का विकास हुआ है। उस वक्त मानवीय उद्भव नहीं होने के कारण सभी मैदानी क्षेत्र सघन वनस्पतियों से ढक गये। इन वनस्पतियों में ग्लोसोप्टेरिस और टीलोफाइलम समूह की वनस्पत्ति अधिक थी। भूसंचलन के कारण ये वनस्पति गिरकर यत्र-तत्र जमने लगे।

         पुन: अत्याधिक ताप एवं दाब के कारण ये वनस्पति कोयले में रूपान्तरित हो गये। जगह-2 पर आज भी इन वनस्पतियों के परतों को स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है। चूँकि कार्बोनीफेरस कल्प में इन वनस्पतियों का विकास एवं भूमि के अन्दर दबने की क्रिया नदी घाटी क्षेत्रों में हुआ था। इसीलिए आज भी कोयला की पेटियाँ नदी घाटी क्षेत्रों में मिलती है।

वितरण

      भारत में गोंडवनाक्रम की चट्टानें प्रायद्वीपीय भारत और प्रायद्वीपीय भारत के बाहरी क्षेत्रों में देखा जा सकता है। जैसे-

झारखण्ड- दामोदर नदी घाटी, उत्तरी कोल क्षेत्र, डाल्टेनगंज क्षेत्र।

बिहार- ललमटिया ये लेकर राजमहल की पहाड़ी तक।

उड़ीसा- महानदी घाटी क्षेत्र में।

आन्ध्रप्रदेश- गोदावरी एवं उनके सहायक नदी घाटी क्षेत्र में।

छतीसगढ़ एवं मध्य प्रदेश- सोन नदी घाटी क्षेत्र।

महाराष्ट्र- वर्दा नदी घाटी क्षेत्र।

पश्चिम बंगाल- दामोदर और बराकर नदी घाटी क्षेत्र में।

         उपरोक्त क्षेत्रों के अलावे कश्मीर, असम, सिक्कीम और दार्जलिंग में भी गोंडवाना प्रकार की चट्टानें पायी जाती है।

भारत में गोण्डवानाक्रम

चित्र: गोंडवाना समूह की चट्टानों का वितरण

आर्थिक महत्व

(1) भारत का 96% एन्थ्रासाइट और बिटुमिनस कोपला गोंडवाना क्रम की चट्टानों से मिलता है। थोड़ा-बहुत लिग्नाइट कोयला इस समूह की चट्टान से प्राप्त होता है।

(2) गोंडवानाक्रम की चट्टानों से बलुआ पत्थर मिलता है जिसका उपयोग भवन निर्माण में किया जाता है।

(3) कोयले की खानों ने चिका मिट्टी और फायर क्ले प्राप्त किये जाते हैं जिसका प्रयोग ईट और बर्तन के निर्माण में किया जाता है।

(4) गोंडवानाक्रम की चट्टानें, सीमेन्ट और रासायनिक उर्वरक के निर्माण में काफी उपयोगी माने जाते हैं।

(5) गोंडवाना क्रम की चट्टानों से मिलने वाला कंक्रीट का प्रयोग, नाभिकीय भट्टी के निर्माण में किया जाता है।

निष्कर्ष

      इस तरह ऊपर के तथ्यों से स्पष्ट है कि भारत में मिलने वाला गोडवानाक्रम की चट्टान से कोयला जैसे ऊर्जा संसाधन के लिए विश्व प्रसिद्ध है जिसकी महत्ता अपने आप में सर्वविदित है।

प्रश्न प्रारूप

Q. भात में गोण्डवानाक्रम के चट्टानों के निर्माण का आधा, वितरण एवं आर्थिक महत्व की विवेचना कीजिए।

25. सूर्यातप (Insolation)

25. सूर्यातप (Insolation)


 सूर्यातप

        वायुमण्डल तथा पृथ्वी की ऊष्मा (Heat) का प्रधान स्रोत (सूर्य) है। सौर्यिक ऊर्जा को ही ‘सूर्यातप’ कहते हैं।

          दूसरे शब्दों में “लघु तरंगों के रूप में संचालित लगभग 3 लाख किमी० प्रति सेकेण्ड की गति से भ्रमण करती हुई प्राप्त सौर्यिक ऊर्जा को ‘सौर्य विकिरण’ या ‘सूर्यातप’ कहते हैं”। सूर्य धधकता हुआ गैस का वृहद् गोला है, जिसकी व्यास पृथ्वी से 100 गुना तथा उसके आयतन से 100,000 गुना अधिक है। सूर्य के धरातल जिसे फोटोस्फेयर कहते है, का तापक्रम 6000 डिग्री सेल्सियस तथा केन्द्रीय भाग का 1.5 करोड़ डिग्री सेल्सियस बताया जाता है। पृथ्वी के वायुमण्डल का औसत तापक्रम 15.2°C होता है।

       सूर्य की ऊर्जा का प्रधान स्रोत उसका आन्तरिक भाग जहाँ पर अत्यधिक दबाव तथा उच्च तापमान के कारण नाभिकीय संलयन के कारण हाइड्रोजन का हीलियम में रूपान्तर होने से ऊष्मा का उत्सर्जन होता है। यह ऊष्मा परिचालन तथा संवहन द्वारा सूर्य की बाहरी सतह तक पहुँचती है। सूर्य की वाह्य सतह से निकलने वाली ऊर्जा को फोटान कहते हैं। इसी तरह सूर्य की वाह्य सतह को फोटोस्फीयर कहते हैं। इस सतह से ऊर्जा का विद्युत् चुम्बकीय तरंग द्वारा विकिरण होता है।

        सूर्य के धरातल के प्रत्येक वर्ग इंच से विकीर्ण ऊर्जा 100,000 अश्व शक्ति के बराबर होती है, सूर्य की वह्य सतह (फोटोस्फीयर) से निकलने वाली ऊर्जा प्रायः स्थिर रहती है। इस तरह पृथ्वी की सतह के प्रति इकाई क्षेत्र पर सूर्य से प्राप्त ऊर्जा प्राय: स्थिर रहती है। इसे सौर्यिक स्थिरांक (Solar constant) कहते हैं।

      इस तरह सौर्यिक स्थिरांक सूर्य के विकिरण की दर को प्रदर्शित करता है जो प्रति वर्ग सेण्टीमीटर प्रति मिनट 2 ग्राम कैलरी है। सूर्य से लगभग 15 करोड़ किमी० दूर स्थित पृथ्वी सौर्यिक ऊर्जा का केवल 1/2×109 भाग ही प्राप्त कर पाती है। परन्तु यह स्वल्प मात्रा भी 23×1012 अश्व शक्ति के बराबर हो जाती है। सूर्य से प्राप्त इस न्यून ऊर्जा के कारण ही भूतल पर सभी प्रकार के जीवों का अस्तित्व सम्भव हो सका है। इसी कारण धरातल पर पवन संचार, सागरीय धाराओं का प्रवाह तथा मौसम एवं जलवायु का आविर्भाव होता है।

         प्रत्येक वस्तु, जिसमें ऊष्मा होती है, विकिरण करती है। नियमानुसार जो वस्तु जितनी अधिक गर्म होती है, उसकी तरंगें उतनी ही छोटी होती हैं। इसी कारण से सूर्य विकिरण द्वारा निकली ऊष्मा लघु तरंगों के रूप में होती है तथा प्रति सेकेण्ड 300000 किमी० की गति से भ्रमण करती है। इसके विपरीत अपेक्षाकृत कम तापक्रम वाली वस्तु से विकिरण तो कम होता है, परन्तु दीर्घ तरंग के रूप में होता है। उदाहरण के लिए पृथ्वी से विकीर्ण ऊर्जा दीर्घ तरंगों के रूप में होती है।

धरातल पर सूर्यातप का वितरण

         सूर्यातप की सर्वाधिक मात्रा विषुवत रेखा के पास होती है क्योंकि यहाँ पर दिन-रात की लम्बाई बराबर होती है तथा सूर्य की किरणें लगभग लम्बवत् होती हैं। परन्तु सूर्य के दक्षिणायन तथा उत्तरायण की स्थितियों के कारण अत्यधिक सूर्यताप मण्डल विषुवत रेखा के दोनों ओर सरकता रहता है। विषुवत रेखा से सूर्यातप ध्रुवों की ओर कम होता जाता है। ध्रुवों पर यह ताप इतना कम हो जाता है कि विषुवत रेखा का केवल 40 प्रतिशत ही प्राप्त हो पाता है।

        इस तरह ध्रुवीय क्षेत्र न्यूनतम सूर्यातप प्राप्त करते हैं। ‘इक्वीनाक्स (Equinox-विषुव) के समय दोनों गोलाद्धों में सूर्यातप का वितरण प्राय: समान रहता है। इसके विपरीत कर्क तथा मकर संक्रांति (Solstices) के समय दोनों गोलार्द्ध में ध्रुवों के बीच सूर्यातप के वितरण में पर्याप्त असमानता होती है।

         यहाँ पर यह भी ध्यान देना आवश्यक है कि सूर्यातप के वितरण पर वायुमण्डल के परावर्तन, शोषण तथा प्रकीर्णन आदि प्रभावों का पर्याप्त असर होता है। इसी कारण से कर्क संक्रान्ति के समय सूर्य उत्तरी गोलार्द्ध में कर्क रेखा पर लम्बवत् होता है, ध्रुवों पर दिन की अवधि सर्वाधिक लम्बी होने पर भी सूर्यातप सर्वाधिक नहीं हो पाता है, अपितु अधिकतम सूर्यातप 40° अक्षांश के आस-पास ही प्राप्त होता है। धरातलीय तापक्रम निम्न मध्य अक्षांश वाले भागों में सर्वाधिक होता है, न कि भूमध्य रेखा के पास।

सूर्यातप के वितरण को प्रभावित करने वाले कारक

         सूर्यातप के उपर्युक्त वितरण से स्पष्ट हो गया है कि भूतल के विभिन्न भागों पर सूर्यातप की मात्रा समान नहीं हुआ करती है, सूर्य की किरणों को वायुमण्डल की एक मोटी परत से होकर गुजरना पड़ता है, अत: वायुमण्डल का प्रभाव सूर्यातप की मात्रा पर पड़ना स्वाभाविक ही है। इसके अलावा सूर्य की किरणों का सापेक्ष्य तिरछापन, दिन की अवधि, पृथ्वी से सूर्य की दूरी, सौर कलंक इत्यादि कारक किसी भी स्थान पर (वायुमण्डल की अनुपस्थिति में) सूर्यातप की मात्रा को प्रभावित करते हैं।

(i) सूर्य की किरणों का सापेक्ष्य तिरछापन:-

           पृथ्वी के गोलाकार रूप के कारण सूर्य की किरणें सर्वत्र समान कोण पर नहीं पड़ती हैं। भूमध्य रेखा पर सूर्य की किरणें लम्बवत् होती हैं क्योंकि सूर्य सर्वाधिक ऊँचाई पर होता है, परन्तु ध्रुवों की ओर किरणों का कोण कम होता जाता है अर्थात् वे तिरछी होती जाती हैं। यद्यपि किरणों के सापेक्ष्य तिरछापन में कुछ परिवर्तन होता रहता है, उदाहरण के लिए 21 जून को सूर्य कर्क रेखा पर तथा 22 दिसम्बर को मकर रेखा पर लम्बवत् चमकता है, जिस कारण पहली स्थिति में दक्षिणी गोलार्द्ध में किरणें अधिक तिरछी होती हैं, तथापि साधारण रूप में भूमध्य रेखा से ध्रुवों की ओर किरणों का तिरछापन बढ़ता जाता है।

(ii) दिन की अवधि

          यदि अन्य दशाएं समान हों तो दिन की अवधि जितनी अधिक होगी, सूर्यातप की मात्रा उतनी ही अधिक होगी। पृथ्वी अपनी कक्षा पर 66.5° का कोण बनाती हुई लगभग 24 घण्टे में अपनी धुरी पर एक परिक्रमा पूरा करती है तथा साथ ही सूर्य के चारों तरफ भी वर्ष में एक बार चक्कर लगाती है।

        यदि पृथ्वी भी अपनी जगह पर स्थिर होती तो वर्तमान स्थिति के विपरीत दशा होती, परन्तु पृथ्वी की दैनिक तथा वार्षिक गति के कारण भूमध्य रेखा को छोड़कर शेष भागों पर दिन की अवधि में अन्तर आता रहता है। भूमध्य रेखा पर दिन सदैव 12 घण्टे का इसलिए होता है कि प्रकाश वृत्त भूमध्य रेखा को दो बराबर भागों में काटता है।

        सूर्य की उत्तरायण स्थिति के समय (जब सूर्य कर्क रेखा पर होता है) भूमध्य-रेखा से उत्तर की ओर दिन की अवधि बढ़ती जाती है तथा उत्तरी ध्रुव पर 6 मास का दिन होता है। इसके विपरीत भूमध्य रेखा से दक्षिण जाने पर दिन की अवधि कम हो जाती है, जबकि द० ध्रुव पर केवल रात (6 मास) ही होती है।

        सूर्य की दक्षिणायन स्थिति में (जबकि सूर्य मकर रेखा पर होता है) भूमध्य रेखा से दक्षिण की ओर दिन की अवधि बढ़ती जाती है और उत्तर की ओर घटती जाती है। केवल 21 मार्च तथा 23 सितम्बर को, जबकि सूर्य की स्थिति भूमध्य रेखा पर होती है, सर्वत्र दिन-रात बराबर होते हैं। स्मरणीय है कि किरणों के तिरछेपन तथा दिन की अवधि के प्रभाव सापेक्ष्य हुआ करते हैं। उच्च अक्षांशों में (21 जून, उत्तरी गोलार्द्ध) दिन की अवधि 6 मास होने पर भी सूर्यातप न्यूनतम इसलिए होता है कि सूर्य की किरणें सर्वाधिक तिछी होती हैं। जहाँ पर दिन की अवधि अधिक होती है तथा साथ ही साथ किरणें सीधी पड़ती हैं वहाँ पर निश्चित रूप से ताप अधिक प्राप्त होता है। 

(iii) पृथ्वी से सूर्य की दूरी

     पृथ्वी अण्डाकार कक्ष के सहारे सूर्य की परिक्रमा करती है, जिस कारण उसकी सूर्य से दूरी में परिवर्तन होता रहता है। औसत रूप में पृथ्वी सूर्य से लगभग 15 करोड़ किमी० दूर है, परन्तु निकटतम दूरी 14.70 करोड़ किमी० है। इस स्थिति को उपसौर (Perihelion) कहते हैं। यह स्थिति 3 जनवरी को होती है। इसके विपरीत 4 जुलाई को अपसौर (Aphelion) की स्थिति होती है, जबकि पृथ्वी सूर्य से 15.20 करोड़ किमी० दूर होती है। साधारण नियम के अनुसार जब पृथ्वी सूर्य से निकटतम दूरी पर होती है, उस समय अधिकतम ताप तथा अधिकतम दूरी पर होने पर न्यूनतम ताप मिलना चाहिए। परन्तु वास्तविकता ठीक उसके विपरीत होती है।

       जनवरी के महीने में जबकि पृथ्वी सूर्य से निकटतम दूरी पर होती है, उत्तरी गोलार्द्ध में ग्रीष्म काल होने के बजाय शीत काल होता है। इसी तरह 4 जुलाई के समय शीत काल के बजाय ग्रीष्मकाल होता है। वास्तव में दिन की अवधि तथा सूर्य की किरणों के तिरछेपन के प्रभाव के आगे यह कारक नगण्य हो जाता है। हाँ, इतना अवश्य होता है कि जनवरी में उ० गोलार्द्ध में जितनी सर्दी होनी चाहिए, उसकी अपेक्षा 7 प्रतिशत कम होती है तथा दक्षिणी गोलार्द्ध में गर्मियां 7 प्रतिशत अधिक तीव्र होती हैं। अपसौर की स्थिति में उत्तरी गोलार्द्ध में (4 जुलाई) गर्मियां 7 प्रतिशत कम तीव्र तथा दक्षिणी गोलार्द्ध में शीतकाल 7 प्रतिशत अधिक तीव्र हो जाता है।  

सूर्यातप

 

(iv) सौर कलंक

       चन्द्रमा के समान सूर्य-तल पर कलंक या धब्बे मिलते हैं। इनका कोई स्थायी रूप नहीं होता है, वरन् ये बनते-बिगड़ते रहते हैं तथा इनकी संख्या घटती-बढ़ती रहती है। यह अन्तर चक्रीय रूप में सम्पन्न होता है। औसत रूप में एक चक्र ग्यारह वर्ष में पूरा होता है।

        जब सौर कलंकों की संख्या अधिक हो जाती है तो सूर्यातप की मात्रा भी अधिक हो जाती है, परन्तु इनकी मात्रा में कमी हो जाने के कारण प्राप्त होने वाला सूर्यातप कम हो जाता है। इस कारण की सत्यता अभी तक संदिग्ध है। सौर कलंकों के कारण सूर्य विकिरण में अन्तर आता रहता है। विश्व स्तर पर मौसम तथा जलवायु में कभी-कभी विश्वव्यापी अनियमितता होती हती है। सौर कलंकों के कारण होने वाला अनियमित सूर्यातप इस विश्वव्यापी मौसम सम्बन्धी अनियमितता का कारण हो सकता है, परन्तु इसे निश्चितता के साथ स्वीकार नहीं किया जा सका है।

(v) वायुमण्डल का प्रभाव

         सूर्यातप वितरण को प्रभावित करने वाले उपर्युक्त कारकों की विवेचना के समय वायुमण्डल के प्रभाव को ध्यान में नहीं रखा गया था, वास्तव में (सूर्य की) प्रकाश किरणों को वायुमण्डल की पारदर्शक मोटी परत से होकर गुजरना पड़ता है, जिस कारण उसका प्रकीर्णन (Scattering), परावर्तन (Reflection) तथा अवशोषण (Absorption) होता रहता है। प्रकीर्णन के अन्तर्गत सौर्यिक शक्ति का कुछ भाग पारदर्शक वायुमण्डल में स्थित अदृश्य कणों तथा अणुओं के कारण बिखर कर फैल जाता है।

       प्रकीर्णन मुख्य रूप से वरणात्मक (Selective) होता है, अर्थात् यह उस समय होता है जबकि अदृश्य कणों (धूलकण आदि) की व्यास विकिरण तरंग से छोटी होती है। इस तरह लघु तरंगों का प्रकीर्णन सर्वाधिक होता है, जिस कारण विभिन्न प्रकार के रंगों का आविर्भाव होता है। उदाहरण के लिए आकाश का नीला रंग, सूर्योदय तथा सूर्यास्त के समय सूर्य की लालिमा आदि प्रकीर्णन के कारण ही सम्भव हो पाती है।

      जब वायुमण्डल में अदृश्य कणों की व्यास विकिरण तरंग से बड़ी होती है तो विसरित परावर्तन (diffuse reflection) की क्रिया होती है। इस क्रिया के कारण सौर्यिक शक्ति का कुछ भाग परावर्तित होकर वापस लौट जाता है, जबकि कुछ भाग वायुमण्डल में चारों तरफ छिटक जाता है। पृथ्वी की सतह से भी कुछ ताप शक्ति का परावर्तन आकाश में हो जाता है। पृथ्वी के इस परावर्तन के कारण ही चन्द्रमा का अंधेरा भाग भी आसानी से दृष्टिगत हो जाता है।

           प्रकीर्णन तथा परावर्तन के कारण वायुमण्डल से कुछ सौर्यिक ऊर्जा पृथ्वी की सतह पर पहुँच जाती है। इसे आकाश का विसरित नीला प्रकाश (diffuse blue light of sky) कहते हैं अथवा विसरित दिवा प्रकाश (diffuse day light) की संज्ञा प्रदान की जाती है। इसी प्रकाश के कारण पूर्ण बदली के दिन अथवा किसी भी स्थान के वे भाग जहाँ पर सूर्य की किरणें नहीं पहुँच पाती हैं, आसानी से देखें जा सकते हैं।

         अवशोषण की क्रिया मुख्य रूप में जलवाष्प तथा गौण रूप में आक्सीजन एवं ओजोन गैसों द्वारा सम्पादित होती है। अवशोषण भी वरणात्मक होता है अर्थात् सभी विकिरण तरंगों का अवशोषण न होकर केवल दीर्घ तरंगों का ही हो पाता है। प्रकीर्णन, परावर्तन तथा अवशोषण द्वारा सूर्यातप की नष्ट होने वाली मात्रा मुख्य मुख्य रूप से सूर्य की किरणों के कोण तथा वायुमण्डल के पारदर्शक तत्व पर आधारित होती है।

         सूर्य से विकीर्ण समस्त सूर्यातप का लगभग 35 प्रतिशत भाग परावर्तन तथा प्रकीर्णन द्वारा आकाश में वापस लौट जाता है तथा इसका उपयोग न ही वायुमण्डल को गर्म करने में हो पाता है और न ही पृथ्वी को सूर्यातप के 14 प्रतिशत भाग का वायुमण्डल द्वारा अवशोषण हो जाता है।

       इस तरह सूर्यातप का केवल 51 प्रतिशत भाग पृथ्वी को प्राप्त हो पाता है, जिससे वायुमण्डल का निचला भाग गर्म होता है। किसी भी सतह से विकिरण ऊर्जा के परावर्तित भाग को अलबिडो (Albedo) कहा जाता है। पृथ्वी की सतह का औसत अलबिडो 24 से 34 प्रतिशत के बीच बताया जाता है।


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7. बिग बैंग तथा स्फीति सिद्धान्त/ महाविस्फोट सिद्धांत-जॉर्ज लैमेण्टर

7. बिग बैंग तथा स्फीति सिद्धान्त/ महाविस्फोट सिद्धांत-जॉर्ज लैमेण्टर


बिग बैंग तथा स्फीति सिद्धान्त

बिग बैंग

              ब्रह्माण्ड तथा आकाशगंगा तथा उनके सदस्य तारों तथा ग्रहों की उत्पत्ति की समस्या के समाधान के लिए ब्रह्माण्ड के अदृश्य घटकों अर्थात् काले पदार्थों के अस्तित्व के आधार पर प्रयास किये गये हैं। आकाश गंगा के निर्माण के विषय में वैज्ञानिकों के दो वैकल्पिक विचार हैं- काले पदार्थों का अस्तित्व ‘गर्म’ या ‘ठंडे’ (Hot or cold forms) रूप में रहा होगा।

         गर्म काले पदार्थों (Hot dark matter) की स्थिति में आकाशगंगायें (Galaxies) दूर-दूर होंगी जबकि ठंडे पदार्थों की स्थिति में वे झुण्ड में होंगी (वर्तमान समय में विभिन्न आकाशगंगायें पास-पास समूह में स्थित हैं)।

         बिग बैंग सिद्धान्त के अनुसार ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति आज से लगभग 15 बिलियन वर्ष (15 अरब वर्ष) पहले घने पदार्थों वाले विशाल अग्निपिण्ड (fireball) के आकस्मिक जोरदार विस्फोट तथा उससे जनित विकिरण के कारण हुई।

           इस सिद्धान्त का प्रतिपादन मुख्यतः जॉर्ज लैमेण्टर द्वारा 1950-60 तथा 1960-70 दशक में किया गया (इस सिद्धान्त के अनुसार आज से 15 अरब वर्ष पहले एक विशाल अग्निपिण्ड था जिसकी रचना भारी पदार्थों से हुई थी। इस विशालकाय अग्निपिण्ड का अचानक विस्फोट हुआ जिस कारण पदार्थों का बिखराव हो गया। इन पदार्थों को प्रारम्भिक सामान्य पदार्थ (Normal matter) कहा गया। शीघ्र ही सामान्य पदार्थों के अलगाव के कारण (काले पदार्थों का सृजन हुआ। इन काले पदार्थों का आपस में समेकन होने से (अनेकों पिण्डों का निर्माण हुआ। इन पिण्डों के चारों ओर सामान्य पदार्थों का जमाव होने लगा। जिस कारण इनका आकार बढ़ता गया। इन पिण्डों के आकार में वृद्धि होने से आकाशगंगाओं का निर्माण हुआ।

 

            ज्ञातव्य है कि प्रारम्भ में ब्रह्माण्ड अत्यधिक छोटा था परन्तु इसमें त्वरित गति से फैलाव होने लगा। परिणामस्वरूप आकाशगंगायें, जो प्रारम्भ में पास-पास थीं वे निरन्तर दूर होती गयीं। आज से लगभग 15 अरब वर्ष पहले अपने निर्माण-काल से आज तक ब्रह्माण्ड आकार में लगातार फैलता रहा है तथा उसके पदार्थ शीतल होते रहे हैं। आकाशगंगाओं का भी भयंकर विस्फोट हुआ तथा विस्फोट से निकले पदार्थों के समेकन से बने असंख्य पिण्डों द्वारा प्रत्येक आकाशगंगा के तारों (stars) का निर्माण हुआ। इसी तरह प्रत्येक तारे, के विस्फोट के कारण जनित पदार्थों के समूहन द्वारा ग्रहों (Planets) का निर्माण हुआ।

          अमेरिकन वैज्ञानिक अलन गुथ (Alan Guth) ने 1980 में बिग बैंग सिद्धान्त को ब्रह्माण्ड (आकाशगंगा, तारों तथा ग्रहों) की उत्पत्ति की समस्या को सुलझाने में असमर्थ पाया। अत: इन्होंने स्फीति सिद्धान्त (inflationary theory) का प्रतिपादन किया। अलन गुथ की अवधारणा है कि ब्रह्माण्ड के दृश्य द्रव्यमान (visible mass) के घनत्व की तुलना में उसका वास्तविक घनत्व बहुत अधिक है। इससे निष्कर्ष निकलता है कि ब्रह्माण्ड में अदृश्य काले पदार्थों का अस्तित्व है। यद्यपि बिग बैंग तथा स्फीति सिद्धान्त लगभग एक जैसे हैं क्योंकि उनकी कई मान्यतायें उभयनिष्ठ हैं। उनमें अन्तर मात्र इस बात से सम्बन्धित है कि विशालकाय अग्निपिण्ड के विस्फोट के एक सेकेण्ड के अन्दर किस प्रकार की घटनायें घटीं।

          स्फीति सिद्धान्त के अनुसार विशालकाय अग्निपिण्ड के जोरदार विस्फोट के बाद अति अल्प काल में ब्रह्माण्ड का असाधारण त्वरित गति से फैलाव (स्फीति, rapaid, expansion or inflation) हुआ। इस प्रक्रिया के दौरान एक सेकेण्ड के अल्पांश के अन्तर्गत ही ब्रह्माण्ड के आकार में कई गुना वृद्धि हो गयी। काले पदार्थों के समूहन से आकाशगंगाओं का निर्माण हुआ। इनके विस्फोट से जनित पदार्थों के समूह से निर्मित पिण्डों द्वारा तारों का निर्माण हुआ तथा तारों के विस्फोट से उत्पन्न पदार्थों के एकत्रित एवं संगठित होने से निर्मित पिण्डों से ग्रहों (पृथ्वी इत्यादि) का निर्माण हुआ।

6. रसेल की द्वैतारक परिकल्पना (Binary Star Hypothesis of Russell)

6. रसेल की द्वैतारक परिकल्पना

(Binary Star Hypothesis of Russell)


रसेल की द्वैतारक परिकल्पना

रसेल की द्वैतारक

              जीन्स की ज्वारीय परिकल्पना से निम्नलिखित दो बातें प्रमाणित नहीं हो पा रहीं थीं-

(i) सूर्य तथा ग्रहों के बीच की वर्तमान दूरी और

(ii) ग्रहों के वर्तमान कोणीय आवेग (Angular momentum) की अधिकता।

       इन दो समस्याओं के समाधान हेतु रसेल ने द्वैतारक परिकल्पना का प्रतिपादन किया।

           आदिकाल में सूर्य के पास ही दो तारे थे। सर्वप्रथम सूर्य का एक साथी तारा था जो सूर्य के चारों ओर परिक्रमा कर रहा था। आगे चलकर एक विशालकाय तारा साथी तारे के समीप आया, किन्तु इसकी परिक्रमा की दिशा साथी तारे के विपरीत थी।

       इन दो तारों के बीच की दूरी सम्भवतः 48 से 64 लाख किमी० के बीच रही होगी। इस तरह विशालकाय तारा सूर्य से और अधिक दूर (साथी तारा तथा विशालकाय तारा के बीच की दूरी का कई गुना) रहा होगा जिस कारण विशालकाय तारे के ज्वारीय बल का प्रभाव सूर्य पर नहीं पड़ा, परन्तु साथी तारे पर ज्वारीय बल के कारण पदार्थ विशालकाय तारे की ओर आकर्षित होने (उभार) लगा। जैसे-जैसे विशालकाय तारा साथी तारे के करीब आता गया, आकर्षण बल बढ़ता गया और उभार अधिक होने लगा।

        जब विशालकाय तारा साथी तारे की निकटतम दूरी पर आ गया तो अधिकतम आकर्षण के कारण कुछ पदार्थ साथी तारे से अलग होकर विशालकाय तारे की दिशा में घूमने (साथी तारे की विपरीत दिशा) लगे। आगे चलकर इन पदार्थों से ग्रहों का निर्माण हुआ। प्रारम्भ में ग्रह करीब रहे होंगे तथा आपसी आकर्षण के कारण ग्रहों से पदार्थ निकलकर उनके उपग्रह बन गये होंगे जिसे निम्नांकित चित्रों में देखा जा सकता है-

रसेल की द्वैतारक

रसेल की द्वैतारक परिकल्पना

         इस तरह युग्म तारे की कल्पना करके तथा सूर्य के स्थान पर साथी तारे से पदार्थ निस्सृत कराके ग्रहों तथा पृथ्वी की उत्पत्ति मानकर रसेल ने सूर्य तथा ग्रहों के बीच की वर्तमान दूरी तथा उनके कोणीय आवेग की समस्या का वैज्ञानिक स्तर पर समाधान कर दिखाया है।

आलोचना

(i) रसेल ने साथी तारे से निकले पदार्थ से ग्रहों की उत्पत्ति को समझाया है, परन्तु साथी तारे के अवशिष्ट भाग पर प्रकाश नहीं डाला है। अवशिष्ट भाग का क्या हुआ? कोई संतोषजनक हल नहीं दिया गया है।

(ii) निर्माण के समय ग्रह सूर्य से दू थे तथा एक-दूसरे दूर फैले थे, परन्तु विशालकाय तारे के भ्रमण पथ पर से आगे निकल जाने पर सभी ग्रह सूर्य की आकर्षण परिधि में आ गये, जबकि उसके सबसे करीब साथी तारे का अवशिष्ट भाग सूर्य के आकर्षण में नहीं आ सका। इस तरह विरोधाभास की स्थिति उत्पन्न हो जाती है। रसेल ने इस समस्या का समाधान नहीं किया है।

(iii) यदि यह मान भी लिया जाय कि सभी ग्रह सूर्य की आकर्षण परिधि में आ गये, तो भी सेल विशद रूप में यह नहीं समझा पाते हैं कि किस प्रक्रिया द्वारा यह सम्भव हुआ।

5. जेम्स जीन्स की ज्वारीय परिकल्पना (Tidal Hypothesis of James Jeans)

5. जेम्स जीन्स की ज्वारीय परिकल्पना

(Tidal Hypothesis of James Jeans)


जेम्स जीन्स की ज्वारीय परिकल्पनाजेम्स जीन्स की ज्वारीय

            सौर्य-मण्डल की उत्पत्ति से सम्बन्धित ”ज्वारीय परिकल्पना” का प्रतिपादन अंग्रेज विद्वान सर जेम्स जीन्स (Sir James Jeans) ने सन् 1919 में किया तथा जेफरीज (Jeffreys) नामक विद्वान ने उक्त परिकल्पना में सन् 1929 में कुछ संशोधन प्रस्तुत किया जिससे इस परिकल्पना का महत्व और अधिक बढ़ गया।

             यह ज्वारीय परिकल्पना आधुनिक परिक्लपनाओं तथा सिद्धान्तों में से एक है, जिसे अन्य की अपेक्षा अधिक समर्थन प्राप्त है। अपनी संकल्पना की पुष्टि के लिए जीन्स कुछ तथ्यों को स्वयं मानकर चले हैं।

        इस प्रकार ‘ज्वारीय परिकल्पना’ प्रतिपादक द्वारा कुछ निम्नलिखित कल्पित तथ्यों पर आधारित है।

1. सौर्य-मण्डल का निर्माण सूर्य तथा एक अन्य तारे के संयोग से हुआ।

2. प्रारम्भ में सूर्य गैस का एक बहुत बड़ा गोला था।

3. सूर्य के साथ ही साथ ब्रह्माण्ड में एक दूसरा विशालकाय तारा था।

4. सूर्य अपनी जगह पर स्थिर था तथा अपनी जगह पर ही घूम रहा था।

5. साथी तारा एक पथ के सहारे इस तरह घूम रहा था कि वह सूर्य के निकट आ रहा था।

6. साथी तारा आकार तथा आयतन में सूर्य से बहुत अधिक विशाल था।

7. पास आते हुए तारे द्वारा ज्वारीय शक्ति का प्रभाव सूर्य के वाह्य भाग पर पड़ा था।

ज्वारीय परिकल्पना के अनुसार ग्रहों का निर्माण 

          इस प्रकार उपर्युक्त स्वयं-कल्पित तथ्यों के आधार पर जीन्स ने बताया है कि साथी तारा निरन्तर एक पथ के सहारे सूर्य की ओर अग्रसर हो रहा था, जिस कारण साथी तारे की आकर्षण शक्ति द्वारा वायव्य ज्वार का प्रभाव सूर्य के वाह्य भाग पर पड़ने लगा। फलस्वरूप सूर्य में ज्वार उत्पन्न होने लगा। यह ज्वारीय क्रिया सूर्य में उसी प्रकार सम्भव हो सकी, जिस प्रकार वर्तमान समय में पृथ्वी के निकट चन्द्रमा के आ जाने से पृथ्वी के महासागरों में ज्वार उत्पन्न हो जाता है। ज्यों-ज्यों विशालकाय तारा सूर्य के पास आता गया, त्यों-त्यों उसकी आकर्षण शक्ति बढ़ती गयी तथा ज्वार की तीव्रता बढ़ती गयी।

          जब तारा सूर्य से निकटतम दूरी पर आया तो उसकी आकर्षण शक्ति सूर्य से अधिक हो गयी, जिस कारण हजारों किलोमीटर लम्बा सिगार के आकार का ज्वार सूर्य के वाह्य भाग में उठा। सिगार के आकार वाले इस भाग को फिलामेन्ट (Filament) कहा गया है। सूर्य के निकटतम दूरी पर पहुँचने के कारण तारे की अधिकतम आकर्षण शक्ति के प्रभाव से एक विशाल फिलामेन्ट सूर्य से हटकर तारे की तरफ अग्रसर हुआ। जीन्स के अनुसार पास आने वाला तारा सूर्य के मार्ग पर नहीं था, अत: यह सूर्य से आगे बढ़ने लगा।

           इस प्रकार तारे के दूर निकल जाने के कारण फिलामेन्ट तारे के साथ न जा सका, वरन् वह सूर्य के चारों ओर परिभ्रमण करने लगा। यह प्रश्न उठाया जा सकता है कि इस स्थिति में जब कि तारा अधिक दूर चला गया तो फिलामेन्ट सूर्य के पास पुन: वापस क्यों नहीं आ गया?

     व्याख्या सरल है। जब फिलामेन्ट टूटकर तारे की तरफ अग्रसर हुआ, उस परिस्थिति में यह सूर्य की आकर्षण शक्ति के क्षेत्र से बाहर (Neutral point) हो गया था, अत: वह सूर्य का ही चक्कर लगाने लगा, वापस नहीं आ सका।

     कुछ समय पश्चात् तारा सूर्य से इतना दूर चला गया कि पुन: कोई वायव्य भाग (फिलामेण्ट) सूर्य से अलग नहीं हो सका। आगे चलकर सूर्य से निकला हुआ ज्वारीय पदार्थ सिगार के आकार में अधिक लम्बा हो गया, जिसका मध्य भाग अधिक मोटा या चौड़ा तथा दोनों किनारे वाले भाग अत्यधिक पतले थे। किनारों के पतला होने का मुख्य कारण तारे तथा सूर्य की आकर्षण शक्ति का प्रभाव ही बताया जाता है। फिलामेंट में गति या परिभ्रमण का आविर्भाव दूर होते हुये (Receding) तारे की गुरुत्वाकर्षण शक्ति के खिंचाव (Gravitational pull) के कारण हुआ था।

फिलामेन्ट से ग्रहों की उत्पत्ति:-

          सूर्य से अलगाव के बाद फिलामेन्ट शीतल होने लगा, जिस कारण उसके आकार में संकुचन प्रारम्भ हो गया। इस संकुचन के कारण फिलामेन्ट कई टुकड़ों में टूट गया तथा प्रत्येक भाग घनीभूत होकर ग्रह (Planet) के रूप में बदल गया। इसी क्रिया से फिलामेन्ट से नौ ग्रहों की रचना सम्भव हुई। इसी प्रक्रिया के अनुसार सूर्य की आकर्षण शक्ति के प्रभाव से ग्रहों पर ज्वार उत्पन्न होने से उनके कुछ पदार्थ अलग हो गये, जो घनीभूत होकर उपग्रह बने।

          अब यह प्रश्न उठता है कि ग्रह से उपग्रह बनने का क्रम कब तक चलता रहा? जब तक ग्रहों से निकले हुये ज्वारीय पदार्थ बड़े आकार वाले थे तथा उनकी केन्द्रीय आकर्षण शक्ति अधिक थी, तब तक उपग्रह बनते रहे। परन्तु जब उनका आकार इतना छोटा होने लगा कि उनकी केन्द्रीय आकर्षण-शक्ति उन्हें संगठित रखने में असमर्थ हो गयी, उपग्रहों की रचना समाप्त हो गयी। इस प्रकार ग्रहों के उपग्रहों की संख्या ग्रहों के आकार के अनुसार निश्चित हुई।

          इस परिकल्पना द्वारा पृथ्वी की उत्पत्ति के साथ ही साथ सौर्य-मंडल की अनेक समस्याएँ भी सुलझी-सी प्रतीत होती हैं-

(1) ग्रहों का क्रम तथा आकार-

        सूर्य से निस्सृत ज्वारीय फिलामेन्ट बीच में चौड़ा तथा किनारों की तरफ पतला था। इस प्रकार जब फिलामेन्ट के टूटने से ग्रहों का निर्माण हुआ तो बड़े ग्रह बीच में तथा छोटे ग्रह किनारे की ओर बने। ग्रहों का यह क्रम वर्तमान सौर्य मंडल के ग्रहों से पूर्णतया सामंजस्य रखता है।

            सूर्य की ओर से प्रारम्भ करने पर बुध ग्रह सबसे पहले है। यह अधिक छोटा है। इसके बाद शुक्र, पृथ्वी, मंगल (यह पृथ्वी से छोटा है) आदि एक-दूसरे से बड़े होते जाते हैं तथा बीच में बृहस्पति सबसे बड़ा ग्रह है । इसके बाद पुनः ग्रहों का आकार घटता जाता है तथा अन्त में कुबेर अत्यन्त छोटा ग्रह है। यह तथ्य निम्न तालिका से पूरी तरह प्रमाणित हो जाता है।

         जीन्स ने अपने सिद्धान्त का प्रतिपादन कुबेर ग्रह( Pluto) की खोज के पहले किया था। बाद में अत्यन्त लघु ग्रह कुबेर की खोज ने इस परिकल्पना का महत्व और अधिक बढ़ा दिया क्योंकि यह परिकल्पना सौर्य-मंडल के सदस्यों के क्रम को पूर्णतया सिद्ध करती है। केवल मंगल की स्थिति इसके अनुसार ठीक नहीं बैठती है।

(2) उपग्रहों का क्रम-

        इस परिकल्पना के अनुसार ग्रहों के उपग्रहों का निर्माण ग्रहों से निकले हुए ज्वारीय पदार्थ से उसी प्रकार हुआ, जिस प्रकार सूर्य से निकले ज्वारीय पदार्थ से ग्रहों की रचना हुई। इस प्रकार ग्रहों के उपग्रहों का भी वही क्रम है जो कि ग्रहों का। अर्थात् एक ग्रह के यदि कई उपग्रह हैं तो सबसे बड़ा उपग्रह बीच में तथा छोटा उपग्रह किनारे की ओर पाया जाता है। यह तथ्य भी वर्तमान उपग्रहों की स्थिति तथा क्रम से पूर्णतया मेल खाता है। इस प्रकार यह सिद्ध हो जाता है कि ग्रहों तथा उपग्रहों की रचना एक ही प्रणाली द्वारा हुई होगी।

(3) उपग्रहों की संरचना तथा आकार-

         इस ‘ज्वारीय परिकल्पना’ के अनुसार बड़े ग्रह ब्रह्माण्ड में अधिक समय तक गैस के रूप में रहे, क्योंकि आकार की विशालता के कारण उसके शीतल होने में अधिक समय लगा होगा। इस कारण बड़े ग्रहों के उपग्रह अधिक संख्या में बने, परन्तु अपेक्षाकृत ये छोटे आकार वाले थे। मध्यम आकार वाले (बड़े ग्रहों के समीपवर्ती ग्रह) ग्रहों से कम संख्या में उपग्रह (Satellites) बने, परन्तु इनका आकार बड़ा रहा। किनारे वाले ग्रह आकार में छोटे होने के कारण शीघ्र शीतल हो गये होंगे। परिणामस्वरूप उनसे उपग्रहों की रचना नहीं हो पायी होगी।

            यह तथ्य वर्तमान सौर्य-मंडल के उपग्रहों के क्रम से पूर्णतया मेल खाता है। शनि तथा बृहस्पति जैसे सबसे बड़े ग्रहों के छोटे आकार वाले अनेक उपग्रह हैं, जबकि बुध तथा शुक्र के पास एक भी उपग्रह नहीं है।

(4) ग्रहों का परिभ्रमण कक्ष-

        इस परिकल्पना के अनुसार ग्रहों के परिभ्रमण कक्ष (Orbit) अथवा ग्रह पथ को सूर्य के कक्ष (orbit) से मेल नहीं खाना चाहिये, बल्कि ग्रह-कक्ष को सूर्य कक्ष से एक निश्चित कोण पर झुका होना चाहिये, क्योंकि सूर्य की आकर्षण शक्ति से ग्रह झुक जाता है। यह तथ्य भी वर्तमान ग्रहों के कक्ष से पूर्णतया मेल खाता है, क्योंकि प्रत्येक ग्रह-कक्ष झुका हुआ है। 

प्रत्येक ग्रह का कोणीय झुकाव

ग्रह झुकाव
बुध
शुक्र 3.5°
पृथ्वी 23.5°
मंगल 2° 
बृहस्पति 1° 
शनि 2.5° 
अरुण 0° 
वरुण
कुबेर 17°

(5) निस्सृत वायव्य पदार्थ का आकार-

        पास आते हुये तारे की ज्वारीय शक्ति से सूर्य से जो फिलामेन्ट निकला वह सिगार के आकार का क्यों हो गया? इसका मुख्य कारण पास आते हुये तारे की आकर्षण शक्ति में विभिन्नता का होना ही बताया जाता है। अर्थात् तारा दूर था तो कम आकर्षण के कारण कम पदार्थ बाहर निकला तथा तारा ज्यों-ज्यों पास आता गया, बढ़ती आकर्षण शक्ति से पदार्थ की मात्रा बढ़ती गयी तथा तारे के सूर्य से निकटतम दूरी पर आने पर निस्सृत पदार्थ सबसे अधिक था।

           पुन: तारे के दूर जाने से आकर्षण शक्ति में कमी के कारण निस्सृत पदार्थ की मात्रा घटती गयी। इस प्रकार कहा जा सकता है कि निस्सृत पदार्थ (Ejected matter) तारे की आकर्षण शक्ति के अनुपात में थे।

परिकल्पना में संशोधन

       सन् 1929 ई. में हेरोल्ड जेफरीज महोदय ने इस परिकल्पना को संशोधित करते हुए बताया कि ग्रहों की उत्पत्ति फिलामेंट बनने से नहीं हुई है, वरन् साथी तारा और सूर्य के आपस में टकराने से हुई है। साथी तारा और सूर्य के बीच जब टक्कर होती है तो कुछ पदार्थ सूर्य से बाहर निकल आते हैं और बाद में संगठित एवं शीतल होकर 9 ग्रहों का निर्माण करते हैं।      

     जेफरीज के इस संशोधन के मानने पर ग्रहों के परिभ्रमण (Rotation) सम्बन्धी अनेक कठिनाईयां सुलझ जाती हैं।

मूल्यांकन

         जीन्स द्वारा प्रतिपादित तथा जेफरीज द्वारा संशोधित एवं परिवर्द्धित ‘ज्वारीय परिकल्पना’ को बहुत समय तक समर्थन प्राप्त होता रहा तथा लोगों में इसके प्रति अधिक विश्वास हो गया था क्योंकि जीन्स को यह विश्वास था कि ब्रह्माण्ड की ग्रह-प्रणाली का निर्माण एक अनुपम विधान है।

         परन्तु पिछले कुछ वर्षों में इस विचारधारा की कटु आलोचनाएँ की गयी हैं तथा वर्तमान वैज्ञानिकों को जीन्स की यह परिकल्पना मान्य नहीं है। यदि कुछ आधुनिक वैज्ञानिकों के इस परिकल्पना में संशोधन मान लिये जाय तो सचमुच यह परिकल्पना बड़ी हद तक पृथ्वी की उत्पत्ति के विषय में सही ज्ञान दे सकती है।

आलोचनाएँ

      इस परिकल्पना के निम्नलिखित आलोचनाएँ बतायी जा सकती हैं:-

⇒ एक तारे से दूसरे तारे इतना दू है कि वो एक-दूसरे के समीप आ ही नहीं सकता।

⇒  रसेल का कहना है कि इस सिद्धांत के आधार पर इतना विशालकाय सौरमण्डल का निर्माण नहीं हो सकता।

⇒ सूर्य का आंतरिक भाग अत्यधिक गर्म है इसके काण सूर्य के आंतरिक भाग से पदार्थ स्वंय ही निकलने की स्थिति में होती है। विशालकाय तारा सूर्य के पास से होकर गुजरा होगा तो तापमान में वृद्धि हुई होगी, ऐसी स्थिति में सूर्य से अलग हुए पदार्थ अंतरिक्ष में बिखर जाने की प्रवृति रखेंगें न कि ठंडा होकर ग्रह का निर्माण करेंगें।

⇒ यह सिद्धांत ग्रहों के कोणीय वेग की व्याख्या नहीं करता।

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