38. Pragmatism in Geography (भूगोल में उपयोगितावाद)

Pragmatism in Geography

(भूगोल में उपयोगितावाद)



प्रश्न प्रारूप

Q. भूगोल में उपयोगितावाद पर प्रकाश डालें।

(Throw light on the Pragmatism in Geography.)

उत्तर- उपयोगितावाद एक दार्शनिक दृष्टिकोण है जो अनुभव द्वारा अर्थपूर्ण विचारों को जन्म देता है। यह सोच अनुभवों, प्रयोगात्मक खोजबीन और सत्य के आधार पर परिणामों का मूल्यांकन करता है। अनुभवों पर आधारित क्रियाओं के फल अर्थपूर्ण व ज्ञानप्रद हैं। इसकी जाँच समस्याग्रस्त स्थितियों के हल में निहित है। समस्याओं में जकड़ी स्थितियों से समायोजन कर लेना और उन्हें उपयोग में लाना ही अर्थपूर्ण है, वही सत्य है।

        उपयोगितावाद भी प्रत्यक्षवाद सोच का संशोधित स्वरूप है। यह भी वैज्ञानिक विधि के प्रयोग करने पर जोर देता है, अन्तर केवल इतना ही है कि उपयोगितावादी मानव समस्याओं के समाधान के प्रयास का आन्दोलन है। मूल्यों पर आधारित वैज्ञानिक पद्धति से समाज की व्यावहारिक, प्रयोगात्मक (Practical) समस्याएँ हल करना उपयोगितावाद का मुख्य लक्षण है। सामाजिक समायोजन ही वस्तुतः भौगोलिक यथार्थता है।

     स्थानिक परिस्थितियों की समस्याओं से घिरे समाज में मानव का समायोजन खोज लेना ही अर्थपूर्ण है, सत्य है औग यथार्थ है। शोध कार्य इसीलिए किए जाते हैं कि वे तुरंत जन्मी स्थानिक समस्याओं को अर्थपूर्ण हल खोज निकालें जो परिणामतः वहाँ जनसमुदाय के लक्ष्यों की पूर्ति कर सकने में सक्षम बन सकें। इसमें शोधकर्ता के सुझाव और उसकी क्रियाएँ परिणामों को लागू करने (उपयोग में लाकर) में अभिकर्ता (Action Agent) बन उठते हैं।

      भूगोल में उपयोगितावाद-अधिगम एक नियोजित क्रिया (Planned Action) है न कि केवल नियोजन के लिए सोच। इसमें परिणामों पर आधारित क्रियाओं के चरण सम्मिलित हैं। लक्ष्यों की पूर्ति के साधन जुटाना, मानवीय उपयोग के तथा जन-कल्याण से जुड़ी क्रियाओं का मूल्यों के आधार पर समाधान इसकी वास्तविकता है।

     अमेरिका के गृह-युद्ध (Civil War) के उपरान्त वहाँ उपयोगितावाद विकसित बना जिसने वहाँ द्वितीय विश्वयुद्ध तक सामाजिक व बौद्धिक परिवर्तन समाज में आए। इसके समर्थकों की एक अच्छी संख्या पश्चिमी यूरोपीय देशों में भी पायी जाती हैं।

      इस दार्शनिक सोच की एक सामान्य विशेषता इसका व्यावहारिक समस्याओं (Practical Problems) से निपटना ही है। अतएव इसका जोर उपयोगिता और प्रयोगात्मकता पर है। उपयोगितावादी का विश्वास सामने खड़ी वास्तविक (Concrete) स्थिति के हल के क्रिया में है। इसके वैज्ञानिक ज्ञान पर आधारित ही वह जगत् को समझने-बुझने में सक्रिय है। इस प्रक्रिया में उसके लिए ‘निरपेक्ष’ अथवा ‘सामान्य’ नियमों व सिद्धान्तों का योग भी महत्त्वपूर्ण निर्देशांक हैं।

     तात्पर्य यह है कि उपयोगितावादी सैद्धांतिक सोच एवं प्रयोगात्मक स्थितियाँ, दोनों ही क्रियाओं से जुड़ी है। सामाजिक परिवर्तन के लिए प्रयासों को सुसंगठित बनाना, प्रेरित बनाना और क्रियान्वयन की आवश्यकता पर भूगोलवेत्ताओं की रणनीति टिकी है। उपयोगितवाद के प्रधान-लक्षण में सम्मिलित हैं-

(1) वास्तविकता का अभाव अथवा अपूर्णता:-

        उपयोगितावादियों का विश्वास बना है कि इस काल में ‘वास्तविकता’ विषयक ज्ञान अपूर्ण है, और उसमें त्रुटियाँ हैं।

(2) ज्ञान की भ्रामक विचार वीथी:-

      जगत् के प्रति वास्तविकता के बारे में हमारे मस्तिष्क में भ्रम उत्पन्न हैं। अतः, प्रयोगों से प्राप्त परिणामों में त्रुटियाँ विकसित हैं। भविष्य में सफलता संदिग्ध है, क्योंकि हमारे सोच भूतकाल की त्रुटियों से ग्रसित रहते हैं। अतः, परिकल्पनाओं व वर्तमान धारणाओं में बदलाव और उनका पुनर्मूल्यांकन आवश्यक है।

(3) वैज्ञानिक पद्धति और परिकल्पना पर आधारित:-

       निगमनात्मक मॉडल सर्वोत्तम विधि है जिसका शोध कार्य में प्रयोग करना आवश्यक बन उठा है।

(4) समस्याओं को तार्किक आधार पर ही हल किया जाना चाहिए। समस्याएँ भी मानव-कल्याण विषयक चयन की जानी चाहिए, और वे व्यावहारिक (Practical) हों तथा जिनके हल मानव कल्याण के विकास में योग दे सकें।

      इन आधारों पर उपयोगितावादियों ने मूल्यविहीन प्रत्यक्षवाद को नकारा घोषित किया। उससे समाज का न तो कल्याण हो सकता है, और न वह जगत् की सम्पूर्ण वास्तविकता का ज्ञान करा सकता है।

     उपयोगितावाद ने भूगोल में प्रयोगात्मक (Applied) पक्ष का समर्थन कर प्रयोगात्मक भूगोल (Applied Geography) को जन्म दिया। प्रयोगात्मक भूगोल की नीतियाँ जन-कल्याण से सम्बन्धित मूल्यों पर आधारित बनायी जानी चाहिए। वे चाहे वातावरण में समायोजित बनाने हेतु परिवर्तन हों, चाहे समाज की आर्थिक, शैक्षिक, आवासीय, स्वास्थ्य विषयक असमानताओं के मेटने के प्रयास अथवा सांस्कृतिक दृश्य-जगत् का संरक्षण हो, सामाजिक मूल्यों पर आधारित किए जाने चाहिए। उनको जन-कल्याण हेतु उपयोगिता के आधार पर ही विकसित करना Pragmatism की मूल भावना है।

     उपयोगितावादी भूगोलवेत्ताओं के लिए परिकल्पनाओं की रचना हेतु ढाँचा प्रस्तुत करने के लिए तर्क-संगत स्थानिक नियमों (Spatial Laws) की आवश्यक होती है। ये निगमनात्मक परिकल्पनाएँ आनुभविक प्रमाणों द्वारा परीक्षण कर एवं संशोधित बनाकर अपनायी जानी चाहिए।

      उपयोगितावादी का लक्ष्य मानवीय घटक पर जोर देने से जुड़ा हुआ है। इसकी पूर्ति हमारे कार्यों को प्रेरित करता है। हमारे कार्यों का स्त्रोत विगत काल के जगत् की प्रकृति है। मानव, यहाँ केन्द्रीय स्थान ग्रहण किए रहता है। ये विचार विडाल-डि-ला ब्लाश (फ्रांसीसी सम्प्रदाय का अग्रणीय भूगोलवेत्ता) द्वारा व्यक्त मत से मिलते-जुलते हैं।

      मानवतावादी भूगोल में, मानव और विज्ञान को समन्वित बना दिया है। भूगोल में आधुनिक मानवतावाद का प्रधान ध्येय सामाजिक विज्ञान व मानव की सामंजस्यता है। इसी में वस्तुनिष्ठता और व्यक्तिनिष्ठता का भौतिकवाद और आदर्शवाद का और तर्क व वास्तविकता का समन्वय है। ऊपर जो कुछ व्यक्त हुआ है, इस आधार पर उपयोगितावादी भूगोल के कतिपय लक्षणों व घटकों की पहचान निम्न आधारों पर की जा सकती है:-

(i) भौगोलिक-स्थान ज्ञान और भ्रांतियों द्वारा संयुक्त बनी परिकल्पना है।

(ii) भौगोलिक-स्थान परिवर्तनशील है। इसके परिवर्तन का बोध और इसको परिवर्तन बनाने की दिशा के लिए हमारे ज्ञान और हमारी सोच के मापकों को परिशुद्ध बनाना आवश्यक प्रक्रिया है।

(iii) भौगोलिक-स्थान काल-अवधि के दौरान विकसित ‘मानवीय घटकों’ का विवरण है।

(iv) प्रयोगात्मक मानवीय समस्याओं के समाधान के लिए भूगोल की संरचना और पुनर्रचना आवश्यक है।

(v) स्थानिक वास्तविकता मानवीय अनुभवों की संयुक्त बनी परिकल्पना है।

(vi) परिकल्पनाओं की रचना के लिए स्थानिक नियमों की आवश्यकता होती है। परन्तु साथ-साथ हमारे ज्ञान व काल के सन्दर्भ में इनमें संशोधन भी किया जाना चाहिए।

(vii) भौगोलिक अध्ययन वस्तुतः प्रयोगात्मक समस्याओं से संबंधित है औ प्रायोगिक समस्याएँ (Practical Problems) स्थानिक रूप से मानव के कल्याण से जुड़ी हैं। इनका अध्ययन वैज्ञानिक रीति-नीति से किया जाना चाहिए।



Read More:-

3. Multidisciplinary Course MDC-2 For Humanities

Multidisciplinary Course MDC-2 For Humanities

(Climatology and Oceanography)

(Theory)

Solved Questions Paper 2024



(Patliputra University Patna)

Multidisciplinary Course MDC

UG (Regular) (Sem.-II) Examination, 2024

(Session: 2023-27)

(MDC-2: Multidisciplinary Course)

GEOGRAPHY

(Climatology and Oceanography)

Time: Three Hours]

[Maximum Marks: 70

Note: Candidates are required to give their answers in their own words as far as practicable. The figures in the margin indicate full marks. Answer from all the sections as directed.

अभ्यर्थी यथासंभव अपने शब्दों में ही उत्तर दें। उपांत के अंक पूर्णांक के द्योतक हैं। निर्देशानुसार सभी खण्डों से उत्तर दीजिए।

Section-A / खण्ड-अ

(Objective Type Questions)

(वस्तुनिष्ठ प्रश्न)

Note: Choose the correct option from each question. [10×2=20]

प्रत्येक प्रश्न से सही विकल्प का चयन कीजिए।

1. (i) All activity related to climate happens in this layer of atmosphere:

(a) Stratosphere

(b) Troposphere

(c) Ionosphere

(d) None of the above

मौसम सम्बन्धी सभी घटनाएँ, वायुमण्डल के इस परत में होती है:

(a) समतापमण्डल

(b) क्षोभमण्डल

(c) आयनमण्डल

(d) उपरोक्त से कोई नहीं

उत्तर- (b) क्षोभमण्डल

(ii) Which layer protect the Earth from Sun’s harmful rays?

(a) Oxygen layer

(b) Ozone layer

(c) Nitrogen layer

(d) Green house gas

कौन-सी परत पृथ्वी को सूर्य की हानिकारक किरणों से बचाती है?

(a) ऑक्सीजन परत

(b) ओजोन परत

(c) नाइट्रोजन परत

(d) ग्रीन हाउस गैस

उत्तर- (b) ओजोन परत

(iii) Which among the following is

(a) Hailstorm 

(b) Shower

(c) Thunderstorm

(d) All of the above

इनमें से कौन वर्षा का एक रूप है?

(a) ओलावृष्टि

(b) बौछार

(c) तूफान

(d) उपरोक्त से सभी

उत्तर- (d) उपरोक्त से सभी

(iv) As one gaes above in the atmosphere, the air pressure :

(a) Increases

(b) Decreases

(c) Remain same

(d) None of the above

वायुमण्डल में ऊपर की तरफ बढ़ने पर, वायुदाब:

(a) बढ़ता है

(b) घटता है

(c) एक जैसा रहता है

(d) उपरोक्त से कोई नहीं

उत्तर- (b) घटता है

(v) This is a local wind of India:

(a) Loo

(b) Chinook

(c) Siroco

(d) Harmattan

यह भारत की स्थानीय पवन है:

(a) लू

(b) चिनूक

(c) सिरोको

(d) हरमट्टान

उत्तर- (a) लू

(vi) Where do temperate cyclones come?

(a) 5o – 10o north latitude

(b) 5o – 15o north latitude

(c) 5o – 10o south latitude

(d) 5o – 15o south latitude

शीतोष्ण कटिबन्धीय चक्रवात कहाँ आते हैं?

(a) 5o – 10o उत्तरी अक्षांश

(b) 5o – 15o उत्तरी अक्षांश

(c) 5o – 10o दक्षिणी अक्षांश

(d) 5o – 15o दक्षिणी अक्षांश

उत्तर- शीतोष्ण चक्रवात दोनों गोलार्द्धों में 35o से 65o अक्षांशों के बीच मध्य-अक्षांशीय क्षेत्र के ऊपर सक्रिय होते हैं।

(vii) Find out the wrong pair:

(a) China Sea – Typhoon

(b) India – Cyclone

(c) Eastern Island – Hurricane

(d) Australia-Tornado

गलत जोड़ा बताइए :

(a) चीन सागर – टाइफून

(b) भारत – चक्रवात

(c) पूर्वी द्वीप समूह – हरीकेन

(d) आस्ट्रेलिया- टॉरनैडो

उत्तर- (d) आस्ट्रेलिया- टॉरनैडो

(viii) Highest saline sea in the world is:

(a) Salt lake

(b) Red sea

(c) Dead sea

(d) Sambher lake

विश्व के सबसे अधिक खारे सागर का नाम है:

(a) साल्ट झील

(b) लाल सागर

(c) मृत सागर

(d) सांभर झील

उत्तर- (c) मृत सागर

(ix) Going from equator to pole the salinity:

(a) Decreases

(b) Increases

(c) Remain same

(d) None of the above

विषुवतरेखा से ध्रुवों की ओर जाने पर लवणता:

(a) घटती है

(b) बढ़ती है

(c) समान रहती है

(d) उपरोक्त में से कोई नहीं

उत्तर- (a) घटती है

(x) Andaman-Nikobar ridge is situated in:

(a) Indian Ocean

(b) Pacific Ocean

(c) Atlantic Ocean

(d) Arctic Ocean

अंडमान-निकोबार कटक स्थित है:

(a) हिन्द महासागर में

(b) प्रशान्त महासागर में

(c) अन्ध महासागर में

(d) आर्कटिक महासागर में

उत्तर- (a) हिन्द महासागर में

Semester-B / खण्ड-ब

(Short Answer Type Questions)

(लघु उत्तरीय प्रश्न)

Note: Answer any four questions of the following: [4×5=20]

निम्नलिखित में से किन्हीं चार प्रश्नों के उत्तर दीजिए।

2. State the importance of ozone layer in the atmosphere.

वायुमण्डल में ओजोन परत का महत्त्व बताइए।।

Discuss the composition of atmosphere.

वायुमडण्ल के संघटन की चर्चा कीजिए।

4. Why does Antarctic Bottom water have more nutrient than North Atlantic Bottom water?

उत्तर अटलाण्टिक नितल जल की तुलना में अन्टार्क्टिक तलीय जल में अधिक पोषक तत्व क्यों होते हैं?

5. Explain different air pressure belts on Earth.

पृथ्वी पर पायी जाने वाली विभिन्न वायुदाब की पेटियों को समझाइए।

6. Write the characteristics of anticyclone.

प्रतिचक्रवात की विशेषताओं को लिखिए।

7. Describe the general characteristics of ocean bottom.

महासागरीय तली की सामान्य विशेषताओं का वर्णन कीजिए।

Section-C / खण्ड-स

(Long Answer Type Questions)

(दीर्घ उत्तरीय प्रश्न)

Note: Attempt any three questions of the following. [3×10-30]

निम्नलिखित में से किन्हीं तीन प्रश्नों के उत्तर दीजिए।

8. Describe the structure and composition of atmosphere
with suitable diagram.

वायुमंडल की संचना एवं संघटन का सचित्र वर्णन कीजिए।

9. Discuss the different types of rainfall.

वर्षा के विभिन्न प्रकारों का वर्णन कीजिए।

10. Describe the mechanism of cyclone.

चक्रवात की क्रियाविधि का वर्णन कीजिए।

11. Explain Ocean bottom relief of either Pacific or Indian ocean.

प्रशान्त अथवा हिन्द महासाग के महासागरीय तल उच्चावच की व्याख्या कीजिए।

12. What is Ocean Salinity? Describe its different sources.

महासागरीय खारापन क्या होता है? इसके विभिन्न स्रोतों का वर्णन कीजिए।

37. Positivism in Geography (भूगोल में प्रत्यक्षवाद)

Positivism in Geography

(भूगोल में प्रत्यक्षवाद)



प्रश्न प्रारूप

Q. भूगोल में प्रत्यक्षवाद की विवेचना करें।

(Discuss the Positivism in Geography.)

उत्तर- प्रत्यक्षवाद एक प्रकार का दार्शनिक आन्दोलन है। यह धर्म और परम्पराओं के विरुद्ध खड़ा हुआ सोच है। इसका वैज्ञानिक आधार और वैज्ञानिक विधि ज्ञान का स्रोत है। यह तथ्यों (आंकड़ों) और मूल्यों (सांस्कृतिक) में भेद व्यक्त करने वाला सोच है।

     ऑगस्ट कॉम्टे (Auguste Comte) ने अध्यात्म (Metaphysics) और कोरे बुद्धिवाद को जाँच व अन्वेषण की एक निरर्थक शाखा बताया है। वह मानवता के विकास के लिए सामाजिककता को वैज्ञानिक धरातल पर स्थापित करने का पक्षपाती था।

     प्रत्यक्षवाद को अनुभववाद (Empiricism) भी कहते हैं। इस दार्शनिक सोच में ज्ञान का आधार तथ्य है। तथ्यों को प्रेक्षण (Observation) द्वारा अनुभव कर उनमें संबंधों पर आधारित ज्ञान प्रत्यक्षवाद का मुख्य उद्देश्य है। इसमें आनुभविक प्रश्नों का हल यथार्थ के दृष्टिकोण पर आधारित है। यथार्थ स्थिति के विषय में ‘तथ्य स्वयं साधन’ बनते हैं। (Facts Speak for Themselves)। विज्ञान का नाता भी वस्तुपरक तथ्यों से है।

    व्यक्तिपरकता (Subjective View Point) का इसमें कोई स्थान नहीं है। यथार्थ वही है जो प्रत्यक्ष में दिखता है। हमारी इन्द्रियाँ जो कुछ अनुभव कर रही हैं, वही ज्ञान है, वही वैज्ञानिक है। वैज्ञानिक दृष्टिकोण वस्तुपरक, सत्य से पूर्ण बना और तटस्थ होता है। प्रत्यक्षवादी वैज्ञानिक एकता के हामी हैं। वे यथार्थ के बारे में सामान्यानुभावों, सामान्य वैज्ञानिक भाषा और प्रेक्षणों की पुनरावृत्ति को सुनिश्चित बनाने की विधि के विश्वासी हैं।

     वैज्ञानिक विधि इन्हीं लक्षणों के एकीकरण से बना व्यापक विज्ञान है। दूसरे शब्दों में हम यह कह सकते हैं कि विज्ञान का आपूर्ण तंत्र भौतिकी, रसायन, जीव, मनोविज्ञान व सामाजिक विज्ञानों के नियमों के अन्तर्गत तार्किक रूप से जुड़ा तंत्र है।

    अतएव प्रत्यक्षवाद-दर्शन एक प्रकार से आदर्शवाद का विरोधी है, क्योंकि आदर्शवाद केवल मानसिक अथवा बुद्धिपरक है। वह नियामक और नीतिपरक भी नहीं है।

     मानव-मूल्यों, विश्वास, आस्था, अभिवृत्ति, पूर्वाग्रह, पक्षपात, रीति-रिवाज, परम्परा, रुचि, लालित्य व सौन्दर्यपरक मूल्यों से जुड़े प्रश्नों व समस्याओं में प्रत्यक्षवादी शोध नहीं करता क्योंकि इनका निर्णय व्यक्तिवादिता से ग्रसित होता है। ये नैतिक मापदण्ड देश, काल, समाजों के साथ-साथ बदलते रहते हैं, और इनके बारे में निर्णय वैज्ञानिक आधारों पर सम्भव नहीं है।

    प्रत्यक्षवाद का दर्शन वस्तुपरक, निष्पक्षता, तटस्थता पर आधारित विज्ञान है। प्रत्यक्षवाद में व्याख्या व कथनों का आधार-

(i) आनुभविक अर्थात् प्रत्यक्ष अनुभवों (जो कुछ हमारे सामने दृश्य-जगत्) से जुड़ा होता है।

(ii) वह एकीकृत बनी वैज्ञानिक विधि है।

(iii) वह अनुभवजन्य वैज्ञानिक नियमों व सिद्धांतों से जुड़ा है।

(iv) वह नियामक, नीति संगत, नैतिकता से मुक्त स्वतंत्र प्रेक्षण है।

(v) वह अपरिवर्तनीय, शाश्वत वैज्ञानिक व्यवस्था है जिसमें वैज्ञानिक नियमों के विकास-क्रम की एकीकृत बनी लोकव्यापी पद्धति सम्मिलित है।

     ऐतिहासिक रूप से इसका उदय फ्रांस की क्रांति के उपरान्त हुआ, और ऑगस्त कॉप्टे ने इसे स्थापित किया। क्रांति से पूर्व प्रचलित बना यह निषेधवादी-दर्शन (Negative Philosophy) की प्रतिक्रिया स्वरूप जन्मा वैज्ञानिक प्रत्यक्षवादी सोच था। निषेधवादी दर्शन न तो रचनात्मक था, और न प्रयोगात्मक (Practical)। वह भावना-प्रधान था जो काल्पनिक विकल्पों द्वारा वर्तमान प्रश्नों के हल खोजने में डूबा था।

     अतः, निषेधवाद के विरुद्ध प्रत्यक्षवाद एक प्रकार से खण्डन-मण्डनी वाद-विवादों से लैस हथियार सिद्ध हुआ। प्रत्यक्षवाद का आन्दोलन घिसे-पिटे निषिद्ध कर्मों व धार्मिक प्रपंचों के विरुद्ध खड़ा हुआ था।

    प्रत्यक्षवाद सामाजिक संबंधों को वैज्ञानिक धरातल पर उतरने में विश्वास व्यक्त करता है। वह सामाजिक-विज्ञान (Social Science) को भी प्राकृतिक विज्ञानों की भाँति शाश्वत नियमों में ढालने का पक्षपाती था। कॉम्टे के अनुसार सामाजिक विकास तीन चरणों में घटित हुआ-

(i) ईश्वर मीमांसा (Theological) का पहला चरण जब मानव प्रत्येक घटना अथवा दृश्य को ईश्वरीय सत्ता व ईश्वरीय समझकर व्याख्या करता था,

(ii) दूसरे चरण में सामाजिक व्यवस्था का विकास तात्विक, बुद्धिपरक, अभौतिक (Metaphysical) विचारों द्वारा व्याख्या, और

(iii) तीसरे चरण में सामाजिक क्रियाओं व विकास के आधार के कार्य-कारण संबंध का जुड़ाव (Causal Connection)।

     मानव अपने निर्णयों को संबंधित कारणों के आधार पर सुनिश्चित बना कर अपनाता है। ऐसे कारकों की पहचान की जा सकती है। प्रत्यक्षवादी सोच अधिनायकवादी शासनों (Dictatorial Regimes) में विकसित सोच के विरुद्ध है।

    सन् 1930 में वियना (यूरोप) में ‘वियना-सर्किल’ की स्थापना हुई। वह तर्कसंगत प्रत्यक्षवादियों का समूह था। ये वैज्ञानिक उन सभी विचारों का विरोध करते थे जो आनुभविक रूप से परीक्षण नहीं किए जा सकते और जो नियंत्रित बनी पद्धतियों से नहीं खोजे जा सकते। नाजीवादी सोच (Nazism) को प्रत्यक्षवादी तर्कशून्य, पक्षपाती और हठधर्मितापूर्ण मानते थे।

   मानव भूगोल में किए गए प्रत्यक्षवादी सोच पर आधारित कार्यों की मार्क्सवादियों और यथार्थवादियों ने आलोचना की। ये कार्य ऐसे नियमों की खोज थे जो साधन सामग्री (Infrastructure) प्रक्रिया से नहीं जुड़े थे। वे अस्तित्वहीन ऐसे ढाँचे के नियम थे जो संसाधनों के ताम-झाम में बदलाव लाने में विश्वासी नहीं थे ।

    मानवतावादियों ने भी प्रत्यक्षवादी सोच की आलोचना की है क्योंकि उसमें मूल्यों व आदर्शों को कोई स्थान नहीं था। मानव जीवन उनके अभाव में अधूरा होता है। मार्क्सवादियों, व्यवहारवादियों और वैज्ञानिक प्रेक्षकों के अनुसार मूल्य विहीन, मात्रात्मक-गणितीयकरण व नियम-निरूपण एवं विवेचन सम्भव नहीं हैं। परन्तु, प्रत्यवादियों की मान्यता है कि प्रत्येक समस्या का तकनीकी हल संभव है और मूल्यविहीन शोध ही वैज्ञानिक है। परन्तु, व्यवहार में यह देखा गया है कि शोध कार्य अनेक स्थलों पर व्यक्तिनिष्ठता से प्रभावित बन जाता है।

     शोध विषय के चयन से लेकर दृश्य-वस्तुओं के वितरण व प्रारूपों की पहचान और निष्कर्ष-निर्धारण प्रक्रियाओं में कुछ न कुछ अंश में व्यक्तिनिष्ठता प्रवेश कर जाती है। जैसे ही परिणाम ज्ञात हो जाते हैं, मौजूदा वितरण के विवरण निर्णयकत्ताओं के सोच को प्रभावित करना आरम्भ कर देते हैं कि भावी वितरण कैसा होना चाहिए। तात्पर्य यह है कि वैज्ञानिक प्रक्रिया स्वयं ही यथार्थता का स्वरूप लेने लगी है। शोधकर्त्ता उदासीन और तटस्थ या वैज्ञानिक नहीं रह पाता।

     विज्ञानों में एकता भी आलोचना का पात्र है। सामाजिक वैज्ञानिकों में एकता का विकास सम्भव नहीं हो सका है। प्रत्येक विषय (समाज शास्त्र, मनोविज्ञान, राजनीति विज्ञान, भूगोल आदि) के अपने-अपने अलग सोच व अभिगम हैं जिनके आधार पर वस्तुओं-दृश्य-जगत् आदि का विश्लेषण करते देखे जाते हैं। वे यथार्थता को अपनी-अपनी पद्धतियों, विधियों, अभिगमों आदि द्वारा व्यक्त करते हैं।

     एक अत्यन्त संगीन आलोचना प्रत्यक्षवाद की इस तथ्य पर आधारित है कि प्राकृतिक एवं सामाजिक विज्ञानों की प्रकृति ही एक जैसे नहीं हैं। दोनों अलग प्रकृति की वैज्ञानिक-शाखाएँ हैं। वे प्रायोगिक दृष्टि से समान नहीं हैं। उनकी प्रयोगात्मक प्रक्रियाएँ (Experimental Processes) अलग-अलग हैं। उनको एक समान कोटि की विधियों द्वारा नहीं पूरा कर सकते हैं।

    सामाजिक विज्ञानों की विषय-वस्तु का केन्द्र ‘मानव’ है जिसे ‘वस्तु’ मानकर पदार्थवत् आकलन नहीं कर सकते क्योंकि उसका नीजी सोच व बुद्धि-कौशल है। मानव-व्यवहार अन्य जीवों के व्यवहार से भी अलग हैं। उसकी कल्पनाएँ, धारणाएँ, अभिवृत्ति, रुचि, आस्था आदि को प्राकृतिक विज्ञानों के वस्तु-जगत् की भाषा में नहीं बदला जा सकता। अतएव-व्यवहार प आधारित मानव भूगोल एवं अन्य सामाजिक विज्ञानों के नियम-निरूपण में व्यक्तिनिष्ठता का घटक समाया रहता है।



Read More:-

36. Concept of Space in Geography (भूगोल में स्थान की विचारधारा)

Concept of Space in Geography

(भूगोल में स्थान की विचारधारा)



प्रश्न प्रारूप

Q. स्थानिक या क्षेत्रीय विज्ञान के रूप में भूगोल की व्याख्या कीजिए।

(Explain Geography as a Spatial or Regional Science.)

अथवा, भूगोल में स्थान की विचारधारा की विवेचना करें।

(Discuss the Concept of Space in Geography.)

उत्तर- भूगोल में क्षेत्र या स्थान (Space) और क्षेत्रीय संकल्पना (Spatial Concept) का केन्द्रीय स्थान है। क्षेत्र ठोस, तरल एवं गैसीय पदार्थों की ऐसी विलक्षण इकाई है जहाँ मानव एवं प्रकृति की क्रियाएँ घटित होती हैं। सामान्य भाषा में क्षेत्र से तात्पर्य भू-तल के किसी बिन्दु विशेष से क्षितिज तक वृत्ताकार आकृति में दिखाई देने वाले क्षेत्र से है। क्षितिज व आकाश मिलकर इसे सीमाबद्ध करते हैं।

     भूगोल में प्रयुक्त क्षेत्र शब्द व्यापक अर्थ रखता है। यह लघु या विस्तृत भी हो सकता है। यह भू-तल, वायुमण्डल, भूगर्भ या सागर में कहीं पर हो सकता है। यह आवश्यक नहीं कि वह सदैव क्षितिज तक ही फैला हो। भूगोल क्षेत्रों की विशेषतओं का ही अध्ययन करता है।

भूगोल में क्षेत्र (Space) की व्याख्या (Explanation of Space in Geography):-

      भूगोल में अध्ययन किए जाने वाले क्षेत्र या स्थान (Space) का अर्थ ‘गृहीत स्थान’ (Occupied Space) से लिया जाता है। क्षेत्रों का सीधा सम्बन्ध भू-तल की ग्लोबीय स्थिति से होता है। यह दिशा, दूरी, विस्तार, व्यापकता या विरलता से प्रभावी रहा है। क्षेत्र विशेष के लक्षणों पर किसी काल विशेष या गतिशिल प्रक्रिया का भी परिणामी प्रभाव बना रहता है।

    अमेरिकन विद्वान प्रेस्टन जेम्स का मत है कि “भूगोलवेत्ता एक ऐसा व्यक्ति होता है जो अवस्थिति, दूरी, दिशा, प्रसार व स्थानिक अनुक्रम के महत्त्व के बारे में प्रश्न पूछता है। वह सह-सामाजिकता, नवाचार, प्रसार घनत्व तथा सापेक्षिक स्थिति से जुड़ी अन्य समस्याओं का समाना करता है।”

       अरस्तू ने ‘वस्तुओं के अस्तित्व हेतु तार्किक दशा’ को क्षेत्र या स्थान कहा है (Space is the logical condition for existence of things)।

      सर आइजक न्यूटन  के अनुसार सभी स्थानिक संकल्पनाएँ मानव के चिन्तन से उद्भव होती हैं।

      भूगोल में हम जिन स्थानों का अध्ययन करते हैं वे विभेदशील (variable), गतिशील (dynamic) तथा परिवर्तनशील (changing) होने के कारण जटिल रूप से सम्बन्धित होते हैं। यदि स्थानों के मध्य पाये जाने वाले सम्बन्धों को प्रभावित करने वाली सभी घटनाएँ या कारक तत्व स्वतंत्र बने रहते तो सम्भवतः भूगोल मात्र स्थानों का वर्णनात्मक ज्ञान कोष ही बन कर रह जाता।

       वर्तमान में यह मान लिया गया है कि जटिल घटनाओं एवं तथ्यों के मध्य भी अन्तर्सम्बन्ध मिलता है। यह मान लिया है कि जटिल घटनाओं एवं तथ्यों के मध्य भी अन्तर्सम्बन्ध मिलता है और विभिन्न स्थानों की ऐसी घटनाओं के मध्य सम्बद्धता है। स्थानों के मध्य अन्तर व विभिन्नता की सीमा के स्तर से क्षेत्रों का निर्माण होता है। भौगोलिक स्थान के स्थिति निर्धारण हेतु जटिल घटनाओं के स्तरीय अन्तर तथा विविध प्रकार की सूचनाओं की सहायता ली जाती है।

      जर्मन विद्वान काण्ट का मत है कि एक स्वतंत्र विषय के रूप में भूगोल का अस्तित्व स्थान (Space) से जुड़ा है। अंग्रेजी शब्द स्पेश या क्षेत्र (Space) का अर्थ है खाली जगह (empty place)। इसका तात्पर्य क्षेत्रीय आयाम (areal dimension) से लिया जाता है। यह भूखण्ड या क्षेत्र का बोध कराता है।

    डेविड हार्वे का मत है कि भूगोल का सम्पूर्ण दर्शन एवं व्यवहार ऐसी संकल्पनात्मक परिसीमाओं के विकास पर निर्भर करता है जिसमें वस्तुओं एवं घटनाओं के क्षेत्र में वितरण का लेखा-जोखा किया जा सके।

     वस्तुतः क्षेत्र (Space) एक भौतिक शास्त्रीय संकल्पना है। काण्ट के अनुसार क्षेत्र के अन्तर्गत द्रव्यों (Substances) के मध्य सम्बन्ध की व्यवस्था को शामिल किया जाता है तथा क्षेत्रीय विस्तार द्रव्यों द्वारा निःसृत सक्रिय शक्तियों की गहनता का मापन मात्र है।

        काण्ट ने स्थान (Space) की अवधारणा को साक्ष्य कहा जिसमें वस्तुओं के मध्य संबंधों की व्यवस्था है।

     हार्टशोर्न एवं हेटनर क्षेत्र को निरपेक्ष (absolute) माना। हार्टशोर्न के अनुसार, “क्षेत्र स्वयं कोई लक्षण (तत्व) नहीं है, यह तत्वों की बौद्धिक परिसीमा है; एक अमूर्त्त संकल्पना जिसका वास्तविक नहीं है। उसकी एक तत्व के रूप में अन्य तत्वों से न तुलना की जा सकती है, न ही साहचर्य मूलक संकल्पनाओं की व्यवस्था में वर्गीकृत किया जा सकता है जिससे इसके अन्य तत्वों से सम्बन्ध परक नियम बनाए जा सकें। क्षेत्र स्वयं अपने आन्तरिक तत्त्वों से मात्र इस अर्थ में जुड़ा है कि यह उन तत्वों को अमुक अमुक स्थलों पर समाहित करता है।”

     कार्ल साँवर का मत है कि “भूगोल का उत्तरदायित्व क्षेत्रीय अध्ययन है, क्योंकि विद्यालय का प्रत्येक छात्र यह जानता है कि भूगोल विभिन्न देशों के सम्बन्ध में सूचना देता है, किसी अन्य विषय ने क्षेत्रीय अध्ययन (Spatial study) का दावा नहीं किया है।”

     विल्हेलम फाल्ज लिखता है, “भूगोल का उद्देश्य एवं अद्वितीय महत्त्व यह है कि उससे हमें पृथ्वी के धरातल का ज्ञान होता है।”

      फ्रोबेल पेशेल तथा जरलैंड ने भूगोल को पृथ्वी का विज्ञान (Science of the Earth- Erdkunde) बताया है। भूगोल के अन्तर्गत विविध प्रकार के भौतिक एवं मानवीय तत्वों का अध्ययन क्षेत्रीय परिप्रेक्ष्य में ही किया जाता है। किसी वस्तु का धरातल पर वितरण कहाँ-कहाँ और क्यों है? इसकी व्याख्या भूगोल के माध्यम से की जा सकती है। भूगोल अपनी मूल प्रकृति के अनुसार भू-तल से विलग (isolate) नहीं हो सकता। इसलिये भूगोल को भू-तल का क्षेत्र-विश्लेषण करने वाला विज्ञान मानना चाहिये। पृथ्वी तल भूगोल का मौलिक आधार है।

      अतः, महाद्वीप, देश, प्रदेश, क्षेत्र, जिला, ग्राम आदि इकाइयों का मूलाधार भूगोल ही है जो भूतल के किसी न किसी अंश को व्यक्त करते हैं। प्रदेश किसी न किसी भौतिक व सांस्कृतिक तत्व के वितरण को ग्रहण किए हुए होता है। वीडाल-डी-ला-ब्लाश का मत है कि “मनुष्य के लिए किसी क्षेत्र की समस्त परिस्थितियों की समष्टि सर्वोपरि होती है।” महान् खोज यात्राओं के युग के आरंभ में क्षेत्रीय विभिन्नताओं से संबंधित सामाजिक दशाओं के दृश्य ने भूगोलवेत्ताओं का ध्यान आकृष्ट किया है।

    ब्लाश ने लिखा है कि “एक देश की विशिष्ट प्रकृति की अभिव्यक्ति उसके पर्वतों, मरुस्थलों तथा नदियों की अपेक्षा उसके निवासियों, उनकी बस्तियों तथा मानव जनसंख्या के भौतिक तत्व से कहीं अधिक होती है।”

     विश्व के सम्पूर्ण ज्ञान के लिए क्षेत्रीय विधि (Regional Method) को भूगोल में महत्त्वपूर्ण स्थान दिया गया है। भूगोल की क्षेत्रीय विधि विश्व का सम्पूर्ण, शुद्ध तथा क्रमबद्ध ज्ञान प्रदान करके मानव उत्सुकता को संतुष्ट करने में समर्थ है। जिस प्रकार इतिहास काल (Time) का अतीत (Past) के संदर्भ अध्ययन करता है, उसी प्रकार भूगोल घटनाओं या तत्वों के स्थानों के संदर्भ में अध्ययन करता है।

    विश्व के प्रत्यक्ष ज्ञान के प्रसार से सम्बन्धित मानव शिक्षा में भूगोल के महत्व को किसी प्रकार कम नहीं आंकना चाहिए, परन्तु भूगोल को संसार का अध्ययन संकुचित क्षेत्रों के संदर्भ में ही करना चाहिए, जिनमें वस्तुओं में पारस्परिक घनिष्ठ सम्बन्ध हों। क्या भूगोलवेत्ता ही क्षेत्रीय ज्ञान की प्राप्ति के लिए सर्वाधिक उपयुक्त व्यक्ति होता है? निश्चय ही यह सत्य है कि अनेक गैर-भूगोलवेत्ता क्षेत्रीय ज्ञान में योगदान देने के इच्छुक रहते हैं।

       राल्फ ब्राउन द्वारा यू० एस० ए० के अटलांटिक तट का 1810 में किया गया अध्ययन इस बात का साक्षी है कि विश्व में केवल व्यावसायिक भूगोलवेत्ता ही इसके लिए समर्थ नहीं हैं। परन्तु, गैर-भूगोलवेत्ता या विद्वानों द्वारा एकत्रित सामग्री की विश्वसनीयता की जाँच यदि क्षेत्रीय अध्ययन के रूप में कर ली जाय तो भौगोलिक ज्ञान का महत्व और भी बढ़ जाता है। भूगोल में ऐसी तमाम सामग्री समाविष्ट कर ली गई है जो प्राचीन अन्वेषकों, यात्रियों व साहित्यकारों ने दी है। हेटनर का मत है कि यदि भूगोलवेत्ता और गैर-भूगोलवेत्ता दोनों एक साथ क्षेत्र का वर्णन करें तो भूगोल तथा क्षेत्र का अध्ययन सशक्त होगा।

     एक प्रादेशिक भूगोलवेत्ता का कार्य क्षेत्र का संश्लिष्ट वर्णन प्रस्तुत करना होता है। उसका कार्य कलाकार (Artist) से भिन्न होता है। यद्यपि भूगोलवेत्ता की विधि की प्रकृति फोटो ग्राफिक है जिसमें व्यक्तिगत प्रतिक्रियाओं का योगदान लघुत्तम होता है। भूगोलवेत्ता दृश्य घटनाओं के पारस्परिक संबंधों की व्याख्या क्षेत्र की सम्पूर्ण तस्वीर को लेकर करता है जो गैर-भूगोलवेत्ता के लिए संभव नहीं है। कोई प्रशिक्षिति भूगोलवेत्ता ही किसी क्षेत्र का वस्तुनिष्ठ, वैज्ञानिक तथा विश्वसनीय वर्णन प्रस्तुत कर सकता है।

      भूगोलवेत्ता कुछ-कुछ कलाकार, मानचित्रकार, साहित्यकार व वैज्ञानिक भी होता है। उसके द्वारा खींचा गया किसी क्षेत्र का चित्र-कलाकार के चित्र से कई अर्थों में भिन्न होता है। वह संकेतों व विरंजक चित्रों से क्षेत्रीय सूचनाओं को आँखों के समक्ष दिखाने में समर्थ होता है।

     एम० मार्टे ने यह स्वीकार किया था कि “भूगोल मूलतः वितरण का विज्ञान है” (Geography is the Science of Distribution)। उसने इस दृष्टिकोण पर सर्वाधिक बल दिया और भूगोल को ‘वस्तुओं के कहाँ? का अध्ययन बताया। यदि वितरण का अध्ययन, भूगोल की प्रकृति का मूल है तो इसे भूगोल प्रतीत होना चाहिए जिससे कि इसकी अन्य विज्ञानों से पहचान हो सके। जब वनस्पति शास्त्री पौधों के वितरण को निर्धारित करता है, तथा समाजशास्त्री जनसंख्या के वितरण को दर्शाता है तो वह भी भूगोलवेत्ता हो जाता है अथवा कम से कम वह भी भूगोल के क्षेत्र में कार्य करने लगता है।

     मिशोटे का तर्क है कि इनमें से प्रत्येक अपने विज्ञान के दृष्टिकोण से विशिष्ट प्रकार की घटनाओं का अध्ययन करता है, भूगोल के दृष्टिकोण से नहीं। हेटनर ने स्पष्ट किया कि ‘वितरण वस्तुओं का गुण है।’ (Distribution is the attribute of things)। वर्गीकृत विज्ञान घटनाओं पर बल देता है। जिनका वह वितरण अध्ययन करता है, भूगोल क्षेत्रों पर बल देता है जिसके तत्वों में विविधताएँ होती हैं। भूगोल की वितरण-विज्ञान की संकल्पना के सम्बन्ध में कार्ले सॉवर का मत है कि भूगोल कहाँ (where) का विज्ञान है। भूगोलवेत्ता सदैव यह जानने का प्रयास करता है कि उसकी दृश्य घटनाएँ कहाँ हैं? कहाँ? का अध्ययन भूगोल विषय का एक अंग है।

      हरमन लाटेन्साच का मत है कि भूगोल का अध्ययन क्षेत्र रूप के निरीक्षण से ही आरम्भ होता है। क्षेत्र में प्रवेश करते समय सर्वप्रथम भूगोलवेत्ता की दृष्टि पहाड़ियों, वनों, खेतों, ग्रामों व नगरों आदि की विभिन्नता पर ही जाती है। वास्तव में भूगोलवेत्ता भू-तल की मुखाकृति का आलोकन करके अलग-अलग क्षेत्रों में तथ्यों का वर्णन करता है।

     आइंस्टीन ने क्षेत्र (Space) को काल से विलग नहीं माना है। वे देश-काल (Space-time) के संदर्भ में भूगोल को देखते थे। क्षेत्र (Space) एवं काल (Time) एक-दूसरे के परिपूरक हैं। वे विलग नहीं किए जा सकते हैं। प्रत्येक कालावधि में क्षेत्रीय आयाम (गुण-धर्म) बदल जाता है अर्थात् प्रत्येक क्षेत्रीय इकाई की विशेषतायें काल-क्रमानुसार भिन्न होती है। इस प्रकार (Space) अन्तराल (Gap) नहीं अन्तर्सम्बन्धों का पुंज है।

    शेफर (Schaefer F) ने निरपेक्ष क्षेत्र (Absolute Space) के स्थान पर सापेक्ष्य क्षेत्र (Relatives Space) को अपनाने पर बल दिया है। इसीलिए वर्तमान वैज्ञानिकतावादी युग में विभिन्न सांख्यिकीय एवं ज्यामितिक संकल्पनाओं का उपयोग करते हुए विभिन्न तत्वों के क्षेत्रीय अन्तर्सम्बन्धों की व्याख्या विश्लेषण के आधा पर क्षेत्रीय प्रतिरूप एवं प्रक्रियाओं के विवेचन पर बल दिया जाता है।



Read More:-

35. Development of Modern Indian Geography: Prospects, Problems and Future (आधुनिक भारतीय भूगोल का विकास: संभावनाएँ, समस्याएँ और भविष्य)

Development of Modern Indian Geography: Prospects, Problems and Future

(आधुनिक भारतीय भूगोल का विकास: संभावनाएँ, समस्याएँ और भविष्य)



प्रश्न प्रारूप

Q. भारत में भूगोल के अध्यापन के विकास एवं प्रगति की समीक्षात्मक विवेचना कीजिए।

(Critically examine the development and progress in teaching of Geography in India.)

अथवा, आधुनिक भारतीय भूगोल के विकास की संभावना, समस्याएँ एवं भविष्य की विवेचना करें।

(Discuss the possibilities, problems and future of development of modern Indian geography.)

उत्तर- आधुनिक भारत में भूगोल की शिक्षा का विकास पर्याप्त विलम्ब से हुआ है। यहाँ ब्रिटिश शासन द्वारा उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में स्कूल स्तर पर भूगोल का अध्यापन कार्य आरम्भ किया गया। तत्कालीन भारत में सन् 1920 में लाहौर में स्नातक स्तर पर भूगोल विषय की शिक्षा की व्यवस्था की गई थी। उसके बाद 1924 में अलीगढ़ तथा पटना विश्वविद्यालय में स्नातक स्तर पर भूगोल का शिक्षण प्रारम्भ हुआ।

      सन् 1936 में अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में स्नातकोतर स्तर पर भूगोल का पठन-पाठन प्रारम्भ हुआ। कलकत्ता विश्वविद्यालय में 1941, बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय में 1949 से स्नातकोत्तर स्तर पर भूगोल की शिक्षा दी जाती थी। आधुनिक भारत के भूगोल के विकास में एक महत्त्वपूर्ण कड़ी उस समय जुड़ी जब 1938 में ‘इण्डियन साइंस कांग्रेस’ (Indian Science Congress) के रजत जयन्ती अधिवेशन में भूगोल को एक अलग खण्ड के रूप में स्वीकार किया गया।

    भारत में 1950 से पूर्व स्नातकोत्तर स्तर तक शिक्षण शोध की सुविधाएँ अलीगढ़, मद्रास, कलकत्ता, बनारस, इलाहाबाद (प्रयागराज), हैदराबाद, लुधियाना तथा पटना विश्वविद्यालयों में उपलब्ध थीं। स्नातक स्तर पर आगरा, कलकत्ता, बम्बई (मुम्बई), मद्रास (चेन्नई), बड़ौदा, मैसूर, हैदराबाद, राँची, वाराणसी, इलाहाबाद, नागपुर, उदयपुर, जोधपुर, गुवाहाटी आदि स्थानों पर भूगोल की शिक्षा प्राप्त की जा सकती थी।

     1950 से पूर्व तक भारत में भूगोल की उच्च शिक्षा के विकास में धीमी गति के पीछे रहने के निम्न कारण थे-

(i) ब्रिटेन में भूगोल की उच्च शिक्षा देर से प्रारम्भ हुई। भारत में 1947 तक ब्रिटेन का अधिकार रहा है। इसलिए ब्रिटिश भारतीय शिक्षण संस्थानों में नियुक्त न हो सके।

(ii) भारत में भूगोल में उच्च शिक्षा हेतु भारतीय विद्वानों की कमी थी।

(iii) भूगोल शिक्षा के विकास हेतु प्रारम्भ में राष्ट्रीय नीति एवं पाठ्यक्रम का अभाव था।

     भारत में 1951 से 1960 के दशक में कर्नाटक (धारवाड़), पूना, उस्मानिया (हैदराबाद) राँची, बड़ौदा, सागर, गौहाटी, सिलीगुड़ी, भागलपुर, गोरखपुर, मैसूर और दिल्ली विश्वविद्यालयों में भूगोल के स्नातकोत्तर विभाग स्थापित हुए।

       1961-1970 की अवधि में दार्जिलिंग, बोधगया, जोधपुर, उदयपुर, रायपुर, ग्वालियर, जयपुर, कुरुक्षेत्र तथा जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, नई दिल्ली में भूगोल के स्नातकोत्तर विभाग खोले गए।

     1971 के बाद गढ़वाल, कुमायूँ (नैनीताल), जम्मू-काश्मीर (श्रीनगर), हिमाचल (शिमला), शिलाँग आदि में भूगोल के स्नातकोत्तर विभाग स्थापित हुए। भारत में महाविद्यालय स्तर पर भूगोल की शिक्षा का प्रबन्ध स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद तेजी से हुआ है। यहाँ सेन्ट जोन्स कालेज (आगरा), बलवन्त राजपूत कालेज (आगरा), डी० ए० वी कालेज (मुरादाबाद) में 1950 से पूर्व भूगोल की शिक्षा दी जाती थी।

      1951 से 1970 तक डी० एस० बिष्ट (नैनीताल), के० एन० राजकीय ज्ञानपुर, वार्ष्णेय अलीगढ़, धर्म समाज (अलीगढ़), वर्धमान (बिजनौर), किशेरी रमन (मथुरा), नागपुर महाविद्यालय (नागपुर), विदर्भ म० वि० अमरावती महाकौशल महाविद्यालय (जबलपुर), महारानी लक्ष्मीबाई कालेज (ग्वालियर), गर्वन्मेण्ट हमीदिया कालेज (भोपाल), पार्ले महाविद्यालय (बम्बई), मेरठ कालेज (मेरठ), एस०एस०वी० कॉलेज (हापुड़), डी० जे० (बड़ौत), डी० बी० एस० (देहरादून), डी० ए० वी०, (देहरादून), राजकीय रजा स्नातकोत्तर कालेज (रामपुर), टी० डी० एस० कालेज (जौनपुर), जे० वी० जैन (सहारनपुर), एम० एम० एच० (गाजियाबाद), माधव कालेज (उज्जैन), दयानन्द महाविद्यद्यालय अजमेर, इन्दौर तथा शोलापुर में स्नातकोत्तर विभाग स्थापित हो चुके थे।

    आरम्भ में भारत में भूगोल की शिक्षा उन विद्वानों द्वारा दी गई जो विदेशों से उच्च शिक्षा ग्रहण करके आते थे। आरम्भिक काल में भूगोल के कार्यों का सम्बन्ध भारतीय भौमिकीय सर्वेक्षण विभाग (Geological Survey of India-G.S.I), भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (Indian Meteorological Department) तथा भारतीय सर्वेक्षण विभाग (Survey of India) से था। एन० सुब्रमण्यम, आई० आर० खान, एस० पी० चटर्जी, एच० एल० छिब्वर, आर० एन० दुबे, मोहम्मद सफी, रामलोचन सिंह, पी० दयाल, जार्ज कुरियन, एस० सी० चटर्जी, एस० एम० अली, एन० के० बोस, सी० डी० देशपाण्डे जैसे भूगोलविदों ने भारत में आधुनिक भूगोल की शुरुआत की है।

    आई० आर० खान ने लंदन से, एस० पी० चटर्जी ने लंदन से, एच० एल० छिब्बर ने लंदन से, आर० एन० दुबे ने पेरिस से, जार्ज कुरियन ने लंदन से, एस० सी० चटर्जी ने लंदन से तथा एस० एम० अली ने लंदन से पी-एच०डी० या डी० लिट् की डिग्री प्राप्त की थी। इन भूगोलविदों ने भूगोल का अनुसंधान निर्देशन भारतीय विश्वविद्यालयों में बड़ी लगन से किया। इसका परिणाम यह हुआ कि भारतीय विश्वविद्यालयों में भूगोल के एम० ए० और पी-एच० डी० प्राप्त करने वाले विद्वान तैयार होने लगे जिन्होंने भूगोल को आगे बढ़ाने में सहयोग किया है।

      भारत में 1960 के दशक के उत्तरार्द्ध से ही शोध के विषयों, समस्याओं एवं चिन्तन पर अमेरिकन चिन्तन शैली का तेजी से प्रभाव बढ़ा है। भौगोलिक चिन्तन में नवीन तकनीक के प्रवेश के साथ नई पीढ़ी के स्नातकोत्तर एवं शोध में रत विद्यार्थियों में यहाँ के विशिष्ट परिवेश में उनका निरीक्षण कर व्याख्या प्रस्तुत करना और उनके समाधान के उपायों को बताने एवं समझाने की मनोवृत्ति का निरन्तर विकास हुआ है।

     भारत में अब नगरीय व ग्रामीण क्षेत्रों के विशिष्ट स्वरूपों एवं उनकी समस्याओं, भूमि के उपयोग व कृषि तकनीक के परिवर्तित स्वरूपों का विभिन्न स्तरीय व विभिन्न क्षेत्रों में प्रभाव संसाधन स्वरूप, प्रादेशिक नियोजन जैसे विषयों पर भौगोलिक शोध किए जा रहे हैं। 1975 से ही जनसंख्या समस्या और उसके समाधान की ओर भी ध्यान आकर्षित किया गया है।

    आधुनिक भारत में भूगोलवेत्ताओं के चिन्तन में कोई निजी दर्शन नहीं झलकता। काण्ट के भौगोलिक दर्शन के अनुसार यहाँ के भूगोल में काल एवं स्थान (Time and Space) के संदर्भ में परिघटनाओं का अध्ययन किया जाता है। भारत में 1980 के दशक के मध्य तक विगत दो दशकों में विभिन्न पक्षों पर शोध कार्य हुआ है। इसके विकास में अनेक सम्मेलनों, संगोष्ठियों, कार्यशालाओं तथा अधिवेशनों का योगदान है।

     1960-70 का दशक भारतीय भूगोल के इतिहास का महत्वपूर्ण दशक है। इस अवधि में 1968 में नई दिल्ली में अन्तराष्ट्रीय भूगोल संगठन (I.G.U.) की 21 वीं कांग्रेस प्रो० एस० पी० चटर्जी की अध्यक्षता में सम्पन्न हुई। इस दशक में लगभग 1000 शोध-पत्र प्रकाशित हुए, 30 शोध ग्रन्थ छपे और 6 शोध पत्रिकाओं का प्रकाशन प्रारम्भ हुआ। उत्तर भूगोल पत्रिका (गोरखपुर) तथा ‘भू-दर्शन’ (उदयपुर) का प्रकाशन इसी अवधि से प्रारम्भ हुआ है।

      इस दशक की अन्य उल्लेखनीय घटनाएँ निम्नांकित हैं-

(1) विश्वविद्यालय अनुदान द्वारा ग्रीष्मकालीन शिक्षण शिविर, संगोष्ठियाँ या कार्यशाला आयोजन हेतु अनुदान देना।

(2) अन्तराष्ट्रीय भूगोल कांग्रेस की देश में विभिन्न विश्वविद्यालयों में गोष्ठियों का आयोजन।

(3) यू० एन० ओ० तथा यूनेस्को द्वारा आयोजित संगोष्ठियाँ।

(4) योजना आयोग शुष्क क्षेत्र संस्थान (जोधपुर), नगर एवं ग्राम्य नियोजन संस्थान, आदि की स्थापना।

      भारत में भूगोल के विकास में संलग्न वैज्ञानिक संस्थान (Scientific Organisations Engaged in Development of Geography in India)

     भारत में विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों के अलावा कुछ वैज्ञानिक संस्थाएँ भी भूगोल के विकास में मदद करती हैं। ये संस्थाएँ हैं-

(1) राष्ट्रीय एटलस संस्थान, कलकत्ता।

(2) सर्वे आफ इण्डिया, देहरादून।

(3) भारतीय मौसम विज्ञान विभाग, पूना।

(4) केन्द्रीय शुष्क क्षेत्र अनुसंधान संस्थान, जोधपुर।

(5) भारतीय भू-वैज्ञानिक सर्वे संस्थान, कलकत्ता।

(6) भारतीय जनगणना विभाग, दिल्ली।

(7) भारत का योजना आयोग, नई दिल्ली।

(8) भारत का मानव वैज्ञानिक सर्वे संस्थान।

(9) भारतीय सांख्यिकीय संस्थान।

(10) भारत का तकनीकी आर्थिक सर्वे विभाग।

(11) भारतीय सामाजिक विज्ञान अनुसंधान परिषद् (ICSSR)।

(12) भारतीय सुदूर संवेदन अभिकरण (Indian Remote Sensing Agency)।

(13) विश्वविद्यालय अनुदान आयोग, नई दिल्ली (U.G.C)।

(14) भारतीय विज्ञान कांग्रेस (Indian Science Congress)।

   स्वतन्त्रता प्राप्ति के बाद भारत में ग्रेट ब्रिटेन के भूगोलवेत्ता एल० डी० स्टाम्प का प्रभाव रहा था। अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के मोहम्मद सफी ने उनके निर्देशन में भूमि उपयोग पर कार्य किया। उनका यह कार्य Land Utilization in Eastern Uttar Pradesh-1960′ में छपा था। बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय के प्रोफेसर रामलोचन सिंह ने नगरीय भूगोल एवं सागर विश्वविद्यालय में प्रो० सक्सेना ने ‘वैदिक भारत का भूगोल’ एवं बेचन दुबे ने ‘प्राचीन भारत’, एस० सी० बोस ने ‘दामोदर घाटी’ का अध्ययन किया। देश में 1980 तक 55 विश्वविद्यालयों में स्नातकोत्तर स्तर पर भूगोल के पठन-पाठन तथा अनुसंधान की सुविधा उपलब्ध हो चुकी थी।

    वर्तमान दशक में भूगोल में देहरादून स्थित भारतीय फोटो निर्वचन संस्थान (IPI), राष्ट्रीय सुदूर संवेदन अभिकरण, हैदराबाद (NRSA) तथा भारतीय एटलस संस्थान, कलकत्ता अति आधुनिक तरीकों से भूगोल के अध्ययन-अध्यापन में सहायता कर रहे हैं।

      1970-80 के दशक में भूगोलवेत्ताओं द्वारा जो कार्य किए गए उससे राष्ट्र निर्माण में पर्याप्त मदद मिली है। लेकिन भारतीय भूगोल की सबसे बड़ी कमी यह रही है कि यहाँ भूगोल के शोध की समस्याओं एवं क्षेत्रों के नियोजन से सम्बन्धित प्रशासकीय दृष्टिकोण से नहीं जोड़ा गया है। आधुनिक भारतीय भूगोलवेत्ता भूगोल का सैद्धान्तिक विकास करने में अक्षम रहे हैं। मो० मुनीस रजा (Moonis Raza) का कथन है कि “भारत का भूगोल वृहदाकार जीव की तरह है जिसकी रीढ़ की हड्डी नहीं है।” 

     भारत में राष्ट्रीय स्तर पर भूगोल का कोई विकसित संस्थान नहीं है और न भूगोल के विकास की कोई राष्ट्रीय नीति है। यहाँ भूगोलवेत्ताओं को नियोजन में वह स्थान नहीं दिया गया है जैसा कि विकसित देशों में दिया जाता है।

    भारतीय राष्ट्रीय भूगोल परिषद्, वाराणसी की स्थापना 1940 में प्रो० एच० एल० मि द्वारा की गई थी। 1955 के बाद से प्रो० रामलोचन सिंह के निर्देशन में भूगोल की प्रतिष्ठित पत्रिका National Geographical Journal का प्रकाशन होता रहा है। यहाँ 1966 में पहली बार All India Seminar on Applied Geography आयोजिन किया गया। इसके बाद विकासशील देशों के नगरीय भूगोल पर सम्मेलन 1968 में तथा राष्ट्रीय भूगोल परिषद् का जयन्ती समारोह 1971 में आयोजित किए गए। 1978 में IGU के अन्तर्गत ग्रामीण अधिकार पर विशेष संगोष्ठी आयोजित की गई थी। यहाँ मानसून एशिया के ग्रामीण अधिवासों पर 1971 में अन्तर्राष्ट्रीय संगोष्ठी भी सम्पन्न हुई।

   बम्बई भूगोल परिषद् भारत की ऐसी भूगोल परिषद् है जहाँ रॉयल ज्याग्राफिकल सोसायटी लंदन का कार्यालय था और जिसकी स्थापना 1832 में की गई। 1873 में इसे एशियाटिक सोसायटी, कलकत्ता से सम्बन्धित किया गया। 1963 से यह परिषद् नियमित रूप से चल रही है। भारतीय भूगोल परिषद्, मद्रास की स्थापना 1926 में की गई। यहाँ से Indian Geographical Journal पत्रिका प्रकाशित होती रही है।

     अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय की भूगोल सोसायटी की स्थापना 1946 में की गई। यहाँ अनेक एशियाई तथा अन्तर्राष्ट्रीय स्तर के भूगोल सम्मेलन आयोजित किए जा चुके हैं। यहाँ 1956 में पहला अन्तर्राष्ट्रीय सेमिनार आयोजित किया गया जिसमें खाद्य एवं जनसंख्या समस्या, शुष्क एवं अर्द्ध-शुष्क प्रदेशों की समस्याएँ, नगरीय सर्वेक्षण, जल विद्युत निकास आदि विषयों पर 65 शोध पत्र पढ़े गए। इस सोसायटी द्वारा 1965 एवं 1966 में विश्वविद्यालय अनुदान आयोग तथा भारत सरकार के विशेष आर्थिक सहयोग से नैनीताल में दो बार ग्रीष्मकालीन शिविरों का अयोजन किया गया। 1968 में मोहम्मद सफी ने यहाँ IGU की उत्तर भारत की एक बैठक बुलाई।

     भारत में भूगोल परिषदों का उत्साह अब समाप्त हो चुका है। यहाँ अधिकांश परिषद् विशेषीकरण (Specialisation) को प्रोत्साहन देकर भूगोल की नई प्रवृत्तियों का संवर्धन कर रही है। अल्पकाल में अनियमित होने वाली परिषदों की संख्या अधिक है। इसके पीछे संस्थापकों/संरक्षकों का देहावसान होना अथवा अवकाश ग्रहण के बाद प्रभावहीन हो जाना रहा है।

निष्कर्ष:-

   आधुनिक भारत में भूगोल की प्रगति एवं उसमें चिन्तन धारा को देखकर यह कहा जा सकता है कि भारत में भूगोल का अभी पूरी तरह से विकास नहीं हुआ है। इसका विकास थम-सा गया है। यहाँ भूगोल की शिक्षा के प्रति वह उत्साह नहीं दिखाई पड़ता है जो उत्साह स्वतंत्रता प्राप्ति के 20 वर्षों बाद तक रहा था। इसका मुख्य कारण यह है कि भारत में भूगोल को वह सरकारी स्थान नहीं मिल पाया है जो मिलना चाहिए था।

     अतः, भारतीय भूगोल के सम्बन्ध में यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि यद्यपि भारतीय भूगोलवेत्ता व्यक्तिगत रूप से भूगोल के क्षेत्र में वास्तविक योगदान दे हे हैं, फिर भी भूगोल की भारतीय विचारधारा का उभरना अभी शेष है।



Read More:-

4. Multidisciplinary Course or MDC-2 / Solved Questions Paper 2024

Multidisciplinary Course or MDC-2 For Science and Commerce

Climatology and Oceanography (Theory)

Solved Questions Paper 2024



(Patliputra University Patna)

Multidisciplinary Course or MDC

UG (Regular) (Sem.-II) Examination, 2024

(Session: 2023-27)

(MDC-2: Multidisciplinary Course)

GEOGRAPHY

(Climatology and Oceanography)

Time: Three Hours]

[Maximum Marks: 70

Note: Candidates are required to give their answers in their own words as far as practicable. The figure in the marginindicate full marks. Answer from all sections as directed.

परीक्षार्थी यथासम्भव अपने शब्दों में ही उत्तर दें। उपांत के अंक पूर्णांक के द्योतक हैं। निर्देशानुसार सभी खण्डों से उत्तर दीजिए।

Section-A / खण्ड-अ

(Multiple Choice Questions)

(बहुविकल्पीय प्रश्न)

Note: Choose the correct option from each question. [10×2=20]

प्रत्येक प्रश्न से सही विकल्प का चयन कीजिए।

1. (i) The uppermost layer of atmosphare is:

(a) Troposphere

(b) Stratosphere

(c) Ionosphere

(d) Exosphere

वायुमण्डल की सबसे ऊपरी परत है-:

(a) क्षोभमण्डल

(b) समतापमण्डल

(c) आयनमण्डल

(d) बाह्ममण्डल

उत्तर- (d) बाह्ममण्डल

(ii) Which one of the following gases constitute the major portion of the atmosphare.

(a). Oxygen

(b) Argon

(c) Nitrogen

(d) Carbon dioxide

निम्नलिखित में से कौन-सी गैस वायुमण्डल में सबसे अधिक मात्रा में मौजूद है?

(a) ऑक्सीजन

(b) आर्गन

(c) नाइट्रोजन

(d) कार्बन डाइऑक्साइड

उत्तर- (c) नाइट्रोजन

(iii) Ozone layer is found in which layer of atmosphare?

(a) Troposphere

(b) Stratosphere

(Ionosphere

(d) Exosphere

ओजोन परत, वायुमण्डल की किस परत में पायी जाती है?

(a) क्षोभमण्डल

(b) समतापमण्डल

(c) आयनमण्डल

(d) बाह्ममण्डल

उत्तर- (b) समतापमण्डल

(iv) Which gas from the following gases protect us from Sun’s harmful ultraviolet rays?

(a) Nitrogen

(b) Ozone

(c) Oxygen

(d) Carbon dioxide

निम्नलिखित में से कौन-सी गैस हमें सूर्य की पराबैंगनी विकिरण से बचाती है?

(a) नाइट्रोजन

(b) ओजोन

(c) ऑक्सीजन

(d) कार्बन डाइऑक्साइड

उत्तर- (b) ओजोन

(v) The monsoon rainfall in India in which type of rainfall?

(a) Convectional rainfall

(b) Orographic rainfall

(c) Cyclonic rainfall

(d) None of the above

भारत की मानसून वर्षा, इनमें से किस तरह की वर्षा है?

(a) संवहनीय वर्षा

(b) पर्वतीय वर्षा

(c) चक्रवातीय वर्षा

(d) उपरोक्त में से कोई नहीं

उत्तर- (b) पर्वतीय वर्षा

(vi) What happens when on move towards height from the surface on Earth?

(a) Air pressure increases

(b) Air pressure decreases

(c) Air pressure remain same

(d) None of the above

पृथ्वी पर धरातल से ऊँचाई की तरफ बढ़ने से क्या होता है?

(a) वायुदाब बढ़ता है

(b) वायुदाब घटता है

(c) वायुदाब सामान्य रहता है

(d) उपरोक्त में से कोई नहीं

उत्तर- (b) वायुदाब घटता है

(vii) An imaginary line joining places of equal air pressure at sea level is called:

(a) Isobar

(b) Isohyet

(c) Isohaline

(d) None of the above

सागर तल पर समान वायुदाब वाले स्थानों को दर्शाने वाली काल्पनिक रेखा को कहते हैः

(a) समदाब रेखा

(b) समवृष्टि रेखा

(c) समलवण रेखा

(d) उपरोक्त में से कोई नहीं

उत्तर- (a) समदाब रेखा

(viii) The part continent which submerged into water is called:

(a) Continental slope

(b) Continental shelf

(c) Deep sea plain

(d) Ocean deep

महाद्वीप का वह भाग जो महासागरीय जल में डूबा रहता है, कहलाता है

(a) महाद्वीपीय मग्नढ़ाल

(b) महाद्वीपीय मग्नतट

(c) गहरा सागरीय मैदान

(d) महासागरीय गर्त

उत्तर- (b) महाद्वीपीय मग्नतट

(ix) Average depth of Pacific Ocean is:

(a) 1280 meters

(b) 4000 meters

(c) 3920 meters

(d) 5000 meters

प्रशान्त महासागर की औसत गहराई हैः

(a) 1280 मीटर

(b) 4000 मीटर

(c) 3920 मीटर

(d) 5000 मीटर

उत्तर- (b) 4000 मीटर

(x) Highest saline sea in the world is:

(a) Salt lake

(b) Red Sea

(c) Dead Sea

(d) Sambher lake

विश्व में सबसे अधिक खारा सागर हैः

(a) साल्ट लेक

(b) लाल सागर

(c) मृत सागर

(d) सांभर झील

उत्तर- (c) मृत सागर

Section-B / खण्ड-ब

(Short Answer Type Questions)

(लघु उत्तरीय प्रश्न)

Note: Answer any four questions of the following. [4×5=20]

निम्नलिखित में से किन्हीं चार प्रश्नों के उत्तर दीजिए।

2. What is Troposphere? What is its importance?

क्षोभमण्डल क्या है? इसका क्या महत्व है?

3. Explain precipitation and its different types.

वर्षण एवं इसके विभिन्न प्रकारों को समझाइए।

4. Show different air pressure belts on Earth.

पृथ्वी पर वायुदाब की विभिन्न पेटियों को दर्शाइए।

5. Describe local winds around the world.

विश्व में पाये जाने वाले स्थानीय पवनों का वर्णन कीजिए।

6. What are the sources of salinity in ocean water?

महासागरीय जल में खारेपन के क्या स्रोत हैं?

7. Describe general characteristics of ocean bottom.

महासागरीय तल की सामान्य विशेषताओं का वर्णन कीजिए।

Section-C / खण्ड-स

(Long Answer Type Questions)

(दीर्घ उत्तरीय प्रश्न)

Note: Answer any three questions of the following. [3×10-30]

निम्नलिखित में से किन्हीं तीन प्रश्नों के उत्तर दीजिए।

8. Describe structure and characteristics of different layers of atmosphare.

वायुमण्डल की विभिन्न परतों की बनावट और विशेषताओं का वर्णन कीजिए।

9. Explain different types of rainfall.

वर्षा के विभिन्न प्रकारों की व्याख्या कीजिए।

10. What is Cyclone? Differentiate tropical and temperate cyclones.

चक्रवात किसे कहते हैं? उष्णकीटबन्धीय एवं समशीतोष्ण चक्रवातों में अंतर स्पष्ट कीजिए।

11. Describe bottom surface of either Pacific or Indian Ocean.

प्रशान्त महासाग अथवा हिन्द महासागर के धरातलीय स्वरूप का वर्णन कीजिए।

12. What do you understand by oceanic salinity? Describe its world distribution pattern.

महासागरीय लवणता से आप क्या समझते हैं? इसके विश्व वितण प्रतिरूप का वर्णन कीजिए।

2. Minor Course or MIC-2 (Climatology and Oceanography) / Questions Paper 2024, PPU Patna

Minor Course or MIC-2

Climatology and Oceanography (Theory)

Solved Questions Paper 2024



(Patliputra University Patna)

Minor Course or MIC

UG (Regular) (Sem.-II) Examination, 2024

(Session: 2023-27)

(MIC-2: MINOR COURSE)

GEOGRAPHY

(Climatology and Oceanography)

Time: Three Hours]

[Maximum Marks: 70

Note: Candidates are required to give their answers in their own words as far as practicable. The figure in the margin indicate full marks. Answer from all parts as directed.

परीक्षार्थी यथासम्भव अपने शब्दों में ही उत्तर दें। उपांत के अंक पूर्णांक के द्योतक हैं। निर्देशानुसार सभी भागों से उत्तर दीजिए।

Part-A / भाग-अ

(Objective Type Questions)

(वस्तुनिष्ठ प्रश्न)

Note: Choose the correct option from each question. [10×2=20]

प्रत्येक प्रश्न से सही विकल्प का चयन कीजिए।

1. (i) The main constituents of atmosphere are:

(a) Nitrogen and Oxygen

(b) Carbon dioxide and Nitrogen

(c) Carbon Monoxide and Carbon dioxide

(d) Ozone and Sulfur dioxide

वायुमंडल के प्रमुख घटक हैं:

(a) नाइट्रोजन और ऑक्सीजन

(b) कार्बन डाइऑक्साइड और नाइट्रोजन

(c) कार्बन मोनोक्साइड और कार्बन डाइऑक्साइड

(d) ओजोन और सल्फर डाइऑक्साइड

उत्तर- (a) नाइट्रोजन और ऑक्सीजन

(ii) The lies above the mesopause and is a region in which temperatures increase with height.

(a) Stratosphere

(b) Troposphere

(c) Thermosphere

(d) Exosphere

——मेसोपॉज के ऊपर स्थित होता है और यह एक ऐसा क्षेत्र है, जहाँ ऊँचाई के साथ तापमान बढ़ता जाता है।

(a) समतापमण्डल

(b) क्षोभमण्डल

(c) तापमण्डल

(d) बर्हिमण्डल

उत्तर- (c) तापमण्डल

(iii) Imaginary lines joining equal as isohyets is known

(a) Height

(b) Humidity

(c) Rainfall

(d) Pressure

समान—–को जोड़ने वाली काल्पनिक रेखाओं को समवर्षा रेखा कहा जाता है।

(a) ऊँचाई

(b) आर्द्रता

(c) वर्षा

(d) दाब

उत्तर- (c) वर्षा

(iv) Which of the following is an equatorial belt of low atmospheric pressure where the trade winds converge?

(a) Horse latitude

(b) Doldrums

(c) Roaring Forties

(d) Furious sixties

निम्नलिखित में से कौन एक कम वायुमंडलीय दबाव की भूमध्यरेखीय पेटी है, जहाँ व्यापारिक पवनें मिलती हैं?

(a) अश्व अक्षांश

(b) डोलड्रम्स

(c) गरजती चालीसा

(d) चीखता साठा

उत्तर- (b) डोलड्रम्स 

(v) The planetary winds that flows between the sub- tropical highs and equatorial low is known as:

(a) Trade winds

(b) Westerlies

(c) Polar Easterlies

(d) None of the above

ग्रहीय पवनें जो उपोष्ण कटिबन्धीय उच्च और भूमध्यरेखीय निम्न के बीच बहती हैं, को जाना जाता हैः

(a) व्यापारिक पवनें

(b) पछुआ पवनें

(c) ध्रुवीय पवनें

(d) उपरोक्त में से कोई नहीं

उत्तर- (a) व्यापारिक पवनें

(vi) Tropical storm in China Sea is known as:

(a) Wave

(b) Tornado

(c) Cyclone

(d) Typhoon

चीन सागर में उष्ण कटिबन्धीय तूफान को कहा जाता है:

(a) लहर

(b) टॉरनैडो

(c) चक्रवात

(d) टाइफून

उत्तर- (d) टाइफून

(vii) Which of the following connects the continental shelf and the ocean basins?

(a) Continental slope

(b) Deep sea plains

(c) Ocean deeps

(d) Submarine ridges

निम्नलिखित में से कौन महाद्वीपीय मग्नतट और महासागरीय बेसिन को जोड़ता है?

(a) महाद्वीपीय मग्न ढ़ाल

(b) अगाध सागरीय मैदान

(c) महासागरीय गर्त

(d) महासागरीय कटक (श्रेणी)

उत्तर- (a) महाद्वीपीय मग्न ढ़ाल

(viii) ‘Mariana Trench’ is located in the:

(a) Indian Ocean

(b) Arctic Ocean

(c) Atlantic Ocean

(d) Pacific Ocean

‘मेरियाना गर्त’ स्थित है:

(a) हिन्द महासागर में

(b) आर्कटिक महासागर में

(c) अटलांटिक महासागर में

(d) प्रशांत महासागर में

उत्तर- प्रशांत महासागर में

(ix) Major source of oceanic salinity is:

(a) Rivers

(b) Wind

(c) Land

(d) None of the above

महासागरीय लवणता का प्रमुख स्रोत हैः

(a) नदियाँ

(b) पवन

(c) भूमि

(d) उपरोक्त में से कोई नहीं

उत्तर- (a) नदियाँ

(x) Which of the following sea has highest salinity in the world?

(a) Red Sea

(b) Black Sea

(c) White Sea

(d) Dead Sea

निम्नलिखित में से किस सागर में विश्व में सबसे अधिक लवणता है?

(a) लाल सागर

(b) काला सागर

(c) श्वेत सागर

(d) मृत सागर

उत्तर- (d) मृत सागर

Part-B / भाग-ब

(Short Answer Type Questions)

(लघु उत्तरीय प्रश्न)

Note: Answer any four questions of the following. [4×5=20]

निम्नलिखित में से किन्हीं चार प्रश्नों के उत्तर दीजिए।

2. What is the composition of Earth’s atmosphere? What is the ratio of two most dominant gases in the atmosphere?

पृथ्वी के वायुमण्डल का संघटन क्या है? वायुमण्डल में सबसे प्रभावशाली गैसों का अनुपात क्या है?

3. Mention the different forms of precipitation.

वर्षण के विभिन्न प्रकारों के बारे में बताइए।

4. What are Local Winds? Write the name of any two local winds.

स्थानीय पवने क्या हैं? किन्हीं दो स्थानीय पवनों के नाम लिखिए।

5. What is the difference between Hurricane and Typhoon?

हरिफेन और टाइफून के मध्य क्या अंतर है?

6. What are the major types of Ocean relief features?

महासागरीय उच्चावच विशेषताओं के प्रमुख प्रकार क्या हैं?

7. What is the main cause of salinity of ocean water?

महासागरीय जल की लवणता का प्रमुख कारण क्या है?

Part-C / भाग-स

(Long Answer Type Questions)

(दीर्घ उत्तरीय प्रश्न)

Note: Answer any three questions of the following. [3×10-30]

निम्नलिखित में से किन्हीं तीन प्रश्नों के उत्तर दीजिए।

8. What is atmosphere? Explain the different layers of Earth’s atmosphere.

वायुमण्डल क्या है? पृथ्वी के वायुमण्डल की विभिन्न परतों को समझाइए।

9. What Precipitation means? What are the four types of precipitation?

वर्षण का क्या अर्थ है? वर्षण के चार प्रकार क्या हैं?

10. What is Cyclone? How is it originated? Describe its salient features in the context of tropical cyclone.

चक्रवात किसे कहते हैं? इसकी उत्पत्ति किस प्रकार होती है? उष्ण कटिबन्धीय चक्रवात के संदर्भ में इसकी मुख्य विशेषताओं का वर्णन कीजिए।

11. Give an account of principal local winds in the world.

विश्व में पायी जाने वाली सभी प्रमुख स्थानीय पवनों का विवरण दीजिए।
12. Discuss the factors which cause variation in salinity of oceans.

महासागरों की लवणता में अन्त उत्पन्न कने वाले कारकों की विवेचना कीजिए।

4. Information Technology (सूचना प्रौद्योगिकी)

Information Technology

(सूचना प्रौद्योगिकी)



Q. सूचना प्रौद्योगिकी से आप क्या समझते है? सूचना प्रौद्योगिकी के अर्थव्यवस्था एवं समाज पर पड़ने वाले प्रभाव की संक्षिप्त विवेचना करें।

Information Technology

    मानव संस्कृति के उद्‌विकास में तीन महत्त्वपूर्ण क्रांतियाँ हुई हैं:-

(1) नव पाषाणिक क्रांति (Neolithic Revolution)

(2) औद्योगिकी क्रांति (Industrial Revolution) और 

(3) सूचना प्रौद्योगिकी क्रांति (Information Techonology Revolution)।

      इन तीनों क्रांतियों ने मानव जीवन में त्वरित परिवर्तन लाने का कार्य किया। अगर 20वीं शताब्दी को औद्योगिकी क्रांति की सदी कही जाय तो 21वीं सदी को सूचना प्रौद्योगिकी क्रांति कहा जाएगा।

     मानव जिन युक्तियों के माध्यम से सूचनाओं को एक स्थान से दूसरे स्थान पर सम्प्रेषण करता है, उस युक्ति को सूचना प्रौद्योगिकी कहते हैं। सूचना प्रौद्योगिकी विकास के क्रम में निम्नलिखित तथ्यों पर गौर किया जाता है-

(1) सम्प्रेषण में समय कम-से-कम लग सके।

(2) सूचना को यथावत एक स्थान से दूसरे स्थान भेजा जा सके।

(3) ऐच्छिक मात्रा में सूचनाओं का सम्प्रेषण हो सके।

     कोई भी सूचना तीन रूपों में पायी जाती है जैसे- Digital, Graphics, शब्द एवं अक्षर के रूप में। इन सूचनाओं को सम्प्रेषित करने के लिए कई प्रकार के प्रौद्योगिकी का प्रयोग किया जाता है। जैसे- रेडियो, टीवी, पेजर, मोबाइल, फैक्स, कम्प्यूटर, इंटरनेट, टेलीफोन, ऑप्टीकल फाइबर इत्यादि। इन उपकरणों में प्रयुक्त तकनीक को पुनः दो भागों में वर्गीकृत किया जाता है-

प्रथम- हार्डवेयर तकनीक

द्वितीय- सॉफ्टवेयर तकनीक

      हार्डवेयर तकनीक के अन्तर्गत विभिन्न प्रकार के उपकरणों के निर्माण संयोजन का कार्य किया जाता है जबकि सॉफ्टवेयर तकनीक के अन्तर्गत सूचना प्रौद्योगिकी में प्रयुक्त होने वाले Programme का निर्माण होता है। अत: सूचना प्रौद्योगिकी विभिन्न प्रकार के हार्डवेयर और साफ्टवेयर के संयोजन से निर्मित आधुनिक उपकरण है।

भारत में सूचना प्रौद्योगिकी का विकास

     भारत में सूचना प्रौद्योगिकी का विकास एक नवीन घटना है। भारत में इस प्रौद्योगिकी का विकास भारत सरकार और निजी क्षेत्र के माध्यम से किया जा रहा है। 1992 ई० में केन्द्र सरकार द्वारा देश में दूर संचार सेवाओं की उपलब्धता सुनिश्चित करने हेतु दूर संचार क्षेत्र को उदारता नीति के तहत लाकर निजी क्षेत्र की अनुमति प्रदान की। 1993 ई० में दूर संचार तकनीक के विकास हेतु प्रति वर्ष 20.6 मिलियन रुपये निवेश करने का लक्ष्य रखा।

      1994 ई० में भारत के चार प्रमुख महानगर दिल्ली, मुम्बई और कोलकाता में मोबाइल सेवा उपलब्ध करने वाले कंपनी के लिए लाइसेंस जारी किये गये। सूचना प्रौद्योगिकी को बढ़ावा देने के लिए 1997 ई० में “भारतीय दूर संचार नियामक प्राधिकरण” (TRAI) की स्थापना की गई। मार्च 1999 ई० में पहली राष्ट्रीय दूरसंचार नीति की घोषणा की गई।

     वर्तमान समय में ट्राई और सूचना प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में कार्यरत कंपनियाँ Call Rate घटाने में तथा ज्यादा से ज्यादा ग्राहकों को अपनी ओर आकर्षित करने के लिए प्रयासरत है। वर्तमान समय में 99% भारतीय जनसंख्या के पास सूचनायें मोबाइल, TV तथा रेडियों के माध्यम से पहुँच रहा है। वर्तमान समय में 90 करोड़ से भी अधिक लोगों के पास मोबाइल की सुविधा उपलब्ध है। इस तरह कहा जा सकता है कि भारत में सूचना प्रौद्योगिकी के विकास की गति काफी तीव्र है।

भारतीय अर्थव्यवस्था तथा समाज पर IT का प्रभाव

   सूचना प्रौद्योगिकी (IT) ने भारतीय अर्थव्यवस्था और समाज में क्रांतिकारी परिवर्तन लाया है। इसने रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य, बैंकिंग और व्यापार के क्षेत्र में दक्षता और पारदर्शिता बढ़ाई है। IT उद्योग ने भारत को वैश्विक स्तर पर एक प्रमुख सेवा केंद्र बनाया है, जिससे विदेशी मुद्रा अर्जन और आर्थिक वृद्धि को बल मिला है।

    समाज में डिजिटल साक्षरता, ऑनलाइन शिक्षा, ई-गवर्नेंस और संचार के नए अवसर विकसित हुए हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में भी डिजिटल सेवाओं से जीवन स्तर में सुधार हुआ है। इस प्रकार IT भारत के सर्वांगीण विकास का प्रमुख आधार बन गया है, इसे निम्नलिखित बिंदुओं के अंतर्गत विस्तार से समझता जा सकता है- 

(i) समय तथा स्थान के बीच की दूरी घटी:-

       IT के कारण समय तथा स्थान के बीच भी दूरी घट चुकी है। इससे ऐच्छिक मात्रा में और पूर्ण शुद्धता के साथ सूचनाओं का सम्प्रेषण संभव हो गया है।

(ii) यातायात के साधनों में मदद:-

     IT के विस्तार एवं प्रसार से यातायात साधनों पर बढ़ते हुए दबाव को कम करने में मदद मिली है।

(iii) सूचनाओं का आसानी से ग्रहण:-

     कम्प्यूटर, E-mail, www के संकलन से इंटरनेट का विकास किया गया है। इंटरनेट अपना पैर पूरे दुनियाँ में फैलता जा रहा है। लोग विश्व की सभी प्रकर की सूचनाएं इन्टरनेट पर उपलब्ध करवा देते हैं जिसके कारण शिक्षा, वाणिज्य, विज्ञान, मनोरंजन इत्यादि से संबंधित सभी प्रकार की सूचनाएँ इंटरनेट पर मौजूद रहती है। इन्टरनेट Connection लिए हुए व्यक्ति कोई भी सूचना आसानी से ग्रहण कर सकता है।

    दूसरे शब्दों में, इंटरनेट ने पूरे दुनिया को Global village में बदल दिया है।

(iv) E-Commerce:-

    सूचना प्रौद्योगिकी के माध्यम से E. Commerce की शुरुआत की गई है। जिसके माध्यम से व्यापार, बीमा, वित्त से संबंधित कार्यों को आसानी से संपादित किया जाने लगा है।

(v) E-प्रशासन

      सूचना प्रौद्योगिकी का एक घटक E-प्रशासन है। इसके माध्यम से दूर दराज के गांवों को जिला मुख्यालय से और जिला मुख्यालय को राजधानी से जोड़‌कर प्रशासन का कार्य आसानी से किया जा सकता है।

(vi) इंटरनेट के माध्यम से विवाह, तलाक, कानूनी सहायता, आवेदन पत्रों का सम्प्रेषण, प्रतियोगिता परीक्षा, मनचाही जानकारी एवं परामर्श लेना संभव हो चूका है।

(vii) नये रोजगारों का सृजन

     सूचना प्रौद्योगिकी शिक्षित एवं अशिक्षित दोनों प्रकार के लोगों को रोजगार उपलब्ध करा रहा है। ये रोजगार IT पार्क, सोफ्टवेयर पार्क, Call Centre, साइबर कैफे, B.P.O., आउट सोर्सिंग इत्यादि के माध्यम से उपलब्ध हो रहे हैं।

(viii) रुढ़िवादी परंपराओं तथा अधविश्वासों से मुक्ति:-

    IT के माध्यम से भारतीय समाज अनेक प्रकार के परम्परागत अवधारणा एवं अंधविश्वासों से मुक्त हो रहा है।

(ix) IT के माध्यम से रेलवे एवं विमानन में आरक्षण, बैंकिग, बीमा एवं शेयर बाजार में त्वरित परिवर्तन लाया है। इस क्षेत्रों में IT के कारण गुणात्मक एवं मात्रात्मक परिवर्तन तो हुआ ही है। इसके अलावे इन क्षेत्रों में पारदर्शिता का भी आगमन हुआ है।

(x) कार्यालयों को मोटे-मोटे रजिस्टरों से मुक्ति:-

    आईटी के माध्यम से सरकारी एवं गैर सरकारी office मोटे-2 रजिस्टर एवं दस्तावेजों से मुक्त हो रहे हैं। आज एक लाइब्रेरी की संपूर्ण जानकारी को DVD के एक कैसेट में संग्रहित किया जा सकता है जिसके कारण आज विभिन्न प्रकर के सेवा का सार्वभौमीकरण संभव हो सका है।

(xi) आईटी के माध्यम से दूर-दराज के भूमि, कृषि, सिंचाई से संबंधित विविध  जानकारी को आसानी से पहुँचाया जा रहा है।

(xii) आईटी के माध्यम से नगरीय परिवहन व्यवस्था को नियंत्रित किया जा रहा है।

(xiii) आपदा प्रबंधन में प्रयोग:-

     सूचना प्रौद्योगिकी का प्रयोग आपदा प्रबंधन के दौरान बड़े पैमाने पर किया जा रहा है।

आईटी का प्रभाव

      इस तरह ऊपर के तथ्यों से स्पष्ट है कि सूचना प्रौद्योगिकी के कारण भारतीय अर्थव्यवस्था एवं समाज पर कई प्रकार के सकारात्मक प्रभाव पड़े हैं। वहीं दूसरी ओर कई नकारात्मक प्रभाव भी रेखांकित किया जा सकता है। जैसे- साइबर अपराध, पाइरेसी (Piracy- DVD, CD का नकल), पोरनोग्राफी (ब्लू फिल्म), सूचनाओं की चोरी, गोपनीय दस्तावेजों से छेड़छाड़, कंप्यूटर कचड़ा, सूचना प्रदूषण की समस्या इत्यादि समस्याएँ उत्पन्न हो रही है।

निष्कर्ष

   अतः स्पष्ट है कि सूचना प्रौद्योगिकी के कारण कई प्रकार के सकारात्मक तथा नकारात्मक प्रभाव दृष्टिगत होने लगे हैं। कुछ विद्वानों का तर्क है कि नारात्मक प्रभावों को देखते हुए सूचना प्रौद्योगिकी के विकास पर रोक लगा दी जाय। लेकिन मेरे विचार के अनुसार इस पर रोक नहीं लगयी जानी चाहिए बल्कि इससे उत्पन्न होने वाले नाकारात्मक प्रभावों से प्रभावी तरीके से निपटा जाना चाहिए और सूचना प्रौद्योगिकी के दिशा में सतत् विकास जारी खा जाना चाहिए।




उत्तर लिखने का दूसरा तरीका




परिचय

     सूचना प्रौद्योगिकी (IT) आधुनिक समाज की रीढ़ बन चुकी है। यह सूचना के उत्पादन, संग्रहण, संचार, प्रसंस्करण तथा प्रबंधन से संबंधित तकनीकों और उपकरणों का समुच्चय है। कंप्यूटर, इंटरनेट, संचार नेटवर्क, क्लाउड सेवाएँ, सॉफ्टवेयर एप्लिकेशन, डेटा एनालिटिक्स, साइबर सुरक्षा और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आज की IT संरचना के मूल घटक हैं। 21वीं सदी की अर्थव्यवस्था में आईटी न केवल नवाचार का केंद्र है बल्कि शिक्षा, स्वास्थ्य, शासन, उद्योग, व्यापार तथा सामाजिक जीवन को भी गतिशील बनाती है।

सूचना प्रौद्योगिकी का विकास (Evolution of IT)

      सूचना प्रौद्योगिकी का विकास मुख्यतः चार चरणों में देखा जाता है:

1. प्रारम्भिक युग (1940-1960)- वैक्यूम ट्यूब तथा ट्रांजिस्टर आधारित कंप्यूटर; सीमित गणनात्मक क्षमता।

2. मेनफ्रेम युग (1960-1980)- बड़े कंप्यूटर, व्यवसायिक डेटा प्रोसेसिंग में विस्तार।

3. पर्सनल कंप्यूटर युग (1980-2000)- माइक्रोप्रोसेसर का विकास; PC का सामान्य उपयोग; इंटरनेट क्रांति।

4. डिजिटल एवं क्लाउड युग (2000-वर्तमान)- स्मार्टफोन, क्लाउड कंप्यूटिंग, AI, IoT, बिग डेटा, साइबर सुरक्षा उन्नति।

     IT आज ubiquitous computing की ओर बढ़ रहा है जहाँ कम्प्यूटिंग क्षमता हर वस्तु, उपकरण और प्रक्रिया में समाहित हो रही है।

सूचना प्रौद्योगिकी के प्रमुख घटक (Core Components of IT)

(A) हार्डवेयर (Hardware)

⇒ कंप्यूटर, सर्वर, लैपटॉप

⇒ इनपुट डिवाइस: Keyboard, Mouse, Scanner

⇒ आउटपुट डिवाइस: Printer, Monitor, Plotter

⇒ Networking devices: Router, Switch, Hub, Modem

(B) सॉफ्टवेयर (Software)

⇒ System Software- Operating System (Windows, Linux), device drivers

⇒ Application Software- MS Office, ERP, MIS, DBMS

⇒ Utility Software- Antivirus, Backup tools

(C) डाटाबेस प्रबंधन (Database Management)

⇒ DBMS और RDBMS जैसे MySQL, Oracle, SQL Server

⇒ डेटा का संग्रहण, पुनर्प्राप्ति, सुरक्षा और प्रबंधन

(D) कंप्यूटर नेटवर्किंग (Networking)

⇒ LAN, MAN, WAN

⇒ Wired और Wireless technologies

⇒ Network topologies, IP addressing, DNS, VPN

(E) इंटरनेट एवं वेब टेक्नोलॉजी (Internet & Web Technology)

⇒ HTTP/HTTPS, Web servers, Browsers

⇒ Web 2.0, Web 3.0, APIs

(F) साइबर सुरक्षा (Cyber Security)

⇒ Encryption, Firewalls, Intrusion Detection Systems

Malware, phishing, ransomware से सुरक्षा

सूचना प्रौद्योगिकी के अनुप्रयोग (Applications of IT)

(A) शिक्षा क्षेत्र

⇒ स्मार्ट क्लास, ई-लर्निंग प्लेटफॉर्म (MOOCs)

⇒ ऑनलाइन परीक्षाएँ और डिजिटल मूल्यांकन

⇒ वर्चुअल लैब और शैक्षिक सॉफ्टवेयर

(B) स्वास्थ्य क्षेत्र

⇒ ई-हॉस्पिटल, टेली-मेडिसिन, ई-प्रिस्क्रिप्शन

⇒ रोगी डेटा प्रबंधन (EHRs)

⇒ मेडिकल इमेज प्रोसेसिंग

(C) व्यापार एवं उद्योग

⇒ ई-कॉमर्स, ऑनलाइन भुगतान

⇒ सप्लाई चेन मैनेजमेंट (SCM)

⇒ Enterprise Resource Planning (ERP)

(D) शासन (E-Governance)

⇒ आधार, डिजिटल इंडिया, UPI, e-Courts, DigiLocker

⇒ नागरिक सेवाओं में पारदर्शिता और त्वरित कार्य

(E) बैंकिंग एवं वित्त

⇒ कोर बैंकिंग, ऑनलाइन लेन-देन, मोबाइल बैंकिंग

⇒ FinTech, Blockchain आधारित समाधान

(F) मनोरंजन एवं मीडिया

⇒ OTT प्लेटफार्म (Netflix, Amazon Prime Video, Disney+ Hotstar, Sony LIV, ZEE5, JioCinema, MX Player), डिजिटल फिल्म निर्माण

⇒ सोशल मीडिया, डिजिटल मार्केटिंग

आधुनिक सूचना प्रौद्योगिकी के उभरते क्षेत्र (Emerging Trends in IT)

(1) क्लाउड कंप्यूटिंग (Cloud Computing)

⇒ IaaS, PaaS, SaaS मॉडल

⇒ ऑन-डिमांड संसाधन और लागत-प्रभावशीलता

(2) बिग डेटा (Big Data)

⇒ विशाल डाटा सेट का विश्लेषण

⇒ निर्णय निर्माण में उपयोग

⇒ Hadoop, Spark जैसी तकनीकें

(3) आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस एवं मशीन लर्निंग (AI & ML)

⇒ Predictive analytics, NLP, Chatbots

⇒ स्वचालन और स्मार्ट निर्णय

(4) इंटरनेट ऑफ थिंग्स (IoT)

⇒ स्मार्ट होम, स्मार्ट सिटी, स्मार्ट फार्मिंग

Sensor-based data processing

(5) साइबर सुरक्षा (Advanced Cyber Security)

⇒ Zero Trust architecture

Digital Forensics, Ethical Hacking

(6) ब्लॉकचेन (Blockchain)

⇒ Decentralized ledgers

⇒ Cryptocurrency, Smart contracts

सूचना प्रौद्योगिकी के लाभ (Advantages of IT)

(i) सूचना का त्वरित प्रसारण- Seconds में data access।

(ii)उत्पादकता में वृद्धि- Automation से efficiency बढ़ती है।

(iii) वैश्वीकरण में मदद- World-wide connectivity।

(iv) सस्ती सेवाएँ- ऑनलाइन सेवाओं से लागत कम होती है।

(v) सुविधा और पारदर्शिता- ई-गवर्नेन्स से नागरिकों को लाभ।

(vi) रोजगार के अवसर- IT sector में विशाल human resource demand।

सूचना प्रौद्योगिकी की चुनौतियाँ (Challenges of IT)

(i) साइबर अपराधों में वृद्धि- डेटा चोरी, हैकिंग, financial fraud।

(ii) गोपनीयता संकट- Personal data misuse का खतरा।

(iii) डिजिटल विभाजन- Rural-Urban gap, internet accessibility की कमी।

(iv) तकनीकी बेरोजगारी- ऑटोमेशन के कारण पारंपरिक नौकरियों में कमी।

(v) इन्फ्रास्ट्रक्चर की कमी- Developing nations में कमजोर IT आधार।

(vi) Dependence on technology- Data failure या cyber-attack होने पर बड़ी समस्या।

भारतीय संदर्भ में सूचना प्रौद्योगिकी (IT in India)

      भारत IT services के क्षेत्र में विश्व का अग्रणी देश है।

⇒ Bangalore – Silicon Valley of India

⇒ TCS, Infosys, Wipro जैसी कंपनियाँ global IT services प्रदान कर रही हैं।

⇒ Digital India Mission ने देश में डिजिटल पहुँच को व्यापक बनाया है।

⇒ UPI, Aadhaar, Rupay ने ICT-based governance को विश्व में एक मॉडल के रूप में स्थापित किया।

⇒ भारत विश्व के सबसे बड़े IT manpower exporters में से एक है।

     IT क्षेत्र का भारत की GDP में योगदान लगभग 7-8% है और यह रोजगार का प्रमुख स्रोत बन चुका है।

भविष्य की दिशा (Future of Information Technology)

     सूचना प्रौद्योगिकी का भविष्य AI-driven systems, data-centric governance, pervasive computing और cybersecurity excellence पर आधारित होगा।

⇒ Quantum Computing जटिल समस्याओं को सेकंडों में हल करेगा।

⇒ Metaverse नया डिजिटल अनुभव प्रस्तुत करेगा।

⇒ 5G/6G ultra-low latency networks को सक्षम करेगा।

     IT का उद्देश्य एक बुद्धिमान, सुरक्षित, समावेशी और स्वचालित समाज की ओर बढ़ना है।

निष्कर्ष (Conclusion)

     इस प्रकार कहा जा सकता कि सूचना प्रौद्योगिकी आज की दुनिया का परिवर्तनकारी तत्व है। यह अर्थव्यवस्था, समाज, शिक्षा, स्वास्थ्य तथा शासन सभी में दूरगामी प्रभाव डालती है। डिजिटल क्रांति ने नए अवसरों के साथ कई चुनौतियाँ भी प्रस्तुत की हैं, जिनके समाधान के लिए मजबूत नीतियों, साइबर सुरक्षा ढांचे और डिजिटल साक्षरता की आवश्यकता है। इसके बावजूद IT भविष्य की प्रगति, नवाचार और विकास का सबसे महत्वपूर्ण आधार बना रहेगा।

3. Special Economic Zone (विशेष आर्थिक क्षेत्र)

Special Economic Zone

(विशेष आर्थिक क्षेत्र)



परिभाषा

      विशेष आर्थिक क्षेत्र (Special Economic Zone) एक ऐसे भौगोलिक प्रदेश है जहाँ देश का सामान्य आर्थिक कानून पूरी तरह से लागू नहीं होती। दूसरे शब्दों में ‘SEZ’ शुल्क मुक्त आर्थिक क्षेत्र है जहाँ पर विदेशी निवेशकों को आकर्षित कर आर्थिक गतिविधियों को बढ़ावा दिया जाता है और उत्पादकों को निर्यात के लिए प्रोत्साहित किया जाता है।

ऐतिहासिक पक्ष

     रॉबर्ट सी हेवर्ड के अनुसार SEZ की अवधारणा काफी प्राचीन है। प्राचीनतम SEZ का प्रमाण यूनान के टायर नगर से मिलता है। 1960 ई० में चीन ने SEZ का निर्माण कर अपनी अर्थव्यवस्था को विकसित करने के प्रयास किया। जबकि भारत ने अप्रैल 2000 ई० में पहले SEZ नीति की घोषणा की।

प्रकार/वर्गीकरण

      SEZ कई प्रकार के हो सकते हैं। जैसे- मुक्त व्यापार क्षेत्र (Free Trade Zone) निर्यात संवर्धन क्षेत्र (Export Prossising Zone), मुक्त क्षेत्र (Free Zone), औद्योगिक क्षेत्र (Industrial Estate), मुक्त बंदरगाह, नगरीय उद्यम क्षेत्र इत्यादि।

उद्देश्य

     SEZ की स्थापना के पीछे कई उद्देश्य है।

(1) उद्योगों के विकास हेतु विदेशी एवं घरेलू निवेशकों को उपयुक्त वातावरण उपलब्ध कराना।

(2) निर्यात को बढ़ावा देना।

(3) अधिक से अधिक रोजगार उत्पन्न करना।

(4) पिछड़े हुए क्षेत्रों को विकसित करना।

(5) सामाजिक-आर्थिक विषमता को कम करना।

(6) औद्योगीकरण तथा नगरीकरण को बढ़ावा देना।

स्वरूप एवं विशेषता

      किसी भी एक आदर्श SEZ के अंतर्गत एक हजार हेक्टेयर भूमि पर स्थापित किया जा सकता है और उसमें कम से कम 10 हजार करोड़ रूपये का निवेश होना चाहिए। पुनः उसकी निम्नलिखित विशेषताएँ होनी चाहिए:-

(1) SEZ के अंतर्गत कार्य करने वाले इकाइ‌यों के द्वारा वस्तु तथा सेवाओं का मुक्त संचलन होना चाहिए।

(2) विश्व स्तर की आधारभूत संरचना का विकास किया जाना चाहिए।

(3) निर्माण या उत्पादन का कार्य गहन तरीके से होना चाहिए।

(4) निर्यात अभिमुख होना चाहिए।

(5) उन्नत तकनीक होना चाहिए।

(6) उचित प्रबंधन तथा उच्च तकनीक का उपयोग होना चाहिए।

वर्तमान स्थिति एवं महत्त्व

     वर्तमान में 379 SEZs अधिसूचित हैं, जिनमें से 265 चालू हैं। लगभग 64% SEZ पाँच राज्यों- तमिलनाडु, तेलंगाना, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और महाराष्ट्र में स्थित हैं। इससे एक लाख से अधिक लोगों को रोजगार मिल रहा है। SEZ पर बाबा कल्याणी समिति की सिफारिशों के अनुसार, SEZ में MSME योजनाओं को जोड़कर तथा वैकल्पिक क्षेत्रों को क्षेत्र-विशिष्ट SEZ में निवेश करने की अनुमति देकर MSME निवेश को बढ़ावा देना है।

      इसके अतिरिक्त सक्षम और प्रक्रियात्मक छूट के साथ-साथ SEZ को अवसंरचनात्मक स्थिति प्रदान करने हेतु वित्त तक उनकी पहुँच में सुधार करके तथा  दीर्घकालिक ऋण को सक्षम करने के लिये भी अग्रगामी कदम उठाए गए। कुछ SEZ के उदाहरण निम्नलिखित है:-

(1) काण्डला तथा सूरत- गुजरात

(2) कोचीन- केरल

(3) सांताक्रुज- मुम्बई

(4) फाल्टा- पश्चिम बंगाल

(5) चेन्नई- तमिलनाडु

(6) विशाखापतनम- आन्ध्र प्रदेश

(7) नोएडा- उत्तर प्रदेश

(8) इंदौर- मध्य प्रदेश

(9) राजीव गाँधी इंटेफोर्ट पार्क- हिंजेवादी, पूना।

(10) जयपुर- राजस्थान

(11) सिंगुर (टाटा मोटर्स कंपनी)- पश्चिम बंगाल 

नोट: टाटा मोटर्स कंपनी 2008 में सिंगूर परियोजना को छोड़ने के बाद कंपनी ने अपनी विनिर्माण इकाई को साणंद, गुजरात में स्थानांतरित कर दिया।

Special Economic Zone

टाटा मोटर्स कंपनी साणंद, गुजरात

(12) नन्दीग्राम (सलीम अली ग्रुप केमिकल फैक्ट्री)- पश्चिम बंगाल

आलोचना

    भारत की SEZ नीति का काफी विरोध किया जा रहा है क्योंकि किसानों का आरोप है कि सरकार किसानों से जबरन कृषि योग्य भूमि छीन रही है और भूमि का सही मुआवजा नहीं दे रही है। नंदीग्राम तथा सिंगुर विवाद इसके उदाहरण है। पुनः विद्वानों का कहना है कि SEZ देश के अन्दर एक औपनिवेशिक क्षेत्र के रूप में सक्रिय होगा जो धीरे-2 देश की आर्थिक संप्रभुता पर प्रहार करेगी।

निष्कर्ष

       किसानों के द्वारा लगाया गया आरोप काफी गंभीर है। अतः सरकार को चाहिए कि किसानों की शिकायत सुनकर न केवल उनके समस्याओं का समाधान करे बल्कि SEZ की स्थापना वैसे बंजर भूमि एवं पत्थरीली भूमि पर किया जाय जिसका प्रयोग आज नहीं किया जा रहा है।

      पुनः SEZ के अन्तर्गत निवेश करने वाली कंपनियों को पर्यावरण को क्षति नहीं पहुंचाने वाले तकनीकी प्रयोग को प्रोत्साहित किया जाय। पुनः स्थानीय लोगों को तरजीह दी जाय।

     उपरोक्त सुझावों प अमल करने के बाद ही SEZ आर्थिक विकास के दूत बन सकेंगे।

2. Cotton Textile Industry (सूती वस्त्र उद्योग)

Cotton Textile Industry

(सूती वस्त्र उद्योग)



प्रश्न प्रारूप

Q1. सूती वस्त्र उद्योग की समस्या की चर्चा करे।

Q2. भारत में सूती वस्त्र उद्योग के स्थानीयकरण तथा वर्तमान गतिविधियों की चर्चा करे।

Q3. भारत में सूती वस्त्र के स्थानीयकरण हेतु कारकों का विश्लेषण कीजिए तथा इस उद्योग में अभिनव प्रवृतियों को बताएँ।

Q4. सूती वस्त्र उद्योग के स्थानीयकरण हेतु कारकों की विवेचना कीजिए तथा इसके वितरण प्रतिरूप का विश्लेषण कीजिए।

उत्तर- सूती वस्त्र उद्योग भारत का सबसे पुराना उद्योग है। यह भारत का सबसे बड़ा उद्योग है। यह भारत का सबसे बड़ा रुग्ण उद्योग भी है। भारत में सर्वाधिक कर्मचारी इसी उद्योग में संलग्न है। भारत कभी विश्व का सबसे बड़ा सूती वस्त्र उत्पादक देश हुआ करता था। लेकिन, इंगलैण्ड में हुए औद्योगिक क्रांति के कारण भारतीय सूती वस्त्र उद्योग को प्रायोजित तरीके से पीछे कर दिया गया।

विकास / वृद्धि

    सूती वस्त्र उद्योग यद्यपि भारत का सबसे प्राचीन उद्योग है। फिर इसका आधुनिक कारखाना 1818 ई० में कलकता के ‘फोर्ट ग्लोस्टर’ नामक स्थान पर लगाया गया था। लेकिन कच्चे माल के अभाव में असफल रहा। पुनः सफल सूती वस्त्र का कारखाना 1850 ई० में कलकत्ता में स्थापित किया गया। इस सफल प्रयास के बाद इस उद्योग का विकास सतत् जारी है। 

      1905 ई० तक भारत में 206 सूती वस्त्र के मील स्थापित हो चुके थे। 1958 ई० तक भारत में मीलों की संख्या 1767 पहुंच गयी थी। वर्तमान समय में इसकी संख्या बढ़कर 2000 से भी अधिक हो चुकी है।

स्थानीयकरण

      बेवर ने अपने न्यूनतम परिवहन लागत सिद्धांत में बताया कि सूती वस्त्र उद्योग शुद्ध कच्चा माल पर आधारित एक ऐसा उद्योग है जिसमें हम जितना कच्चा माल लगाते है उतने ही मात्रा में शुद्ध उत्पाद प्राप्त करते है। ऐसे उद्योगों को समभार उद्योग कहा जा सकता है। इस प्रकार के उद्योगों का स्थानीकरण कच्चे माल वाले क्षेत्रों में, बाजार में या दोनों स्थानों पर हो सकता है। जैसे- मुम्बई के आसपास इस उद्योग का विकास बड़े पैमाने पर हुआ है क्योंकि महाराष्ट्र के काली मिट्टी की भूमि पर बड़े पैमाने पर कपास की खेती होती है।

      पुनः इस उद्योग का स्थानीयकरण कोलकाता के आस-पास हुआ है जबकि पूरे पश्चिम बंगाल में कपास की खेती कहीं नहीं की जाती है। अतः कलकत्ता के आस-पास सूती वस्त्र उद्योग विकास बाजार के कारण हुआ है।

विकास के विभिन्न चरण या नवीन प्रवृति या वितरण

    भारत उष्ण एवं उपोष्ण जलवायु वाला देश है। इसलिए सम्पूर्ण भारत में सदैव सूती वस्त्र की माँग होती रही है। प्रारंभ में इसके विकास में केन्द्रीयकरण की प्रवृति थी। कालान्तर में यह विकेन्द्रीकृत उद्योग बना। केन्द्रीयकरण से विकेन्द्रीकृत उद्योग बनने में काफी लम्बा समय लगा है। इस समय को चार चरण में बाँटकर अध्ययन किया जा सकता है:-

प्रथम चरण:-

  भारत में सूती वस्त्र उद्योग का प्रथम चरण 1854–1900 ई. तक माना जाता है। प्रथम चरण में सूती वस्त्र उद्योग का विकास केवल मुम्बई महानगर में हुआ। यहाँ पर इस उद्योग के स्थानीयकरण के चार कारक महत्त्वपूर्ण थे। जैसे-

(1) मुम्बई भारत का सबसे बड़ा बंदरगाह रहा है।

  • कपास निर्यात करने के लिए यहाँ लाये जाते थे।
  • कपास के व्यापारी मुम्बई में ही रहा करते थे। उनके पास पूँजी और तकनीक पहले से मौजूद थी।
  • पुनः मुम्बई की आर्द्र जलवालु सूती वस्त्र उद्योग के लिए उपयुक्त वातावरण उपलब्ध कराती थी।

     यही कारण था कि मुम्बई द्वीप पर सूटी वस्त्र उद्योग का प्रथम विकास हुआ।

(2) चीन में विकसित हो रहे सूती वस्त्र उद्योग में धागा आपूर्ति करने का कार्य ब्रिटिश कंपनियाँ किया करती थी। जब ब्रिटिश कंपनियाँ चीन को पर्याप्त मात्रा में धागा आपूर्ति करने में असफल होने लगी तो उन्होंने भारतीय व्यापारियों के इस क्षेत्र में पूंजी निवेश के लिए प्रोत्साहित किया।

(3) मुम्बई महानगर में वाणिज्यिक ऊर्जा की कमी थी लेकिन द० अफ्रीका से आयातित कोयला पर मुम्बई के पास तापीय विद्युत केन्द्र की स्थापना की गई तो सुचारू रूप से विद्युत की आपूर्ति होने लगी।

(4) सस्ते श्रमिक और आन्तरिक बाजार की उपलब्धता भी यहाँ पर इस उद्योग के विकास में सहायक रहा।

    ऊपर वर्णित कारकों के कारण 19वीं सदी के अन्त तक मुम्बई द्वीप पर करीब 40 कारखाने विकसित हो चुके थे। इसे “भारत का मैनचेस्टर” या “कपास की महानगरी” भी कहा जाने लगा। स्वेज नहर के पूरब में सूती वस्त्र उत्पादन करने वाला यह सबसे बड़ा केन्द्र बन गया।

दूसरा चरण:-

      1900-23 ईo के मध्य लगे सूती वस्त्र उद्योग को इस चरण में शामिल करते हैं। इस चरण में उद्योगों का विकास मुम्बई के बाहरी क्षेत्रों में हुआ क्योंकि मुम्बई महानगर में लगातार जमीन का मूल्य बढ़ता जा रहा था। श्रमिक संगठनों का विकास बड़े पैमाने पर हो चुका था। मलीन बस्तियाँ विकसित होने लगी थी। अतः निवेशकों ने मुम्बई के बाहरी क्षेत्रों में पूँजी निवेश का कार्य प्रारंभ किया। इस चरण में स्थानीयकरण की दो प्रवृति थी- प्रथम मुम्बई के ही बाहरी क्षेत्रों में सूती वस्त्र के कारखाने लगाये गये।

     पुनः सूती वस्त्र कारखाना लगाने हेतु मुम्बई के आप-पास के नगरों का चयन किया जहाँ मुम्बई के समान सभी परिस्थितियाँ अनुकूल थी। जैसे- इस चरण में कल्याण, थाणे, पुणे, नासिक, सूरत, बड़ोदरा तथा अहमदाबाद जैसे नगरों में सूती वस्त्र उद्योग का तेजी से विकास हुआ क्योंकि ये सभी केन्द्र अरब सागर के निकट थे जिसके कारण नम जलवायु उपलब्ध थी। बड़ौदरा, सूरत बंदरगाह थे। “टाटा हाइड्रल प्रोजेक्ट” के द्वारा विद्युत की आपूर्ति सुनिश्चित हो चुकी थी। मुम्बई के ही समान सस्ते श्रमिक तथा बाजार उपलब्ध थे।

तीसार चरण:-

     1923 से 1947 ई० के बीच लगे उद्योगों को इस चरण में शामिल करते हैं। इस चरण में सूती वस्त्र उद्योग का विकास दक्कन के लावा के पठारी क्षेत्र तथा मध्यवर्ती पठार पर हुआ। दक्कन के पठार पर पोरबन्दर, राजकोट, सुरेन्द्रनगर (सूरत), भूसावल, अहमदनगर, नागपुर, कोल्हापुर, सोलापुर, गुलवर्गा प्रमुख केन्द्र के रूप में थे। इन केन्द्रों में इस उद्योग का विकास कपास की खेती, सस्ते श्रमिक तथा बाजार की उपलब्धता के कारण हुआ।

      भारत के उ० मध्यवर्ती पठारी क्षेत्र में इस उद्योग का विकास इंदौर, ग्वालियर, जबलपुर, भोपाल, इटारसी, भिलवाड़ा, अजमेर, जयपुर, जोधपुर तथा बीकानेर में हुआ। इन क्षेत्रों में सूती वस्त्र उद्योग का विकास कई कारणों के चलते हुआ। जैसे-

(1) इन क्षेत्रों में कई बड़े देशी रियासत रहा करते थे। इन रियासतों ने इस उद्योग में रुचि लिया। ब्रिटिश कंपनियों ने भी देशी रजबाड़ों को इस क्षेत्र में आमंत्रित किया। देशी रजबाड़ों ने ब्रिटिश कंपनियों को भूमि दिया तो दूसरी ओर ब्रिटिश कंपनियों ने बड़े पैमाने पर पूंजी तथा तकनीक का निवेश किया। इसके अलावे मैदानी भारत का बाजार, सस्ते श्रमिक उपलब्धता और कपास की खेती ने भी इस उद्योग को आकर्षित किया।

     इसी चरण में कानपुर, आगरा, दिल्ली, हैदराबाद, बंगलोर, विशाखापतन तथा कलकता भी सूती वस्त्र केन्द्र के रूप में उभरे क्योंकि यहाँ की सभी भौगोलिक परिस्थितियाँ अनुकूल थी तथा सस्ते श्रमिक और बाजार उपलब्ध थे।

   आजादी के बाद भारत में सूती वस्त्र उद्योग

चौथा चरण:-

     आजादी के बाद विकसित हुए सूती वस्त्र उद्योगों को इसमें शामिल करते हैं। इस चरण में सूती वस्त्र उद्योग का विकास चार क्षेत्रों में हुआ-

(i) उ०-प० भारत-

   इसमें पंजाब तथा हरियाणा को शामिल करते हैं। सिंचाई की सुविधा उपलब्ध होने के कारण इन क्षेत्रों में कपास की खेती प्रारंभ की गई। कपास की स्थानीय उपलब्धता के करण जालंधर, लुधियाना, अम्बाला, चंडीगढ़ अमृतसर तथा गंगानगर जिला सूती वस्त्र उद्योग केन्द्र के रूप में उभरे।

(ii) UP तथा बिहार-

   यहाँ पर सस्ते श्रमिक तथा बाजार की उपलब्धता के कारण इस उद्योग का विकास हुआ। UP में मेरठ, गाजियाबाद, सहारनपुर, मोदीनगर, मुरादाबाद, वाराणसी, मिर्जापुर जैसे नगर में और बिहार में गया, डुमराँव, भागलपुर, मुजफ्फरपुर, पटना इत्यादि में विकसित हुआ। इस क्षेत्रों में सस्ते श्रमिक तथा बाजार उपलब्ध होने के कारण इस उद्योग कर विकास हुआ था।

(iii) पूर्वी भारत-

   बाजार की सुविधा, सस्ते श्रमिक, आयात-निर्यात की सुविधा तथा हुगली औद्योगिक प्रदेश में विकसित संरचनात्मक सुविधाओं के कारण इस उद्योग का यहाँ विकास हुआ। यहाँ इस उद्योग के मुख्य केन्द्र कोलकाता, हावड़ा, मानिकपुर, नैहाटी, चन्दन नगर, सियारामपुर, दीमापुर, इम्फाल, गुवाहाटी तथा कटक थे।

(iv) द० भारत-

    यहाँ सस्ते जल विद्युत की अपलब्धता तथा कपास की खेती किए जाने के कारण इस उद्योग का विकास हुआ। विजयवाड़ा,  बेलगाँव मैसूर, काँचीपुरम्, मदुरई, तिरुचिरापल्ली, पाण्डिचेरी तथा तिरुअनन्तपुरम जैसे नगरों में इस उद्योग का विकास हुआ। कोयम्बटूर को “दक्षिण भारत का मैनचेस्टर” भी कहा जाने लगा। भारत में सर्वाधिक सूती वस्त्र का मील तमिलनाडु राज्य में ही स्थित है।

   उपरोक्त तथ्यों से स्पष्ट है कि भारत में सूती वस्त्र उद्योग का अभूतपूर्व विकेन्द्रीकरण हुआ है। भारत के प्रमुख सूती वस्त्र केन्द्रों को नीचे मानचित्र में देखा जा सकता है।

Cotton Textile Industry

चित्र: भारत के प्रमुख सूत्री वस्त्र उद्योग केंद्र

   भारत में सूती वस्त्र का उत्पादन तीन क्षेत्रों में किया जाता है:-

(1) मील 

(2) पावरलूम (छोटे-छोटे मशीन से)

(3) हथकरघा / चरखा

   इन तीनों क्षेत्रों में होने वाला उत्पादन को नीचे के तालिका में देखा जा सकता है:-

Sector Approx Share (Indicative) Role
Powerloom Majority (सबसे बड़ा) कपड़े का बड़ा उत्पादन भाग Powerloom से आता है
Handloom छोटा हिस्सा पारंपरिक हस्तकल्याणित बुनाई
Mill औद्योगिक उत्पादन बड़े पैमाने पर घेराबंदी
Others न्यून खास/विशिष्ट वस्त्र

           नीचे के तालिका में सूत उत्पादन को प्रदर्शित किया जा रहा है:-     

वर्ष सूत का उत्पादन हजार टन में
1950-51  835
1960-61 1075
1970-71 1050
1980-81 1400
1990-91 1430
2000-01 1600
2010-11 4500
2020–21
5200

विश्लेषण 

  • 1950–51 से 1970–71 तक सूत उत्पादन में धीमी वृद्धि देखी जाती है।

  • 1980–81 के बाद आधुनिकीकरण, पावरलूम और मिल सेक्टर के विस्तार से उत्पादन तेज़ी से बढ़ा।

  • 2000–01 के बाद तकनीकी प्रगति, निर्यात वृद्धि और निजी निवेश के कारण उत्पादन में तीव्र वृद्धि हुई।

  • 2010–11 से 2020–21 के बीच भारत विश्व के प्रमुख सूत उत्पादक देशों में शामिल हो गया।

भारत में सूती वस्त्र उत्पादन करने वाले 5 प्रमुख राज्य

1. महाराष्ट्र 

  • सर्वाधिक सूती वस्त्र उत्पादन
  • प्रमुख केंद्र: मुंबई, नागपुर, शोलापुर, पुणे

2. गुजरात 

  • दूसरा स्थान
  • प्रमुख केंद्र: अहमदाबाद, सूरत, वडोदरा

3. तमिलनाडु 

  • दक्षिण भारत में सबसे प्रमुख
  • प्रमुख केंद्र: कोयंबटूर, मदुरै, तिरुपुर

4. पश्चिम बंगाल

  • हावड़ा, हुगली क्षेत्र प्रमुख
  • जूट के साथ-साथ सूती वस्त्र उद्योग भी विकसित

5. मध्य प्रदेश

  • इंदौर, उज्जैन क्षेत्र
  • कपास उत्पादन के कारण सूती वस्त्र उद्योग को बढ़ावा

समस्या तथा संभावना

    सूती वस्त्र उद्योग कई समस्याओं का सामना कर रही है। जैसे-

(1) कच्चे माल की समस्या-

    भारत में बढ़ती हुई जनसंख्या के कारण वस्त्र की माँग लगातार बढ़‌ती ही जा रही है। बढ़ती हुई मांग को देश पूरा नहीं कर पा रहा है जिसके कारण कपास का मूल्य लगागर बढ़‌ता ही जा रहा है। फलतः भारत को अन्य देशों से कपास आयात करना पड़ता है।

    भारत के पास कपास उत्पादन हेतु विस्तृत काली मिट्टी का क्षेत्र उपलब्ध है। अतः सिंचाई सुविधाओं का विकास कर कपास का उत्पादन बढ़ाया जा सकता है। उत्पादन को बढ़ाकर आयात पर से निर्भरता कम की जा सकती है।

(2) पुराने मशीन-

    भारत में अधिकांश वस्त्र का उत्पादन पूराने मशीनों से किया जाता है। जबकि USA, चीन, मिस्र, जैसे आधुनिक तकनीक का प्रयोग कर सूती का उत्पादन करते हैं जिसके कारण भारतीय सूती वस्त्र उद्योग अन्तर्राष्ट्रीय प्रतिस्पर्धा में पिछड़‌ता जा रहा है। लेकिन, नई औद्योगिक नीति की घोषणा से यह उम्मीद जगी है कि भारत में नवीन विदेशी तकनीक आगमन होगा।

(3) अनियमित विद्युत की आपूर्ति-

     देश में लगातार ऊर्जा की मांग बढ़ती जा रही है। माँग के अनुरूप विद्युत की आपूर्ति न होने के कारण कोई भी कारखाना निर्बाध्य रूप से नहीं चल पाता है। लेकिन, आने वाले समय में परमाणु ऊर्जा, जल विद्युत ऊर्जा इत्यादि के विकास से इस समस्या से निजात मिल सकेगा।

(4) हड़ताल तथा तालाबंदी-

    सूती वस्त्र उद्योग से जुड़े हुए श्रमिक संगठन काफी मजबूत है। ये संगठन अपने मांगों को लेकर हड़ताल करते हैं। अगर उनकी मांग पूरी नहीं हुई तो कंपनी में ताला लटका देते हैं, जिसके कारण उत्पादन में कमी आती है।

     हालांकि न्यापालिका के हस्तक्षेप से और सरकार के बीच-बचाव से इस समस्या में लगातार कमी आ रही है।

(5) कृत्रिम रेशे के साथ प्रतिस्पर्द्धा-

       देश की गरीब जनता कृत्रिम रेसे से बने वस्त्र का उपयोग करते हैं जो अधिक टिकाऊ, सस्ता तथा आकर्षक होता है जबकि सूती वस्त्र कम टिकाऊ तथा महंगा होता है।

(6) घाटे में चल रही मील-

    भारत में सबसे ज्यादा सूती वस्त्र मील तमिलनाडु में है। लेकिन, तमिलनाडू भारत का मात्र 6.4% ही सूती वस्त्र का उत्पादन करता है। उत्तर भारत में खाद्यान्न फसल की खेती कपास उपजाने वाले भूमि पर की जाने लगी, जिसके कार‌ण कच्चे माल की कमी हो गई। फलतः अधिकांश उत्तर भारत के सूती वस्त्र उद्योग बन्द हो गए। पुनः अधिक आयात शुल्क होने के कारण उसका आयात भी संभव नहीं था। लेकिन नवीन औद्योगिक नीति के कारण इसमें सुधार आने की संभावना है।

निष्कर्ष:

       ऊपर के तथ्यों से स्पष्ट है कि भारत के सूती वस्त्र उद्योग कई समस्याओं का सामना कर रही है। फिर भी, यह भारत का सबसे बड़ा उद्योग है, इस उद्योग में सबसे अधिक लोगों को रोजगार मिला हुआ है।

      यह भारत का पूर्ण रूप से विकेन्द्रित उद्योग है। भारत के पास देशी एवं विदेशी बाजार उपलब्ध है। अतः कहा जा सकता है कि भारत में सूती वस्त्र उद्योग का भविष्य काफी उज्ज्वल है।

1. Iron and Steel Industry (लौह-इस्पात उद्योग)

Iron and Steel Industry

(लौह-इस्पात उद्योग)



Q. भारत में लौह इस्पात उद्योग के विकास, स्थानीयकरण, समस्या एवं संभावना की चर्चा विस्तार से करें।

उत्तर- किसी भी राष्ट्र की लौह इस्पात उद्योग आधुनिक अर्थव्यवस्था के बुरी होती है। प्रति व्यकि इस्पात की उपलब्धता के आधार पर राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था का मूल्यांकन किया जा सकता है। भारत में लौह-इस्पात उद्योग के विकास का इतिहास काफी पुराना है। भारत में कई आदिम समाज परम्परागत तरीके से लैह-इस्पात उत्पादन करने में कार्य करती हैं। जैसे- MP के अगरिया जनजाति के लोग इस कार्य में दक्ष है।

      भूगोलवेत्ताओं के अनुसार, भारत में लौह-इस्पात उघोग का इतिहास 4000 वर्ष पुराना है। भारत में प्रथम लोहा का प्रमाण 800 ईसा पूर्व का मिलता है। दिल्ली में कुतुबमीनार के निकट लौह-स्तंभ काफी पुराना है। प्राचीन काल में लौह-इस्पात उत्पादन का तकनीक काफी उन्नत था। यही कारण है कि खुले वातावरण में दिल्ली का लौह स्तंभ स्थित होने के बावजूद आज भी उसमें जंक नहीं लगा।

     आधुनिक तरीके से लौह-इस्पात उत्पादन करने का प्रथम प्रयास 1830 ई० में तमिलनाडु के पोर्टोनोवा नामक स्थान पर किया गया जो असफल रहा है। पुन: कच्चे लोहे का उत्पादन पहली बार 1874 ई० में प. बंगाल के कुल्टी में स्थित ‘बराकर आयरन बर्क्स’ में किया गया जो सफल रहा।

      भारत में लौह इस्पात उद्योग के विकास के दिशा में वृहत प्रयास 1907 ई० में शुरू हुई जब J.N. टाटा ने शाकची (जमशेदपुर का पुराना नाम) स्थान पर प्रथम इस्पात कारखाना नींव रखी। इससे “टाटा आयरन एण्ड स्टील कंपनी” (टिस्को) कहा गया। इसने 1911 ई० से इस्पात उत्पादन का कार्य प्रारंभ किया। इसके बाद “इण्डियन आयरन एण्ड स्टील कंपनी लि०” (TISCO) की स्थापना 1918 ई० में प० बंगाल में हीरापुर में किया गया। पुन: 1923 ई० में भद्रावती (कर्नाटक) में विश्वेश्वरैया आयरन एण्ड स्टील कंपनी लि० की स्थापना की गई। प्रारंभ में ये ‘मैसूरु स्टील वर्क्स’ कहलाता था। यह सार्वजनिक क्षेत्र की पहली इस्पात कंपनी थी।

      1936 ई० में कुल्टी और हीरापुर के कारखाने को मिलाकर “भारतीय लौह एवं इस्पात कंपनी” का नाम दिया गया। 1953 ई० में बर्नपुर स्थित इस्पात के कारखाने को भारतीय लौह एवं इस्पात कंपनी में मिला दिया गया।

     स्वतंत्रता के बाद इस्पात उद्योग के विकास हेतु कई प्रयास किये गये। जैसे- दूसरी पंचवर्षीय योजना में लौह-इस्पात उद्योग का काफी विकास हुआ। पूर्व USSR की सहायता से भिलाई में, ब्रिटेन की सहायता से दुर्गापुर में, प० जर्मनी की सहायता से राउरकेला में एक-एक इकाई की स्थापना की गई। इन तीनों को “हिन्दुस्तान स्टील लिमिटेड” के अन्तर्गत रखा गया। तीसरी पंचवर्षीय योजना के दौरान पूर्व सोवियत संघ की सहायता से बोकारों में इस्पात के प्लाण्ट लगाये गये जिसने उत्पादन का कार्य 1974 ई० में प्रारंभ किया।

    चौथी पंचवर्षीय योजना के दौरान इस्पात उद्योग के विकास की दिशा में कोई विशेष प्रयास नहीं किया गया। लेकिन, भारतीय इस्पात प्राधिकरण की स्थान 1973 ई० में की गई। इसका नाम बदलकर 1978 ई० में (SAIL) स्टील ऑथोरिटी ऑफ इण्डिया लि० कर दिया गया।

    पांचवी पंचवर्षीय योजना के दौरान पाराद्वीप, सलेम तथा विशाखापतनम में लौह इस्पात केन्द्र की स्थापना की गई। पांचवी पंचवर्षीय योजना के बाद लौह- इस्पात उद्योग के क्षेत्र में निजी क्षेत्रों को बढ़ावा दिया जाने लगा। भारत में कहीं भी इस्पात का कारखाना सार्वजनिक क्षेत्र में नहीं लगाया जा रहा है हलाँकि संयुक्त उपक्रम के रूप में ‘पास्को इण्डिया लिमिटेड’ के द्वारा पाराद्वीप में इस्पात का एक संयंत्र स्थापित की जा रही है। पुनः जिंदल ग्रुप ने महाराष्ट्र, छतीसगढ़ तथा दिल्ली में छोटे-2 इस्पात के कई इकाईयों की स्थापना की है।वर्तमान में लौह-इस्पात उद्योग का विकास निजी क्षेत्रों के माध्यम से जारी है।

स्थानीयकरण

     1 टन लौह इस्पात के लिए 5.5 टन खनिज की आवश्यकता पड़ती है। इनमें 2 टन लौह अयस्क, 2 टन कोयला, 0.5 टन चूना-पत्थर, 0.5 टन मैगनीज तथा डोलोमाइट हथा शेष अन्य खनिजों की आवश्यकता पड़‌ती है। बेबर के अनुसार लौह-इस्पात उद्योग वजन ह्रास उद्योग है। इसलिए इसकी स्थापना समान्यतः कच्चे माल के क्षेत्र में होना चाहिए। पुनः बेबर ने बताया कि लौह-इस्पात उद्योग के स्थानीयकरण में दो खनिज पदार्थों की भूमिका महत्वपूर्ण होती है। ऐसे उद्योगों को स्थापना का निर्धारण त्रिकोण मॉडल से करते हैं। इसे नीचे के चित्र से भी समझा जा सकता है।

Iron and Steel Industry

    अगर भारतीय इस्पात उधोग के स्थानीयकरण की प्रवृति को देखा जाय तो पाते हैं कि भिलाई, भद्रावती तथा सलेम का इस्पात कारखाना लौह-अयस्क क्षेत्र में है। दुर्गापुर, बर्नपुर तथा बोकारो का कारखाना कोयला क्षेत्र में जमशेदपुर तथा राउरकेला का कारखाना लौह अयस्क और कोयला क्षेत्र के मध्य में है। पुनः विशाखापतनम तथा पाराद्वीप का कारखाना बंदरगाह के पास स्थित है।

     भारत में कुल 12 लौह-इस्पात संयंत्र है। इनमें से TISCO को छोड़कर सभी कारखाने सार्वजनिक क्षेत्र के है जिसका प्रबंधन का कार्य SAIL करती है। भारत का प्रमुख लौह-इस्पात केन्द्र और उसके स्थानीयकरण को प्रभावित करने वाले कारकों को नीचे देखा जा सकता है।

  • जमशेदपुर (झारखण्ड)

लौह अयस्क- गुरुमहीसानी (उड़ीसा के मयूरभंज जिला), नोवामुंडी

कोयला- झरिया, पश्चिमी बोकारो  

मैगनीज- क्योंझर , सुन्दरगढ़ से चुना पत्थर

विद्युत एवं जल की आपूर्ति-  डिमना झील झील से जल (स्वर्णरेखा और खरकई नदी के संगम पर स्थित), चांडिल बांध परियोजना से जल विद्युत

  • भद्रावती (कर्नाटक)

लौह अयस्क- बाबाबुदन की पहाड़ी से (चिकमंगलूर जिला)

कोयला- स्थानीय लकड़ी कोयला

मैगनीज- शिमोगा जिला से

विद्युत एवं जल की आपूर्ति- भद्रा नदी से जल प्राप्ति और महात्मा गाँधी तथा भद्रावती परियोजना से विद्युत की आपूर्ति 

  • ISCO (बर्नपुर, हीरापुर, कुल्टी-पश्चिम बंगाल)

लौह अयस्क- क्योंझर, मयुरभंज

कोयला- रानीगंज तथा झरिया

मैगनीज- क्योंझर

विद्युत एवं जल की आपूर्ति- बराकर नदी से जल, DVC से विद्युत

  • दुर्गापुर

लौह अयस्क- नुवामुन्डी (325 किमी० दूर)

कोयला- झरिया तथा बोकारो से (110 किमी० दूर)

मैगनीज- क्योंझर से

विद्युत एवं जल की आपूर्ति- दामोदर नदी से जल, DVC से विद्युत

  • राउरकेला

लौह अयस्क- क्योंझर तथा कोनाई से (75 किमी०)

कोयला- झरिया, बोकारो तथा तलचर से  

मैगनीज- क्योंझर से

विद्युत एवं जल की आपूर्ति- जल शंख नदी से, तालचेर से विद्युत

नोट: शंख नदी (Sankh River) भारत के झारखंड, छत्तीसगढ़ और ओड़िशा राज्यों में बहने वाली एक नदी है।

  • भिलाई

लौह अयस्क- डाली राजहरा से

कोयला- झरिया, बोकारो तथा कोरबा से

मैगनीज- बालाघाट तथा  भंडारा से

विद्युत एवं जल की आपूर्ति- तेंदुला बांध से, विद्युत्- कोरवा से

  • बोकारो

लौह अयस्क- क्योंझर

कोयला- झरिया

मैगनीज-किरिबुरु

विद्युत एवं जल की आपूर्ति- बोकारो नदी तथा दगहा डैम से जल, विद्युत-चन्द्रपुरा से

  • सलेम

लौह अयस्क- शिवाराय की पहाड़ी से 

कोयला- नवेली

मैगनीज- सलेम

विद्युत एवं जल की आपूर्ति- जल तथा विद्युत मैटूर बांध से

  • विजय नगर

लौह अयस्क- बाबाबुदन की पहाड़ी से

कोयला- सिंगरैनी तथा कान्हन घाटी

मैगनीज- स्थानीय विजयनगर

विद्युत एवं जल की आपूर्ति- तुंगभद्रा परियोजना से

  • विशाखापत्तनम

लौह अयस्क- बैलाडीला

कोयला- आस्ट्रेलिया

मैगनीज- बालाघाट

विद्युत एवं जल की आपूर्ति- तुंगभद्रा परियोजना से

समस्या

         भारत का लौह इस्पात उद्योग कई समस्याओं से गुजर रही हैं। जैसे-

(1) पूँजी की समस्या:-

    इस उद्योग की स्थापना में अधिक पूँजी की आवश्यकता पड़ती है। चूँकि भारत एक विकासशील देश है जिसके सदैव इसके पास पूँजी का अभाव बना रहता है।

(2) आधुनिक तकनीक का अभाव।

(3) सार्वजनिक क्षेत्र के अन्तर्गत आने वाले इस्पात केन्द्रों में कुप्रबंधन की समस्या।

(4) सरकार द्वारा लौह एवं इस्पात का मूल्य निर्धारित किया जाता है जिसके कारण इस्पात उलादन कंपनी घाटे में रखती है।

(5) लघु इस्पात संयंत्रों का घाटे में चलना।

(6) अंतर्राष्ट्रीय बाजार में प्रतिस्पर्द्धा।

(7) परिवहन की समस्या।

(8) SAIL द्वारा निराशाजनक प्रदर्शन।

संभावना

       निश्चय ही भारतीय इस्पात उद्योग कई समस्याओं के दौर से गुजर रहे हैं। लेकिन भारत के पास लौह अयस्क, कोयला, मैगनीज, चुना-पत्थर इत्यादि का विशाल भण्डार है जिसके आधार पर इस उद्योग का विकास बड़े पैमाने पर किया जा सकता है। भारत की अर्थव्यवस्था दूसरी सबसे तेज गति से विकसित होने वाली अर्थव्यवस्था है जिसके कारण यहाँ पर निर्माण कार्य बड़े पैमाने पर चल रहे हैं जिसके कारण देशी माँग में अभूतपूर्व वृद्धि हुई है।

      पुन: भारत के किसी भी पड़ोसी देश में इस्पात उत्पादन नहीं होता है। ऐसे में पड़ोसी देशों के साथ संबंध स्थापित क अंतर्राष्ट्रीय बाजार में पैठ बना सकता है। स्वर्णीम चतुर्भुज  परियोजना या सड़क-निर्माण क्रांति, फ्रेड रेलवे कोरीडोर के निर्माण से परिवहन की समस्या समाप्त हो जायेगी। अधुनिक औद्योगिक नीति से विदेशी पूँजी और आधुनिक तकनीक का आगमन भारत में हो रहा है। ओडिशा के पाराद्वीप में निर्मित होने वाला पोस्को इस्पात केन्द्र एक ऐसा केन्द्र है जहाँ अब तक सबसे बड़ा विदेशी पूँजी का निवेश हुआ है।

     आर्थिक सुधार के दूसरे चण में विनिवेश की नीति को अपनाकर प्रबंधन में सुधार लाने प्रयास कर रही है।

निष्कर्ष:

       उपरोक्त तथ्यों के विवेचना से स्पष्ट है कि भारत में लौह-इस्पात उद्योग का भविष्य उज्ज्वल है।

2. Meaning of Major Geographical Terms (प्रमुख भौगोलिक शब्दों का अर्थ)

Meaning of Major Geographical Terms

(प्रमुख भौगोलिक शब्दों का अर्थ)



प्रमुख भौगोलिक शब्दों का अर्थ

♣ अपघर्षण पवन⇒ वायु, नदी, हिमानी, समुद्री लहरों आदि अपरदनात्मक प्रक्रमों द्वारा निरन्तर क्रियाशील रहने पर धरातल का बहुत सा मलवा परिवहित कर लिया जाता है, इस क्रिया को ही अपघर्षण कहते हैं।

♣ वायूढ़⇒ पवन जिन पदार्थों का परिवहन, अपरदन तथा निक्षेपण करता है, उसे वायूढ़ की संज्ञा दी जाती है।

♣ वायुराशि⇒ वायु का विस्तृत पुंज जिसमें तापमान, आर्द्रता में समानता विद्यमान रहती है।

जलोढ़ शंकु⇒ नदी अपने मुहाने पर जमाव के द्वारा शंकु की आकृति का निर्माण करती है, जिसका पृष्ठीय ढाल अत्यन्त झुका हुआ होता है, उसे जलोढ़ शंकु की संज्ञा दी जाती है।

♣ अल्पाइन⇒ यूरोप में एक ऐसा पर्वत तंत्र है जिसमें जलवायु वनस्पति स्थलाकृति, आदि में विशिष्टता विद्यमान है।

♣ प्रतिचक्रवात⇒ केन्द्र में उच्च वायुदाब तथा परिधि पर निम्न वायुदाब से युक्त एक उच्च वायुमण्डलीय दाब क्षेत्र होता है, जिसमें केन्द्र से बाहर निकलने वाली हवाएं उत्तरी गोलार्द्ध में दक्षिणावर्त तथा दक्षिणी गोलार्द्ध में वामावर्त होती है।

♣ भूमि उच्च⇒ चन्द्रमा या अन्य ग्रह जब अपने पथ पर पृथ्वी से सर्वाधिक दूरी पर रहते हैं, तब वह स्थिति भूमि उच्च कहलाती है।

♣ वायुमण्डल⇒ पृथ्वी के चारों ओर फैले विस्तृत गैस, जलवाष्प व धूल-कण का आवरण है। इसी आवरण के कारण धरातल जीव जगत तथा वनस्पति-जगत का अस्तित्व सम्भव हुआ है।

♣ प्रवाल द्वीप वलय⇒ वलयाकार या अश्वनाल के आकार की प्रवाल कीटों द्वारा निर्मित स्थलाकृति है, जो लैगूनों व खुले सागरों में पायी जाती है।

♣अजोर्स⇒ यह एक उपोष्ण कटिबन्धीय प्रति चक्रवात है, जो अन्ध महासागर में स्थित है। इसकी सक्रियता ग्रीष्म ऋतु में देखने को मिलती है।

♣ बरखान⇒ पवन के निक्षेप द्वारा निर्मित बालुका स्तूप है, इसका आकार चापाकार होता है।

♣ प्रवाल रोधिका⇒ यह सागरीय स्थलाकृति सागर तट के समानान्तर होती है, जिसका निर्माण सागरीय लहरों के निक्षेप द्वारा होता है।

♣ बैथोलिथ⇒ जब मैग्मा पदार्थ अपने स्रोत क्षेत्र से ऊपर उठकर एक गुम्बद के समान ठोस हो जाते है तो उससे बैथोलिथ का निर्माण होता है।

♣ ज्वालामुखी कुण्ड⇒ जब ज्वालामुखी का उद्गार होता है, तो उस समय निकला लावा उसके मुख के चारों तरफ ऊंचाई में जमा हो जाता है, जिससे ज्वालामुखी कुण्ड का निर्माण होता है।

♣ ग्रीनविच मीन टाइम⇒ ग्रीनविच में 0° याम्योत्तर रेखा पर स्थानीय समय, जो यूरोप व ब्रिटिश द्वीप समूह का मानक समय है।

♣ पहाड़ी⇒ पर्वत से निम्न तथा अपने आस-पास की भूमि से एकाएक ऊपर उठा हुआ भाग पहाड़ी कहलाता है।

♣ अश्व अक्षांश⇒ वायुमण्डलीय उच्च वायुदाब की उपोषण पेटी व्यापारिक एवं पछुवा पवनों के मध्य स्थित 30°- 35° दोनों गोलार्द्धों में विस्तीर्ण है। यहां पर वायु अवरोहण के कारण प्रतिचक्रवातीय दशाएं तथा शुष्क मौसम विद्यमान रहता है।

♣ आग्नेय शैल⇒ ऐसी चट्टान जो तप्त मैग्मा के शीतलन के फलस्वरूप सृजित होती है।

♣ अन्तर्राष्ट्रीय तिथि रेखा⇒ 180° देशान्तर के लगभग साथ-साथ निर्धारित रेखा, जो केवल जलीय भाग में खींची गई है, फलत: उक्त रेखा से विचलित हो जाती है। जब पश्चिम की तरफ यात्रा करते हैं तो एक दिन घटा दिया जाता है तथा पूर्व की ओर यात्रा करने पर एक दिन जोड़ दिया जाता है।

♣ लीप वर्ष⇒ 365 दिन व 6 घण्टे में पृथ्वी सूर्य का एक चक्कर लगा लेती है। प्रत्येक चौथे वर्ष 1 दिन जोड़ कर 366 दिन का एक वर्ष बनाया जाता है, जो लीप वर्ष कहलाता है।

♣ चन्द्र ग्रहण⇒ सूर्य तथा चन्द्रमा के मध्य जब पृथ्वी गुजरती है तो इसकी छाया चन्द्रमा पर पड़ती है, जिससे चन्द्रमा पर अन्धकार दिखाई पड़ता है, जो चन्द्र ग्रहण कहलाता है।

♣ चुम्बकीय ध्रुव⇒ उत्तरी ध्रुव (आर्कटिक के निकट) तथा दक्षिणी ध्रुव अण्टार्कटिक क्षेत्र में मैगनेटिक धातु के क्षेत्र विद्यमान हैं, जो चुम्बकीय (मैगनेटिक) ध्रुव के नाम से जाने जाते हैं।

♣ मध्य रात्रि का सूर्य⇒ 15 मई से 31 जुलाई तक उत्तरी गोलार्द्ध में तथा 15 नवम्बर से 31 जनवरी तक दक्षिणी गोलार्द्ध में, जिसमें सूर्य 24 घण्टे नहीं छिपता अर्थात् मध्य रात्रि में भी द्रष्टव्य रहता है। इसे मध्य रात्रि का सूर्य की संज्ञा दी जाती है।

♣ज्वार-भाटा⇒ चन्द्रमा व सूर्य की आकर्षण शक्ति के फलस्वरूप सागरीय जल में आन्दोलन प्रारम्भ हो जाता है, जिससे जल का कुछ भाग उच्च तथा कुछ भाग निम्न रहता है। उच्च भाग को ज्वार तथा निम्न भाग को भाटा की संज्ञा दी जाती है।

♣ बृहत् ज्वार⇒ जब सूर्य, चन्द्रमा तथा पृथ्वी एक सीध में आ जाते हैं तो सूर्य तथा चन्द्रमा का आकर्षण बल सम्मिलित रूप से एक ही दिशा में कार्य करता है, जिससे ज्वार तीव्र होता है, जिसे दीर्घ ज्वार की संज्ञा दी जाती है। दीर्घ ज्वार की स्थिति प्रत्येक महीने की पूर्णिमा तथा अमावस्या के दिन होती है।

♣ लघु ज्वार⇒ जब सूर्य तथा चन्द्रमा की स्थिति पृथ्वी से समकोणिक रहती हैं, तो इनका आकर्षण बल अलग-अलग कार्य करता है। जिससे ज्वार की तीव्रता अल्प होती है। इसे लघु ज्वार की संज्ञा दी जाती है।

♣ इन्द्र धनुष⇒ सूर्य की किरणों के सामने वर्षा की बूंदों के पड़ने से अपवर्तन तथा परावर्तन के कारण निर्मित एक सप्त रंगी चाप इन्द्र धनुष के नाम से जाना जाता है।

♣ वृष्टि छाया⇒ पर्वत का वह भाग, जहां पर हवाएं वर्षा करके गर्म होकर उतरती हैं, तो न्यून वर्षा करती हैं, वह वृष्टि छाया कहलाता है।

♣ कोयम्बैंग⇒ जावा की स्थानीय पवन है। इसके प्रवाहित होने पर यहां की तम्बाकू इत्यादि की फसल नष्ट हो जाती है।

♣ समुद्री जलवायु⇒ द्वीपीय एवं महाद्वीपीय समुद्र तटों की जलवायु अन्य की अपेक्षा भिन्न है, क्योंकि दैनिक एवं ऋतुवत् तापान्तर अल्प होता है। वर्षा की अधिकता वताग्रों के कारण यहां पर सम्भव होती है।

♣ पर्वतीय वर्षा⇒ आर्द्रतायुक्त पवनों के प्रवाह मार्ग में जब पर्वत पड़ जाते हैं, तो ये हवाएं उछाल दी जाती हैं, जिससे रुद्रोष्म तापह्रास दर से इनका संघनन होता है। वायु के संतृप्त होने पर वर्षा प्रारम्भ होती है, जो पर्वतीय वर्षा कहलाती है। पर्वतीय ढालों पर प्रारम्भ में वर्षा कम तथा इसके बाद मात्रा बढ़ती जाती है, पुनः घटती जाती है।

♣ ध्रुवीय पवनें⇒ ध्रुवीय पवनों तथा उष्ण कटिबन्धीय पवनों को अलग करने वाले वाताग्र को ध्रुवीय वाताग्र की संज्ञा दी जाती है।

♣ वर्षा⇒ वर्षा वह प्रक्रिया है, जिसमें आरोही वायु के संतृप्त होने, शीतलित जल सीकरों के मध्य कुछ हिमकणों की उपस्थिति, जल बिन्दुकाओं का विकास तथा वायुमण्डल के विभिन्न स्तरों से गुजरकर जल बिन्दुओं के रूप में बरस पड़ती है।

♣ तापान्तर⇒ किसी स्थान का एक निश्चित अवधि के उच्चतम एवं न्यूनतम तापमान के अन्तर को तापान्तर कहते हैं।

♣ स्थानीय पवन⇒ किसी स्थान विशेष की पवने जो स्थानीय निम्न व उच्च वायुदाब के कारण उत्पन्न वायुदाब प्रवणता के कारण प्रवाहित होती हैं।

♣ कैम्पो⇒ मध्य ब्राजील के उष्ण कटिबन्धीय घास के मैदान व सवाना घास के मैदान को कम्पो की संज्ञा दी जाती है।

♣ महाद्वीप⇒ गैसीय पुंज के शीतलन तथा ठोसीकरण के फलस्वरूप पृथ्वी की ऊपरी पपड़ी कठोर हुई। शीतलन की प्रक्रिया के समय संकुचन के कारण कुछ भाग ऊंचा व कुछ भाग नीचा हो गया। ऊंचे भाग को महाद्वीप तथा नीचे भाग को, जहां जल भर गया, महासागर कहलाया।

♣ महाद्वीपीय विस्थापन⇒ महाद्वीप या पृथ्वी की बाह्य कठोर परत किसी गाढ़े द्रव पर तैर रही है। गुरुत्वाकर्षण तथा अन्य अनेक भू गर्भिक कारणों से अतीत में बृहत् स्तर पर इन महाद्वीपों का विस्थापन हुआ। इस सिद्धान्त का प्रतिपादन वेगनर महोदय ने किया था।

♣ धारा⇒ समुद्र जलराशि जब एक निश्चित दिशा में प्रवाहित होती है, तो उसे धारा कहते हैं।

♣ निक्षेपण⇒ यह वह क्रिया है, जिसमें अपरदनात्मक कारक मलवा का परिवहन करके किसी स्थान पर जमा करते हैं।

♣ पृथ्वी⇒ जलवायुविक दशाओं एवं मानव से युक्त सौर मण्डल का एक सदस्य ग्रह, जो अपने निश्चित पथ पर सूर्य का चक्कर लगाती है।

♣ भूकम्प⇒ भूगर्भिक या बाह्य कारणों के फलस्वरूप पृथ्वी की बाह्य पपड़ी में उत्पन्न होने वाले कम्पन को भूकम्प की संज्ञा दी जाती है।

♣ पारिस्थितिकी⇒ यह ऐसा तंत्र है जिसमें जीव एवं उनके वातावरण के पारस्परिक सम्बन्ध विद्यमान है।

♣ वातावरण⇒ जीवों के चारों ओर व्याप्त परिवेश वातावरण कहलाता है।

♣ भूमध्य रेखा या वृहत् वृत्त⇒ 0º अक्षाश रेखा, जो दोनों ध्रुवों से समान दूरी पर स्थित है तथा पृथ्वी के अक्ष को समकोण पर काटती है। इसकी लम्बाई 40,069 किलोमीटर है।

♣ ब्लॉक पर्वत⇒ दो समानान्तर भ्रंशों के मध्य का वृहत भाग के उत्थित होने से जिस पर्वत का निर्माण होता है, उसे ब्लॉक पर्वत की संज्ञा दी जाती है।

♣ वलित पर्वत⇒ अपरदन के विभिन्न कारकों के द्वारा मलवा का निक्षेपण भूसन्नति में होता है। प्लेटों के खिसकाव के कारण या अन्य भूगर्भिक कारणों से मलवा में वलन होता है, तब जिस पर्वत का निर्माण होता है, उसे दलित पर्वत की संज्ञा दी जाती है।

♣ भू-सन्नति⇒ भू-सन्नतियाँ लंबे, संकरे तथा उथले जलीय भाग होती है, जिनमें तलछटिय निक्षेप के साथ-साथ तली में धंसाव होता है। वर्तमान समय में प्राय: सभी विद्वानों की यह मान्यता है कि प्राचीन और नवीन वलित पर्वतों का आविर्भाव भू-सन्नतियाँ से हुआ है। जैसे- रॉकी भूसन्नति से रॉकी पर्वत, यूराल भू-सन्नति से यूराल पर्वत तथा टेथिस भू-सन्नति से महान हिमालय पर्वतों का निर्माण हुआ।

♣ हिमनदन⇒ वह समय जिसमें हिमानी क्षेत्रों में हिमानी क्रियाएं होती है।

♣ हिमानी या हिमनद⇒ हिम का विस्तृत खण्ड जो गुरुत्व के कारण हिम क्षेत्रों में गतिशील रहता है।

♣ हिम झंझावात⇒ सूक्ष्म हिमकणों के प्रचण्ड तूफान को हिम झंझावात कहते हैं।

♣ समीर⇒ हल्के वायुदाब प्रवणता के फलस्वरूप जब हवाएं एक स्थान से दूसरे स्थान को प्रवाहित होती हैं, तो उन्हें समीर की संज्ञा दी जाती है।

♣ स्थल समीर⇒ रात में जब स्थलीय भाग पर वायुदाब अधिक तथा सागरीय भाग में बायुदाब न्यून रहता है, तो हवाएं स्थल से जल की तरफ प्रवाहित होती है, इन्हें स्थल समीर कहते हैं।

♣ मानसून⇒ ये हवाएं मौसमी होती है। ग्रीष्मकाल में सागर से स्थल की ओर 6 महीने तथा शीतकाल में स्थल से सागर की ओर 6 महीने प्रवाहित होती है। इसकी उत्पत्ति में वायुदाब प्रवणता तिब्बत के पठार के ऊपर प्रतिचक्रवातीय दशाएं, पूर्वी जेट स्ट्रीम की स्थिति आदि महत्वपूर्ण कारक उत्तरदायी हैं।

♣ ध्रुवीय पवन⇒ अत्यन्त शीतल हवाएं जो ध्रुवों से शीतोष्ण प्रदेशों की ओर प्रवाहित होती है, उन्हें ध्रुवीय पवन कहते हैं।

♣ तूफानी चालीसा या गरजता चालीसा⇒ 40° से 60° दक्षिणी अक्षांशों के मध्य तीव्र गति से प्रवाहित होने वाली पवन है।

♣ रेतीला तूफान⇒ मरु प्रदेशों में 15 मीटर की ऊंचाई तक बालू के कणों की आंधी चलती है जिसे रेतीला तूफान कहते हैं।

♣ सिमून⇒ सहारा मरुस्थल में कष्टप्रद, शुष्क तथा लू की भांति प्रवाहित होने वाली पवन को सिमून कहते हैं।

♣ पश्चिमी हवाएं⇒ दोनों गोलाद्धों में 35° से 65° अक्षांशों के मध्य प्रवाहित होने वाली पवनों को पछुवा पवन की संज्ञा दी जाती है।

♣ चिनूक⇒ संयुक्त राज्य अमेरिका में रॉकी पर्वत के पश्चिमी ढाल पर उतरने वाली पवन को चिनूक कहते हैं। ये हवाएं रॉकी के पूर्वी ढाल के सहारे आरोहण करती हैं। शुष्क रुद्धोष्म तापह्रास दर से शीतलन, संघनन तथा वर्षा होती है। ऊंचाई पर जाने पर इनकी आर्द्रता सामर्थ्य समाप्त हो जाती है तथा ये हवाएं गर्म होकर रॉकी के पूर्वी ढाल के सहारे नीचे उतरती हैं।

♣ शीत वाताग्र⇒ शीतोष्ण कटिबन्धीय चक्रवात में जिस वाताग्र के सहारे शीत वायु गति करती है, उसे शीत वाताग्र की संज्ञा दी जाती है। इस वाताग्र के आगमन से मौसम बदल जाता है।

♣ शीत ध्रुव⇒ उत्तरी तथा दक्षिणी गोलार्द्ध में सबसे शीतल भाग को शीत ध्रुव की संज्ञा दी जाती है।

♣ संघनन⇒ वायु का आरोहण की प्रक्रिया के फलस्वरूप वायु में विद्यमान जल वाष्प ठोस रूप में परिवर्तित हो जाती है, इसे संघनन कहते हैं।

♣ चक्रवात⇒ चक्रवात उस वायुमण्डलीय परिस्थिति को कहते हैं जिसमें हवाएँ एक निम्न वायुदाब केन्द्र के चारों ओर घूमने की प्रवृत्ति रखती है। चक्रवात में ज्यों ही किसी स्थान पर निम्न वायुदाब केन्द्र का निर्माण होता है त्यों ही उच्च वायुदाब केन्द्र से हवाएँ निम्न वायुदाब केन्द्र की ओर दौड़ने लगती है। उच्च वायुदाब केन्द्र से आने वाली हवाओं का मुख्य उद्देश्य निम्न वायुदाब केन्द्र को समाप्त करना होता है। लेकिन निम्न वायुदाब केन्द्र की ओर दौड़ने वाली हवाएँ पृथ्वी की घूर्णन गति के प्रभाव में आकार उत्तरी गोलार्द्ध में घड़ी की सूई के विपरीत (Anticlock wise) और दक्षिण गोलार्द्ध में घड़ी की सुई की दिशा (Clock wise) में घुमने लगती हैं।

♣ डोलड्रम⇒ विषुवत रेखीय निम्न वायुदाब की पेटी जिसमें व्यापारिक व उत्तरी-पूर्वी हवाएं सम्मिलित रूप से प्रवाहित होती हैं। यहां पर वायु का आरोहण भी परिलक्षित होता है।

♣ तुषार⇒ जब वायुमण्डलीय तापमान OºC या इससे कम होता है, तो वायुमण्डल में व्याप्त वाष्प छोटे-छोटे वर्फ कणों में बदल कर धरातल, वनस्पतियों व घासों पर जमा हो जाता है, उसे तुषार कहते हैं। 

♣ ओला⇒ कपासी वर्षी मेघ से गिरने वाली 5 मिलीमीटर या इससे अधिक व्यास वाली बर्फ के कण को ओला की संज्ञा दी जाती है।

♣ हरीकेन⇒ मेक्सिको की खाड़ी में आने वाले चक्रवातीय तूफान को हरीकेन कहते हैं।

♣ हीदरग्राफ⇒ यह एक ऐसा रेखाग्राफ है जिसमें निश्चित अवधि के तापमान (ऊर्ध्वाधर रेखा) व वर्षा (क्षैतिज रेखा) को प्रदर्शित किया जाता है।

♣ हिमगव्हर⇒ हिमानी प्रदेशों में हिमानी द्वारा अपरदित वृत्ताकार गर्त को हिमगव्हर की संज्ञा की दी जाती है।

♣ भृगु⇒ सागरीय लहरें तटवर्ती क्षेत्रों में मुलायम चट्टानों का अपरदन कर लेती हैं, परन्तु कठोर चट्टाने सागर-जल के ऊपर निकली रहती है, उसे भृगु की संज्ञा दी जाती है।

♣ शंकु⇒ ज्वालामुखी के उदगार में निकले लावा के द्वारा कभी-कभी शंकु के आकार में निक्षेप होता है, जिसे शंकु की संज्ञा दी जाती है।

♣ क्रेटर⇒ ज्वालामुखी शिखर में कीपाकार गर्त, जिससे कभी-कभी ज्वालामुखी उद्गार होता है, उसे क्रेटर कहते हैं।

♣ डेल्टा⇒ नदियाँ अपनी अन्तिम अवस्था में मुहाने पर ग्रीक अक्षर डेल्टा की भांति जमाव करती हैं, जिन्हें डेल्टा की संज्ञा दी जाती है।

♣ निक्षेपण⇒ यह वह क्रिया है, जिसमें अपरदनात्मक प्रक्रम पवन, हिमानी, परिहिमानी, सागरीय लहरें, नदियों, आदि के द्वारा मलवा जमाव होता है।

♣ मरुस्थल⇒ यह ऐसा विस्तृत भू-भाग है, जिसमें न्यून वर्षा, बालू की अधिकता, छोटी व कंटीली झाडियाँ विद्यमान होती हैं।

♣ टिब्बा⇒ मरुस्थलीय प्रदेशों में पवन के जमाव द्वारा निर्मित गुम्बदाकार छोटी-छोटी बालू की पहाड़ियों को टिब्बा कहा जाता है।

♣ डाइक⇒ ज्वालामुखी के उद्गार के बाद लावा के शीतल तथा उसके अपरदन के बाद कठोर ग्रेनाइट का निकला हुआ भाग डाइक कहलाता है। अर्थात जब मैग्मा पदार्थ अपने स्रोत क्षेत्र से ऊपर उठकर लम्बत ठोस होता है तो उसे डाइक कहते है।

♣ कगार⇒ सारगीय लहरें अपरदन करके तटवर्ती क्षेत्रों में काफी दूर खोखला भाग बना देती है, जबकि ऊपर चट्टानें विद्यमान रहती हैं, जिसे कगार की संज्ञा दी जाती है।

♣ एस्कर⇒ हिमानी क्षेत्रों में हिम नदियाँ अपरदित पदार्थों को कटक के रूप में जमा करती है, जिसे एस्कर की संज्ञा दी जाती है।

♣ एस्चुअरी⇒ सागरीय क्षेत्रों में नदी का यह मुहाना, जिसमें प्रायः ज्वार आता रहता है। इसका निर्माण उच्च ज्वार वाले क्षेत्र में होता है तथा ऐसे नदियाँ इनका निर्माण करती हैं जो रिफ्ट घाटी से होते हुए बहती हैं। अरब सागर में गिरने वाली सभी नदियाँ एस्चुअरी का निर्माण करती है।

♣ भ्रंशन⇒ ऐसी दरार जो चट्टानों में भूगर्भिक या बाह्य कारणों से निर्मित होती है, उसे भ्रंशन की संज्ञा दी जाती है।

♣ फियोर्ड⇒ सागर तटवर्ती क्षेत्रों में ऐसा समतल मैदान जो हिमनदियों की घाटियों के धंसाव के फलस्वरूप निर्मित होता है।

♣ वलन⇒ भूगर्भिक या बाह्य शक्तियों द्वारा चट्टानों में दबाव की क्रिया होती है तो तोड़-मरोड़ उठती है, जिससे इनका कुछ भाग ऊंचा तथा कुछ भाग नीचा हो जाता है, इसे वलन कहते हैं।

♣ गॉर्ज⇒ तीव्र पार्श्ववर्ती ढालों वाली गहरी व संकीर्ण घाटी को गॉर्ज कहते हैं।

♣ खाड़ी⇒ समुद्र तटीय क्षेत्रों में जल स्थलीय भागों में इस तरह प्रवेश किए हुए रहता है, जिसके तीन ओर सागर रहता है। प्रत्येक खाड़ी कोई न कोई वृहत सरिता अपना मुहाना अवश्य बनाती है। इसका निर्माण भूपटल विभंजन तथा धरातलीय अवतलन के फलस्वरूप होता है।

♣ केन्द्र स्थल⇒ किसी प्रदेश का वह भाग जो उसकी समृद्धि व विकास का आधार हो तथा उस प्रदेश की अधिकांश सेवाएं वहां से प्रदान की जाती हों।

♣ हार्स्ट⇒ दो दरारों या भ्रंशों का मध्य भाग जब ऊपर उठ जाता है, तो वह हार्स्ट कहलाता है।

टेकरी⇒ अपरदन के अवशिष्ट भाग जो गोल व लघु पहाड़ी के रूप में होता है, उसे टेकरी कहते हैं।

♣ सिन्धु पंक⇒ समुद्र तल में समुद्री निक्षेप जो अत्यन्त सूक्ष्म होते हैं, वे सिन्धु पंक कहलाते हैं।

♣ प्रायद्वीप⇒ यह वह स्थलीय भाग है जो तीन और समुद्रों से घिरा रहता है।

♣ पठार⇒ कठोर, समतल पृष्ठ से युक्त, तीव्र ढाल वाले किनारों से युक्त उत्थित या अपरदित स्थलखण्ड जो लगभग 300 मीटर से 900 मीटर ऊंचा हो उसे पठार कहते हैं।

♣ प्रदेश⇒ भूपृष्ठ की यह लघु इकाई, जिसमें साम्यता विद्यमान हो तथा अपने निकटवर्ती क्षेत्रों से सर्वथा भिन्न हो, उसे प्रदेश की संज्ञा दी जाती है।

♣ युवाला⇒ घोलीकरण द्वारा निर्मित विस्तृत गर्त जो डोलाइन से बड़ा होता है, उसे युवाला कहते हैं। यह स्थलाकृति कार्स्ट प्रदेश में होती है।

♣ घाटी⇒ उच्च भूमि से घिरी निम्न भूमि जिसका निर्माण नदियाँ अपनी अपरदनात्मक प्रक्रिया द्वारा करती है।

♣ अवशोषण⇒ वायुमण्डल में विद्यमान जलवाष्प तथा गैसें और विकिरण की लघु तरंगों का शोषण करते हैं, जो वायुमंडलीय अवशोषण कहलाता है।

♣ अभिवहन⇒ वायुमण्डल में ऊष्मा का क्षैतिजवत् एक स्थान से दूसरे स्थान पर स्थानान्तरण होता है, तब इस क्रिया को अभिवहन करते हैं।

♣ आर्द्रता⇒ गैंसों के साथ वायु में जो जलवाष्प की मात्रा होती है, उसे वायुमण्डलीय आर्द्रता कहते हैं।

♣ आयनमण्डल⇒ धरातल से लगभग 80 किलोमीटर से 500 किलोमीटर तक मध्य्मंडल के ऊपर स्थित वायुमण्डलीय स्तर को आयनमण्डल कहते हैं। निम्न वायुदाब के कारण पराबैगनी फोटान्स तथा तीव्रगति वाले कणों के द्वारा वायुमण्डल पर अनवरत प्रहार से गैसों का आयनन जाता है। इसी आयनन के प्रभाव से इस स्तर का नामकरण आयनमण्डल किया गया।

♣ उष्मा स्थानांतरण⇒ ऊष्मा का एक स्थान से दूसरे स्थान, एक वस्तु से दूसरी वस्तु में संचार उष्मा का स्थानान्तरण कहलाता है।

♣ एल्बिडो⇒ अन्तरिक्ष की ओर परावर्तित विकिरण तथा आपतित विकिरण की मात्रा के अनुपात को पृथ्वी का एल्बिडो कहा जाता है।

♣ ओस⇒ स्वच्छ तथा शान्त मौसम में सूर्यास्त के पश्चात् धरातल के सन्निकट वायु में निहित जलवाष्प के संघनन द्वारा क्षैतिज तल में संचित शीतलित जल की बूंदों को ओस करते हैं।

♣ कोहरा⇒ धरातल के सत्रिकट आर्द्र वायु में शीतलन तथा संघनन की क्रिया होती है, तो जल या हिम के असंख्य सूक्ष्म कण उपस्थित हो जाते हैं, जिससे वायुमण्डल की पारदर्शकता एक किलोमीटर से कम हो जाती है, तब इसे कोहरा कहा जाता है।

♣ धुन्ध⇒ जब जल या हिम कणों की संख्या इतनी कम रहती है कि इसकी पारदर्शीकता एक किलोमीटर से अधिक हो जाती है, तब उसे घुन्ध कहते हैं।

♣ कृष्णिका विकिरण⇒ विकिरण की अधिकतम मात्रा जो किसी दिये गये तापक्रम पर होती है, उसे कृष्णिका विकिरण कहते हैं।

♣ मौसम विज्ञान⇒ मौसम विज्ञान वह विज्ञान है जो मौसम के प्रत्येक तत्व का वैज्ञानिक विश्लेषण करता है।

♣ मेट्रोलॉजी⇒ मेट्रोलॉजी (मौसम विज्ञान) शब्द ‘मेटोलॉजी’ से लिया गया है जिसका तात्पर्य है- ‘ऊपर की वस्तुओं का विवेचन’। अर्थात् वायुमण्डल की दशाओं का विश्लेषण इसके अन्तर्गत किया जाता है।

♣ रुद्धोष्म ताप परिवर्तन⇒ किसी वस्तु का ऐसा परिवर्तन जिसमें वह वस्तु किसी बाहरी माध्यम से न ऊष्मा ग्रहण करे न तो उसे ऊष्मा दे, फिर भी उसका ताप बदल जाय, तब वह परिवर्तन रुद्धोष्म परिवर्तन कहलाता है।

       किसी वायु का आरोहण होता है तो उस वायु का शीतलन 1º सेन्टीग्रेड प्रति 165 मीटर की दर से होता है। इस ताप ह्रास दर को रुद्धोष्म ताप परिवर्तन कहते हैं। इसी प्रकार जब किसी वायु का अवरोहण होता है तो उसके ताप में 1º सेन्टीग्रेड प्रति 165 मीटर की दर से वृद्धि होती है।

♣ वर्षण⇒ धरातल पर वायुमंडल से जल तरलावस्था या ठोस रूप में गिरता है, तब इसे वर्षण या अवक्षेपण कहा जाता है।

♣ फुहार⇒ जब वायु प्रवाह की दिशा में उड़ती हुई जल वर्षा की बूंदे जो सूक्ष्म, सघन तथा समान आकार वाली होती हैं, धरातल पर गिरती है, तब उसे फुहार कहते हैं।

♣ जल वृष्टि⇒ तरलावस्था में होने वाली वृष्टि है। जब जल की बूँदें तथा हिम साथ-साथ धरातल पर गिरते हैं, तो इसे सहिम वृष्टि कहते हैं।

♣ वाताग्र⇒ जब विभिन्न तापमान, आर्द्रता तथा घनत्व वाली वायु राशियाँ परस्पर मिलती हैं तो इनका पृथकत्व एक सीमा प्रदेश के द्वारा होता है, जिसे वाताग्र कहते हैं।

      जब उष्ण वायु धरातल को छोड़ कर शीतल वायु के ऊपर उठती है तथा जिसके माध्यम से इन दोनों में पृथकत्व होता है तो उसे उष्ण वाताग्र कहते हैं। जब शीतल वायु गतिशील होकर गर्म वायु को प्रतिस्थापित करती है, तब शीतल वायु का अग्र बढ़ता हुआ किनारा शीत वाताग्र कहलाता है।

♣ वायु राशि⇒ किसी निश्चित भौगोलिक क्षेत्र में समान भौतिक विशेषताओं के साथ उपस्थित वायुपूँज को वायुराशि कहते हैं। यहाँ समान भौतिक विशेषता का तात्पर्य वायु के तापमान, आर्द्रता एवं स्थिरता जैसे गुणों से होता है। जहाँ इन गुणों में एकाएक असमानता प्रकट होती है वहीं वायुराशि की सीमा समझी जाती है। किसी भी वायुराशि की भौतिक गुण स्रोत क्षेत्र, सतह की विशेषता, निम्न अथवा उच्च अक्षांशीय क्षेत्र में गमन एवं समय पर निर्भर करता है।

♣ वायुदाब⇒ धरातल पर पड़ने वाला वायु के भार का दबाव ही वायुदाब है।

♣वायुमण्डल⇒ भू-पृष्ठ के चरों ओर हजारों किलोमीटर मोटे फैले गैसीय आवरण को वायुमण्डल कहा जाता है। इसमें मुख्यतः 9 प्रकार की गैसें ऑक्सीजन, नाइट्रोजन, आर्गन, कार्बन डाइआक्साइड, हाइड्रोजन, नियॉन, हीलियम, क्रिप्टोन तथा जेनन पायी जाती हैं। वायुमण्डल में गैसों के अतिरिक्त जलवाष्प तथा धूलकण भी पर्याप्त मात्रा में विद्यमान हैं।

♣ वाष्पीकरण⇒ किसी भी ताप पर जब कोई द्रव धीरे-धीरे गैस में परिवर्तित होता है, तब इस प्रक्रिया को वाष्पीकरण कहा जाता है। जल से जब गैस बनती है तो वह जल वाष्प कहलाती है।

♣ संघनन⇒ जल वाष्प गैसीय अवस्था से जिस प्रक्रिया द्वारा तरल अवस्था में परिवर्तित होता है, उस प्रक्रिया को संघनन कहते हैं।

♣ संतृप्त वायु⇒ किसी निश्चित वायु राशि में जल की इतनी मात्रा रहती है कि वह और जल वाष्प की मात्रा को ग्रहण नहीं कर सकती है, उसे संतृप्त वायु कहते हैं।

♣ समताप मण्डल⇒ वायुमण्डल में ट्रोपोपाज के बाद के स्तर को समताप मण्डल कहते हैं, जिसकी धरातल से औसत 50 किलोमीटर मानी जाती है। इस मण्डल के प्रत्येक भाग में ताप समान पाया जाता है। इसमें मेघ, जलवाष्प, धूलकण आदि नहीं होते हैं।

♣ सूर्यातप⇒ सूर्य विकीर्ण ऊर्जा का वह भाग जो पृथ्वी की ओर प्रवाहित होता है, उसे सूर्यातप कहते हैं।

♣ सौर स्थिरांक⇒ वायुमण्डल के वाह्य भाग में एक वर्ग सेन्टीमीटर तल पर एक मिनट तक लम्बवत् पड़ने वाली सूर्य की किरणों से प्राप्त ऊर्जा की मात्रा को सौर स्थिरांक (ऊष्मांक) कहते हैं।

♣ कृत्रिम वर्षा⇒ कृत्रिम वर्षा एक प्रक्रिया है, जिसमें एक विशेष प्रकार के मेघों में (जिसमें वर्षा की संभावना रहती है) कृत्रिम तरीकों से संतृप्त करके वर्षा करायी जाती है।

♣ जलवायु⇒ किसी प्रदेश की वायुमण्डलीय दशाओं का दीर्घकालीन औसत को उस प्रदेश की जलवायु कहा जाता है। जलवायु को आंग्ल भाषा में ‘क्लाइमेट’ कहा जाता है।

    क्लाइमेट शब्द की व्युत्पत्ति ग्रीक भाषा के ‘क्लाइमा’ शब्द से हुई है, जिसका अर्थ झुकाव होता है। ग्रीक विद्वानों ने सूर्य की किरणों के झुकाव से उत्पन्न तापमान की विषमता के लिए इसका प्रयोग किया था।

♣ जलवायु प्रदेश⇒ भू-पृष्ठ का वह भाग, जिसमें जलवायवीय तत्वों में स्थानीय विभेदों के बावजूद इनमें अनेक समानताएं विद्यमानहती है, जिससे वह अपने निकटवर्ती क्षेत्रों से भिन्न होता है, उसे जलवायु प्रदेश कहते है।

♣ जल-वाष्प⇒ वायु में उपस्थित जल की मात्रा को जलवाष्प कहते हैं। वायुमण्डल में 8,000 मीटर तक जल वाष्प की 90 प्रतिशत मात्रा विद्यमान होती है।

♣ जलवायु के तत्व⇒ 1. वायुदाब, 2. पवन, 3. आर्द्रता तथा वर्षण, 4. मेघ, 5. वायु का तापमान, 6. सौर विकिरण।

♣ जेट स्ट्रीम⇒ ऊपरी वायुमण्डल में अर्थात क्षोभमंडल के ऊपर तथा समताप मंडल के नीचे क्षैतिज एवं तीव्र गति से चलने वाले वायु को जेट स्ट्रीम कहते हैं। यह हवा प्रायः 9-18 km की ऊँचाई के बीच चलती है।

     इस जेटस्ट्रीम की खोज द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान अमेरिकी सैनिकों ने किया था। कालान्तर में स्वीडिश वैज्ञानिक रॉक्सबी (स्वेडेन) ने इसका व्यापक अध्ययन किया। इसलिए उनके नाम पर इसे रॉक्सबी तरंग भी कहते हैं।

♣ जल-स्तम्भ⇒ जापान, चीन तथा संयुक्त राज्य अमेरिका के पूर्वी तटों से थोड़ी दूर सागर-तल पर उत्पन्न टॉरनेडो, जो अपने कीप में समुद्र के जल को कुछ ऊपर तक उठा लेते हैं तथा जिनका ऊपरी भाग अपने निचले भाग की अपेक्षा अधिक तीव्रगति से गतिशील होता है, को जल-स्तम्भ कहते हैं।

♣ टॉरनेडो⇒ संयुक्त राज्य अमेरिका के तटीय क्षेत्रों में अल्प अवधि वाला प्रचण्ड तूफान टॉरनेडो कहलाता है, जिसका व्यास 30 मीटर से 1,500 मीटर, लम्बाई 150 से 600 मीटर, ऊंचाई 320 किलोमीटर तथा गति 32 से 64 किलोमीटर प्रति घण्टा होती है। इसमें तेज आंधी, मूसलाधार वर्षा, ओले, मेघ गर्जन तथा बिजली की चमक सभी लक्षण विद्यमान रहते हैं। इनका सम्पूर्ण जीवन-काल लगभग 3 मिनट तक का होता है।

♣ टाइफून (हरीकेन)⇒ टाइफून उष्ण कटिबन्धीय चक्रवात होता है, जिसे जापान में टाइफून के नाम से जाना जाता है। एक प्रचण्ड एवं गहरा चक्रवातीय भ्रमिल होता है, जिसके केन्द्र में न्यून वायुदाब होता है, जिससे केन्द्रोन्मुखी प्रवाह, मध्य में तीव्रगति से ऊपर की ओर प्रवाह तथा शीर्ष भाग में वायु का निःस्राव होता है। इसका व्यास 500 से 800 किलोमीटर तथा ये 120 से 240 किलोमीटर प्रति घण्टा की गति से 10 से 15 किलोमीटर की ऊंचाई तक विस्तीर्ण 8° से 15° उत्तरी अक्षांशों के मध्य चलते हैं।

♣ तड़ित झंझा⇒ तड़ित झंझा मेघ गर्जन तथा बिजली की चमक से युक्त प्रचण्ड स्थानीय तूफान एवं वायुमण्डलीय विक्षोभ है, जिसका व्यास 4 किलोमीटर होता है। उष्ण कटिबन्धीय तथा शीतोष्ण कटिबन्धीय क्षेत्रों में ग्रीष्म ऋतु में वायु राशियों के अभिसरण द्वारा इनकी उत्पत्ति होती है।

♣ तापमान⇒ वायुमण्डल की ऊष्मीय अवस्था बतलाने वाला तापमान होता है। तापमान किसी पदार्थ के अणुओं की औसत गतिज ऊर्जा का मापन करता है।

♣ ऊष्मा⇒ किसी पदार्थ के अणुओं की सम्पूर्ण गतिज ऊर्जा की द्योतक है।

♣ दैनिक तापचक्र⇒ सूर्योदय से आकाश में सूर्य की ऊंचाई बढ़ने से तापमान में तीव्रगति वृद्धि, दो से तीन बजे तक अधिकतम तापमान, तत्पश्चात् सूर्योदय तक ताप ह्रास होता है, जिसे दैनिक ताप चक्र कहा जाता है।

♣ दैनिक तापान्तर⇒ किसी स्थान विशेष दैनिक का तापान्तर उस स्थान के अधिकतम तापमान तथा न्यूनतम् तापमान के अन्तर को कहते हैं।

    औसत दैनिक तापांतर उस स्थान के औसत उच्चतम तापमान तथा औसत न्यूनतम तापमान के अन्तर को औसत दैनिक तापान्तर कहते हैं।

♣ तापमाप्रवणता⇒ तापमान की भिन्नता के कारण उच्च तथा निम्न वायु दाब स्थापित होते हैं, जिससे उच्च वायुदाब से निम्न वायुदाब की ओर ढाल बन जाता है, जिसे तापमान प्रवणता कहते हैं।

      तापमान में ऊपर की ह्रास दर को ऊर्ध्वाधर तापमान प्रवणता तथा क्षैतिजवत् तापमान के ह्रास को तापमान की क्षैतिज प्रवणता कहते हैं।

♣ तापमान-व्युत्क्रमणता⇒ वायुमण्डल में धरातल के निकट शीतल वायु तथा ऊपर उष्ण वायु की स्थिति जब सामान्य ताप ह्रास के विपरीत होती है, तब उसे तापमान की व्युक्रमणता कहते हैं।

♣ वार्षिक तापांतर⇒ एक वर्ष में किसी स्थान का सबसे गर्म महीने तथा सबसे ठंडे महीने के औसत तापमान का अन्तर किसी स्थान का वार्षिक तापान्तर कहलाता है।

♣ धूल कण⇒ वायुमण्डल में जल-वाष्प या गैसों के अतिरिक्त जितने भी ठोस पदार्थ कण के रूप में में विद्यमान रहते हैं, उनको धूल कण कहते हैं।

♣ पर्वतीय वर्षा⇒ वाष्प से युक्त प्रवाहित पवनों के मार्ग में पर्वतों के अवरोध से व्यवधान उत्पन्न होता है, जिससे ये पवनें उछाल दी जाती हैं, जिनका शीतलन रुद्धोष्म ताप ह्रास दर से होता है, जिससे संघनन की क्रिया तथा वर्षा होती है। इस प्रकार की वर्षा को पर्वतीय वर्षा कहते हैं।

♣ पछुवा पवन⇒ दोनों गोलर्द्धों में 35° से 60° अक्षांशों के बीच, कोरियालिस बल के कारण उत्तरी गोलार्द्ध में दक्षिण-पश्चिम तथा दक्षिणी गोलार्द्ध में उत्तर-पश्चिम दिशा में प्रवाहित होने वाली पवनों को पछुवा पवन कहते हैं। दक्षिणी गोलार्द्ध में इसका वेग अत्यन्त तीव्र होता है जिस कारण इसे गरजने वाली चालीसा, प्रचण्ड पचासा आदि नामों से सम्बोधित करते हैं।

♣ प्रकीर्णन⇒ वायुमण्डल में वायु के अणु, जल वाष्प, धूल-कण आदि के सूक्ष्म कण तैरते रहते हैं, जिनसे सौर ऊर्जा की लघु तरंगों का चारो तरफ बिखराव होता है। यह प्रक्रिया प्रकीर्णन कहलाती है।

♣ पार्थिव विकिरण⇒ सौर विकिरण से ऊर्जा की जितनी मात्रा सम्पूर्ण पृथ्वी को वर्ष भर में प्राप्त होती है, पृथ्वी उसे पुनः विकिरण द्वारा वापस लौटा देती है, उसे पार्थिव विकिरण कहते हैं।

♣ फॉन⇒ जब वायु राशि या चक्रवात आल्प्स पर्वत के उत्तर से गुजरता है तो दक्षिण से आने वाली पवनों को इस पर्वत को पार करना पड़ता है, परन्तु ऊंचाई अधिक होने के कारण इसे पार नहीं कर पाती, बल्कि इससे टकरा जाती हैं, जिससे उछाल दी जाती हैं। उछाली गई वायु का आरोहण तथा रुद्धोष्म ताप ह्रास दर से शीतल होता है, जिससे संघनन तथा वृष्टि होती है। जब गर्म होती है तथा आल्प्स के विमुख ढाल पर उतरती हैं तो रुद्धोष्म दर से इनके ताप में वृद्धि होती है। ये हवाएं गर्म तथा झोकेदार होती हैं जिसे फॉन कहा जाता है। इस वायु का प्रवाह बसन्त ऋतु के प्रारम्भ में होता है, जिससे बर्फ पिघल जाती है।

♣मानसून⇒ मानसून मौसमी पवनें होती हैं जो शीत ऋतु में महाद्वीपों से महासागर की ओर तथा ग्रीष्म ऋतु में महासागरों से महाद्वीपों की ओर प्रवाहित होती हैं।

   ऋतु परिवर्तन से वायुदाब में परिवर्तन हो जाता है जिससे इनकी दिशा परिवर्तित हो जाती है, फलतः 6 महीने स्थल से जल तथा अगले 6 महीने जल से स्थल की ओर प्रवाहित होती हैं।

♣ मेघ⇒ वायुमण्डल में विभिन्न ऊंचाइयों पर जल-वाष्प के संघनन की प्रक्रिया के फलस्वरूप निर्मित हिमकणों या जलसीकरों की राशि को मेघ कहते हैं। जलवायविक दृष्टि से मेघों का अत्यन्त महत्त्व होता है।

♣ मौसम⇒ मौसम किसी स्थान की अल्पकालिक वायुमण्डलीय दशा (तापमान, वायु दाब, पवन, आर्द्रता एवं वृष्टि) है।

♣ मौसम के तत्व⇒ तापमान, आर्द्रता, वायुदाब, पवन, वृष्टि आदि मौसम के तत्व है।

♣ बेलांचली धारा (Littoral Current)⇒ बेलांचली धारा तट के समानान्तर प्रवाहित होती है तथा अपरदित पदार्थों के परिवहन में अत्यधिक महायता करती है, इसकी उत्पत्ति दो रूपों में होती है-

(i) जब पवन वेग से प्रभावित होकर जल, तट से टक्कर खाता है, तो वह मुड़कर तट के समानान्तर बेलांचली धारा के रूप में प्रवाहित होने लगता है।

(ii) पवन वेग के परिणामस्वरूप सागरीय तरंगें तट में तिरछे रूप में टकराती हैं, तो अधिकांश जल तट के समानान्तर बेलांचली धारा के रूप में प्रवाहित होने लगता है।

♣ तरंगिका (Rip Current)⇒ सागरीय लहर का जल जब सर्फ (Surf) के रूप में तट से टकराता है, तो उसका जल कई रूपों में बंट जाता है, कुछ जल बेलांचली धारा के रूप में प्रवाहित हो जाता है और कुछ जल अधः प्रवाह (undertow) के रूप में प्रवाहित होता है तथा कुछ जल तट से लौटकर जल की सतह पर तरंग के रूप में सागर की ओर लौट जाता है. इसी तरंग को तरंगिका कहते हैं।

♣ तटीय क्लिफ (Coastal Cliffs)⇒ सागरीय तरंगों के अपरदन द्वारा उत्पन्न क्लिफ सागर तटीय दृश्यावली का एक प्रमुख तथा विचित्र स्थल रूप है। क्लिफ का निर्माण तरंग द्वारा अपरदन के कारण तट-रेखा के सहारे होता है। अतः इसका निर्माण चट्टान के प्रकार, संरचना तथा स्वभाव और सागरीय अपरदन तथा भूपृष्ठीय अनाच्छादन के सापेक्षिक रूप पर आधारित होता है।

♣ तटीय कन्दरा⇒ सागर तटीय भाग की चट्टानों में जब सन्धियां पूर्णतया विकसित होती हैं, तो सागरीय तरंगें इन संधियों में प्रविष्ट होकर अपरदन करती है, जब इस तरह की कठोर शैलों में कोमल शैलें स्थित होती हैं, तो तरंगें उन्हें शीघ्र काटकर एक छोटी कन्दरा का निर्माण कर देती हैं। धीरे-धीरे अपरदन चलता रहता है और कन्दरा की गहराई तथा आकार दोनों में विस्तार होता रहता है। एक निश्चित समय में पूर्ण विकसित तटीय कन्दरा का निर्माण हो जाता है।

♣ अण्डाकार कटान तथा लघुनिवेशिका (Cove)⇒ जब तट के समानान्तर क्रमशः कठोर तथा कोमल चट्टानों की परतों का विस्तार होता है, तो तरंग का जल कठोर चट्टान की संधियों में प्रविष्ट होकर भीतर चला जाता है। इस कठोर शैल के नीचे कोमल शैल है। अतः प्रविष्ट जल कोमल शैल को भीतर ही भीतर अपरदित करके खोखला बनाता रहता है। इस प्रकार कोमल चट्टान वाले भागों में अण्डाकार कटान तथा उससे निर्मित आकृति को लघु निवेशिका या लघु खाड़ी कहा जाता है।

♣ तरंग-घर्षित वेदी (Wave-cut platform)⇒ जब सागरीय तरंगें क्लिफ से टकराकर उसके आधार पर दांत या खांच का निर्माण करती हैं। तब धीरे-धीरे खांच के विस्तृत होने पर क्लिफ का लटकता हुआ ऊपरी भाग टूटकर गिरने लगता है तथा क्लिफ निरन्तर पीछे हटता जाता है। इस क्रिया के परिणामस्वरूप क्लिफ के सामने के तटीय भाग पर जल के अन्दर एक मैदान का निर्माण हो जाता है जिसको तरंग-घर्षित मैदान या तरंग घर्षित प्लेटफार्म या बेदी कहते हैं।

♣ पुलिन कूट (Beach Ridges)⇒ जिन पुलिन तटों पर निरन्तर पदार्थों का निक्षेपण होता रहता है। वहां पर पुलिन कूटों की रचना हो जाती है, फ्लोरिडा तथा डंगनेश जैसी चौड़ी पुलिनों पर प्रायः कई कूटें देखी जाती हैं।

♣ पुलिन उभयाग्र⇒ जब पुलिन तट के सहारे लगभग समान दूरी पर बालू तथा अन्य अवसाद का त्रिकोण के रूप में निक्षेपण होता है, जिसे पुलिन उभयाग्र कहते हैं। इनकी रचना लहरों के द्वारा समुद्र की ओर प्रक्षिप्त स्थल के अपरदन तथा खाड़ियों में निक्षेपण के फलस्वरूप होती है।

♣ पुलिन (Beaches)⇒ समुद्री लहरों द्वारा तट के अपरदन से जो पदार्थ प्राप्त होता है, वह अधिकांशतः तट के समीप जमा हो जाता है, इस निक्षेप के कारण तट के समीप का क्षेत्र उथला हो जाता है। जलमग्न तट के इस उथले क्षेत्र को ही पुलिन कहते हैं।

♣ अपतटीय बलुई भित्तियाँ (Offshore Bar)⇒ जब लहरों द्वारा निर्मित बलुई भित्ति तट से दूर खुले समुद्र में बनती है, तो उसे अपतटीय बलुई भित्ति कहते हैं। सामान्यतः यह तट रेखा के समानान्तर होती है। इसका ऊपरी भाग जल की सतह से ऊपर उठा हुआ रहता है।

♣ भूजिह्वा (Spit)⇒ जब सागरीय मलवा (कंकड़, पत्थर आदि) का निक्षेप इस तरह होता है कि वह रोधिका के रूप में जल की ओर निकला रहता है, उसे भूजिह्वा (spit) कहते हैं।

♣ संयोजक रोधिका या अर्गला (Connecting Bar or Tombolo) ⇒ जब कभी लहरों द्वारा ऐसी संलग्न भित्तियों का निर्माण होता है, तो तटवर्ती छोटे-छोटे द्वीपों के परस्पर हों अथवा किसी द्वीप को मुख्य स्थल से जोड़ती हों, तो उन्हें संयोजक रोधिका कहा जाता है। इटली में ऐसी भित्तियों को संयोजक अर्गला (Tombolo) कहते हैं।

♣ अंकुश (Hook) ⇒ जब मोड़ने वाली तरंग या धारा अधिक प्रबल हो जाती है तो स्पिट का अग्र भाग तट की ओर मुड़ जाता है। धीरे-धीरे यह मोड़ बढ़ता जाता है तथा कुछ समय बाद यह अंकुश के आकार का हो जाता है। इंगलैण्ड में हम्बर नदी के मुहाने से कुछ दूर स्पर्न हेड के समीप अंकुश के सुन्दर रूप देखे जा सकते हैं।

♣ वात गर्त (Blow out) ⇒ उष्ण मरुस्थली भागों में धरातल के ऊपर बिछी हुई कोमल और असंगठित चट्टानों के टीलों और हल्के कणों को हवा अपने साथ उड़ा ले जाती है, जिससे चट्टानों में पहले छोटे-छोटे गर्तों का आविर्भाव होता है, धीरे-धीरे इन गर्तों के आकार और गहराई में वृद्धि होती जाती है। यद्यपि इन वात गर्तों की गहराई भौम-जल स्तर के नीचे नहीं होती, किन्तु मरुस्थलों में कई जगह ये वात गर्त समुद्र जल से भी नीचे तक पाए जाते हैं। इस प्रकार के वात गर्त सहारा, कालाहारी, मंगोलिया तथा संयुक्त राज्य अमेरिका के पश्चिमी शुष्क भाग में अधिक पाए जाते हैं।

छत्रक या गारा (Mushrooms or Gara)⇒ मरुस्थलीय प्रदेशों में बालू से लदी हुई हवा चट्टानों के निचले भाग को तीव्रता से घिसती रहती है। हवा के इस अपघर्षण से ऊपर उठे हुए चट्टानी भागों में विशेष आकृतियाँ बन जाती हैं, चारों ओर से हवा के सतत प्रहार से चट्टानों का निचला भाग कटकर संकीर्ण हो जाता है और उसके ऊपर का भाग विशाल मेज की भांति सपाट तथा चौड़ा बना रहता है। कभी-कभी ऊपरी भाग वर्षा से गोलाकार तथा चिकना भी हो जाता है। जो कुकुरमुत्ता नामक पौधे के सदृश प्रतीत होती है। इन्हीं चट्टानों को छत्रक (Mushrooms Rocks) कहा जाता है।

♣ ज्यूगेन (Zeugen)⇒ जिन मरुस्थली प्रदेशों में कठोर चट्टानों के परत कोमल चट्टानों के ऊपर क्षैतिज (horizontal) रूप में बिछे हुए पाए जाते हैं। सर्वप्रथम अपक्षय के कारण ऊपर कठोर चट्टानों की संधि चौड़ी होती हैं, जब धीरे-धीरे संधि काफी चौड़ी हो जाती हैं, तो नीचे की कोमल चट्टानी परत निकल आती है, जिसे हवा शीघ्र ही काट देती है और चट्टानों के बीच-बीच में घाटियाँ-सी बन जाती हैं। इस प्रकार कठोर चट्टानी भाग कोमल चट्टानों के ऊपर टोपी की तरह अवस्थित रहता है। सहारा में इस प्रकार की चट्टानों की आकृतियों को ज्यूगेन (Zeugen) कहते हैं।

♣ यारडांग (Yardangs)⇒ जब कहीं कठोर और कोमल शैलों की पट्टियाँ प्रचलित हवा की दिशा के अनुरूप फैली हुई पाई जाती हैं, तो वहां ‘कटक और खांचे’ के समरूप भू-दृश्य उत्पन्न हो जाता है। हवा के अपघर्षण से कटकों के पवनाभिमुख अग्र सुघड़ एवं गोलाकार तथा उनके शिखर सुई के समान नुकीले बन जाते हैं। इन्हें यारडांग कहते हैं।

♣ अनुप्रस्थ परिच्छेद (Cross Section)⇒ किसी सरल रेखा पर उर्ध्वाधर कटी हुई भूमि का पार्श्वचित्र। इसे परिच्छेद अथवा परिच्छेदिका भी कहते हैं।

♣ अपवाह (Drainage) ⇒ नदियों अथवा सरिताओं का वह तंत्र जो किसी प्रदेश के सम्पूर्ण वर्षा-जल को बहाकर ले जाता है।

♣ अवस्थिति खण्ड (Location Quotient)⇒ किसी क्षेत्र विशेष के कुछ अभिलक्षकों के प्रतिशत और उन्हीं के पूरे प्रदेश के प्रतिशत के बीच अनुपात को अवस्थिति खण्ड कहते हैं।

♣ अक्षांशीय पैमाना (Parallel Scale) ⇒ किसी अक्षांश रेखा पर की वह दूरी जो दो देशान्तर रेखाओं के बीच नापी जाए। अक्षांशीय पैमाना मानक अक्षांश रेखा पर सर्वदा शुद्ध रहता है।

आपेक्षित परिक्षेपण (Relative Dispersion) ⇒ किसी बारम्बारता बंटन के परिक्षेपण का माप और उसकी केन्द्रीय प्रवृत्ति की माप के बीच के अनुपात को आपेक्षिक परिक्षेपण कहते हैं।

♣ आयतचित्र (Histogram)⇒ बारम्बारता बंटन, जैसे वर्षा की ऋतु के अनुसार बारम्बारता का ग्राफीय प्रदर्शन।

♣ उच्चावच (Relief) ⇒ पृथ्वी के धरातलीय लक्षण जैसे, पर्वत, पठार, मैदान, घाटी तथा जलाशय के लिए दिया गया सामूहिक नाम। भू-सतह की ऊंचाइयों एवं गर्तों को उच्चावच-लक्षण कहते हैं।

♣ उच्चावच मानचित्र (Relief Map)⇒ समोच्च रेखा, आकृति रेखा, स्तर-रंजन, हैश्यूर, पहाड़ी-छायाकरण जैसी विधियों में से किसी एक अथवा इन विधियों के मिश्रण द्वारा एक समतल धरातल पर किसी क्षेत्र के उच्चावच को निरूपित करने वाला मानचित्र।

♣ एकदिश नौपथ (Rhumb Line)⇒ किसी प्रक्षेप पर सभी देशान्तर रेखाओं को एक ही कोण पर काटने वाली नियत दिगंशीय रेखा।

♣ केन्द्रीय देशान्तर रेखा (Central Meridian)⇒ किसी भी मान की देशान्तर रेखा जब प्रक्षेप के केन्द्र या मध्य भाग में स्थित होती है तो इसे केन्द्रीय देशान्तर रेखा या मध्य देशान्तर रेखा कहते हैं। इसका प्रधान मध्याह्न रेखा से कोई सम्बन्ध नहीं होता।

♣ केन्द्रीय प्रवृत्ति (Central Tendency)⇒ सांख्यिकीय आंकड़ों की प्रवृत्ति जो किसी मान के आस-पास गुच्छित होती है।

♣ ग्रिड (Grid)⇒ पृथ्वी पर अक्षांश और देशान्तर रेखाओं का जाल पृथ्वी का ‘ग्रिड’ कहलाता है।

♣ चक्रारेख (Wheel Diagram)⇒ वृत्तीय आरेख जिसमें आंकड़े को प्रतिशत के रूप में प्रदर्शित करने के लिए वृत्त की त्रिज्या खण्डों में विभाजित करते हैं।

♣ चतुर्षक (Quartile) ⇒ चतुर्थक चर संस्थाओं के वे मान हैं जो श्रृंखला के पदों को चार बराबर भागों में बांटते हैं।

♣ चुम्बकीय उत्तर (Magnetic North) ⇒ चुम्बकीय कम्पास की सुई द्वारा निर्देशित दिशा। चुम्बकीय उत्तरी ध्रुव यथार्थ उत्तर ध्रुब से भिन्न है और यह समय के साथ धीरे-धीरे खिसकता रहता है।

♣ चर (Variable)⇒ कोई भी अभिलक्षण जो बदलता रहता है। संख्यात्मक चर वह अभिलक्षण है जिसके अलग-अलग मान होते हैं और उनका अन्तर संख्यात्मक रूप से मापा जा सकता है। 

♣ जलवायु मानचित्र (Climatic Maps)⇒ संसार अथवा उसके किसी भाग पर किसी विशेष अवधि से विद्यमान तापमान, वायुदाब, वायु, वृष्टि एवं आकाश की सामान्य दशाओं को प्रकट करने वाला मानचित्र।

♣ जल विभाजक (Water Shed)⇒ परस्पर विरोधी दिशाओं में प्रवाहित जल का विभाजन करने वाला पतला एवं ऊंचा स्थलीय भाग।

♣ दण्ड आलेख (Bar Graph)⇒ स्तम्भों या दण्डों की एक श्रृंखला जिसमें दण्डों की लम्बाई उनके द्वारा प्रदर्शित मात्रा के अनुपात में होती है। ये स्तम्भ या दण्ड चुने हुए पैमाने के अनुसार खींचे जाते हैं। ये क्षैतिज या ऊर्ध्वाधर रूप से खींचे जा सकते हैं।

♣ देशान्तरीय पैमाना (Meridian Scale)⇒ किसी देशान्तर रेखा पर नापी गई दो अक्षांश रेखाओं के बीच की दूरी।

♣ पवनारेख (Wind Rose)⇒ किसी स्थान पर किसी अवधि में विभिन्न दिशाओं में बहने वाली वायु की आवृत्ति को प्रकट करने वाला आरेख।

♣ पेन्टोग्राफ (Panto Graph)⇒ मानचित्रों को शुद्धतापूर्ण बड़ा करने या छोटा करने के लिए प्रयोग में आने वाला यंत्र।

♣ प्रकीर्ण आरेख (Scatter Diagram) ⇒ एक प्रकार का आरेख जिसमें ग्राफ कागज पर दो अभिलक्षकों का विचलन दिखाया जाता है।

♣ प्रवाह मानचित्र (Flow Map) ⇒ मानचित्र जिसमें ‘प्रवाह’ अर्थात लोगों या वस्तुओं का गमनागमन रिबनों द्वारा प्रदर्शित किया जाता है। इन रिबनों की मोटाई उनके द्वारा प्रदर्शित विभिन्न मार्गों पर आने जाने वाली वस्तुओं की मात्रा या लोगों की संख्या के अनुपात में होती है।

♣ बहुलक (Mode) ⇒ किसी श्रेणी में बहुलक चरांक का वह मान होता है, जो सबसे अधिक बार आता है। दूसरे शब्दों में बहुलक पद का वह मान है जिसकी बारम्बारता सबसे अधिक होती है।

♣ बरम्बारता बंटन सारणी (Frequency Distribution Table) ⇒ विभिन्न परिसरों में पड़ने वाले चर के विविध मानों के इन परिसरों को वर्ग कहते हैं और प्रत्येक वर्ग में पड़ने वाले विभिन्न मानों को बारम्बारता कहते हैं।

♣ बृहत् वृत्त (Great Circle)⇒ पृथ्वी की सतह पर वह काल्पनिक वृत्त जिसका तल पृथ्वी को समद्विभाग करता हुआ उसके केन्द्र से होकर गुजरे। पृथ्वी की सतह पर किन्हीं दो बिन्दुओं के बीच की लघुत्तम दूरी एक वृहत् वृत्त के चाप पर होगी।

♣ भू-कर मानचित्र (Cadastral Map)⇒ प्रत्येक खेत एवं भूमि के टुकड़े का विस्तार तथा माप के यथार्थ प्रदर्शनार्थ बहुत बड़े पैमाने पर खींचे गए मानचित्र भू-सम्पत्ति एवं उस पर लगाए जाने वाले कर निर्धारण के लिए इन मानचित्रों की आवश्यकता पड़ी थी। अतः इनका नाम भी भू-कर मानचित्र पड़ गया।

♣ भूमि उपयोग (Land Use)⇒ भूमि की सतह का मानव द्वारा उपयोग। विरल जनसंख्या वाले क्षेत्रों में प्राकृतिक एवं अर्ध- प्राकृतिक वनस्पति से आच्छादित भूमि भी इसके अन्तर्गत आ जाती है।

♣ माध्य विचलन (Mean Deviation)⇒ किसी केन्द्रीय मान से विचलनों के औसत द्वारा परिक्षेपण की माप। ऐसे विचलनों को निरपेक्ष रूप में लिया जाता है अर्थात् उनके धनात्मक अथवा ऋणात्मक चिह्नों पर ध्यान नहीं दिया जाता। केन्द्रीय मान सामान्यतः माध्यिका का माध्य होता है।

♣ माध्यिका (Median)⇒ जब किसी श्रेणी के पदों के विस्तार को आरोही अथवा अवरोही क्रम में रखा जाता है तो मध्य पद का मान माध्यिका कहलाती है। इससे स्पष्ट हुआ कि माध्यिका पूर्ण श्रेणी को दो बराबर भागों में बांटती है और इससे आधे पदों के मान ऊपर और आधे के नीचे होते हैं।

♣ मानक अक्षांश रेखा (Standard Parallel)⇒ किसी भी प्रक्षेप की वह अक्षांश रेखा जिस पर पैमाना शुद्ध हो।

♣ मानक विचलन (Standard Deviation)⇒ विक्षेपण के सर्वनिरपेक्ष मापकों में यह सबसे सामान्य मापक है। यह श्रेणी के समस्त पदों के माध्य से निकाले गए विचलनों के वर्गों के माध्य का धनात्मक वर्गमूल होता है।

♣ मानचित्र (Map)⇒ पृथ्वी के धरातल के छोटे या बड़े किसी क्षेत्र का एक चौरस सतह पर पैमाने के अनुसार रूढ़ निरूपण जैसा कि ठीक ऊपर से देखने पर प्रतीत होता है।

♣ मानचित्र कला (Cartography)⇒ सभी प्रकार के मानचित्र बनाने की कला। इसके अन्तर्गत मौलिक सर्वेक्षण से लेकर मानचित्र के अन्तिम मुद्रण तक की सभी क्रियाएं आती है।
♣ मानचित्र प्रक्षेप (Map Projection)⇒ अक्षांश एवं देशान्तर रेखाओं के जाल को पृथ्वी की गोलाकार सतह से एक समतल पर स्थानान्तरित करने की विधि।

♣ मानचित्रावली (Atlas)⇒ एक पुस्तक के रूप में बंधा हुआ मानचित्रों का संग्रह। प्रायः ये मानचित्र छोटे पैमाने पर बनाए जाते हैं।

    एटलस शब्द सर्वप्रथम सन् 1595 ई. में मर्केटर के मानचित्रों के संग्रह के आवरण-पृष्ठ पर प्रकाशित हुआ था। इस शब्द की उत्पत्ति और भी प्राचीनतम है, क्योंकि पौराणिक विश्वासों के अनुसार यह आकाश को सहारा देने वाले एटलस पर्वत से सम्बन्धित है।

♣ मानारेख (Cartogram)⇒ किसी क्षेत्र की मूल आकृति को किसी विशेष उद्देश्य से विकृत कर सांख्यिकीय आंकड़ों का आरेखी विधि से मानचित्र पर प्रदर्शन।

    यह प्रायः किसी एक की कल्पना को आरेखी ढंग से प्रतिष्ठित करने वाला अति सारगर्भित एवं सरल मानचित्र होता है। यह आधुनिक भूगोल के प्रमुख तथा लोकप्रिय साधनों में से एक है।

♣ मापनी (Scale)⇒ मानचित्र पर किन्हीं दो बिन्दुओं के बीच की दूरी और भूमि पर के उन्हीं बिन्दुओं के बीच की वास्तविक दूरी का अनुपात।

♣ मिश्र माप (Composite Measurement)⇒ कई अंतर्सहसम्बन्धित चरांकों के व्यापक प्रभाव का मापन।

♣ रेखीय मापनी (Linear Scale)⇒ रेखा द्वारा मापनी प्रदर्शन करने की एक विधि जिसमें रेखा को सुविधानुसार प्रधान तथा द्वितीयक भागों में बांटा जाता है और जिससे मानचित्र पर दूरियां सीधे नापी और पढ़ी जा सकती हैं।

♣ रैखिक आलेख (Line Graph)⇒ X अक्ष और Y अक्ष पर दो निर्देशांकों की सहायता से निर्धारित बिन्दु-श्रृंखला को मिलाने वाली निष्कोण रेखा। इसमें एक चर में परिवर्तन दूसरे चर के निर्देशांक से दिखाया जाता है। इसका उपयोग प्रायः वर्षा, तापमान, जनसंख्या में वृद्धि, उत्पादन, इत्यादि से सम्बन्धित आंकड़ों को प्रकट करने में किया जाता है।

♣ लॉरेंज वक्र (Lorntz Curve) ⇒ अभिलक्षकों के संकेन्द्रण को दिखाने वाली एक ग्राफीय विधि।

♣ वर्ग-अन्तराल (Class-interval)⇒ किसी बारम्बारता बंटन के उपरि-वर्ग और निम्न वर्ग की सीमाओं के बीच का अन्तर वर्ग-अन्तराल कहलाता है।

♣ वर्णमापी मानचित्र (Choropleth Map) ⇒ मानचित्र जिनमें क्षेत्रीय आधार पर मात्राओं को प्रदर्शित किया जाता है। ये मात्राएं किसी विशिष्ट प्रशासनिक इकाइयों के भीतर प्रति इकाई क्षेत्र के औसत मान होते हैं। जैसे जनसंख्या का घनत्व, कुल जनसंख्या में नागरिक जनसंख्या का प्रतिशत आदि।

♣ वास्तविक उत्तर (True North) ⇒ पृथ्वी के उत्तर ध्रुव द्वारा संकेतित दिशा। इसे भौगोलिक उत्तर भी कहते हैं।

♣ विकर्ण मापनी (Diagonal Scale) ⇒ रेखीय-मापनी (ग्राफिक स्केल) का विस्तार, जिसमें एक सेण्टीमीटर या इंच का अल्पांश भी नापा जा सकता है। यह रेखीय मापनी के गौण भाग से भी छोटा भाग मापने में सहायक होती है।

♣ वितरण मानचित्र (Distribution Map) ⇒ बिन्दु तथा छायाकरण जैसी विधियों द्वारा विभिन्न भौगोलिक तत्वों एवं उनकी आवृत्ति, प्रबलता तथा घनत्व की अवस्थिति को प्रदर्शित करने वाला मानचित्र। उदाहरणार्थ इन मानचित्रों द्वारा किसी क्षेत्र की उपज, पशुधन, जनसंख्या, औद्योगिक उत्पादन, आदि के वितरण को प्रदर्शित किया जाता है।

♣ विक्षेपण या फैलाव (Dispersion)⇒ किसी चरांक के विभिन्न मानों में आन्तरिक विभिन्नताओं की गहनता।

♣ संचयी बारम्बारता (Cumulative Frequency)⇒ किसी निश्चित मान से अधिक अथवा कम मानों वाले कई प्रेक्षण।

♣ समकोण दर्शक यंत्र (Optical Square)⇒ जरीब सर्वेक्षण में जरीब से निकटवर्ती वस्तुओं के अन्तर्लंब नापने के काम में आने वाला यंत्र।

♣ सममान रेखा मानचित्र (Isopleth Maps)⇒ मानचित्र जिनमें एक से मानों या एकसमान संख्याओं वाले बिन्दुओं को मिलाने वाली काल्पनिक रेखाएं अर्थात् सममान रेखाएं बनी होती हैं, उदाहरणार्थ समताप रेखा मानचित्र।

♣ समोच्च रेखा (Contours)⇒ समुद्रतल से समान ऊंचाई पर स्थित बिन्दुओं को मिलाने वाली काल्पनिक रेखा। इसे समतल रेखा भी कहते हैं।

♣ समोच्च रेखा का अन्तर्वेशन (Interpolation of Contours)⇒ मानचित्र पर दी गई स्थान की ऊंचाइयों की सहायता से समोच्च रेखाएं खींचना।

♣ समोच्चरेखीय अन्तराल (Contour interval)⇒ दो उत्तरोत्तर समोच्च रेखाओं के बीच का अन्तर। इसे ऊर्ध्वाधर अन्तराल भी कहते हैं। यह प्रायः अंग्रेजी के अक्षरों द्वारा लिखा जाता है। किसी भी मानचित्र पर प्रायः इसका मान स्थिर होता है।

♣ सर्वेक्षण (Surveying)⇒ पृथ्वी की सतह पर विन्दुओं की सापेक्ष स्थिति निर्धारण के लिए प्रेक्षण तथा रैखिक एवं कोणात्मक मापन कला। भूपृष्ठ के किसी भाग की सीमा, विस्तार, स्थिति तथा उच्चावच के निर्धारण में यह लाभदायक होता है।

♣ सहसम्बन्ध गुणांक (Correlation Co-efficient)⇒ दो चरांकों के बीच सम्बन्धों की दिशा और गहनता की माप।

♣ सुदूर संवेदन (Remote Sensing)⇒ वस्तुओं को स्पर्श किए बिना दूर से ही उसके बारे में सूचनाएं प्राप्त करने के विज्ञान को सुदूर संवेदन कहते हैं। इसमें भूमि अथवा उसके ऊपर वस्तुओं से परावर्तित, प्रकीर्णित या उत्सर्जित विद्युत चुम्बकीय विकिरण का संवेदन विद्युत प्रकाशित यंत्रों तथा कैमरों द्वारा किया जाता है।

♣ स्तर रंजन (Layer Colouring)⇒ मानचित्र पर रंगों की सहायता से उच्चावच दिखाने की एक विधि जो विशेषतया एटलस के मानचित्रों तथा दीवारी मानचित्रों से अपनाई जाती है। रंग-व्यवस्था सर्वत्र समान रूप से मान्य होती है, उदाहरणार्थ, समुद्र के लिए नीले रंग की छटाएं, निम्न स्थलों के लिए हरा रंग, उच्च भूमि के लिए भूरा रंग तथा अत्यधिक ऊंची भूमि के लिए गुलाबी रंग।

♣ स्थलाकृतिक मानचित्र (Topographic Map)⇒ भूसतह के प्राकृतिक एवं मानवकृत ब्यौरों को प्रदर्शित करने वाला बड़े पैमाने पर खींचा गया एक छोटे क्षेत्र का मानचित्र। इस मानचित्र पर उच्चावच समोच्च रेखाओं द्वारा प्रकट किया जाता है।

error: