2. उपग्रहों के विकास के इतिहास / The Historical Development of Satellite

2. उपग्रहों के विकास के इतिहास

(The Historical Development of Satellite)



उपग्रहों के विकास के इतिहास⇒

              1950 के दशक में कृत्रिम उपग्रह को विकसित कर पृथ्वी के कक्ष में छोड़ा गया था। आरंभ में उनका उपयोग सामरिक दृष्टि से किया गया किन्तु बाद में वैज्ञानिकों ने इनका उपयोग साधारण कार्यों में भी करना आरंभ किया।

          सर्वप्रथम सोवियत संघ में 4 अक्टूबर, 1957 से स्पुतनिक-1 (Sputnik-1) को बाह्य अन्तरिक्ष में छोड़ा गया। पुनः कुछ माह के अन्तराल में ही सोवियत संघ ने स्पुतनिक-2 (Sputnick-2) का अन्तरिक्ष में प्रक्षेपण किया, जिसमें परीक्षण हेतु ‘लाइका’ नामक कुत्ता भी भेजा गया था। इसके सकुशल लौटने के पश्चात् अध्ययन द्वारा यह ज्ञात हुआ कि मानव बाह्य अन्तरिक्ष में जीवित रह सकता है। 1958 में संयुक्त राज्य अमेरिका ने अन्तरिक्ष यान एक्सप्लोरर (Explorer-2) को अन्तरिक्ष में भेजा जो शुक्र ग्रह के नजदीक से गुजरा था। इसके नजदीक से भेजे गये चित्रों एवं आंकड़ों से शुक्र ग्रह की सतह पर सर्वाधिक तापमान होने तथा अपनी धूरी पर पृथ्वी की अपेक्षा शुक्र ग्रह के विपरीत दिशा में परिभ्रमण करने के विषय में वैज्ञानिकों को महत्वपूर्ण जानकारी प्राप्त हुई। 12 अप्रैल, 1961 में सोवियत संघ के यूरी गागरिन (Uuri Gagarin) ने अन्तरिक्ष की यात्रा कर प्रथम अन्तरिक्ष यात्री होने का गौरव प्राप्त किया। 21 जुलाई, 1969 में मानव ने प्रथम बार चन्द्रमा पर अपने कद रखे। अपोलो 11, अन्तरिक्ष यान द्वारा नील आर्मस्ट्रांग (Neil Armstrong) एवं एडविन एलड्रीन (Edvin Aldrin) दो अन्तरिक्ष यात्री चन्द्रमा पर उतरे थे। तब से लेकर अब तक निरन्तर अन्तरिक्ष में उपग्रहों को भेजने का क्रम जारी है।

विदेशी उपग्रह (Foreign Satellites):-

        विकसित देशों में सुदूर संवेदन तकनीक अत्यधिक विकसित है। समय-समय पर अन्तरिक्ष में प्रक्षेपित उपग्रहों का संक्षिप्त विवरण निम्न है।

टाइरोस (TIROS) तथा नोआ (NOAA) क्रम:-

         संयुक्त राज्य अमेरिका ने 13 अक्टूबर, सन् 1978 में टेलीविजन एवं इन्फ्रारेड ऑपरेशनल उपग्रह (Television and Infrared Operational Satellite- TIROS) को अन्तरिक्ष में प्रक्षेपित किया था। इस क्रम में नेआ-6 (National Oceanic And Atmospheric Administrative) उपग्रहों को मौसम संबंधी जानकारियों के लिये अन्तरिक्ष में भेजा था। ये तृतीय युग के ध्रुवीय कक्ष में स्थापित मौसम संबंधी उपग्रह हैं।

उद्देश्य (Objective):-

         HCMM का प्रमुख उद्देश्य धरातलीय जटिलताओं का विश्लेषण करना तथा तापीय जड़त्व से मानचित्र तकनीक को विकसित करना है।

समुद्रीय उपग्रह (Seasat):-

           प्रथम समुद्रीय उपग्रह 26 जनवरी, 1978 में समुद्रीय दशाओं के अवलोकन के लिये ध्रुवीय कक्ष में 800 किमी० की ऊँचाई पर प्रक्षेपित किया गया था। समुद्रीय उपग्रह को शोध उपग्रह भी कहा जाता है जिसको इस प्रकार डिजाइन्ड किया गया कि यह प्रत्येक 36 घंटे के अंतर्गत दिन और रात में कवरेज देता रहे। प्रक्षेपण के 99 दिन बाद इसने कार्य करना बन्द कर दिया था।

अवकाश प्रयोगशला (SKYLAB):-

          स्काईलैब मानव युक्त अन्तरिक्ष स्टेशन था जिसे 435 किमी० की ऊँचाई पर मई, 1973 में पृथ्वी के कक्ष में स्थापित किया गया था। इसमें फोटोग्राफिक कैमरा तथा 13 चैनल युक्त बहुस्पैक्ट्रल स्कैनर को ले जाया गया था। इसमें एक विद्युत टेप होता है जिसमें एम.एस.एस. डिजिटल आँकड़े अंकित होते हैं। खींची गई फोटो रीलों तथा विद्युत टेप को पृथ्वी पर क्रीव (Crew) के द्वारा लाया जाता है। स्काईलैब से उपलब्ध फोटोग्राफ तथा डिजीटल आँकड़ों का विभेदन (Resoultion) 60 मीटर से 73 मीटर था।

स्पॉट (System Probalor Obesrvation Terr- SPOT):-

           फ्रांस में Center National Eludes Spatials द्वारा अप्रैल, 1985 में क्रमश: SPOT-1 को अन्तरिक्ष में पृथ्वी से 822 किमी० की ऊँचाई पर प्रक्षेपित किया गया। इसका कक्ष ध्रुवीय गोलाकार है। उपग्रह का आकार व ढाँचा इस प्रकार तैयार किया गया कि नादिर बिन्दु व नादिर बिन्दु से दूर दोनों तरह की स्थितियों में सूचनाओं को भली-भांति एकत्र किया जा सके। नादिर दृश्य में इसका चक्र प्रति 26 दिन बाद आता है। उपग्रह को इस प्रकार नियोजित किया गया है कि यह भूमध्यरेखा को ठीक 10.30 बजे पार करे। स्पॉट (SPOT) की खास विशेषता यह है कि इसको वृहत मापनी पर विकसित अन्तर्राष्ट्रीय प्रोग्राम भूमि स्टेशन (Ground Receiving Station) के साथ तैयार किया गया है जो 30 से अधिक देशों में स्थित हैं। आँकड़ों का वितरण तथा उपयोग 30 देशों से अधिक देशों द्वारा किया जाता है।

लैंडसेट उपग्रह-क्रम (Landsat Series of Satellites):-

          लैंडसेट उपग्रह को भू-संसाधन तकनीक उपग्रह (Earth Resources Technology Satellite- ERTS) कहते हैं। इसको संयुक्त राज्य अमेरिका के नासा द्वारा ध्रुवीय कक्षा में स्थापित किया गया। ERTS-1 का प्रक्षेपण 13 जुलाई, 1972 में किया गया था तथा इसने 6 जनवरी, 1978 से कार्य करना बन्द कर दिया था। यह तितली की आकृति का 3 मीटर लम्बा तथा 1.5 मी० अर्द्धव्यास का है। इस पर 4 मीटर लम्बे सौर्य ऊर्जा पैनल लगे हुये हैं। यह एक सूर्य तुल्यकालिक उपग्रह है जो भूमध्य रेखा को प्रत्येक पथ में ठीक एक समय (स्थानीय) पर पार करता है। लैंडसेट 1, 2 व 3 भूमध्यरेखा को सुबह 11 बजे पार करता है। सुबह के समय आसमान स्वच्छ एवं साफ रहता है जो कि सौर्य ऊर्जा के परावर्तन विशेषताओं के लिये तथा फोटोग्राफिक उपयोगों के लिये बहुत उपयुक्त होता है।

           संयुक्त राज्य अमेरिका के 43 राज्यों तथा 36 देशों में ERTS-1 में 300 प्रयोग किये गये थे। 22 जनवरी, 1975 को ERTS-B को अन्तरिक्ष में प्रक्षेपित करने से पूर्व नासा (NASA) ने ERTS प्रोग्राम का नाम बदलकर ‘लैंडसेट’ (Landsat) प्रोग्राम रख दिया। इसके क्रम में जो भी उपग्रह छोड़े गये उनका नाम लैंडसेट रखा गया। इस प्रकार पांच लैंडसेट उपग्रह सफलता पूर्वक अन्तरिक्ष में प्रक्षेपित किये गये। लैंडसेट-6 प्रक्षेपण के दौरान असफल हो गया था।

लैंडसेट के उद्देश्य (Objects of Landsat):-

        लैंडसेट का प्रमुख उद्देश्य सुदूर संवेदन तकनीक द्वारा बहुआयामी धरातलीय सूचनाओं को प्राप्त करना एवं इनको भू-स्थित केन्द्र (Ground Station) को भेजना था। दूसरा, प्राप्त आंकड़ों को भू-केन्द्र पर परिष्कृत कर उपयोग के योग्य तैयार करना तथा उपयोगकर्ता तक पहुँचाना है।

भूसंसाधन उपग्रह (Earth Resources satellite):-

           भूसंसाधन उपग्रह दो प्रकार के होते हैं-

(1) मानवयुक्त भू-संसाधन उपग्रह (Manned Earth Resources Satellite):-

            मानवयुक्त भू-संसाधन उपग्रह में मनुष्य द्वारा फोटोग्राफिक सामग्री तथा धरातलीय बिम्बों को लेने के लिये संवेदक इत्यादि को उपग्रह में ले जाया जाता है। इन बिम्बों की फोटोग्राफिक विश्लेषण तकनीक द्वारा व्याख्या की जाती है। सबसे प्रथम जिस मानवयुक्त उपग्रह को तैयार किया गया, उसका नाम ‘अन्तरिक्ष दौड़’ (Space Race) रखा गया था। तत्पश्चात मानवयुक्त उपग्रह, आकाश प्रयोगशाला (Skylab) तथा अन्तरिक्ष शटल क्रम (Space Shuttle Series) को अन्तरिक्ष स्टेशन के रूप में प्रयोग के लिये तैयार किया गया। उदाहरण के लिये अन्तरिक्ष दौड़ (Space Race) उपग्रहों में सरकारी क्रम (1961), जैमिनी क्रम (1965) तथा अपोलो क्रम (1967) प्रमुख हैं। इसी प्रकार अन्तरिक्ष स्टेशन के अंतर्गत अन्तरिक्ष शटल (Space Shuttle) क्रम (1981) तथा स्काईलैब (1973) हैं।

(2) मानव रहित भू-संसाधन उपग्रह (Unmanned Earth Resources Satellite):-

           मानवरहित उपग्रह भू-धरातल के विम्बों को लेने के लिये अपने साथ कई संवेदकों को जाते हैं। इस प्रकार के सूचनाओं, आंकड़ों तथा बिम्बों का विश्लेषण, फोटोग्राफिक विश्लेषण तकनीक तथा डिजिटल इमेज प्रक्रिया तकनीक द्वारा किये जाते हैं।

नोआ उपग्रह (National Ocanic and Atmospheric Administration- NOAA):-

         नोआ (NOAA) उपग्रह क्रम में कई युगों के उपग्रह अन्तरिक्ष में प्रक्षेपित किये गये। नोआ-12 मिशन के अन्तर्गत नोआ 6 में एक अति उच्च श्रेणी का अग्रणी विभेदक (Advanced Very High Resolution- AVHRR) लगाया गया था। इनमें से कई मिशन में, भूमध्यरेखा को पार करने का समय दिन में (7.30 AM) तथा कई अन्य मिशन में रात्रि के समय (2.30 AM) निर्धारित किया गया।

        नोआ पूर्ण विभेदन पर AVHRR आंकड़ों को प्राप्त करता है तथा इन्हें दो अलग-अलग आकारों में व्यवस्थित करता है। पूर्ण निभेदन आंकड़ों को स्थानीय क्षेत्र कवरेज (Local Area Coverage) आंकड़े कहते हैं। विश्वस्तरीय क्षेत्र के आंकड़ों को 4 किमी० के विभेदन पर प्रतिचयन किया जाता है।

समुद्रीय प्रबोधक उपग्रह (Ocean Monitoring Satellite):-

             पृथ्वी का 2/3 भाग समुद्रों व महासागरों से घिरा हुआ है जो पृथ्वी के मौसम तथा जलवायु पर महत्वपूर्ण प्रभाव डालते हैं। यद्यपि इन प्राकृतिक संसाधनों के बारे में बहुत कम जानकारियाँ प्राप्त हैं। उपग्रह प्रतिविम्ब विस्तृत समुद्रीय क्षेत्रों का समय-समय पर सामान्य अवलोकन करते हैं। यह लक्ष्य परम्परागत महासागरीय मापन तकनीकियों के द्वारा पूरा करना असंभव सा जान पड़ता है। समुद्रीय उपग्रह (Seasat) के साथ कई प्रकार के यंत्रों को उपग्रह पर फिट किया जाता है। जो समुद्रीय क्रियाओं का प्रबोधन (Monitoring) करती रहती हैं। ये क्रियायें स्पैक्ट्रम के लघु-तरंग प्रभाग (Micro Wave Region) में अभिलेखित (Recording) की जाती हैं। समुद्रीय प्रबोधन करने वाला प्रमुख संवेदक (Sensor) निम्बुस 7 है जिसे 1978 में अन्तरिक्ष में प्रक्षेपित किया गया था। इस उपग्रह में समुद्रीय सम्भाग रंगीन स्कैनर (Coastal Zone में Colour Scanner-CZCS) को अन्तरिक्ष में ले जाया गया जो सीमित क्षेत्र का हो अवलोकन करता है तथा Proof of Concept मिशन को पूरा करता है। CZCS स्कैनर को विशेष रूप से समुद्र तटीय भागों के तापमान तथा रंगों के मापन व अभिलेखन के लिये तैयार किया गया था। यह विद्युत चुम्बकीय स्पैक्ट्रम के दृश्य, अवरक्त (नजदीक) तथा तापीय बैंडों के अन्तर्गत संभव है। इस प्रणाली में स्वाथ की चौड़ाई 1566 किमी० तथा नादिर बिन्दु पर धरातलीय विभेदन 825 मी० होता है।

जापान का उपग्रह:-

       जापान ने अपना प्रथम समुद्रीय अवलोकन उपग्रह (Marine Observations Satellite MOS IA) को 19 फरवरी, 1987 में प्रक्षेपित किया था तथा इसकी सफलता के बाद 7 फरवी, 1990 में MOS IB का सफलतापूर्वक प्रक्षेपण किया गया। इस उपग्रह पर मुख्यतः तीन यंत्र-

(i) चार चैनल युक्त बहुलवीयग रेडियोमीटर (Multispectral Electronic Self Scanning Radiometer- MESSR),

(ii) चार चैनलयुक्त दृश्य तथा तापीय अवरक्त रेडियोमीटर (Visiual and Thermal Infrared Radiometer- VTIR ) तथा

(iii) दो चैनलयुक्त लघुतरंग स्कैनिंग रेडियोमीटर (Microwave Scanning Radiometer- MSR) लगाये गये थे।

मौसम विज्ञानी उपग्रह (Meteorological Satellites):-

           मौसम विज्ञानी उपग्रह या मिटियोसेट (Meteosats) मुख्यतः मौसम की भविष्यवाणी एवं प्रबोधन के लिये गये हैं। इनमें जो संवेदक लगा रहता है उसमें भूमि स्थित प्रणाली की तुलना में अधिक (Course) धरातलीय विभेदन होता है। दूसरी ओर मिटियोसेट का लाभ यह है कि इनमें पृथ्वी को तय करने के अधिक उच्च सामयिक विभेदन होता है। मिटियोसेट आंकड़ों का उपयोग प्राकृतिक संसाधनों की जानकारी के लिये किया जाता है जहां कि बहुत वृहत क्षेत्र का मानचित्रण किया जा सकता है। वृहत क्षेत्र के मानचित्रण के लिये सूक्ष्म विवरण की आवश्यकता नहीं होती है। वृहत धरातलीय विभेदन, आंकड़ों के आकार को भी कम कर देता है तो जिससे इसकी प्रक्रिया भी सुगम हो जाती है।

           कई देशों में अलग-अलग प्रकार के मिटियोसेट अन्तरिक्ष में प्रक्षेपित किये हैं। इनमें संयुक्त राज्य अमेरिका का नोआ (NOAA) क्रम प्रमुख हैं। लैंडसेट, स्पॉट तथा आई. आर. एस. उपग्रहों की भांति इन्हें ध्रुव के नजदीक, सूर्य तुल्यकालिक कक्षा में स्थापित किया गया है। केवल GOES तथा INSAT क्रम के उपग्रह भू-स्थौतिक कक्षा में स्थापित हैं। भारत ने भी INSAT क्रम के उपग्रहों को अन्तरिक्ष में प्रक्षेपित किया है और जो दूर संचार एवं जलवायु विज्ञानी उपग्रह हैं।

मौसम विज्ञानी उपग्रह (Meteosat-8):-

            मिटियोसेट 8 को अन्तरिक्ष में अगस्त 2002 में प्रक्षेपित किया गया था। इसको MSG-1 के नाम से भी जाना जाता है, जिसका अर्थ है- Meteosat Second Generation (MSG), 2008 से मिटियोसेट-8 एवं मिटियोसैट-9 दोनों ही क्रियाशील हैं।

आइकोनोस (IKONOS):-

              यह एक नये युग का प्रथम तथ उच्च विभेदन वाला उपग्रह है। आइकोनोस-2 को अमेरिका द्वारा सितम्बर, 1999 में अन्तरिक्ष में स्थापित किया गया था, तबसे यह सफलतापूर्वक कार्य कर रहा है। इसका प्रमुख उद्देश्य पृथ्वी के धरातल के उच्च विभेदन वाले आंकड़े प्राप्त कर उनको दूसरे देशों को बेचकर धन कमाना है। यह व्यापारिक प्रक्रिया वर्ष 2000 से निरन्तर कार्य कर रही है। वर्तमान समय में आइकोनोस उपग्रह के आंकड़े सबसे महंगे हैं क्योंकि इनका विभेदन अभी तक सबसे अधिकतम (1 मीटर) है।

भू-अवलोकन-1 (Earth Observation-1, EO-1):-

            भू-अवलोकन-1 (EO-1) मिशन नासा (NASA) एक नया सहस्त्राब्दी (Millimium) प्रोग्राम था जो नये संवेदक स्पेसक्राफ्ट तकनीक पर केंद्रित था। यह सीधे लेण्डसेट एवं संबंधित भू-धरातल प्रबोधन (Monitoring) प्रणाली की कीमतों में कमी करने का था। भू-अवलोकन-1 का अन्तरिक्ष में प्रक्षेपण वर्ष 2000 में किया गया था जो आज तक सफलता पूर्वक संचालित हो रहा है।

प्रोबा/चरिस (Proba/Chris):-

             यूरोपियन स्पेश संस्था (ESA) का सबसे सूक्ष्म (Project for on-Brond Autonomy- Proba) है जिसे अक्टूबर 2001 में प्रक्षेपित किया गया था। इसका प्रमुख उद्देश्य एक नये तकनीकि प्रयोग का प्रयोग करना था। प्रोबा कई प्रकार के यंत्रों को ले जा सकता है, उनमें से प्रमुख Compact High Resolution Imaging Spectrometer (CHRIS) है। CHRIS का उपयोग धरातल के दिशा स्पैक्ट्रल परावर्तन का मापन करने में किया जाता है जो नये जैव-भौतिक (biophysical) एवं जैव-रसायनिक सूचनाओं को प्रस्तुत करने में अति सहायक है।

इनवीसैट-1 (Envisat-1):-

           इनवीसैट को 2001 में अन्तरिक्ष में प्रक्षेपित किया गया था। इसका प्रमुख उद्देश्य वायुमण्डल, समुद्र, भूमि तथा हिमानी क्षेत्रों की विशेषताओं का मापन करना था। यह 8200 किग्रा० का सबसे भारी भरकम उपग्रह था जो कई प्रकार के संवेदकों को ले जाने में सक्षम था। इसको कई वैज्ञानिकों के समूह ने तैयार करवाया था जो कई तरह के यंत्रों से सुसज्जित है।

भारत का सुदूर संवेदन कार्यक्रम

           भारत द्वारा अन्तरिक्ष कार्यक्रम का शुभारम्भ सन् 1972 में भारत सरकार द्वारा अन्तरिक्ष आयोग (Space Commission) एवं अन्तरिक्ष विभाग (Department of Space-DOS) की स्थापना के साथ प्रारम्भ हुआ था। इनकी स्थापना में अन्तरिक्ष कार्यक्रम को अति व्यापक बनाया गया जिसके अन्तर्गत अन्तरिक्ष प्रक्षेपण प्रणाली (Space Launch System) उपग्रहों का विकास तथा उपयोग को विशेष महत्व दिया गया। यह एक पूर्ण संगठित कार्यक्रम था जो विश्वसनीय अन्तरिक्ष सेवाओं की व्यवस्था करता है। अन्तरिक्ष विभाग (DOS) के अन्तर्गत भारतीय अनुसंधान संगठन (ISRO), राष्ट्रीय अन्तरिक्ष कार्यक्रम की योजनाओं के विकास तथा इनको कार्यान्वित करने में मूलभूत भूमिका निभाता है। भौतिक अनुसंधान प्रयोगशाला (Physical Research Laboratory) अहमदाबाद तथा तिरुपति के पास स्थित राष्ट्रीय आयनमण्डलीय, समतापमण्डलीय तथा अधोमण्डलीय रडार सुविधायें अन्तरिक्ष विज्ञान की खोज में कार्य करती है। ये सब अन्तरिक्ष विभाग द्वारा संचालित होते हैं। हैदराबाद में स्थित राष्ट्रीय सुदूर संवेदन संस्था (National Remote Sensing Agency-NRSA) एक स्वायत्त संस्था है जो अन्तरिक्ष आधारित सुदूर संवेदन सूचनाओं को उपयोगकर्ता तक पहुंचाता है। इसके अतिरिक्त अन्तरिक्ष विभाग अन्तर्गत कार्यरत अन्तरिक्ष कारपोरेशन लिमिटेड, बाजार आधारित हार्डवेयर तथा अन्य सुविधाओं को उपलब्ध कराता है।

प्रारंम्भिक प्रयोग (Early Experiments)

          अन्तरिक्ष क्षेत्र में भारत द्वारा किये गये प्रारम्भिक प्रयोग इस प्रकार हैं-

आर्यभट्ट (Aryabhat):-

         भारत का प्रथम उपग्रह ‘आर्यभट्ट’ 19 अप्रैल, 1975 में पृथ्वी के कक्ष के नजदीक सोवियत संघ की सहायता से अन्तरिक्ष में प्रक्षेपित किया गया था। भास्कर (Bhaskar) भास्कर-1 का प्रक्षेपण 7 जून, 1979 में व भास्कर-2 का प्रक्षेपण 20 नवम्बर, 1981 में रूस के इन्टर कौसमोस रॉकेट की सहायता से किया गया था। इन पर एक दृश्य बैंड तथा दूसरा अवरक्त बैंड में कार्य करने वाले दो टेलीविजन कैमरा तथा तीन आवृत्ति निष्क्रय लघुतरंग रेडियोमीटर लगे हुये थे।

एप्पल (Ariane Passanger Payload Experiment- APPLE):-

          एप्पल एक भू-तुल्यकालिक संचार उपग्रह था जिसे 19 जून, 1981 में यूरोप अन्तरिक्ष संस्था (ESA) के एरिओन प्रक्षेपण यान द्वारा प्रक्षेपित किया गया। इसका उपयोग कई संचार कार्यक्रमों को संचालित करने के लिये किया गया।

रोहिणी क्रम (Rpjomo Series):-

          रोहिणी क्रम के उपग्रह भारत द्वारा निर्मित SLV-3 प्रक्षेपण यान द्वारा प्रक्षेपित किये गये। ये सभी तकनीक एवं वैज्ञानिक उपग्रह थे। रोहिणी-1 का उपयोग SLV-3 प्रक्षेपणयान की क्षमता को परखने के लिये किया गया। रोहिणी-3 व 3 में लेंडमार्क संवेदक पे-लोड (Landmark Sensor Payload) लगा हुआ था। रोहिणी क्रम के दो अन्य उपग्रह SROSS-C व S2, को क्रमश: 20 मई, 1992 तथा 4 मई, 1994 को भारत में निर्मित उपग्रह प्रक्षेपणयान ASLV द्वारा प्रक्षेपित किया गया। इन पर दो वैज्ञानिक पे-लोड, एक रिटार्डिंग पोटेंशियल एनालाइजर (Retarding Potential Analyser) तथा GRB (Gram Ray Burst) संसूचक (Detector) लगे हुये थे। SROSS-S2, अभी भी महत्वपूर्ण वैज्ञानिक सूचनाओं को उपलब्ध कराता है।

साइट (Satellite Instructional Television Experiment-SITE):-

             यह एक प्रकार की अनुसंधान परियोजना थी जिसका उद्देश्य उपग्रह तकनीक सम्भावनाओं का पता लगाना था। इस प्रयोग को संयुक्त राज्य अमेरिका के ATS-6 (Application Technology Satellite) की सहायता से वर्ष 1975-76 के दौरान सम्पन्न किया गया था। इस तकनीक को संचार के क्षेत्र में प्रभावशाली बनाया गया।

स्टेप (Satellite Telecommunication Experiment Project-STEP):-

            स्टेप को 1977-79 के दौरान फ्रान्स जर्मनी सिमफोनी उपग्रह की सहायता से सम्पन्न किया गया। इसका प्रमुख उद्देश्य घरेलू दूरसंचार तथा भूमि पर तकनीकी ढांचा तैयार करने के लिये भू-स्थैतिक उपग्रह प्रणाली का क्रियान्वयन कर अनुभव प्राप्त करना था।

भारतीय राष्ट्रीय उपग्रह प्रणाली (Indian National Satellite System-INSS):-

             भारतीय राष्ट्रीय उपग्रह प्रणाली भारतीय अन्तरिक्ष संस्थान (ISRO), दूरसंचार विभाग, भारतीय मौसम विभाग, आकाशवाणी, दूरदर्शन इत्यादि कई विभागों के सामूहिक प्रयास का प्रतिफल है। इसका उद्देश्य क्षेत्रीय दूरसंचार, आकाशवाणी व दूरदर्शन का विस्तार एवं मौसम के बारे में जानकारी प्राप्त करना है। INSAT क्रम भू-स्थैतिक उपग्रह हैं।

इन्सैट-1 A (INSAT- 1A) इन्सैट-1A को 10 अप्रैल, 1982 को कैप कारनवेल (अमेरिका) से छोड़ा गया लेकिन 6 दिसम्बर, 1982 के बाद इसने कार्य करना बंद कर दिया। इसके पश्चात इन्सैट-1B को अगस्त, 1983 में कैप कारनवेल से सफलतापूर्वक गया और इसके साथ ही भारत एशिया में बहुउद्देशीय उपग्रह छोड़ने वाले जापान इन्डोनेशिया के बाद तीसरा देश हो गया। इन्सैट-1C को यूरोपियन अन्तरिक्ष संस्था द्वारा एरीयन 3 राकेट की सहायता से 22 जुलाई, 1988 में फ्रेंच गुयाना से छोड़ा गया था। नवम्बर 1989 को इसे अनुपयोगी घोषित किया गया था। इन्सैट-1D के अमेरिका प्रक्षेपण पैड से 12 जून, 1990 को छोड़ा गया। यह 17 जुलाई, 199 से उपयोग में आया। यह इन्सेट-1 का चौथा एवं अन्तिम उपग्रह था। इसके द्वारा दूरसंचार, आकशवाणी, दूरदर्शन तथा विज्ञान के क्षेत्र में क्रान्तिकारी परिवर्तन आये।

उपग्रहों के विकासइन्सैट-2 (INSAT-2):-

          भारत द्वारा स्वदेशी तकनीक से निर्मित यह इन्सैट श्रृंखला द्वितीय पीढ़ी का उपग्रह है। इन्सैट-2A को एरियन-4 राकेट की सहायता से 10 जुलाई, 195 को छोड़ा गया। यह उपग्रह इन्सेट-1 श्रृंखला से अधिक शक्तिशाली श्रेणी का था। इसके द्वारा भारत को विदेशी लीग अरबसैट (ARABSAT) से छुटकारा मिला जिस पर प्रतिवर्ष भारत द्वारा 2 करोड़ विदेशी मुद्रा खर्च करनी पड़ती थी।

       इसी क्रम में इन्सेट-2B स्वदेशी तकनीक से निर्मित था। इसका 23 जुलाई, 1993 को अन्तरिक्ष में सफलतापूर्वक प्रक्षेपण किया गया। इन्सैट-2B निरन्तर क्रियाशील है। 4 जून 1997 का दिन भारत के लिये सबसे गौरवशाली दिन था, जब भारत ने अपने ही देश में निर्मित 2079 किलोग्राम का इन्सैन्ट-2D को बाह्य अन्तरिक्ष में स्थापित किया। इन्सैट-2D बुनियादी टेलीफोन सुविधा तथा दूरदर्शन के कार्यक्रमों को दूरस्थ क्षेत्रों तक पहुंचाने के लिए 23 ट्रांसपोंडर्स (Transponders) लगे हैं। इसी श्रृंखला के पांचवें उपग्रह इन्सैट-2E को भारत ने 3 अप्रैल, 1999 को छोड़ा तथा इसके साथ ही भारत उन देशों की श्रेणी में आ गया जो उपग्रह को दूसरे देशों को लीज पर देते हैं। इन्सैट-2E के 11 ट्रान्सपोंडर्स को भारत दूसरे देशों को दस वर्ष की लीज पर देने के बारे में विचार कर रहा है।

       इन्सैट क्रम के उपग्रहों का उपयोग निम्न क्षेत्रों में सफलतापूर्वक किया जा रहा है-

1. दूर संचार (Telecommunication):-

              इन उपक्रमों के माध्यम से भारत दूरदर्शन व आकाशवाणी के विभिन्न कार्यक्रमों को पूरे विश्व में प्रसारित कर रहा है। दूरसंचार के क्षेत्र में आज भारत ने पर्याप्त प्रगति कर ली। देश अपने दूर-दराज के गांवों को भी दूरभाषा की सुविधा से आपस में जोड़ सकने में सक्षम हो सका है। आज भारत अपने उपग्रहों के माध्यम से ई-मेल, इन्टरनेट इत्यादि त्वरित संचार सुविधाओं को अपने नागरिकों को दे सकने में सक्षम है।

2. मौसम विज्ञान (Meteorology ):-

          प्रतिघंटा सामयिक दृश्यावलोकन से मौसम के विभिन्न पहलुओं का अध्ययन इन्सैट क्रमों के उपग्रहों द्वारा किया जा सकता है। इनमें प्रमुख हैं- तूफान, चक्रवात, प्रतिचक्रवात, समुद्रीय उत्थान, बादलों के ऊपर तापमान, जल राशियाँ बर्फ व हिम आवरण इत्यादि का सफलतापूर्वक अध्ययन किया जा सकता है। इन्सैट उपग्रहों में स्वतः सूचना एकत्र करने वाले प्लेटफार्म लगे हुये हैं जो समुद्रों, महासागरों एवं मौसम संबंधी जानकारियों को केन्द्रीय प्रक्रिया स्टेशन तक पहुंचाने का कार्य करते हैं।

उपग्रहों के विकास

3. रेडियो तथा दूरदर्शन (Radio and Television):-

            दुर्गम एवं ग्रामीण क्षेत्रों में आवर्धक (Augmented) दूरदर्शन प्राप्तकर्ता द्वारा सीधे दूरदर्शन का प्रसारण करता है।

भारतीय सुदूर संवेदक उपग्रह क्रम (Indian Remote Sensing Satellite Series-IRS):-

           भारत सुदूर संवेदन उपग्रह श्रृंखला का प्रथम उपग्रह IRS-1A को मार्च 1988 में सोवियत वोस्टक रॉकेट (Soviet Vostak Rocket) की सहायता से अन्तरिक्ष में प्रक्षेपित किया गया। इसी श्रृंखला का द्वितीय उपग्रह IRS-1B को अगस्त, 1991 को प्रक्षेपित किया गया जो अभी भी निरन्तर कार्य कर रहा है। इस पर 72.5 मीटर विभेदन के LISS-1 तथा 236.25 मीटर के LISS 2A व LISS-2B संवेदक के दो कैमरे लगे हुये हैं। ये कैमरे चार स्पैक्ट्रम बैंड 0.45 से 0.86 माइक्रोमीटर पर कार्य करते हैं। इसी प्रकार तृतीय उपग्रह IRS-1C को 28 दिसम्बर, 1995 में रूसी रॉकेट द्वारा मोलिया से प्रक्षेपित किया गया। इस पर निम्न तीन कैमरे लगे हुये थे-

(i) पेंक्रोमेटिक कैमरा (Panchromatic Camera-PAN):- यह एक उच्च विभेदक (5.8 मीटर) पेंक्रोमेटिक बैंड पर कार्य करता है जिसकी स्वाथ चौड़ाई 70 किमी, होती हैं। इसमें स्टीरियोस्कोपिक बिम्ब देखने की क्षमता है।

(ii) LISS-3 (A Linear Imaging Self Scanning Sensor):- यह चार स्पेक्ट्रल बैंड पर कार्य करता है। इनमें तीन दृश्य/अवरक्त स्पैक्ट्रल (VNIR) बैंड तथा एक लघु तरंग अवरक्त (SWIR) प्रभाग है। इसका भूमि विभेदन VNIR बैंड पर 23.5 मीटर तथा SWIR बैंड पर 70.5 मीटर है जिनकी स्वाथ चौड़ाई क्रमशः 41 किमी० तथा 148 किमी० है ।

(iii) WIFS ( A Wide Field Sensor-WIFS):- यह एक निम्न विभेदक (188.3 मीटर) कैमरा है जिसकी स्वाथ चौड़ाई 810 किमी० है। उपग्रह में एक टेपरिकार्डर भी है जो आंकड़ों को अंकित करता है।

        चतुर्थ उपग्रह IRS-1D को 29 सितंबर 1997 को प्रक्षेपित किया गया जो IRS-IC के ही समान है। IRS-P2 तथा IRS-P1, को भारत में निर्मित PSLV (Polar Satellite Launch Vehicle) द्वारा क्रमश:, 15 अक्टूबर, 1994 व 21 मार्च, 1996 को प्रक्षेपित किया गया। IRS IA व IB की ही भांति IRS-P2, में भी LISS-2 कैमरा लगा है जबकि IRS-P3 में WIFS कैमरा लगा हुआ है।

         IRS-P4 को PSLV-C2, द्वारा 26 मई, 1999 को सफलतापूर्वक अन्तरिक्ष में छोड़ा गया। यह अपने तरह का एक नया प्रयोग था। इस पर समुद्रीय रंगीन मोनीटर (Ocean Colour Monitor) तथा बहु आवृत्ति स्कैनिंग लघुतरंग रेडियोमीटर (Multi-Frequency Scanniring Microwave Radiometer) लगे हुये हैं। 

उपग्रहों के विकास

             उपग्रह नियंत्रण केन्द्र बंगलौर में स्थित है। इसके अतिरिक्त लखनऊ तथा माउरीटियस उपस्टेशन भी निरन्तर आई. आर. एस. उपग्रह का प्रबोधन (Monitor) करते हैं। राष्ट्रीय सुदूर संवेदन संस्था (NRSA) का आंकड़ों को प्राप्त करने वाला स्टेशन हैदराबाद के पास सादनगर में स्थित है। यहां पर उपग्रह से आंकड़ों को प्राप्त कर इन्हें प्रयोग के योग्य बनाया जाता है। तत्पश्चात् हैदराबाद में NRSA द्वारा आंकड़ों को वितरित करने की सुविधा है।

           भारतीय सुदूर संवेदन प्रणाली का सबसे मुख्य आधार राष्ट्रीय प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन प्रणाली (National Natural Resources Management System-NNRMS) है जो भारत के प्राकृतिक संसाधनों के आंकड़ों का प्रभावशाली ढंग से प्रबन्धन करती है। आई. आर. एस. के आंकड़ों को कई उपयोगों में लाया जाता है जैसे कि कृषि फसलों का उत्पादन, अनुमान, सूखाग्रस्त क्षेत्रों का प्रबन्धन, बाढ़ क्षेत्रों का मानचित्रण, भूमि उपयोग मानचित्रण, बेकार भूमि का प्रबन्धन, जल संसाधनों का प्रबन्धन, समुद्रीय संसाधनों का सर्वेक्षण, नगरीय योजनायें, खनिज संभावनायें, वन सर्वेक्षण इत्यादि। आई. आर. एस. आंकड़ों का सबसे अनोखा उपयोग IMSD (Intergrated Mission for Sustainable Development) है। वास्तव में IMSD के अन्तर्गत 174 जिलों का सम्मिलित किया गया है। इसका प्रमुख उद्देश्य उपग्रहीय तथा सामाजिक व आर्थिक घरातलीय आँकडों की सहायता से सतत विकास (Sustainable Development) करना है।

प्रश्न प्रारूप

प्रश्न 2. उपग्रहों के विकास के इतिहास प प्रकाश डालें।

(Throw light on the historical development of satellite.)



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1. सुदूर संवेदन और भौगोलिक सूचना तंत्र

1. सुदूर संवेदन और भौगोलिक सूचना तंत्र

Remote Sensing and GIS (Geographical Information System)



सुदूर संवेदन और भौगोलिक सूचना तंत्र⇒

सुदूर संवेदन का अर्थ एवं परिभाषा (Meaning and Definition of Remote Sensing)

           सुदूर संवदेन का अर्थ है किसी दूर स्थिति घटना, वस्तु अथवा धरातल के बारे में सूचनाओं अथवा आंकड़ों को प्राप्त करना। दूसरे शब्दों में मोटे तौर पर सुदूर संवेदन का अर्थ है कि बिना किसी भौतिक सम्पर्क के किसी वस्तु अथवा घटना के संबंध में सूचनायें एकत्र करना।

          “तरंगदैर्ध्य के पराबैंगनी से लेकर रेडियो प्रभाग में आंकड़ों को एकत्र करने की व्यावहारिकता अथवा अभ्यास को सुदूर संवेदन कहते हैं।”

         “किसी घटना या वस्तु के संबंध में शीघ्र एवं तीव्र टोह लेना सुदूर संवेदन कहलाता है।”

         सुदूर संवेदन एक ऐसा विज्ञान है जो पृथ्वी के किसी स्थान, वस्तु अथवा घटना के संबंध में दूर अन्तरिक्ष में स्थित उपग्रह या अन्तरिक्ष यानों पर लगे संवेदकों के द्वारा ग्रहण किये गये धरातलीय परावर्तित प्रकाश के आवेगों को अंकित करता है। हम संवेदक पर अंकित परावर्तित प्रकाश के आवेगों का विश्लेषण करते हैं। तत्पश्चात् प्राप्त आंकड़ों तथा प्रतिबिम्बों के माध्यम से किसी स्थान, घटना या वस्तु के संबंध में आवश्यक जानकारी प्राप्त कर निष्कर्ष पर पहुंचते हैं।

           जिस प्रकार हमारी आँखें प्रत्येक वस्तु को देखकर उनमें भेद स्थापित करती हैं ठीक उसी प्रकार संवेदक भी कार्य करता है। आँखों से देखने पर कुछ वस्तुयें चमकीली तथा कुछ काली लगती हैं या आँखों को अलग-अलग वस्तुओं में रंगों की गहनता अलग-अलग प्रतीत होती है। यह सब प्रकाश आवेगों के कारण होता है।

            प्रत्येक वस्तु का विद्युत चुम्बकीय विकीरण अलग-अलग होने से आँखों को वस्तुयें अलग-अलग रंगों में प्रतीत होती हैं। संवेदक भी आँखों की तरह विद्युत चुम्बकीय विकीरण को प्राप्त करते हैं। जिस वस्तु से या स्थान से परावर्तित प्रकाश अधिक प्राप्त होता है। वह चमकीली एवं अन्य इसके विपरीत काली प्रतीत हैं।

          उपग्रहों में प्रयोग किये जाने वाले संवेदक विद्युत चुम्बकीय विकिरण को अंकीय आँकड़ों (Digital Data) के रूप में अभिलेखन (Recording) करते हैं। इन आंकड़ों से प्रतिविम्ब बनाने की क्षमता होती है। इस प्रकार स्पष्ट है कि “पृथ्वी से दूर अन्तरिक्ष में किसी प्लेटफार्म पर लगे हुये संवेदक द्वारा विद्युत-चुम्बकीय विकीरण के माध्यम से धरातलीय सूचनाओं को प्राप्त करने की कला को सुदूर संवेदन विज्ञान कहते हैं।”

          प्लॉयड एफ. साबिन्स (Floyd F. Sabins) के अनुसार सुदूर संवेदन शब्द का तात्पर्य उन विधियों में है जिनमें किसी लक्ष्य को पहचानने तथा उनके लक्षणों को मापने के लिए विद्युत चुम्बकीय ऊर्जा जैसे प्रकाश, ऊष्मा व रेडियो तरंगों को प्रयोग में लाया जाता है।

           लिंग्टज एवं सिमनेट (Lintz and Simonett) के अनुसार बिना छुये या सम्पर्क के किसी वस्तु के बारे में भौतिक आँकड़ों की प्राप्ति करना सुदूर संवेदन कहलाता है।

     बैरेट एवं क्टज (Barrett and Curtis) के अनुसार- किसी निश्चित दूरी से किन्हीं युक्तियों द्वारा किसी लक्ष्य के अवलोकन को सुदूर संवेदन कहते हैं।

      “Remote sensing is the observation of a target by a device separated from it by some distance.”

        कोलवेल (Colwell) के अनुसार- विस्तृत अर्थों में ‘सुदूर संवेदन’ शब्द का अर्थ है किसी निश्चित दूरी से टोह लेना या सर्वेक्षण करना है।

सुदूर संवेदन की प्रक्रियायें (Processes of Remote Sesing)

               सुदूर संवेदन तकनीक द्वारा पृथ्वी के धरातल से सूचनाओं को एकत्र करने तथा विद्युत चुम्बकीय आँकड़ों का विश्लेषण करने के लिये प्रमुखतः दो प्रक्रियायें से गुजरना पड़ता है-

1. आंकड़े अर्जित करना (Data Acquisition):-

            यद्यपि आँकड़े अर्जित करने की विधियों को आगे विस्तार से समझाया गया है परन्तु यहां इनका संक्षिप्त विवरण दिया गया है। सर्वप्रथम, संवेदक द्वारा पृथ्वी या पृथ्वी के किसी भाग को या किसी वस्तु के संबंध में विद्युत चुम्बकीय विकिरण द्वारा सूचनायें अंकीय (Digital) रूप में एकत्र किये जाते हैं।

              दूसरा इन अंकीय आंकड़ों की सहायता से प्रतिबिम्ब तैयार किये जाते हैं, जिन्हें चित्रीय (Pictorial) रूप भी कहते हैं। टी. एम. लिलिसेंट एवं आर. डब्ल्यू काईफर ने आंकड़ा अर्जित करने की प्रक्रिया को पाँच रूपों में विभाजित किया है। जिनको नीचे के चित्रों में दिखाया गया है-

(a) ऊर्जा के स्रोत (Source of Energy)

(b) वायुमण्डल द्वारा संचरण (Propagation through the atmosphere)

(c) पृथ्वी की धरातलीय आकृतियाँ (Earth Surface Features)

(d) वायुमण्डल द्वारा पुनः संचरण (Re-Transmission through the Atmosphere)

(e) संवेदन प्रणालियों (Sesing Systems)

सुदूर संवेदन

          सूर्य ऊर्जा का प्रमुख स्रोत है। पृथ्वी सूर्य से विकिरण ऊर्जा प्राप्त करती हैं। सूर्य से पृथ्वी की ओर कुल विकिरण ऊर्जा को 100 इकाई या प्रतिशत माना जाता है। सूर्य से जितनी ऊर्जा विकिरण होती है उसका स्वल्पांश (1/2 अरबवां भाग) ही पृथ्वी को प्राप्त होता है। वायुमण्डल द्वारा प्रकीर्णन तथा प्रत्यावर्तन के कारण सौर्य ऊर्जा का कुछ भाग शून्य में वापस लौट जाता है। लघु तरंग प्रवेशी सौर्य विकिरण का 35% भाग प्रकीर्णन तथा प्रत्यावर्तन के माध्यम से शून्य में वापस चला जाता है (27% बादलों से +20% धरातल से प्रत्यावर्तित है +6% वायुमण्डल द्वारा प्रकीर्ण), 51% भाग भूतल द्वारा अवशोषित किया जाता है (17% विसरित दिवा प्रकाश (Diffuse day light) के रूप में तथा 34% प्रत्यक्ष विकिरण के रूप की में) तथा 14% वायुमण्डल द्वारा अवशोषित कर लिया जाता है।

                23% ऊर्जा का धरातल से पार्थिव विकिरण द्वारा वायुमण्डल में प्रत्यक्ष गमन हो जाता है, 9% ऊर्जा संवहन तथा विक्षोभ के रूप में खर्च होती है तथा 19% ऊर्जा वाष्पीकरण के रूप में खर्च हो जाती है। इस तरह भूतल पर सौर्यिक विकिरण द्वारा जो 51% ऊर्जा है, वह पृथ्वी से विकिरण, संवहन तथा परिचालन के माध्यम से वायुमण्डल में वापस चली जाती है। वायुमण्डल सौर्यक विकिरण से अवशोषण द्वारा 14% ऊर्जा तथा पृथ्वी से होने वाले विकिरण से 34% ऊर्जा अर्थात् कुल 48% ऊर्जा प्राप्त करता है।

सुदूर संवेदन और भौगोलिक

Electromagnetic Remote Sensing of Earth Resources

2. आँकड़ा विश्लेषण (Data Anlysis):-

             सुदूर संवेदन की दूसरी प्रक्रिया आंकड़ों का विश्लेषण करना है। अन्तरिक्ष आधारित संवेदकों के द्वारा जो अंकीय आँकड़े अर्जित किये जाते हैं, उनसे कम्प्यूटर की सहायता से प्रतिबिम्ब तैयार किये जाते हैं, जिन्हें आँकड़ा उत्पाद (Data Product) कहा जाता है। ये उत्पाद किसी भी दृश्य क्षेत्र के सभी विवरणों को प्रस्तुत करते हैं। इन विवरणों को पहचानने एवं इनके बारे में आवश्यक जानकारी प्राप्त करने तथा किसी निर्णय तक पहुंचने की प्रक्रिया का आँकड़ा विश्लेषण कहते हैं। इसके लिए पर्याप्त अनुभव, अभ्यास, ज्ञान एवं श्रम की आवश्यकता होती है। आंकड़ा उत्पादों को दो वर्गों में बांटा जा सकता है- पहला उपग्रहीय प्रतिबिम्ब (Satellite Imageries) तथा दूसरा वायु फोटो चित्र (Aerial Photographs) वायु फोटो चित्रों के विश्लेषण के लिये स्टीरियोस्कोप (Sterioscope) इत्यादि यंत्रों की आवश्यकता होती है। इनकी सहायता से लिए स्थलाकृतिक मानचित्र, सांख्यिकीय आंकड़े तथा अन्य संदर्भ आंकड़ों की आवश्यकता होती है। आंकड़ा विश्लेषण के निम्न प्रमुख तत्व हैं-

(a) आँकड़ा उत्पाद (Data Product)

(b) व्याख्या तथा विश्लेषण (Interpretation and Analysis)

(c) सूचना उत्पाद (Information Products)

(d) उपयोगकर्ता (Users)

          इस प्रकार सुदूर संवेदन आँकड़ा अर्जन की प्रक्रिया को निम्न सात सोपानों में विभाजित किया जा सकता है जो सुदूर संवेदन की अलग-अलग अवस्थायें हैं।

1. ऊर्जा स्रोत (Energy Source):-

            सुदूर संवेदन में आधारभूत आवश्यकता ऊर्जा स्रोत की है जो इच्छित लक्ष्यों को प्रकाशयुक्त (Illuminte) करता है। इसको विद्युत चुम्बकीय विकीरण (EMR) का उत्सर्जन (Emission) कहते हैं।

2. ऊर्जा का वायुमण्डल के साथ अन्योन्यक्रिया (Energy Interaction with the Atmosphere):-

              ऊर्जा जब प्रमुख स्रोत से धरातल पर किसी लक्ष्य तक तथा किसी लक्ष्य से संवेदक तक पहुंचती है तो यह वायु मण्डल के सम्पर्क में आकार अन्योन्याक्रिया करती है। इसके अन्तर्गत ऊर्जा का संचारण (Transission), अवशोषण (Absorption) तथा प्रकीर्णन (Scattering) को सम्मिलित किया जाता है।

3. ऊर्जा का पृथ्वी के धरातलीय आकृतियों से अन्योन्यक्रिया (Interaction of Energy with Earth’s Surface Features):–

              पृथ्वी के धरातल की आकृतियाँ, आपतन (Incident) ऊर्जा के साथ अलग-अलग प्रकार से अन्योन्यक्रिया करती है। घरातल द्वारा आपतन ऊर्जा का कुछ अंश परावर्तित (Reflected) तथा कुछ अंश अवशोषित (Absorption) किया जाता है।

4. ऊर्जा का संवेदक द्वारा अभिलेखन (Recording of Energy by the Sensor):-

           धरातलीय तत्वों के साथ अन्योन्याक्रिया के पश्चात् ऊर्जा संवेदक तक पहुंचती है जिसे ऊर्जा का संचारण (Transmission) कहते हैं। जिन रूपों में इसे अंकित किया जाता है उन्हीं रूप में उपयोगकर्ता द्वारा इसे प्रयोग किया जाता है।

5. आँकड़ों का संचारण तथा प्रक्रमण (Data Transmission and Processing):-

             जो ऊर्जा संवेदक द्वारा अभिलेखित की जाती है उसे प्राप्त कर्ता तथा प्रक्रमण स्टेशन को संचारित किया जाता है। इस सम्पूर्ण प्रक्रिया को धरातल से सुदूर संवेदक तक ऊर्जा का संचरण (Transmission) कहलाता है।

6. प्रतिविम्ब प्रक्रमण तथा विश्लेषण (Image Prosessing and Analysis):-

                प्रक्रमण के पश्चात् बिम्बों का विश्लेषण किया जाता है तथा पृथ्वी के धरातलीय आकृतियों के बारे में सूचनाओं को निकाला जाता है। इसे आंकड़ों का प्रक्रमण तथा विश्लेषण करना कहते हैं।

7. अनुप्रयोग (Application):-

           विश्लेषण के पश्चात् उपयोगी सूचनाओं का अनुप्रयोग किसी समस्या के समाधान में निर्णय लेने के लिए किया जाता है।

         यह सारा परिदृश्य विद्युत-चुम्बकीय विकीरण तथा धरातल के वस्तुओं व आकृतियों के भौतिक गुण व विशेषताओं पर निर्भर करता है।

      इस प्रकार हम कह सकते हैं कि सुदूर संवेदन एक अन्तर्विषयी विज्ञान है जिनके अन्तर्गत विभिन्न विषयों जैसे कि ऑप्टिक्स (Optics), फोटोग्राफी (Photography), कम्प्यूटर (Computer), इलेक्ट्रॉनिक्स (Electronics), दूर संचार (Telecommunication). उपग्रहीय-प्रक्षेपण (Satellite launching) इत्यादि का समावेश है।

        जहां तक सुदूर संवेदन का प्रश्न है, सौर्य ऊर्जा के विकिरण एवं प्रदीपन (Illumination) में इतनी शक्ति होती है कि प्रत्यावर्तित प्रकाश सुदूर कैमरा एवं संवदेक तक पहुंच जाता है। सुदूर संवेदन का आधार विद्युत-चुम्बकीय विकिरण (EMR) है। प्रकृति में प्रत्येक वस्तु का अपना धरातलीय स्वरूप होता है। प्रत्येक वस्तु का परावर्तित (Reflected) उत्सर्जित (Emitted) तथा अवशोषित (Absorbed) विकिरण (Radiation) का वितरण अलग-अलग होता है। यदि इन स्पेक्ट्रल विशेषताओं का उत्तम तरीके से शोषण (Exploitation) अथवा मापन किया जाय तो एक वस्तु से दूसरे वस्तु में भेद दर्शाया जा सकता है।

           इसी प्रकार प्रत्येक वस्तु का आकार, आकृति, विस्तार तथा अन्य भौतिक एवं रासायनिक गुणों से संबंधित सूचनाओं को आसानी से एकत्रित किया जा सकता है। उत्तम संसूचक (Detector) के चुनाव व सहायता से आवश्यकतानुसार ऊर्जा का मापन भी कर सकते हैं। जैसा कि स्पष्ट है कि तरंग दैर्ध्य तथा दूरी के साथ ऊर्जा का संचारण घटता जाता है। किसी भी कलेक्टर टाईमीटर के लघु तरंग दैर्ध्य एवं अधिकतम ऊर्जा भाग में धरातलीय विभेद अधिकतम होता है।

         इस प्रकार कहा जा सकता है कि सूर्य से प्राप्त ऊर्जा की कितनी मात्रा विद्युत-चुम्बकीय विकिरण द्वारा संवेदक या फिल्म तक पहुंच पाती है। यह बहुत कुछ संसूचक की उत्तमता पर भी निर्भर करता है कि वह कितनी मात्रा में इसे अंकित करता है।

           सुदूर संवेदन एक ऐसा विज्ञान है जो किसी इच्छित लक्ष्य अथवा घटना का बिना प्रत्यक्ष सम्पर्क में आये या बिना आंखों से देखे सुदूर अन्तरिक्ष या उँचाई से अवलोकन का सूचना देता है। इस प्रक्रिया में परावर्तित ऊर्जा अथवा उत्सर्जित ऊर्जा को संसूचन युक्तियों (Devices) के द्वारा संसूचन (Detect) किया जाता है। ये अभिलेखन युक्तियाँ निरन्तर ऊर्जा का संसूचन करती रहती है। यहां पर ऊर्जा का अभिप्राय प्रकाश (सार्य ऊर्जा) से है जिसे विज्ञान की भाषा में विद्युत चुम्बकीय विकिरण (EMR) कहा जाता है। सूर्य से प्राप्त ऊर्जा जिसे हम आपातिक (Incident) ऊर्जा कहते हैं, धरातलीय आकृतियों पर अन्तर्क्रिया करके परावर्तित एवं उत्सर्जित होती है, जिसे सुदूर संवेदक युक्तियों के द्वारा रिकार्ड किया जाता है ।

          वर्तमान समय में सभी सुदूर संवेदन संवेदक विद्युत युक्तियाँ (Electronic Devices) है। संवेदक के द्वारा जो आंकड़ें रिकार्ड किये जाते हैं उनका प्रयोग प्रतिबिम्बों के निर्माण में किया जाता है। इन प्रतिबिम्बों को देखकर व्याख्या की जाती है। इन्हें ही हम सुदूर संवेदक बिम्ब (Image) कहते हैं।

            सुदूर संवेदन का उपयोग कई क्षेत्रों में किया जाता है। इसे हम एक व्यावहारिक विज्ञान (Applied Science) भी कहते हैं। यहां पर हमारा उद्देश्य पृथ्वी के अवलोकन करने से है। यह समझाने का प्रवास किया गया है कि किस प्रकार हम धरातलीय सूचनाओं को प्राप्त कर सकते हैं। इसके अन्तर्गत वायु फोटोग्राफी से लेकर अन्तरिक्ष आधारित प्लेटफार्म सभी सम्मिलित किये जाते हैं। इतना ही नहीं सम्पूर्ण संवेदक प्रणाली भी इसके अन्तर्गत सम्मिलित है जो सुदूर से पृथ्वी के धरातल का सफलतापूर्वक अवलोकन करती है तथा लघु से लघु सूचनाओं को प्रदान करती है।

         भू-धरातलीय आंकड़ों को एक निश्चित निर्देशांक प्रणाली के तहत ही स्पष्ट किया जा सकता है जिनकी धरातल पर एक निश्चित भौगोलिक वसाव स्थिति होती है। इसके लिये भू-धरातलीय आंकड़े अर्जित (Geospatial Data Acquisition) शब्दावली का प्रयोग किया जाता है। संक्षिप्त में इसे GDA भी कहते हैं। संवेदक द्वारा जो आंकड़े प्राप्त किये जाते हैं। तथा उनसे जो विम्ब तैयार किया जाता है वे इतने साल नहीं होते हैं। संवेदक से प्राप्त आंकडों का सर्वप्रथम प्रक्रियन (Process) अथवा विश्लेषण किया जाता है।

        प्रक्रियन/विश्लेषण तथा प्राप्त आंकड़ों की वैधता, व्याख्या के लिए उपयुक्त माने जाते हैं। इस प्रकार प्रक्रियन किये गये आंकड़े जी. आई. एस. उपयोग के लिये भी उपयुक्त होते हैं। भू-धरातलीय आंकड़ों के कई प्रकार से विम्ब तैयार किये जा सकते हैं। प्रमुख विम्ब आर्थोफोटो (Orthophoto) मानचित्र, उपग्रहीय विम्ब मानचित्र, थिमेटिक मानचित्र, भूपत्रक मानचित्र, भूमि उपयोग मानचित्र, भूमि उपयोग परिवर्तन मानचित्र इत्यादि हैं।

         यदि हम भूधरातलीय सूचनाओं एवं आंकड़ों के ऐतिहासिक पक्ष प बात करें तो सर्वप्रथम सर्वेक्षण एवं मानचित्रण के द्वारा इनका प्रारम्भ माना जाता है।

प्रश्न प्रारूप

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1. दूर संवेदन से क्या आशय है? इसकी प्रक्रियाओं का वर्णन करें।

(What do you mean by remote sensing ? Describe its process.)



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22. वाताग्र किसे कहते है? / वाताग्रों का वर्गीकरण

22. वाताग्र किसे कहते है? / वाताग्रों का वर्गीकरण


वाताग्र किसे कहते है?

        जब दो अलग-अलग स्वभाव अर्थात तापमान और आर्द्रता में भिन्न वाली वायुराशियाँ दो विपरीत दिशाओं से आकर अभिसरण करने का प्रयास करती हैं, तब वे पूर्ण रूप से मिश्रित नहीं हो पाती एवं उनके सीमांत प्रदेश में ढलुआं सीमा सतह का निर्माण होता है, जिसे ही वाताग्र कहा जाता हैं।

       इस प्रकार वाताग्र से आशय उस ढलुआं सीमा से है जिसके सहारे दो विपरीत स्वभाव वाली वायु-राशियाँ आकर मिलती है। जहाँ कहीं दो भिन्न वायु-राशियों का अभिसरण होता है वहाँ उनके बीच एक विस्तृत संक्रमणीय प्रदेश स्थापित हो जाता है। इस संक्रमणीय प्रदेश को ही वाताग्र प्रदेश अथवा वाताग्र-उत्पत्ति क्षेत्र कहा जाता है।

        वाताग्र तथा वाताग्र उत्पत्ति के संबंध में कई विद्वानों ने अपने मत प्रकट किये है। प्रसिद्ध विद्वान पीटरसन के अनुसार, “वाताग्री सतह एवं धरातलीय सतह को अलग करने वाली रेखा को वाताग्र कहते हैं तथा जिस प्रक्रिया द्वारा वाताग्र की उत्पत्ति होती है उसे वाताग्र-उत्पत्ति क्षेत्र कहा जाता है।”

       ट्रिवार्था के अनुसार “वाताग्र कोई रेखा नहीं अपितु वे पर्याप्त चौड़ाई वाले ऐसे क्षेत्र होते है जो 3 से 50 मील तक चौड़े होते है। इसके साथ ही वे क्षेत्र जहाँ दो भिन्न स्वभाव वाली वायु राशियाँ आमने-सामने से आकर अभिसरण करती है तो उस अभिसरण क्षेत्र को वाताग्र-उत्पत्ति क्षेत्र कहा जाता है।”

    अतः स्पष्ट है कि वाताग्र न तो धरातल के ऊपर लम्बवत् रूप में होता है और न धरातलीय सतह के समान्तर ही पाया जाता है। इसके विपरीत वह कुछ कोण पर झुका हुआ होता है। वाताग्र का ढाल पृथ्वी की घूर्णन गति पर आधारित होता है जो ध्रुवों की ओर बढ़ता जाता है। इस प्रकार वाताग्र विपरीत स्वभाव वाली वायु-राशियों को अलग करने वाली ढलुआं सीमा सतह का ही दूसरा नाम है।

   ट्रिवार्था के अनुसार “The sloping Boundary surfaces separating contrusting air-masses are called surfaces of discontinuity of front.” वाताग्र अपनी उत्पत्ति के बाद कुछ विशिष्ट अवस्थाओं में नष्ट हो जाते हैं।

            वाताग्रों के इस प्रकार लोप होने की प्रक्रिया को वाताग्र-क्षय कहते है। किसी क्षेत्र-विशेष की जलवायु तथा मौसम को समझने के लिए आजकल जलवायु विज्ञान में वाताग्र का अध्ययन महत्वपूर्ण स्थान रखता है क्योंकि ये मौसम संबंधी विशिष्ट अवस्थाओं को जन्म देते हैं जिन्हें चक्रवातीय अथवा प्रतिचक्रवातीय अवस्थायें कहा जाता है। इस प्रकार वाताग्र चक्रवातों और प्रतिचक्रवाती के पालने कहे जाते हैं।

वाताग्र उत्पत्ति (Frontogenesis)

         वाताग्रों के बनने की क्रिया को वाताग्र उत्पत्ति कहा जाता है। मुख्य रूप से वाताग्रों की उत्पत्ति निम्नलिखित दो बातो पर आधारित होती हैं:-

1. भौगोलिक कारक (Geographical Factor):-

      जब दो भिन्न स्वभाव वाली वायुराशियों एक-दूसरे के समीप आती हैं तो वाताग्रों की उत्पत्ति होती है। दूसरे शब्दों में वाताग्रों की उत्पत्ति के लिए तापमान और आर्द्रता की दृष्टि से वायु राशियों में भिन्नता होना आवश्यक है।

2. गतिक कारक (Dynamic Factor ):-

      वाताग्रों की उत्पत्ति के लिए वायु राशियों में प्रवाह अर्थात् गति होना आवश्यक है। पीटरसन एवं बर्गरान नामक विद्वानों ने अपने अध्ययन के द्वारा इस बात को प्रमाणित किया है कि वायुराशियों की गति वाताग्रों को तीव्र बना देती है। इस प्रकार वाताग्र बनने के लिए अभिसरण की स्थिति का होना परम आवश्यक है।

वाताग्र-उत्पत्ति एवं वाताग्र-क्षय क्षेत्र (Areas of Frontogenesis and Frontolysis)

1. उत्पत्ति क्षेत्र:-

        जिन क्षेत्रों में दो भिन्न गुण वाली वायु-राशियाँ आकर परस्पर मिलती हैं अर्थात् अभिसरण करती हैं उन क्षेत्रों को वाताग्र-उत्पत्ति क्षेत्र कहते हैं। उदाहरण के लिए जाड़े की ऋतु में पूर्वी एशिया, उत्तरी अमेरीका का पूर्वी तट एवं ग्रीनलैंड आदि वाताग्र-उत्पत्ति क्षेत्र हैं।

2. क्षय क्षेत्र:-

          जिन क्षेत्रों में वायुराशियाँ अपसरित होती हैं उन क्षेत्रों में वाताग्रों का क्षय होने लगता है। अतः ऐसे क्षेत्रों को वाताग्र-क्षय क्षेत्र कहा जाता है। उदाहरण के लिए साइबेरिया तथा उत्तरी कनाडा आदि वाताग्र-क्षय क्षेत्र हैं।

वाताग्र

वाताग्र उत्पत्ति के लिए आवश्यक दशाएँ

     धरातल पर वाताग्रों की उत्पत्ति कुछ विशिष्ट दशाओं में ही होती हैं। प्रमुख रूप से इन दशाओं का विवेचन निम्नलिखित बिन्दुओं के अन्तर्गत किया गया है-

1. तापमान की भिन्नता:-

       वाताग्र की उत्पत्ति के लिए दो विपरीत तापमान वाली वायु-राशियों का होना आवश्यक है। इसमें एक वायु-राशि ठण्डी और शुष्क तथा दूसरी वायु-राशि का गर्म तथा आर्द्र होना आवश्यक है। ये वायु-राशियाँ जब परस्पर मिलती हैं जो ठण्डी वायु-राशि गर्म तथा हल्की वायु-राशि को ऊपर उठा देती है जिससे वहाँ वाताग्र का निर्माण हो जाता है।

2. वायु-राशियों की विपरीत दिशा:-

      जब कभी वितरित तापमान वाली दो वायुराशियाँ विपरीत दिशाओं से आकर आमने-सामने मिलती है तो एक-दूसरे के क्षेत्र में घुसने की चेष्टा करती हैं। परिणामस्वरूप उनके मिलने के क्षेत्र में एक लहरनुमा वाताग्र बन जाता है। इसके विपरीत जब कभी दो भिन्न तापमान वाली वायु-राशियाँ आमने-सामने न मिलकर विपरीत दिशाओं की ओर चलने लगती हैं तो उस अवस्था में वहाँ वाताग्र का निर्माण नहीं हो सकता।

       प्रसिद्ध विद्वान पीटरसन ने विभिन्न पवन क्रमों को स्पष्ट कर यह बताने का प्रयास किया है कि किन अवस्थाओं में वाताग्र के निर्माण की संभावनायें होती हैं। वाताग्र निर्माण की सम्भावनाओं का विवेचन निम्नलिखित बिंदुओं के अन्तर्गत किया गया है-

(i) स्थानान्तरणी प्रवाह:-

        इस प्रकार के पवन प्रवाह में हवायें क्षैतिज रूप में एक स्थान से दूसरे स्थान को एक ही दिशा में चलती है। इस दशा में तापमान की विपरीत अवस्था पैदा नहीं हो पाती। फलस्वरूप इस प्रकार के पवन प्रवाह से वाताग्र की उत्पत्ति नहीं होती।

(ii) घूर्णन प्रवाह:-

       इसमें हवायें चक्रवातीय और प्रतिचक्रवातीय रूप में प्रवाहित होती हैं। यद्यपि इस प्रकार के पवन प्रवाह में विपरीत तापमान की अवस्थायें होती हैं लेकिन फिर भी वाताग्र की उत्पत्ति नहीं हो पाती। क्योंकि इसमें हवायें विपरीत दिशाओं से आकर आमने-सामने नहीं मिलती।

(iii) अभिसरण तथा अपसरण:-

      जब हवायें चारों ओर से आकर एक ही बिन्दू पर मिलती हैं तो वह अभिसरण की स्थिति होती है। इस स्थिति में यद्यपि विपरीत तापमान की अवस्था रहती है फिर भी वाताग्र का निर्माण नहीं हो पाता है क्योंकि इस दशा में विपरीत तापक्रम एक रेखा के सहारे न होकर एक केन्द्र पर होता है जहाँ चारों ओर की हवायें आकर तापमान और आर्द्रता की आदर्श दशाओं को भंग कर देती हैं।

     इसके विपरीत जब हवायें एक बिन्दु से चारों ओर चलती हैं तो वे परस्पर कभी नहीं मिल पाती जिससे वहाँ वाताग्र का निर्माण कदापि सम्भव नहीं होता। हवाओं की इस स्थिति को अपसरण कहते हैं।

(iv) विरूपणी प्रवाह:-

      इस प्रकार के पवन प्रवाह में दो विपरीत तापमान वाली हवायें एक-दूसरे से क्षैतिज रेखा के सहारे आकर मिलती हैं। इस प्रकार की हवायें दो प्रकार की बाह्य प्रवाह अक्ष और अन्त प्रवाह अक्ष रेखायें बनाती हैं। वाताग्र निर्माण की दृष्टि से पवन-प्रवाह का यह क्रम सर्वाधिक अनुकूल होता है। फिर भी वाताग्र का बनना न बनना स्थान विशेष की प्राकृतिक स्थिति तथा अक्षांशों पर निर्भर करता है।

वाताग्रों का वर्गीकरण

वाताग्रों के प्रमुख लक्षण

     वाताग्र प्रदेशों में पाये जाने वाले वाताग्रों के मुख्य लक्षणों का विवेचन निम्नलिखित बिन्दुओं के अन्तर्गत किया गया है-

1. वाताग्रों की गति:-

      यद्यपि मानचित्रों पर वाताग्र स्थिर दिखलाई देते है, किन्तु वस्तुतः वाताग्रों में गति होती है। ये प्रायः 50 से 80 किलोमीटर प्रति घण्टे की गति से चलते है। इस प्रकार वाताग्र एक दिन-रात अथवा 25 घण्टे में एक विस्तृत क्षेत्र को पार कर जाते है।

2. वाताग्रों की ऊर्ध्व गति:-

       वाताग्र क्षेत्र में वायु सदैव नीचे से ऊपर उठती रहती है। इस प्रकार ऊर्ध्व गति वाताग्रों का एक प्रमुख लक्षण है। इस गति के कारण वाताग्र क्षेत्र में ऊष्ण वायु शीतल वायु के ऊपर चढ़ती है क्योंकि उष्ण वायु हल्की एवं शीतल वायु भारी होती है। उष्ण व आर्द्र वायु के ऊपर उठने से मेघ बनते हैं और वर्षा होती है।

3. वाताग्रों की गहराई:-

      वाताग्रों की रचना करने वाली वायुराशियों में ऊपरी तलों की अपेक्षा निम्न तलों अर्थात् धरातल के समीप गति अधिक होती है। इसलिए वाताग्रों की रचना ऊपरी भागों में नहीं होती। सामान्यतः वाताग्रों की रचना 3,000 मीटर के ऊपर बहुत कम और 5,000 मीटर के ऊपर तो बिल्कुल ही नहीं होती।

4. वाताग्रों की चौड़ाई:-

         यद्यपि वाताग्रों की कोई निश्चित चौड़ाई नहीं होती। ये प्राय: 5 से 80 किलोमीटर तक चौड़े होते हैं।

5. वाताग्रों का भंग होना:-

       वाताग्र में दोनों ओर की वायु-राशियों के गुण भिन्न होते हैं। जब वायु-राशियों के अपने गुणों का फैलाव बहुत विस्तृत क्षेत्र में हो जाता है तो वाताग्र भंग हो जाते हैं। वायु-राशियों के गुणों में तापमान, वायुदाब, पवन-दिशा, प्रवणता आदि मुख्य हैं। वायु-राशियों के इन गुणों में परिवर्तन के साथ ही वाताग्र की समाप्ति हो जाती है।

वाताग्रों के प्रकार (Types of Fronts)

     तापमान और आर्द्रता की भिन्नता के आधार पर वाताग्रों को निम्नलिखित बिन्दुओं के अर्न्तगत विभाजित किया गया है:-

1. उष्ण वाताग्र (Warm Front):-

      जब आगे बढ़ती हुई उष्ण वायु-राशि किसी ठण्डा वायु-राशि के ऊपर चढ़ती है तो उसे उष्ण वाताग्र कहते हैं। उष्ण वाताग्र सदैव दायीं तरफ से बायीं तरफ आगे बढ़ता है। इसका ढाल मध्य अक्षांशों में प्राय: 1:100 से 1:400 अनुपात में पाया जाता है।

2. शीत वाताग्र (Cold Front ):-

         एक ही दिशा से आती हुई ठण्डी एवं उष्ण वायु-राशियाँ जब आपस में मिलती हैं और ठण्डी वायु-राशि आक्रामक होती हैं तो वह उष्ण वायु-राशि को ऊपर धकेल देती है। इसी को शीत वाताग्र कहा जाता है। इनका ढाल 1:25 से 1:100 तक होता है। इसमें वाताग्र शीतल से ऊष्ण भाग की ओर अर्थात् बायीं ओर से दायीं ओर बढ़ता है।

3. अवशिष्ट वाताग्र (Oecluded Front):-

       जब कभी शीत वाताग्र तीव्र गति से चलकर ऊष्ण वाताग्र से मिल जाता है तो ऊष्ण वायु ऊपर उठ जाती है और धरातल से उसका सम्पर्क समाप्त हो जाता है। इसी अवस्था को अवशिष्ट वाताग्र कहते हैं।

4. स्थायी वाताग्र (Stationary Front):-

      जब कभी दो विपरीत स्वभाव वाली वायु-राशियाँ एक-दूसरे के समान्तर चलकर एक वाताग्र के रूप में अलग हो जाती है तो ऐसी दशा में वायु ऊपर नहीं उठ पाती जिसे स्थायी वाताग्र कहते हैं।

वाताग्र प्रदेश (Frontal Zones)

     पृथ्वी तल पर उन प्रदेशों में वाताग्रों की उत्पत्ति होती है जहाँ वायु-राशियों के तापमान में अधिक अन्तर पाया जाता है और जहाँ वायु-राशियाँ अभिसरित होती हैं। पृथ्वी के धरातल पर चलने वाली वायु-राशियों और उनके मिलने के क्षेत्रों का वर्णन निम्नलिखित दिन्दुओ के अन्तर्गत किया गया है-

1. ध्रुवीय वाताग्र प्रदेश (Polar Frontal Zone):-

      यह प्रदेश दोनों गोलार्द्ध में 30° से 45° अक्षांशों के मध्य स्थित है। इस प्रदेश में ध्रुवीय ठण्डी वायु-राशि तथा ऊष्ण कटिबंधीय गर्म वायु-राशि के मिलने से ध्रुवीय वाताग्र का निर्माण होता है। इनका विस्तार उत्तरी अटलांटिक महासागर तथा उत्तरी प्रशान्त महासागर में अधिक पाया जाता है। ये वाताग्र जाड़ों में अत्यधिक सक्रिय होते हैं किन्तु गर्मियों में शिथिल हो जाते हैं।

2. आर्कटिक वाताग्र प्रदेश (Arctic Frontal Zone):-

        ध्रुव वृत्तीय क्षेत्रों में महाद्वीपीय ध्रुवीय हवायें तथा सागरीय ध्रुवीय हवायें परस्पर मिलती है। इसी से यहाँ वाताग्रों का निर्माण होता है। इन दोनों वायु-राशियों के तापमान में विशेष अन्तर नहीं पाया जाता। परिणामस्वरूप यहाँ वाताग्र अधिक सक्रिय नहीं होते। इन वाताग्रों का विस्तार मुख्यतः यूरेशिया तथा उत्तरी अमेरीका के उत्तरी भागों में पाया जाता है।

3. आन्तरिक उष्ण कटिबंधीय वाताग्र प्रदेश (Inter Tropical Frontal Zone):-

     यह प्रदेश विषुवतीय रेखीय न्यून वायुदाब की पेटी में फैला हुआ है। यहाँ जब कभी उत्तरी-पूर्वी तथा दक्षिणी-पूर्वी व्यापारिक हवायें मिलती हैं तो वाताग्र का निर्माण हो जाता है। इस प्रकार यहाँ व्यापारिक हवाओं के अभिसरण के कारण वाताग्रों का निर्माण होता है। ये वाताग्र प्रदेश के मौसम के अनुसार ऊपर-नीचे सरकते रहते है।

निष्कर्ष:

     उपरोक्त तथ्यों से स्पष्ट है कि वाताग्रों की उत्पत्ति कुछ निर्दिष्ट दशाओं के सम्यक रूप से अनुकूल होने पर ही होती है। इनमें विभिन्न विपरीत तापमान वाली दो वायु-राशियों की उपस्थिति तथा उनकी विपरीत प्रवाह दिशा मुख्य है। अन्यथा किसी एक के अनुपस्थित होने पर उनका बनना असंभव हो जाता है।

प्रश्न प्रारूप

प्रश्न 1. सीमाग्र क्या है? स्पष्ट कीजिए। (What do you mean by Front ? Explain.)

Or वाताग्र किसे कहते हैं? प्रत्येक की उत्पत्ति एवं लक्षणों की व्याख्या कीजिए। (What is Fronts? Describe the origin and characteristics of each.)

Or वाताग्र से आप क्या समझते हो? प्रमुख वाताग्र प्रदेशों का वर्णन कीजिए। (What do you understand by Fronts? Describe main Frontal Zones.)

Or, वाताग्रों का वर्गीकण कीजिए एवं उनकी विशेषताओं की विवेचना करें।


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21. जलवायु परिवर्तन के विभिन्न प्रमाण

21. जलवायु परिवर्तन के विभिन्न प्रमाण

 (Evidences of Climatic Change)


जलवायु परिवर्तन के विभिन्न प्रमाण

         यह सनातन सत्य है कि अनुकूल जलवायु के कारण ही पृथ्वी पर जीवन संभव हो पाया है, लेकिन मानवीय और कुछ प्राकृतिक गतिविधियों के कारण जलवायु की दशा बदल रही है। इस स्थिति को जलवायु परिवर्तन (Climate change) की संज्ञा दी जाती है। हाल के वर्षों और दशकों में गर्मी के कई रिकॉर्ड टूट गए हैं: यूएन जलवायु रिपोर्ट 2019 इस बात की पुष्टि करती है कि रिकॉर्ड में साल 2019 दूसरा सबसे गर्म वर्ष था, और 2010-2019 सबसे गर्म दशक। वर्ष 2019 में वातावरण में कार्बन डाईऑक्साइड (CO2) तथा अन्य ग्रीनहाउस गैसें नए रिकॉर्ड स्तर तक पहुंच गई थी। जलवायु में परिवर्तन के कारण ही विशालकाय जीव जैसे डायनासोर आदि जिनकी इस पृथ्वी पर बहुलता थी आज उपलब्ध नहीं है। इसी प्रकार राजस्थान के मरु प्रदेश में किसी समय हिमाच्छादन था। वातावरण की गैसों, धूलकणों तथा जलवाष्प की मात्रा में आये परिवर्तन और रूप में धरातलीय भौतिक दशाओं के परिवर्तन के परिणाम है। धरातलीय दशाओं के अतिरिक्त पृथ्वी के आन्तरिक भागों में होने वाला समस्थिति असंतुलन भी इसके लिए कुछ सीमा तक जिम्मेदार हैं। तारों, ग्रहों तथा उपग्रहों की स्थितियों में परिवर्तन भी पृथ्वी पर जलवायु परिवर्तन को प्रभावित करता है। इस प्रकार जलवायु परिवर्तन को प्रमुख रूप से तीन कारक प्रभावित करते हैं।

1. धरातलीय भौतिक दशाओं में परिवर्तन

2. सौर मण्डलीय स्थितियों में परिवर्तन

3. भूर्भिक दशाओं में परिवर्तन 

          उपरोक्त प्रभावी कारको का संक्षिप्त विवरण निम्नलिखित है-

1. धरातलीय भौतिक दशाओं में परिवर्तन:-

      पृथ्वी के धरातल पर भौतिक दशाओं में परिवर्तन के प्रमुख कारण धरातल पर बनने वाली विशालकाय नदी जल परियोजनायें, राजमार्ग तथा रेलमार्ग, विशाल औद्योगिक संस्थान, वनों का समाप्त होना, प्रदूषण की वृद्धि, अनियंत्रित जनसंख्या वृद्धि, नगरीकरण व औद्योगीकरण, जलचक्र एवं नाइट्रोजन चक्रों का विनाश आदि है।

       मनुष्य अपनी क्रियाओं से वातावरण को प्रभावित करता है। मनुष्य प्रकृति का अंग है और प्राकृतिक संतुलन के बिना मानव अस्तित्व खतरे में है। यही कारण है कि पृथ्वी में अनियंत्रित वनों की कटाई से उष्ण कटिबंधीय वर्षा में परिवर्तन हुये है। नगरीकरण व औद्योगीकरण ने हरित पेटी संकल्पना प्रायः समाप्त कर दी है। अतः इन क्षेत्रों में ध्वनि, वायु तथा जल प्रदूषणों ने वायुमण्डलीय गैसों में ऑक्सीजन की कमी तथा कार्बन डाईआक्साइड की अधिकता कर दी है।

      इसी प्रकार पृथ्वी की आन्तरिक सतह से सिंचाई हेतु अत्यधिक जल निकास से तथा वर्षा द्वारा जल के पुनः सतह पर एकत्र न होने से जल चक्र विनष्ट हो जाता है और जल का स्तर लगातार गिरता जाता है। बड़े पैमाने पर कीटनाशकों के प्रयोग से वायुमण्डलीय दशाओं में परिवर्तन आता है। पृथ्वी में इनका निर्धारित प्रयोग वायु संतुलन ही स्थापित कर सकता है। चरनोबिल तथा भोपाल दुर्घटनायें विकिरण के प्रभाव को स्पष्ट करती है। इन से स्पष्ट हो चुका है कि गैस तथा परमाणु संयंत्रों से कितना विनाश हो सकता है। पृथ्वी से प्रेरित परीक्षण हेतु उपग्रहों, रॉकेटों तथा वायुयानों के बढ़ते दबाव से भी वायुमण्डलीय दशाओं में अन्तर आता है।

      ये सभी धरातलीय परिवर्तन कम या अधिक मात्रा में जलवायु के विभिन्न कारकों को प्रभावित करते हैं।

जलवायु परिवर्तन2. भूगर्भिक दशाओं में परिवर्तन:-

        पृथ्वी की सतह तथा वायु मण्डलीय परिवर्तनों का प्रभाव आन्तरिक भागों में पड़ता है। ज्वालामुखी तथा भूकम्पों की संख्या में लगातार वृद्धि पृथ्वी के अन्दर होने वाले परिवर्तनों को सिद्ध करती है। अब तक प्राप्त ज्ञान के अनुसार ज्वालामुखी तथा भूकम्पीय दशाओं का प्रभाव प्रायः पृथ्वी की कमजोर पर्त वाले भागों में होता था। परन्तु अब अत्यन्त ठोस तथा स्थिर भूभागों में भी भूकम्प तथा ज्वालामुखी उद्गार देखने को मिलते हैं। जर्जिया का भूकम्प इसका नवीनतम उदाहरण है। पृथ्वी में होने वाली अपरदन निक्षेपण तथा समस्थिति परिवर्तन आदि कारकों के साथ-साथ विशाल जल परियोजनायें, परमाणु परीक्षणों तथा बड़े पैमाने पर होने वाली उत्खनन क्रियाओं के फलस्वरूप पृथ्वी के बाह्य तथा आन्तरिक भागों में संबंध परिवर्तित हो रहे हैं। इन परिवर्तनों से आन्तरिक क्रियायें तीव्र हो जाती है। आन्तरिक क्रियाओं से होने वाले उद्गार एवं झटके पृथ्वी की सतह पर वायु-ताप तथा जलवायु आदि दशाओं में परिवर्तन करते हैं।

जलवायु परिवर्तन

3. सौर मण्डलीय स्थिति में परिवर्तन:-

        तारों, ग्रहों, उपग्रहों, नीहारिकाओं, उल्काओं आदि के मध्य प्राकृतिक संतुलन पाया जाता है। इस संतुलन के पीछे सौरमण्डलीय निरक्षेप तथा सापेक्षिक गुरुत्वाकर्षण शक्ति है। सौर परिवार के अन्तर्गत सूर्य धब्बों के प्रभाव से पृथ्वी पर औसत ताप बढ़ जाता है। इसी प्रकार ग्रहों के परिभ्रमण मार्ग में आने से सापेक्षिक आकर्षण बढ़ता है, इससे भी वायुदाब कम तथा तापीय असंतुलन बढ़ जाता है। चन्द्रमा में पाये जाने वाले धब्बों का प्रभाव भी पृथ्वी पर पड़ता है। वैज्ञानिक परीक्षणों से सिद्ध हुआ है कि पृथ्वी की सूर्य तथा चन्द्रमा के सन्दर्भ में स्थिति से पृथ्वी पर तापीय असंतुलन बढ़ता है। खगोलशास्त्रीय अध्ययनों से सिद्ध हो चुका है कि सौर मण्डलीय प्रभावों से वायुमण्डलीय परतों में गैसीय अनुपात असंतुलित हो रहा है।

जलवायु परिवर्तन

निष्कर्ष:-

      निष्कर्षत: कहा जा सकता है कि ओजोन परतों का पतला पड़ना, पृथ्वी में औसत तापमान का बढ़ना, हरित गृह प्रभाव में अनवरत वृद्धि, उष्णकटिबन्धीय वर्षा की मात्रा में स्थानिक एवं कालिक अन्तर, नगरीय तथा वनों की स्थितियों में परिवर्तन आदि पृथ्वी में जलवायु परिवर्तन के स्पष्ट संके है।

प्रश्न प्रारूप

1. जलवायु परिवर्तन के विभिन्न प्रमाणों का उल्लेख करें।


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General Geography Capsule 8

General Geography Capsule 8

सामान्य भूगोल


General Geography Capsule 8

एक नजर में इसे जरुर देखें

1. डीयागोगार्सिया द्वीप किस महासागर में स्थित है-

उत्तर-  हिन्द महासागर में 

2. कील नहर किस देश में स्थित है-

उत्तर- जर्मनी में 

3. क्यूराइल द्वीप का विवाद किन दो देशों के बीच है-

उत्तर- रूस और जापान

4. विश्व की सबसे अधिक ऊँचाई पर स्थित खारे पानी की झील है-

उत्तर- पैंगांग झील (लद्दाख व तिब्बत में)

5. विश्व का सबसे लम्बा प्लेटफार्म किस देश में स्थित है-

उत्तर-  भारत (गोरखपुर, UP)

6. उत्तरी अमेरिका के शीतोष्ण घास के मैदान को कहा जाता है-

उत्तर- प्रेयरी 

7. संयुक्त राज्य अमेरिका का प्रमुख कार उद्योग का केन्द्र है-

उत्तर- डेट्रायट

8. सर्वाधिक कागज उत्पादित करने वाला देश है-

उत्तर-  कनाडा  (मांट्रियल)

9. विश्व का सर्वाधिक मक्का तथा सोयाबीन उत्पादित करने वाला देश है-

उत्तर- USA

10. विश्व में सर्वाधिक चाँदी उत्खनित करने वाला देश है-

उत्तर- मैक्सिको (उत्तरी अमेरिका)

11. विश्व में अप्रवाह क्षेत्र की दृष्टि से बहने वाली सबसे बड़ी नदी है-

उत्तर- अमेजन (ब्राजील)

12. ब्राजील के कहवा के बागों को कहा जाता है-

उत्तर- फैजेन्डा

13. ब्राजील के उष्ण आर्द्र वनों को कहा जाता है-

उत्तर- सेल्वास

14. अटकामा मरुस्थल स्थित है-

उत्तर- चिली में (द० अमेरिका)

15. दक्षिण अमेरिका के वृक्ष-रहित घास के मैदान को कहा जाता है-

उत्तर- पम्पास (अर्जेंटीना का ह्रदय)

16. लंदन किस नदी के तट पर बसा है-

उत्तर- टेम्स

17. फ्रांस की राजधानी पेरिस किस नदी के तट पर बसा है-

उत्तर- सीने नदी

18. ‘फैशन की नगरी’ कहा जाता है-

उत्तर- पेरिस को

19. विश्व का सर्वाधिक अंगूर उत्पादक देश है-

उत्तर- इटली

20. फ्रांस को यूनाइटेड किंगडम से अलग करता है-

उत्तर- इंग्लिश चैनल

21. आस्ट्रेलिया की खोज किया था-

उत्तर- जेम्स कुक ने (1769 में)

22. न्यूजीलैंड के मूल निवासी को कहा जाता है-

उत्तर- माओरी

23. विश्व विख्यात सोने की खान कालगुर्ली और कुलगार्डी है-

उत्तर- आस्ट्रेलिया में

24. विश्व में सर्वाधिक ऊन निर्यातक देश है-

उत्तर- ऑस्ट्रेलिया

25. विश्व विख्यात जीव ‘कंगारू’ किस महाद्वीप में पाया जाता है-

उत्तर- ऑस्ट्रेलिया में

26. ‘दक्षिण का ब्रिटेन’ कहा जाता है-

उत्तर- न्यूजीलैंड को

27. विश्व में सर्वाधिक बॉक्साइट उत्खनित करने वाला देश है-

उत्तर- ऑस्ट्रेलिया

28. ‘बर्फीला’ या ‘श्वेत महाद्वीप’ कहा जाता है-

उत्तर- अंटार्कटिका को

29. विश्व में सर्वाधिक नगरीय जनसंख्या घनत्व वाला देश है-

उत्तर- सिंगापुर

30. ‘झीलों का देश’ कहा जाता है-

उत्तर- फिनलैंड को

31. ‘यूरोप का भारत’ कहा जाता है-

उत्तर- इटली को

32. ‘यूरोप का खेल मैदान’ कहा जाता है-

उत्तर- स्विट्जरलैंड को

33. विश्व का सबसे व्यस्त हवाई अड्डा है-

उत्तर- हार्ट्सफील्ड जैक्सन का अटलांटा

34. विश्व में सर्वाधिक कॉफी तथा कोको उत्पादक देश है-

उत्तर- ब्राजील

35. विश्व का सर्वाधिक गर्म स्थल अल-अजीजीयाह (लिबिया) किस महाद्वीप में स्थित है-

उत्तर- अफ्रीका में

36. विषुवत रेखा को दो बार काटने वाली नदी है-

उत्तर- कांगो नदी

37. मकर रेखा को दो बार काटने वाली नदी है-

उत्तर- लिम्पोपो नदी

38. लाल सागर को भूमध्य सागर से जोड़ती है-

उत्तर- स्वेज नहर

39. अफ्रीका यूरोप से पृथक किस जलसन्धि से होता है-

उत्तर- जिब्राल्टर जलसन्धि से

40. ‘यूरोप का गर्म कम्बल (Warm blanket of Europe)’ के उपनाम से जाना जाता है-

उत्तर- गल्फस्ट्रीम जलधारा को

41. उत्तरी अमेरिका तथा दक्षिणी अमेरिका को जोड़ती है-

उत्तर- पनामा नहर

42. ‘गोल्ड कोस्ट’ के नाम से जाना जाने वाला देश है-

उत्तर- घाना

43. आस्वान बांध किस नदी पर बना है-

उत्तर- नील नदी पर 

44. वनों का देश किसे कहा जाता है-

उत्तर- कांगो देश को

45. एकमात्र महाद्वीप, जिससे कर्क व मकर दोनों रेखाएँ गुजरती है-

उत्तर- अफ्रीका

46. द लैंड ऑफ गोल्डेन प्लीस, लैंड ऑफ कंगारू एवं प्यासी भूमि का देश कहा जाता है-

उत्तर- ऑस्ट्रेलिया महाद्वीप को

47. विश्व में सबसे अधिक लवणता पायी जाती है-

उत्तर- वान झील में (330, टर्की)

48. विश्व का प्रथम उद्यान है-

उत्तर- येलोस्टोन पार्क (USA)

49. विश्व का सबसे बड़ा रेलवे जंक्शन है-

उत्तर- शिकाओ (USA)

50. विश्व की सबसे बड़ी ताजे जल की झील है-

उत्तर- सुपीरियर झील (USA)

General Geography Capsule 8

सुपीरियर झील एवं दूसरी संयुक्त झीलें


 

General Geography Capsule 9

General Geography Capsule 9

सामान्य भूगोल



General Geography Capsule 9

एक नजर में इसे जरुर देखे

1. सूर्य की दीप्तिमान सतह को कहा जाता है-

उत्तर- प्रकाशमण्डल 

2. सूर्य की उम्र है-

उत्तर-  5 बिलियन वर्ष

3. सौर ज्वाला को उत्तरी ध्रुव पर कहा जाता है-

उत्तर- औरोरा बोरियालिस

4. सौर ज्वाला को दक्षिणी ध्रुव पर कहा जाता है-

उत्तर-  औरोरा ऑस्ट्रेलिस

5. सौरमण्डल (खेजकर्ता-कॉपरनिक्स) का सबसे बड़ा ग्रह है-

उत्तर- वृहस्पति

6. सौरमंडल (मुखिया सूर्य) का सबसे छोटा ग्रह है-

उत्तर- बुध (मरकरी)

7. सूर्य से सबसे निकट स्थित ग्रह है-

उत्तर- बुध

8. सूर्य से सबसे दूर स्थित एवं सर्वाधिक ठंडा ग्रह है-

उत्तर- वरुण

9. सर्वाधिक गर्म एवं चमकीला ग्रह है-

उत्तर- शुक्र

10. बिना उपग्रहों वाला ग्रह है-

उत्तर- बुध और शुक्र

11. सौरमंडल का सबसे भारी ग्रह है-

उत्तर- वृहस्पति

12. पृथ्वी के सबसे निकट स्थित ग्रह है-

उत्तर- शुक्र ग्रह

13. सर्वाधिक उपग्रहों वाला ग्रह है-

उत्तर- वृहस्पति ग्रह

14. ‘लाल ग्रह’ के रूप में जाना जाता है-

उत्तर- मंगल

15. ‘नीला ग्रह’ के रूप में जाना जाता है-

उत्तर- पृथ्वी

16. ‘पीला ग्रह’ एवं ‘शीत ग्रह’ के रूप में जाना जाता है-

उत्तर- वृहस्पति

17. ‘हरा ग्रह’ के रूप में जाना जाता है-

उत्तर- वरुण

18. ‘जीवाश्म ग्रह’ कहा जाता है-

उत्तर- चन्द्रमा को

19. ‘लेटा हुआ ग्रह’ कहा जाता है-

उत्तर- अरुण को

20. ‘भोर का तारा/सांझ का तारा’ तथा ‘पृथ्वी की बहन’ कहा जाता है-

उत्तर- शुक्र ग्रह को

21. रात्रि में लाल दिखाई देने वाला ग्रह है-

उत्तर- मंगल ग्रह

22. पृथ्वी का एक मात्र उपग्रह है-

उत्तर- चन्द्रमा

23. सौरमंडल का सबसे बड़ा उपग्रह है-

उत्तर- गेनिमीड (वृहस्पति का)

24. सौरमंडल का सबसे छोटा ग्रह है-

उत्तर-  डिमोस (मंगल का)

25. सर्वाधिक चमकीला तारा है-

उत्तर- साइरस

26. मंगल ग्रह के लाल होने का कारण-

उत्तर- आयरन ऑयरन-ऑक्साइड

27. शनि (सबसे चपटा ग्रह) का सबसे बड़ा उपग्रह है-

उत्तर- टाईटन

28. वलय युक्त ग्रह है-

उत्तर- शनि

29. शनि के रिंग्स (वलय) की खोज की थी-

उत्तर- गैलिलियो

30. शनि के चारों ओर वलयों की संख्या है-

उत्तर- 10

31. बुध ग्रह का विशिष्ट गुण है-

उत्तर- चुम्बकीय क्षेत्र का होना

32. सबसे कम समय में सूर्य का चक्कर लगाने वाला ग्रह है-

उत्तर- बुध (88 दिन)

33. क्षुद्र ग्रह (Asteriods) स्थित होते है-

उत्तर- मंगल और वृहस्पति के बीच

34. सबसे बड़ा क्षुद्र ग्रह है-

उत्तर- सेरेस

35. सबसे अधिक अक्षांशीय वाला ग्रह है-

उत्तर- बुध

36. अंतरिक्ष में कुल तारामंडलों की संख्या-

उत्तर- 89

37. सबसे बड़ा तारामंडल है-

उत्तर- हाईड्रा

38. हैली पुच्छल तारा दिखता है-

उत्तर- 76 वर्षों बाद (2062 में पुन: दिखाई पड़ेगा)

39. पृथ्वी की घूर्णन दिशा है-

उत्तर- पश्चिम से पूरब

40. पृथ्वी के दिशा के विपरीत चक्कर लगाने वाला ग्रह है-

उत्तर- शुक्र और अरुण

41. पृथ्वी का आकार है-

उत्तर- जिओएड (Geoid)

42. ‘पृथ्वी अपनी धूरी पर घुमती है और ग्रह सूर्य के चारों ओर घुमते है’ यह सिद्धांत है-

उत्तर- कॉपरनिक्स का

43. पृथ्वी की अपेक्षा चन्द्रमा का द्रव्यमान होता है-

उत्तर- 1/81

44. दूरी के अनुसार ग्रहों का आरोही क्रम है-

उत्तर- बुध⇒ शुक्र⇒ पृथ्वी⇒ मंगल⇒ वृहस्पति⇒ शनि⇒ अरुण⇒ वरुण

45. आकार एवं द्रव्यमान के अनुसार ग्रहों का अवरोही क्रम है-

उत्तर- वृहस्पति⇒ शनि⇒ अरुण⇒ वरुण⇒ पृथ्वी⇒ शुक्र⇒ मंगल⇒ बुध

46. आकार में पाँचवां सबसे बड़ा ग्रह है-

उत्तर- पृथ्वी

47. आकार एवं बनावट की दृष्टि से पृथ्वी के समान ग्रह है-

उत्तर- शुक्र

48. हरे रंग का ग्रह है-

उत्तर- वरुण ग्रह

49. लेटा हुआ ग्रह किसे कहा जाता है-

उत्तर- अरुण को

50. एकमात्र क्षुद्र ग्रह जिसे नंगी आँखों से देखा जा सकता है-

उत्त– फोर वेस्टा को

General Geography Capsule 9

सभी ग्रहों का नाम


 

General Geography Capsule 7

General Geography Capsule 7

सामान्य भूगोल


General Geography Capsule 7

1. पृथ्वी का काल्पनिक अक्ष पर घुमना कहलाता है-

उत्तर- घूर्णन/दैनिक गति 

2. पृथ्वी पर दिन-रात का होना परिणाम है-

उत्तर- घूर्णन गति का

3. सूर्य के चारों ओर पृथ्वी का घुमना कहलाता है-

उत्तर- परिक्रमण / वार्षिक गति 

4. पृथ्वी के परिक्रमण गति के कारण होता है-

उत्तर- ऋतु परिवर्तन

5. पृथ्वी पर सर्वाधिक सूर्य ताप होता है-

उत्तर- विषुवत रेखा पर

6. पृथ्वी अपने अक्ष पर झुकी है-

उत्तर- 23½º

7. भू-स्थिर उपग्रहों की ऊँचाई है-

उत्तर- 36000 किमी०

8. पृथ्वी की एक मात्र मंदाकिनी है-

उत्तर- दुग्धमेखला (मिल्की वे)

9. पृथ्वी, सूर्य की एक परिक्रमा करता है-

उत्तर- 365 दिन 6 घंटा में

10. पृथ्वी अपने अक्ष पर एक पूरा चक्कर लगाता है-

उत्तर- 23 घंटे 56 मिनट में

11. पृथ्वी की विषुवतीय व्यास है-

उत्तर- 12756 किमी०

12. पृथ्वी की ध्रुवीय व्यास है-

उत्तर- 12713 किमी०

13. पृथ्वी की ध्रुवीय व्यास विषुवतीय व्यास से कम है-

उत्तर- 43 किमी०

14. सूर्य के प्रकाश को पृथ्वी पर पहुँचने में लगा समय-

उत्तर-8.3 मिनट 

15. चन्द्रमा के प्रकाश को पृथ्वी पर पहुँचने में लगा समय है-

उत्तर- 1.3 सेकेण्ड 

16. चन्द्रमा पर दिन का तापमान है-

उत्तर- 100 डिग्री सेल्सियस

17. चन्द्रमा पर रात का तापमान है-

उत्तर-  -180 डिग्री सेल्सियस

18. सूर्य के बाहरी सतह (तल) का तापमान है-

उत्तर- 6000 डिग्री सेल्सियस

19. सूर्य के केन्द्र का तापमान है-

त्तर- 1.50 करोड़ डिग्री सेल्सियस

20. सूर्य के काले धब्बे का तापमान है-

उत्तर- 1500 डिग्री सेल्सियस

21. सूर्य की ऊर्जा का स्रोत है-

उत्तर- नाभिकीय संलयन 

22. सूर्य के प्रमुख संघटक है-

उत्तर- हाइड्रोजन (69.5%), हीलियम (28%) व अन्य (2.5%) 

23. सौर दिवस की अवधि होती है-

उत्तर- 24 घंटा 

24. सूर्य और पृथ्वी के मध्य स्थित दो ग्रह है-

उत्तर- शुक्र और बुध 

25. चन्द्रमा की सतह व उसकी आंतरिक स्थिति का अध्ययन से संबंधित विज्ञान है-

उत्तर- सेलेनोलॉजी

26. पृथ्वी की ध्रुवीय तथा विषुवतीय परिधि है-

उत्तर- क्रमशः 40,008 किमी० तथा 40075 किमी०

27. ब्रह्माण्ड का व्यास है-

उत्तर- 108 प्रकाश वर्ष

28. सूर्य का व्यास है-

उत्तर- 1392000 किमी०

29. पृथ्वी के क्रोड का तापमान होता है-

उत्तर- 2200 डिग्री सेल्सियस से 2750 डिग्री सेल्सियस

30. आकाश गंगा की आकृति है-

उत्तर- सर्पिलाकार 

31. मंगल ग्रह के दो उपग्रह है-

उत्तर- फोबोस एवं डीमोस

32. सूर्य का बाहरी भाग कहलाता है-

उत्तर- क्रोमोस्फिय 

General Geography Capsule 7

क्रोमोस्फियर 

33. सूर्य का केन्द्रीय भाग कहलाता है-

उत्तर- फोटोस्फीयर

34. सूर्य से प्रकाश की चाल है-

उत्तर- 3×108 m/s

35. प्रकाश वर्ष (प्रकाश द्वारा एक वर्ष में तय की गई दूरी) मात्रक है-

उत्तर- दूरी का 

36. 1 प्रकाश वर्ष बराबर होता है-

उत्तर- 9.45×1012 किमी०

37. दूरी की सबसे बड़ी इकाई है-

उत्तर- पारसेक

38. 1 पारसेक बराबर होता है-

उत्तर- 3.26 प्रकाश वर्ष 

39. पृथ्वी का औसत तापमान होता है-

उत्तर- 15 डिग्री सेल्सियस

40. निकटतम तारे से पृथ्वी पर प्रकाश पहुँचता है-

उत्तर- 4.2 वर्ष में

41. सूर्योदय पश्चिम की ओर एवं सूर्यास्त पूरब की ओर होता है-

उत्तर- अरुण ग्रह पर 

42. सौर मंडल का सबसे छोटा ग्रह है-

उत्तर- बुध

43. सूर्य के पश्चात् पृथ्वी के सबसे निकट का तारा है-

उत्तर- प्रौक्सिमा सेंचुअरी

44. प्रौक्सिमा सेंचुअरी पृथ्वी से कितनी दूर है-

उत्तर- 4.22 प्रकाश वर्ष

45. पृथ्वी पर जीवन पारिस्थितिकी के कारण है, इसी कारण पृथ्वी को कहा जाता है- 

उत्तर- हरित ग्रह 

46. पृथ्वी पर जल की उपस्थिति के कारण इसे कहा जाता है-

उत्तर- नीला ग्रह

47. लाल ग्रह किसे कहा जाता है-

उत्तर- मंगल ग्रह को

48.  सौरमंडल का सबसे छोटा उपग्रह है-

उत्तर- डीमोस

49. सौरमंडल का सबसे बड़ा ज्वालामुखी है-

उत्तर- ओलम्पस मेसी (मंगल ग्रह)

50. सौरमंडल का सबसे ऊँचा पर्वत है-

उत्तर- निक्स ओलंपिया  (मंगल ग्रह)


 

1. प्रमुख भौगोलिक सिद्धांत एवं उनके प्रतिपादक

प्रमुख भौगोलिक सिद्धांत एवं उनके प्रतिपादक




प्रमुख भौगोलिक सिद्धांत एवं उनके प्रतिपादक

प्रमुख भौगोलिक सिद्धांत⇒ पृथ्वी की उत्पत्ति से सम्बन्धित सिद्धान्त

(1) गैसीय परिकलना/ वायव्य राशि परिकल्पना (Gaseous Hypothesis) @ काण्ट (1755)

(2) निहारिका परिकल्पना (Nebulas Hypothesis) @ लाप्लास (1796)

(3) ग्रहाणु परिकल्पना (Planetesimal Hypothesis) @ चेम्बरलेन (1904)

(4) ज्वारीय परिकल्पना (Tidal Hypothesis) @ जीन्स एवं जेफरीज

(5) युग्म-तारा परिकल्पना (Binary Star Hypothesis of Russell) @ रसैल

(6) सिफीड परिकल्पना (The Cepheid Hypothesis) @ ए. सी. बनर्जी

(7) नवतारा परिकल्पना (Nova Hypothesis) @ हायल एवं लिटिलटन

(8) फान वाइसकर की परिकल्पना (Fon Vaischcer’s Hypothesis) भी पृथ्वी की उत्पत्ति से सम्बंधित है।

(9) अंतर-तारक धूलि परिकल्पना (Inter-Steller Dust Hypothesis) @ ऑटोश्मिड (1943)

(10) विद्युत् चुम्बकीय परिकल्पना (Electro- Magnetic Hypothesis) @ डॉ. अल्फवेन (1942)

(11) बिग-बैंग सिद्धान्त @ ऐ. जार्ज लैमेण्टेर

(12) अद्वैतवादी विचारधारा @ कास्ते द बफन

(13) सतत सृष्टि सिद्धान्त @ थॉमस गोल्ड एवं हर्मन वाण्डी

(14) परिभ्रमण एवं ज्वारीय परिकल्पना @ रासजन

(15) बृहस्पति-सूर्य द्वैतारक परिकल्पना @ ई. एम. ड्रोबीशेवेस्की

⇒ महाद्वीप एवं महासागरीय नितल की उत्पत्ति से सम्बन्धी सिद्धान्त

(1) चतुष्फलक सिद्धान्त (Tetrahedral Theory) @ लोथियन ग्रीन (1857)

(2) लेपवर्थ एवं लव की परिकल्पना भी महाद्वीप एवं महासागरीय नितल की उत्पत्ति से सम्बन्धी है।

(3) महाद्वीपीय प्रवाह सिद्धान्त (Continental Drift Theory) @ वैगनर (1912)

(4) स्थल सेतु परिकल्पना (Land Bridge Hypothesis) @ ग्रेगरी

(5) संवहन धारा की परिकल्पना @ होम्स

(6) महाद्वीपीय फिसलन की परिकल्पना (Hypothesis of Sliding Continents) @ डैली

(7) पेन्टागोनल डोडिकाहेड्रन सिद्धान्त @ इली डी. ब्यूमान्ट

(8) प्रत्यास्थ-पुनश्चलन सिद्धान्त (Elastic Rebound) @ एच. एफ. रीड

(9) प्लेट विवर्तनिकी (Plate Tectonic) सिद्धान्त @ हैरीहेस 

⇒ पृथ्वी के सन्तुलन से सम्बन्धित सिद्धान्त

(1) सर जॉर्ज एयरी की संकल्पना

(2) प्राट की संकल्पना

(3) हेफोर्ड एवं बोबी की संकल्पना

(4) जोली की संकल्पना

(5) आर्थर होम्स की संकल्पना

⇒ भूसन्नति (Geosynclines) से सम्बन्धित सिद्धान्त

(1) हाल व डाना की संकल्पना

(2) हेग की संकल्पना

(3) ईवान्स की संकल्पना

(4) शुशर्ट की संकल्पना

(5) आर्थर होम्स की संकल्पना

⇒ पर्वत निर्माण से सम्बन्धित सिद्धान्त

(1) पर्वत निर्माणक भूसन्नति सिद्धान्त (Geosynclinal Orogen Theory) @ कोबर

(2) तापीय संकुचन सिद्धान्त (Thermal Contraction) @ जेफरीज

(3) महाद्वीपीय विसर्पण सिद्धान्त / खिसकते महाद्वीप का सिद्धांत @ डैली

(4) रेडियोऐक्टिवता सिद्धान्त या तापीय चक्र सिद्धान्त (Radioactivity Theory) @ जॉली

(5) संवहन तरंग सिद्धान्त (Convection Current Theory) @ होम्स

(6) विचलित चुम्बकत्व की परिकल्पना @ ब्लैकिट

⇒ भू-आकृतियों से सम्बन्धित सिद्धान्त

(1) भौगोलिक चक्र की संकल्पना @ डेविस (1899)

(2) शुष्क अपरदन चक्र की संकल्पना @ डेविस (1905)

(3) कार्स्ट अपरदन चक्र की संकल्पना @ सैण्डर्स  (1918)

(4) अपरदन चक्र संकल्पना @ वाल्टर पेंक

(5) परिहिमानी अपरदन चक्र संकल्पना @ पेल्टियर (1950)

(6) पैनप्लेनेशन की संकल्पना @ क्रिकमे

(7) अपघर्षण सिद्धान्त @ मैलट

(8) द्विचक्र सिद्धान्त @ डेविस

(9) भौमजल स्तर सिद्धान्त @ स्विनटर्न

(10) स्थैतिक जल मण्डल सिद्धान्त @ गार्डनर

(11) पेडीप्लेनेशन चक्र की संकल्पना @ एल. सी. किंग

(12) ढाल प्रतिस्थापन की परिकल्पना @ वाल्टर पैक

(13) पहाड़ी ढाल चक्र (Hill Slope Cycle) सिद्धान्त @ एल. सी. किंग

(14) प्रगामी सरिता अपहरण (Progressive Piracy Theory) का सिद्धान्त @ एच. डी. भाम्पसन

(15) चादरी बाढ़ (Sheet Flood) सिद्धान्त @ डब्ल्यू. जे. मेगी

(16) सवाना अपरदन चक्र @ पफ तथा टामस

(17) हिमनदीय अपरदन का सिद्धान्त @ दी मार्तोनी

(18)  वर्गश्रुण्ड (Bergschrund) सिद्धान्त @ जॉनसन

(19) खण्डकालिक अपरदन (Episodic Erosion) सिद्धान्त @ एस. ए. शूम

(20) अधः अपक्षय (Deep Weathering) सिद्धान्त @ डी. एल. लिण्टन

(21) सरिता संख्या का सिद्धान्त (Law of Stream Numbers) @ हार्टन

⇒ ज्वार-भाटा उत्पत्ति से सम्बन्धी सिद्धान्त

(1) स्थैतिक तरंग सिद्धान्त @ हैरिस

(2) नहर सिद्धान्त @ एयरी

(3)  प्रगामी तरंग सिद्धान्त @ विलियम हेवेल

(4)  संतुलन का सिद्धांत (Equilibrium Theory) @ न्यूटन

(5) गतिक सिद्धांत (Dynamical Theory) @ लाप्लास 

प्रवाल भित्तियों की उत्पत्ति से सम्बन्धी सिद्धान्त

(1) अवतलन सिद्धान्त @ डार्विन (1837)

(2)  स्थिर-स्थल सिद्धान्त @ मर्रे

(3) हिमानी नियंत्रण सिद्धान्त @ डैली

(4) लवणीय उच्छवसन (Saline Exhalation) सिद्धान्त @ हेले

वर्षण से सम्बंधित सिद्धान्त

1. हिम कण सिद्धांत (Ice-Crystal Theory) @ बर्जरान

2. संलयन सिद्धांत @ ई. जी. बोवेन

प्रवास भूगोल से सम्बंधित सिद्धान्त

(1) प्रवास कटिबन्ध सिद्धान्त @ टेलर

⇒ नगरीय भूगोल से सम्बंधित सिद्धान्त

(1) संकेन्द्रीय वलय (Concentric Zone) सिद्धान्त @ बर्गेस

(2) बहु-नाभिक सिद्धान्त (Multiple Nuclei) @ हैरिस एवं उलमैन

(3) खण्ड (Sector) सिद्धान्त @ होमर हायट

(4) संयुक्त वृद्धि (Fused Growth) सिद्धान्त @ गैरीसन

(5) कोटि-आकार नियम (Rank Size Rule) के प्रथम विचारक @ आयरबैक

(6) कोटि-आकार नियम पर महत्त्वपूर्ण कार्य @ जिफ

(7) प्राथमिक नगर का नियम (The Law of Primate City) -@ मार्क जेफरसन

(8) केन्द्रीय स्थान सिद्धांत (Central Place Theory) @  क्रिस्टालर

(9) अमलैंड (Umland) शब्द का प्रथम प्रयोग @ आन्द्रे एलिक्स

(10) उपवन नगर (Garden City) का विचार @ ईबेनजर होवर्ड

कृषि एवं उद्योगों के स्थानीयकरण का सिद्धान्त

(1) कृषि वलय सिद्धान्त / फसल सघनता का सिद्धांत / तुलनात्मक लाभ सिद्धांत @ वॉन थ्यूनेन

(2) उद्योग स्थापना-अवस्थिति सिद्धान्त / औद्योगिक स्थानीयकरण का सिद्धांत / न्यूनतम परिवहन लागत सिद्धांत @ अल्फेड वेबर

(3) अल्प-व्यय अवस्थिति सिद्धान्त @ लौन्हार्ट

(4) बाजार प्रतिस्पर्धा (Market Competition) सिद्धान्त @ फेटर एवं होटेलिंग

(5) न्यूनतम लागत सिद्धांत @ हूबर

(6) अधिकतम लाभ का सिद्धांत @ स्मिथ

⇒ अन्य प्रमुख सिद्धान्त एवं तथ्य

(1) हृदय-स्थल विचारधारा @ एच. जे. मैकिण्डर

(2) रिमलैण्ड विचारधारा @ एन. जे. स्पाइकमैन

(3) भूकूटनीति (Geo-Strategic) संकल्पना @ एस. बी. कोहेन

(4) भू-राजनीतिक (Geopolitic) विचारधारा @ कार्ल हाउशोफर

(5) राज्य का जैविक सिद्धान्त @ कार्ल हाउशोफर

(6) आदर्श या अनुकूलतम (Optimum) जनसंख्या सिद्धान्त @ कार साण्डर्स

(7) खण्ड एवं स्तर (Zone and Strata) सिद्धान्त @ ग्रिफिथ टेलर

(8) आकारिकी कटिबन्ध (Morphological Zone) सिद्धान्त @ आर. ई. डिकिन्सन

(9) समावेशी पदानुक्रम (Nested Hierarchy) सिद्धान्त @ ए. के. फिलब्रिक

(10) क्रोड़ एवं परिधि (Core and Periphery) सिद्धान्त @ फ्रीडमैन

(11) ध्रुवीय वाताग्र (Polar Front) सिद्धान्त @ बर्कनीज 

(12) अग्रिम प्रदेश (Pioneer Fringe) की संकल्पना @ आयशा बोमेन

(13) गतिक (Dynamic) सिद्धान्त @ नेपियर शा तथा लिम्फर्ट

(14)  विसरण का नियम (Law of Difusion) @ टी. ग्राहम

(15) ग्रह गति (Planetary Motion) का सिद्धान्त @ केपलर

(16) संसाधनों का संक्रियात्मक सिद्धान्त (Operational or Functional Theory of Resources) @ जिम्मरमैन

(17) भूकम्प की उत्पत्ति से संबंधित प्रत्यास्थ पुनश्चलन सिद्धांत (Elastic Rebound Theory) @ एच. एफ. रीड 

(18) प्लेट (Plate) शब्द का प्रथम प्रयोग- विलसन

(19) भू-संतुलन (Isostasy) शब्द का प्रथम प्रयोग @ डटन

(20) समान घनत्व परंतु गहराई में विभिन्नता (Uniform Density but Varying Thickness) @ एयरी

(21) बड़ा स्तंभ कम घनत्व, छोटा स्तंभ अधिक घनत्व (Bigger the column lesser the density, Smaller the column greater the density) @ प्राट

(22) पेनीप्लेन संकल्पना (Peneplain concept) @ डेविस

(23) पेनप्लेन संकल्पना (Panplain concept) @ क्रिर्कमे 

(24) पेडीप्लेन संकल्पना (Pediplain concept) @ किंग

(25) प्राइमारम्फ (Primarrumf) संकल्पना @ पेंक

(26) प्लिस्टोसीन हिमयुग का सर्वप्रथम प्रमाण @ लुई अगासीज

(27) आधार तल (Base Level of Erosion) की संकल्पना @ पॉवेल

4. नदियों के किनारें बसे प्रमुख नगर

नदियों के किनारें बसे प्रमुख नगर




भारत में नदियों के किनारे बसे प्रमुख नगर
क्रम  नगर का नाम  नदियाँ  
1. आगरा यमुना
2.  बद्रीना      अलकनंदा
3. प्रयागराज    गंगा, यमुना
4. दिल्ली, कोंटासाहेब, मथुरा यमुना 
5. फिरोजपुर सतलज
6. हरिद्वार, ऋषिकेष गंगा
7. कानपुर, बक्सर गंगा
8. अयोध्या, फैजाबाद सरयू
9. कोलकाता, हल्दिया, डायमण्ड हार्बर हुगली
10. लखनऊ गोमती
11.   डिब्रूगढ़ ब्रह्मपुत्र
12. गुवाहाटी ब्रह्मपुत्र 
13. जबलपुर नर्मदा
14. कोटा चम्बल
15. कुर्नूल तुंगभद्रा
16. सोकोवा घाट ब्रह्मपुत्र
17. कन्नौज गंगा
18. श्रीनगर, लेह झेलम
19. सूरत ताप्ती
20. हैदराबाद मूसी
21. मथुरा यमुना
22. अहमदाबाद, गांधीनगर साबरमती
23. राँची, जमशेदपुर स्वर्णरेखा नदी
24. पंढरपुर  भीमा नदी
25. बरेली रामगंगा
26. कटक, भुवनेश्वर महानदी
27. नासिक गोदावरी
28. सम्बलपुर महानदी
29. श्रीरंगपट्टनम कावेरी
30. जौनपुर गोमती
31. ओरछा बेतबा
32. वाराणसी गंगा
33. उज्जैन, कोटा क्षिप्रा
34. लुधियाना सतलज
35. विजयवाड़ा कृष्णा
36. तिरुचिरापल्ली, मैसूर कावेरी
37. पटना  गंगा
38. भागलपुर, फरक्का गंगा
39. मुंगेर  गंगा
40. सोनपुर, हाजीपुर गंडक
41. गोरखपुर  रापती
42. गंगटोक तिस्ता
43. बोधगया निरंजना
44. गया फल्गु
45. लखीसराय किऊल
46. मुम्बई माहिम
47. जम्मू तवी
48. दुर्ग, रायपुर शिवनाथ
 


नदियों के किनारें बसे प्रमुख नगर से सम्बंधित पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तर



1. निम्नलिखित में से कौन-सा शहर गंगा नदी के तट पर स्थित नहीं है?

(a) कानपुर

(b) पटना

(c) वाराणसी

(d) दिल्ली

[read more] (d) दिल्ली [/read]

2. निम्नलिखित में से कौन-सा नगर गोमती नदी के किनारे स्थित नहीं है?

(a) चित्रकूट

(b) लखनऊ

(c) जौनपुर

(d) सुल्तानपुर

[read more] (a) चित्रकूट [/read]

3. गंगा नदी पर कौन-सी प्रान्तीय राजधानी स्थित है?

(a) कोलकाता

(b) लखनऊ

(c) भुवनेश्वर

(d) पटना

[read more] (d) पटना [/read]

4. गंगा, यमुना और अदृश्य सरस्वती के संगम पर स्थित नगर है-

(a) हरिद्वार

(b) वाराणसी

(c) प्रयागराज

(d) कर्ण प्रयाग

[read more] (c) प्रयागराज [/read]

5. गोवा राज्य की राजधानी पणजी किस नदी के किनारे स्थित है?

(a) कोयना

(b) माण्डवी

(c) मूठा

(d) भीमा

[read more] (b) माण्डवी [/read]

6. आगरा किस नदी के किनारे स्थित है?

(a) गंगा

(b) अलकनंदा

(c) यमुना

(d) भागीरथी

[read more] (c) यमुना [/read]

7. आन्ध्र प्रदेश की राजधानी हैदराबाद किस नदी के तट पर स्थित है?

(a) कृष्णा

(b) मूसी

(c) मूठा

(d) माण्डवी

[read more] (b) मूसी [/read]

8. जम्मू-कश्मीर की राजधानी श्रीनगर किस नदी के तट पर स्थित है?

(a) चिनाब

(b) रावी

(c) व्यास

(d) झेलम

[read more] (d) झेलम [/read]

9. सूरत किस नदी के तट पर स्थित है?

(a) नर्मदा

(b) तापी

(c) सोन

(d) कावेरी

[read more] (b) तापी [/read]

10. उज्जैन किस नदी के किनारे स्थित है?

(a) नर्मदा

(b) तवा

(c) तापी

(d) क्षिप्रा

[read more] (d) क्षिप्रा [/read]

11. जमशेदपुर किस नदी के तट पर स्थित है?

(a) दामोदर

(b) स्वर्णरखा

(c) मयूराक्षी

(d) अजय

[read more] (b) स्वर्णरखा [/read]

12. नासिक किस नदी के तट पर स्थित है?

(a) महानदी

(b) गोदावरी

(c) नर्मदा

(d) कावेरी

[read more] (b) गोदावरी [/read]

13. जौनपुर किस नदी के तट पर स्थित है?

(a) गंगा

(b) सरयू

(c) गोमती

(d) रिहन्द

[read more] (c) गोमती [/read]

14. निम्नलिखित में से कौन-सा नगर किसी नदी के तट पर नहीं बसा है?

(a) सू

(b) कटक

(c) भोपाल

(d) मैसूर

[read more] (c) भोपाल [/read]

15. गंगा नदी के किनारे स्थित सबसे बड़ा शहर है-

(a) वाराणसी

(b) पटना

(c) कानपुर

(d) प्रयागराज

[read more] (c) कानपुर [/read]

16. निम्नलिखित में से कौन-सा शहर गंगा के तट पर नहीं बसा है?

(a) कानपुर

(b) पटना

(c) बरौनी

(d) दिल्ली

[read more] (d) दिल्ली [/read]

17. स्टील सिटी राउरकेला किस नदी के किनारे स्थित है?

(a) महानदी

(b) ब्राह्मणी

(c) वैतरणी

(d) स्वर्णरेखा

[read more] (b) ब्राह्मणी,

व्याख्या: 

    राउरकेला (Steel City) ओडिशा राज्य में स्थित है और ब्राह्मणी नदी के तट पर बसा हुआ है।

नदियों के किनारें बसे [/read]

18. निम्नलिखित में से सरयू नदी के किनारे कौन-सा शहर स्थित है?

(a) पटना

(b) प्रयागराज

(c) अयोध्या

(d) वाराणसी

[read more] (c) अयोध्या [/read]

19. कावेरी नदी के तट पर कौन-सा शहर स्थित है?

(a) तिरूचिरापल्ली

(c) बंगलौर

(b) मैसूर

(d) हैदराबाद

[read more] (a) तिरूचिरापल्ली [/read]

20. साबमती नदी किस शहर के किनारे बहती है?

(a) मुम्बई

(b) अहमदाबाद

(c) हैदराबाद

(d) विजयवाड़ा

[read more] (b) अहमदाबाद [/read]

3. भारत के प्रमुख जलप्रपात

3. भारत के प्रमुख जलप्रपात



भारत के प्रमुख जलप्रपात

        भारत में जलप्रपातों (Waterfalls) की संख्या नगण्य है। सभी जलप्रपात छोटे हैं। अधिकांश दक्षिण भारत में ही पाये जाते हैं। देश के प्रमुख जलप्रपात निम्नवत हैं:-

भारत के प्रमुख जलप्रपात
क्रम जलप्रपात  स्थिति ऊँचाई
1. धुँआधार नर्मदा नदी 30 मीटर
2. येन्ना  येन्ना नदी 183 मीटर
3. चूलिया चम्बल नदी 18 मीटर
4. पुनासा चम्बल नदी 12 मीटर
5. शिवसमुद्रम कावेरी नदी 90 मीटर
6. गोकक घाटप्रभा नदी 55 मीटर
7.  बिहार टोंस नदी 100 मीटर
8. हुंडरू स्वर्णरेखा नदी  98 मीटर
9. जोग या गरसोप्पा शरावती नदी  255 मीटर
10. पायकारा नीलगिरि क्षेत्र
⇒ जोग या गरसोप्पा / महात्मा गाँधी जलप्रपात शरावती नदी पर 255m ऊँचा है, जिसके निर्माण में राजा, रानी, राकेट तथा रोरर नामक चार छोटे-छोटे जलप्रपातों का योगदान है।

⇒ जोग या गरसोप्पा जलप्रपात का नया नाम महात्मा गाँधी जलप्रपात रखा गया है।

⇒ भारत की प्रथम जल-विद्युत परियोजना शिवसमुद्रम, जलप्रपात (कर्नाटक) पर 1902 ई० में स्थापित की गई है।

⇒ भारत में दूसरा सबसे बड़ा जलप्रपात कावेरी नदी बनाती है जिसे शिवसमुद्रम जलप्रपात के नाम से जानते हैं।

⇒ शिवसमुद्रम जलप्रपात मैसूर, बंगलोर तथा कोलार स्वर्ण क्षेत्र को विद्युत प्रदान करता है।

⇒ कावेरी नदी में दो द्वीप हैं- श्रीरंगपट्टनम & शिवसमुद्रम।

शिवसमुद्रम द्वीप के दोनों ओ जलप्रपात बनते हैं।

भारत के प्रमुख जलप्रपात

शिवसमुद्रम



भारत के प्रमुख जलप्रपात से सम्बंधित महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तर



1. भारत का सबसे ऊँचा जलप्रपात है-

(a) कपिल धारा जलप्रपात

(b) धुआँधार जलप्रपात

(c) जोग जलप्रपात

(d) सहस्त्र धारा जलप्रपात

[read more] (c) जोग जलप्रपात [/read]

2. विश्वविख्यात जोग या गरसोप्पा जलप्रपात किस राज्य में स्थित है?

(a) कर्नाटक

(b) महाराष्ट्र

(c) आ० प्र०

(d) केरल

[read more] (a) कर्नाटक [/read]

3. जोग या गरसोप्पा जलप्रपात का नया नाम क्या है?

(a) सरदार पटेल जलप्रपात

(b) महात्मा गाँधी जलप्रपात

(c) जवाहरलाल नेहरू जलप्रपात

(d) इन्दिरा गाँधी जलप्रपात

[read more] (b) महात्मा गाँधी जलप्रपात [/read]

4. जोग जलप्रपात किस नदी पर स्थित है?

(a) शरावती

(b) कावेरी

(c) नर्मदा

(d) चम्बल

[read more] (a) शरावती [/read]

5. धुआँधार जलप्रपात किस नदी पर स्थित है?

(a) नर्मदा

(b) तापी

(c) इन्द्रावती

(d) चम्बल

[read more] (a) नर्मदा [/read]

6. कपिल धारा जलप्रपात किस नदी पर स्थित है?

(a) तापी

(b) शरावती

(c) नर्मदा

(d) इन्द्रावती

[read more] (c) नर्मदा [/read]

7. शिवसमुद्रम जलप्रपात किस नदी पर स्थित है?

(a) नर्मदा नदी

(b) कृष्णा नदी

(c) गोदावरी नदी

(d) कावेरी नदी

[read more] (d) कावेरी नदी [/read]

8. गोकक जलप्रपात किस नदी पर स्थित है?

(a) कावेरी

(b) ताम्रपर्णी

(c) शरवती

(d) घाटप्रभा 

[read more] (d) घाटप्रभा [/read]

9. हुण्डरू जलप्रपात निर्मित है-

(a) स्वर्ण रेखा नदी पर

(b) कावेरी नदी पर

(c) इन्द्रावती नदी पर

(d) नर्मदा नदी पर

[read more] (a) स्वर्ण रेखा नदी पर [/read]

10. बिहार जलप्रपात किस नदी पर स्थित है?

( a) चम्बल

(b) टोंस

(c) नर्मदा

(d) कावेरी

[read more] (b) टोंस [/read]

 11. सूची-1 को सूची-II से सुमेलित कीजिए-

सूची-I (जलप्रपात)  सूची-II (नदी)

A. जोग जलप्रपात 1. शरावती

B. शिवसमुद्रम जलप्रपात 2. कावेरी

C. धुआँधार जलप्रपात 3. नर्मदा

D. गोकक जलप्रपात 4. गोकक

कूट: 

A B C D

(a) 2 1 4 3

(b) 2 3 1 4

(c) 4 2 3 1

(d) 1 2 3 4

[read more] (d) 1 2 3 4 [/read]

12. एशिया का सबसे बड़ा जलप्रपात (Falls) ‘हुण्डरू’ किस जगह के पास है?

(a) राँची

(b) हजारीबाग

(c) जमशेदपुर

(d) बोधगया

[read more] (a) राँची [/read]

13. महात्मा गाँधी जल विद्युत् उत्पादक प्लाण्ट कहाँ स्थित है?

(a) जोग प्रपात

(b) शिवसमुद्रम प्रपात

(c) गोकक प्रपात

(d) इनमें से कोई नहीं

[read more] (a) जोग प्रपात [/read]

14. गोकक प्रपात किस जिले में स्थित है?

(a) बेलगाँव

(b) धारवाड़

(c) रायचूर

(d) बीदर

[read more] (a) बेलगाँव [/read]

15. राजा, रानी, रोरर और रॉकेट…… से सम्बन्धित है।

(a) कावेरी

(b) कृष्णा

(c) जोग प्रपात

(d) श्रृंगेरी

[read more] (c) जोग प्रपात [/read]

16. ककोलत जलप्रपात बिहार के किस जिले में स्थित है?

(a) नवादा

(b) रोहतास

(c) कटिहार

(d) भागलपुर

[read more] (a) नवादा [/read]

17. सहस्रधारा पर्यटन स्थल स्थित है-

(a) देहरादून

(b) मसूरी

(c) पंतनगर

(d) श्रीनगर

[read more] (a) देहरादून [/read]

18. नीलगिरि के पर्वतीय क्षेत्र में कौन-सा जलप्रपात स्थित है?

(a) जोग

(b) येन्ना

(c) धुआँधार

(d) पायकारा

[read more] (d) पायकारा [/read]

19. निम्नलिखित में कौन सुमेलित नहीं है?

(a) शिवसमुद्रम प्रपात- कावेरी

 (b) धुआँधार प्रपात- नर्मदा

(c) सहस्र धारा प्रपात- नर्मदा

(d) गरसोप्या प्रपात- कावेरी

[read more] (d) गरसोप्या प्रपात- कावेरी [/read]

20. निम्नलिखित में कौन-सा युग्म सुमेलित नहीं है?

(a) जोग- कर्नाटक

(b) पापनाशम- हि० प्र०

(c) धुआँधार- म० प्र०

(d) हुण्डरू- झारखण्ड

[read more] (b) पापनाशम- हि० प्र० [/read]

General Geography Capsule 6

General Geography Capsule 6

सामान्य भूगोल


General Geography Capsule 6

1. विश्व का सबसे बड़ा मांस निर्यातक देश है-

उत्तर- अर्जेंटीना 

2. दक्षिण अमेरिका का वह स्थान जहाँ जड़ों में वर्षा होती है-

उत्तर- मध्य चिल्ली

3. विश्व का एकमात्र महाद्वीप जिससे कर्क वृत्त, मकर वृत्त एवं विषुवत वृत्त होकर गुजरता है-

अफ्रीका महाद्वीप

4. एण्डीज पर्वतमाला (द० अमेरिका) की सर्वोच्च पर्वत चोटी का नाम है-

उत्तर- अकांकागुआ

5. मैनीगॉट रेखा किन दो देशों के बीच की सीमा रेखा है-

उत्तर- जर्मनी एवं फ़्रांस 

6. जपान पहले किस नाम से जाना जाता था-

उत्तर- निप्पन

7. अर्जेन्टीना देश की राजधानी है-

उत्तर- ब्यूनस ऑयर्स

8. सीयर्स टावर स्थित है-

उत्तर- शिकागो में 

9. उत्तरी सागर और बाल्टिक सागर को जोड़ने वाली नहर है-

उत्तर- कील नहर 

10. बेरूत किस देश की राजधानी है-

उत्तर-  लेबनान

11. ब्लैक हिल, ब्लू हिल तथा ग्रीन हिल नामक पहाड़ियाँ किस देश में है-

उत्तर- संयुक्त राज्य अमेरिका में

12. पहले ‘स्याम’ के नाम से जाना जाने वाला देश है-

उत्तर- थाईलैंड

13. विश्व के मानचित्र के सर्वप्रथम निर्माणकर्त्ता थे-

उत्तर- अनेग्जीमेंडर

14. ‘पृथ्वी का अंतिम स्वर्ग’ कहा जाता है-

उत्तर- इंडोनेशिया द्वीप को

15. संयुक्त राज्य अमेरिका तथा कनाडा की बीच की सीमा रेखा है-

उत्तर- 49वीं समांतर रेखा

16. ‘महाद्वीपों का महाद्वीप’ कहा जाता है-

उत्तर- एशिया को 

17. विश्व का सबसे बड़ा मरुस्थल सहारा स्थित है-

उत्तर- उत्तरी अफ्रीका में 

18. विश्व में जूट उत्पादन में अग्रणी देश है-

उत्तर- बांग्लादेश 

19 आर्कटिक एवं प्रशांत महासागर को जोड़ती है-

उत्तर- बेरिंग जलडमरूमध्य

20. लेब्रोडोर उत्तरी अटलांटिक महासागर की जलधारा की प्रक्रति है-

उत्तर-  ठंडी जलधारा

21. गल्फस्ट्रीम उत्तरी अटलांटिक महासागर की जलधारा की प्रक्रति है-

उत्तर- गर्म जलधारा

22. दक्षिणी अमेरिका का उष्ण मरूस्थल है-

उत्तर- पेंटागोनिया 

23. मिसीसिपी-मिसौरी नदी का उद्गम स्थल, जो मैक्सिको की खाड़ी में गिरती है-

उत्तर- लटास्का झील” (उत्तरी मिनेसोटा)

24. ‘सूर्योदय का देश’ कहा जाता है-

उत्तर- जापान को

25. नील नदी का उदग्न स्थल है-

उत्तर- विक्टोरिया झील 

26. ‘मध्यरात्रि के सूर्य का देश’ कहा जाता है-

उत्तर- नार्वे को

27. ‘आँसूओं का प्रवेश द्वार’ अथवा दुःख का द्वार के रूप में जाना जाता है-

उत्तर- बाब-उल-मंदब जलडमरूमध्य को 

नोट : बाब-उल-मंदब अरब प्रायद्वीप पर यमन और अफ़्रीका के सींग पर जिबूती, इरिट्रिया  और उत्तरी सोमालिया के बीच स्थित एक जलडमरूमध्य है।  

28. ‘यांगटीसीक्यांग नदी’ का उद्गम स्थल है-

उत्तर- सीकांग के पहाड़ी क्षेत्र से (तिब्बत की पठार, चीन)

29. ‘मृतक घाटी’ (Death Valley) स्थित है-

उत्तर- पूर्वी कैलीफोर्निया में

30. पिग्मी जनजाति निवास करती है-

उत्तर- कांगो बेसिन (अफ्रीका) में

31. आस्वान बांध किस नदी पर निर्मित है-

उत्तर- नील नदी पर 

32. वोल्गा नदी किस सागर में गिरती है-

उत्तर- कैस्पियन सागर

33. करा नहर (Kra Canal) किस देश में स्थित है-

उत्तर- थाईलैंड

नोट: प्रस्तावित “करा नहर” का मुख्य उद्देश्य दक्षिण चीन सागर एवं हिंद महासागर के बीच की नौवहन दूरी को कम करना है। नहर का निर्माण करा के स्थलडमरूमध्य के माध्यम से किया जाएगा। ये नहर थाईलैंड की खाड़ी और अंडमान सागर को जोड़ने का काम करेगी।

34. अंकोरवाट कहाँ है-

उत्तर- कम्बोडिया 

35. प्रायद्वीपों का महाद्वीप’ कहा जाता है-

उत्तर- यूरोप को 

36. आस्ट्रेलिया में किस नदी के किनारे घना आबादी है-

उत्तर- मर्रे-डार्लिंग 

37. नियाग्रा जल प्रपात किन दो देशों को विभाजित करती है-

उत्त– USA और कनाडा को 

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नियाग्रा जल प्रपात

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38. ‘प्रशांत महासागर के चौराहा’ के उपनाम से जाना जाता है-

उत्तर- हवाई द्वीप को 

39. विश्व का सर्वाधिक व्यस्त एवं महत्त्वपूर्ण जलमार्ग है-

उत्तर- उत्तरी अतलांतिक जलमार्ग

40. मलक्का जलसंधि (इंडोनेशिया) जोड़ती है-

उत्तर- अंडमान सागर एवं दक्षिणी चीन सागर को

41. कोलोराडो नदी स्थित है-

उत्तर-  USA में

42. महत्त्वपूर्ण मत्स्य ग्रह क्षेत्र ‘ग्रैण्ड बैंक’ स्थित है-

उत्तर- उत्तरी अतलांतिक महासागर में 

43. आस्ट्रेलिया के ऊपर चलने वाला उष्ण कटिबंधीय चक्रवात है-

उत्तर- विली-विली

44. जर्मनी और पोलैण्ड की बीच की सीमा रेखा है-

उत्तर- ऑडरनीस रेखा

45. विश्व का सबसे प्राचीन राजतंत्र है-

उत्तर- जापान

46. विश्व में निम्नत्तम प्रजनन दर है-

उत्तर- स्वीडन की 

47. विश्व में सर्वाधिक अम्लीय वर्षा वाला देश है-

उत्तर- नार्वे 

48. ‘चकमा’ शरणार्थी है-

उत्तर-  बांग्लादेश की

49. नील नदी (6690 किमी०) का उद्गम स्थल है-

उत्तर- विक्टोरिया झील

50. पेट्रोनेस टावर स्थित है-

उत्तर- मलेशिया में

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General Geography Capsule 5

सामान्य भूगोल


General Geography Capsule 5

एक नजर में इसे जरुर पढ़ें

1. विश्व का सबसे बड़ा प्रायद्वीप है-

उत्तर- अरब प्रायद्वीप

2. विश्व की छत (Roof of the World) कहा जाता है-

उत्तर- पामीर के पठार को

3. विश्व की कुल जनसंख्या है-

उत्तर-  7.78 अरब (लगभग)

4. विश्व में जनसंख्या दृष्टि से सबसे बड़ा देश हो गया है-

उत्तर- भारत

5. विश्व का सबसे छोटा देश है-

उत्तर- वेटिकन सिटी (44 हेक्टेयर)

6. महाद्वीपों की कुल संख्या है-

उत्तर- 7

7. विश्व का सबसे बड़ा महाद्वीप है-

उत्तर- एशिया

8. विश्व का सबसे छोटा महाद्वीप है-

उत्तर- आस्ट्रेलिया

9. विश्व में ग्रामीण जनसंख्या है-

उत्तर- लगभग (50%)

10. सबसे ऊँचा पर्वत शिखर है-

उत्तर- माउन्ट एवरेस्ट (नेपाल में 8848 मी०)

11. विश्व में सर्वाधिक जन्म दर वाला महाद्वीप है-

उत्तर- अफ्रीका

12. विश्व में सर्वाधिक मृत्यु दर वाला महाद्वीप है-

उत्तर- अफ्रीका

13. विश्व में न्यूनत्तम साक्षरता वाला देश है-

उत्तर- नाइजर (17.6%)

14. विश्व में सर्वाधिक जनसंख्या घनत्व वाला देश है-

उत्तर- बांग्लादेश (926 व्यक्ति प्रति वर्ग किमी०)

15. विश्व का सर्वाधिक गरीब देश है-

उत्तर- पूर्वी तिमोर

16. विश्व में सर्वाधिक बोली जाने वाली भाषा है-

उत्तर- चीनी (मंदारिन)

17. विश्व की सबसे गहरी झील है-

उत्तर- बैकाल झील  (धरातल से 1940 मीटर गहरा)

18. एशिया को उत्तरी अमेरिका से अलग करता है-

उत्तर- बेरिंग जलसन्धि

19. विश्व में सिंचाई नहरों का सबसे बड़ा जाल है-

उत्तर- पाकिस्तान में

20. विश्व का सबसे बड़ा सिनकोना उत्पादक केंद्र है-

उत्तर- इंडोनेशिया 

21. विश्व में सर्वाधिक जलयान बनाने वाला देश है-

उत्तर- जापान

22. जनसंख्या दृष्टि से विश्व का सबसे छोटा महानगर है-

उत्तर- शंघाई  (चीन)

23. विश्व का सबसे बड़ा देश (क्षेत्रफल में) है-

उत्तर- रूस (यूरोप महाद्वीप)

24. विश्व का सबसे छोटा गणतंत्र है-

उत्तर- नौरु

25. एशिया महादेश में विश्व का सर्वाधिक वर्षा वाला क्षेत्र है-

उत्तर- मासिनराम (मेघालय, भारत)

26. विश्व की कुल जनसंख्या का कितना प्रतिशत एशिया में निवास करती है-

उत्तर – 60 प्रतिशत

27. एशिया में सर्वाधिक घना रूप से बसा द्वीप है-

उत्तर- जावा

28. श्रीलंका की सबसे लम्बी नदी है-

उत्तर-  महावेली

29. संसार का सबसे बड़ा सागर है-

उत्तर- दक्षिण चीन सागर

30. लाल सागर एवं भूमध्य सागर को जोड़ने वाली नहर है-

उत्तर- स्वेज नहर 

31. एशिया महादेश में क्षेत्रफल की दृष्टि से सबसे बड़ा देश है-

उत्तर- चीन

32. एशिया महादेश में क्षेत्रफल की दृष्टि से सबसे छोटा देश है-

उत्तर- मालदीव

33. विश्व का सर्वाधिक मछली पकड़ने वाला देश है-

उत्तर- चीन

34. विश्व का सर्वाधिक प्राकृतिक रबड़ उत्पादित करने वाला देश है-

उत्तर- थाईलैंड

35. विश्व का सर्वाधिक अबरख उत्पादित करने वाला देश है-

उत्तर- भारत

36. विश्व का सर्वाधिक चाय उत्पादित करने वाला देश है-

उत्तर- भारत

37. विश्व में सर्वाधिक टिन उत्पादित करने वाला देश है-

उत्तर- मलेशिया

38. अंध महाद्वीप (Black/Dark Continent) कहा जाता है-

उत्तर- अफ्रीका को

39. बुशमैन (कलाहारी) तथा पिग्मी (कांगो बेसिन) प्रमुख जनजातियाँ है-

उत्तर- अफ्रीका महादेश का

40. विश्व का प्रमुख स्वर्ण उत्पादक नगर है-

उत्तर- जोहांसबर्ग (अफ्रीका में)

41. अफ्रीका के उष्ण तथा शीतोष्ण घास का मैदान कहलाता है-

उत्तर- सवाना तथा वेल्ड्स

42. विश्व को सबसे बड़ी हीरे की खान है-

उत्तर- किम्बरले (दक्षिण अफ्रीका)

43. विश्व में सर्वाधिक कोको उत्पादन देश है-

उत्तर- आइबरी कोस्ट (अफ्रीका)

44. उत्तरी अमेरिका की खोज की गई थी-

उत्तर- कोलंबस

45. रेड इंडियन और नीग्रो प्रजातियाँ निवास करती है-

उत्तर- उत्तरी अमेरिका में

46. कालगुर्ली और कूलगार्डी सोने कि प्रसिद्ध खाने है- 

उत्तर-  आस्ट्रेलिया में

47. आस्ट्रेलिया में भेड़ पालक मजदूरों को कहा जाता है-

उत्तर- जेकारू

48. गोल्ड कोस्ट के नाम से जाना जाने वाला देश है-

उत्तर- घाना

General Geography Capsule 5

गोल्ड कोस्ट

49. वनों का देश किसे कहा जाता है-

उत्तर- कांगो देश को

50. मिस्र के किसान को क्या कहा जाता है-

उत्त– फेल्लाह


 

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