30. भूगोल एक क्षेत्र-वर्णनी विज्ञान (Chorological Science) है। विवेचना कीजिये।

30. भूगोल एक क्षेत्र-वर्णनी विज्ञान (Chorological Science) है। विवेचना कीजिये।


           भूगोल एक ‘क्षेत्र-वर्णनी विज्ञान’ (Chorological Science) है, भूगोल के इस स्वरूप को प्रतिपादित करने का मुख्य श्रेय जर्मनी के दो प्रमुख निम्न भूगोलवेत्ताओं को जाता है:

1. वॉन रिचथोफेन (Von Richthofen)

2. अल्फ्रेड हैटनर (A. Hettner)

     इन दोनों भूगोलवेत्ताओं ने भूगोल के अध्ययक्ष क्षेत्र (scope) की व्याख्या भी की थी और अन्य क्रमबद्ध विज्ञानों (systematic science) के साथ भूगोल के सम्बन्धों का विश्लेषण (analysis) और संश्लेषण (synthesis) भी किया था।

1. वॉन रिचथोफेन (Von Richthofen 1833-1905):-

        यद्यपि रिचथोफेन की शिक्षा भूगर्भ विज्ञान या भौमिकी (Geology) में हुई थी, परन्तु यह एक प्रसिद्ध भौतिक भूगोलवेत्ता (Physiographer) थे और साथ ही उन्होंने भूगोल के मानवीय पक्ष का भी ध्यान रखा था। वे बोन, लीपजिंग तथा बर्लिन विश्वविद्यालयों में प्राध्यापक भी रहे थे। सर्वप्रथम उनके अन्वेषण आल्पस क्षेत्र में आस्ट्रिया के टिरोल (Tyrol) प्रदेश में हुए थे तत्पश्चात् वह ट्रांसिल्वानिया तक बढ़ा और पूर्वी चीन में जाकर रहा।

        चीन में उसने व्यापक विस्तृत क्षेत्र अध्ययन करके सन् 1882 में ‘चीन का भूगोल’ नामक पुस्तक तथा उसकी मानचित्रावली (Atlas) प्रकाशित की। रिचथोफेन ने चीन के शान्टुग और किआओचाऊ क्षेत्रों में कोयले के भण्डारों को बताया था। वह संयुक्त राज्य अमेरिका में कैलीफोर्निया भी गया था जहाँ उसने सोने के भण्डारों की भी खोज की थी।

     रिचथोफेन चीन में भू-विज्ञानी (Geologist) होकर गया था और वहाँ से भूगोलवेत्ता (Geographer) बनकर लौटा था। चीन के भूगोल पर रिचथोफेन की ग्रन्थमाला कुछ उसके जीवनकाल में और कुछ उसकी मृत्यु के बाद सन् 1877 से 1912 तक प्रकाशित हुई थी उसमें 5 ग्रन्थ थे। इस ग्रन्थमाला के प्रकाशन से रिचथोफेन विश्वविख्यात हो गया था। प्रथम ग्रन्थ पर ही उसको ‘Royal Geographical Society’ के संस्थापक का पदक मिला था। जर्मनी में वापस आने के बाद बोन विश्वविद्यालय में और फिर लीपजिग विश्वविद्यालय में भूगोल के प्रोफेसर के पद पर नियुक्ति हुई। तत्पश्चात् वह बर्लिन विश्वविद्यालय में प्रोफेसर नियुक्त हुए थे।

    कई वर्षों तक वह ‘Berlin Geographical Society’ के अध्यक्ष भी रहे थे। उन्होंने महासागरीय संस्थान (Oceanographical Institute of Berlin) को ठोस वैज्ञानिक आधार पर स्थापित किया था।

       रिचथोफेन का मुख्य कार्य भौतिक भूगोल में विशेष भू-आकृति विज्ञान (Geomorphology) के क्षेत्र में है। सर्वप्रथम उसने रिया तटों (Ria Coasts) और फियोर्ड (Fiord Coasts) का अन्तर समझाया था। बाद में उसने प्रदेशों का अध्ययन करके सामान्य तुलनात्मक भूगोल (General Comparative Geography) की स्थापना की थी।

      जर्मनी में रिचथोफेन का निकटतम शिष्य अल्ब्रेट पेंक (Albrecht Penck) था। जर्मनी से बाहर उसके ग्रन्थों की प्रशंसा ब्लाश ने बहुत अधिक की, परन्तु उसका सबसे अधिक प्रमुख सहायक कार्यकर्ता अमेरिकन भौतिक भूगोलशास्त्री डेविस (W. M. Davis) था।

     वॉन रिचथोफेन ने भूगोल को ‘क्षेत्र-वर्णनी विज्ञान’ (Chorological Science) सिद्ध किया था अर्थात् भूगोल में पृथ्वीतल की क्षेत्रीय विभिन्नताओं (Areal Variations) का अध्ययन होता है। उसने अपने लेखों में कहा था कि भूगोल की अध्ययन सामग्री में अनेक प्रकार के तथ्यों की बहुत बड़ी संख्या होती है, उस सब तथ्यों को मिलाकर एक विषय के अन्तर्गत अध्ययन करने के लिए अध्ययन की विधि को तय करना बहुत अधिक आवश्यक है। इस दृष्टिकोण से भूगोल क्षेत्रीय भिन्नता (Areal diversity) का विषय है। रिचथोफेन के अनुसार भौगोलिक अध्ययन में क्षेत्रीय सिद्धान्त (Areal principle) अनिवार्य था।

       “इस प्रकार भूगोल को ‘क्षेत्रीय विज्ञान’ का स्वरूप देने का मुख्य श्रेय वॉन रिचथोफेन को ही है।”

2. अल्फ्रेड हैटनर (Alfred Hettner 1859-1941):-

      हैटनर महोदय बीसवीं शती के अग्रगण्य रीति-विधायक (Methodologist) माने जाते हैं। हैटनर ने अन्य भूगोलवेत्ताओं की अपेक्षा सबसे अधिक मात्रा में भूगोल को दार्शनिक तथा वैज्ञानिक आधार प्रदान किया था। उसने भूगोल की एक प्रमुख अनुसन्धान पत्रिका (Research Journal) को प्रकाशित किया था। साथ ही कई ग्रन्थ भी लिखे, जिनमें प्रमुख ग्रन्थ भूगोल के विधि तंत्र (Methodology) पर और प्रादेशिक भूगोल पर थे और लगभग 30 व्यक्तियों को डाक्ट्रेट की उपाधि के लिए शोधकार्य कराया था।

भूगोल एक क्षेत्र
      हैटनर भूगोल के ही विद्यार्थी थे। वे रिचथोफेन तथा रेटजेल के शिष्य थे। उनकी नियुक्ति हाइडिलबर्ग विश्वविद्यालय में प्रोफेसर के पद पर थी। वह मूलतः भौतिक भूगोलवेत्ता तथा प्रादेशिक भूगोलवेत्ता थे। उन्होंने बहुत सी भौगोलिक यात्राएं भी की थीं।

        भौतिक भूगोल पर उसके बहुत से शोध पत्र (Research papers) भी प्रकाशित हुए थे जो 1919 से आगे के वर्षों में 4 खण्डों में छपे थे। यूरोप के भूगोल की पुस्तक 1907 में छप चुकी थी, परन्तु उसका संशोधित संस्करण शेष विश्व के भूगोल के साथ सन् 1923 में प्रकाशित हुआ था। हैटनर की विशेष ख्याति भौगोलिक विधि तंत्र(Geographical methodology) पर लिखे गए ग्रन्थ द्वारा हुई थी जो सन् 1927 में प्रकाशित हुआ था।

      हैटनर ने अपने लेखों में काण्ट द्वारा प्रस्तुत भूगोल की परिभाषा का पुनरावर्तन किया और उस ढांचे के अन्दर हम्बोल्ट, रेटजेल एवं पेशेल के द्वारा लिखे गए क्रमबद्ध अध्ययन (Systematic Study) को तथा रिचथोफेन, रिटर एवं मार्थे के द्वारा लिखे गए प्रादेशिक अध्ययनों को परस्पर शामिल करके भूगोल को एक समबद्ध पूर्ण (Coherent whole) विषय बना दिया है।

     उसने एक भौगोलिक पत्रिका ‘Geographische Zeitschrift’ सन् 1895 में प्रकाशित की थी। वास्तव में हैटनर की विचारधारा का प्रकाशन उस पत्रिका की प्रस्तावना में, उसके बाद सन् 1898 में भूगोल का प्रोफेसर होने के प्रारम्भिक भाषण में, तत्पश्चात् भौगोलिक विधि-तंत्र पर प्रकाशित पुस्तक में हुआ है।      

   अलफ्रेड हैटनर के अनुसार भूगोल सामान्य भू-विज्ञान नहीं है, वरन् पृथ्वी तल का क्षेत्रीय विज्ञान है। “Geography is a Chorological Scinece of the earth’ Surface.”

      इसका सम्बन्ध प्रमुख रूप से प्रकृति और मनुष्यों के बीच पारस्परिक क्रियाओं से होता है इसके अन्तर्गत स्थानिक सम्बन्धों का मूल्यांकन भी होता है। भूगोल का प्राथमिक रूप से उद्देश्य क्षेत्रों या प्रदेशों का अध्ययन करना है। हैटनर ने सामान्य भूगोल एवं विशेष भूगोल अथवा प्रादेशिक भूगोल के अन्तर को भी समझाया है। सामान्य भूगोल के अन्तर्गत भूतल पर विभिन्न भौगोलिक परिघटनाओं (Phenomena) के वितरण का क्रमबद्ध (Systematic) वर्णन होता है। दूसरे विशेष या प्रादेशिक भूगोल (Landerkunde) के अन्तर्गत प्रदेशों के भौगोलिक तत्वों का अध्ययन होता है।

       सन् 1905 में हैटनर ने भूगोल की परिभाषा में कहा, कि भूगोल पृथ्वी का क्षेत्रीय विज्ञान है, जिसमें क्षेत्रों का अध्ययन उनकी विभिन्नताओं और स्थानिक सम्बन्धों के प्रसंग में होता है।

       क्षेत्रों (Area) के अध्ययन में हैटनर ने प्रकृति और मनुष्य दोनों को सम्मिलित किया है। इन दोनों को अलग-अलग नहीं किया जा सकता।

   अलफ्रेड हैटनर के भौगोलिक विधि तंत्र (Methodology) पर लिखे गए शोध प्रबन्ध, जिनको वह विधि विहार (Methodological rambles) कहकर सम्बोधित करते थे तथा जलवायु एवं उच्चावचन (relief) पर उनके विवेचन आज भी भौगोलिक ज्ञान और प्रस्तुतीकरण (Presentation) में उच्च स्थान पर हैं। उसने अपनी भौगोलिक पत्रिका ‘Geographische Zetschrift’ का लेखन सम्पादन निरन्तर नियमित रूप से किया था। सन् 1905 में सोवियत संघ के भूगोल पर एक श्रेष्ठ पुस्तक, सन् 1907 में यूरोप का भूगोल और सन् 1915 में ब्रिटेन का मूल्यांकन हैटनर महोदय ने प्रकाशित कराया था।

        उसने अपनी भौगोलिक पत्रिका में, पुस्तक के रूप में अपने भू-प्राकृतिक अध्ययन- महाद्वीपों की स्थलाकृति (The terrain Features of the continents) और विश्व के सांस्कृतिक भूगोल (The march of culture over the world) की पुस्तकें भी छपवाई थीं।

प्रश्न प्रारूप

1. भूगो एक क्षेत्र-वर्णनी विज्ञा (Chorological Science) है। विवेचना कीजिये।


29. भूगोल में क्षेत्रीय विभेदन अथवा विभिन्नता (Areal Differentiation) की संकल्पना

 29. भूगोल में क्षेत्रीय विभेदन अथवा विभिन्नता (Areal Differentiation) की संकल्पना



            क्षेत्रीय विभेदन भूगोल की आत्मा स्वरूप है। अन्तर्सम्बन्ध की प्रक्रिया तो मात्र यह स्पष्ट करती है कि पृथ्वी पर पाए जाने वाले तथ्य कैसे एक जैविक इकाई की तरह परस्पर ससंजित एवं क्रियाशील हैं, लेकिन इन तथ्यों की जिनमें प्राकृतिक वातावरण एवं मनुष्य आते हैं, अपनी अलग विशेषताएँ होती हैं।

     यदि हम पृथ्वी की सतह को देखें तो पृथ्वी की सतह का दो-तिहाई हिस्सा जल है एवं एक-तिहाई भाग थल है। थल पर मिट्टी की असमान परत है तथा अनेक भू-आकृतियाँ हैं, जैसे-पर्वत, पठार, मैदान, घाटियाँ एवं उसके विविध रूप। जल भी अनेक छोटे-बड़े सागरों, नदियों, झीलों में विभक्त है। थल पर नदियाँ, हिमानी, झरने, भूमिगत जल, अन्तरादेशीय प्रवाह प्रणालियाँ, जंगल, घास के मैदान, पशुजीवन, मरुस्थल, कृषि क्षेत्र आदि दृष्टव्य हैं।

       जल की सतह पर कोरल रीफ, जल से प्राप्त पदार्थ, थल से प्राप्त पदार्थ, जलीय वनस्पतियाँ, मछलियाँ, कछुए आदि अनेक जीव हैं। वायुमण्डल भी पृथ्वी की सतह का अंग है। पृथ्वी अपनी धुरी पर 23°30′ अंश झुकी है एवं सूर्य की परिक्रमा करती है। वायुमण्डल भी उसके साथ घूमता है। पृथ्वी की सतह पर सूर्यताप का वितरण असमान है जो सूर्य से सापेक्ष स्थिति के अनुसार बदलता है। इससे पृथ्वी की जलवायु में विविधता आती है। इस तरह वैभिन्न्य पृथ्वी की सतह की मूल विशेषता है।

      दूसरी ओर मनुष्य हैं। मनुष्य अकेला नहीं होता। वह वस्तुतः समाज में रहता है। आज भी पृथ्वी की सतह पर आदिवासी जनजातियाँ हैं जो परस्पर युद्धरत रहती हैं। पशुचारण करने वाले समूह भी हैं। उन्नत समाज स्थायी कृषि करते हैं और उद्योग, व्यापार परिवहन में रत रहते हैं। उनके अधिवास हैं जो कहीं बिखरे हैं तो कहीं सघन हैं, ग्राम एवं नगर हैं, ये सब भी स्थान घेरते हैं।

     उपरोक्त दोनों तथ्य कैसे एक-दूसरे से एक जीव की तरह अन्तर्सम्बन्धित हैं, यह ऊपर विवेचित है। इस तरह यह अन्तर्सम्बन्धित वैविध्य पृथ्वी की सतह पर पहचाना जा सकता है तथा इसके छोटे-बड़े क्षेत्र दृष्टव्य होते हैं। उदाहरणार्थ ध्रुवीय क्षेत्र के एस्किमों निवासियों को अपना स्पष्ट क्षेत्र है, तो अफ्रीका के पिग्मी एवं कलाहारी के बुशमैन का अपना रहन-सहन एवं स्पष्ट क्षेत्र है।

        इतना ही नहीं असम घाटी में धान की खेती, कनाडा में गेहूँ की खेती के विस्तृत क्षेत्र, अर्जेन्टाइना में पशुचारक प्रदेश, संयुक्त राज्य अमेरिका एवं जापान में औद्योगिक प्रदेश सब वैभिन्य से परिपूर्ण होते हुए भी क्षेत्रीय इकाइयों के रूप में पहचाने जाते हैं। इस तरह, समाज एवं वातावरण के अन्तर्सम्बन्ध की परिणति क्षेत्रीय इकाई में होती है। ऐसी क्षेत्रीय इकाइयों का अध्ययन भूगोल का उद्देश्य है।

    यहीं से भूगोल में प्रदेश (Region) की संकल्पना का समावेश होता है। पृथ्वी की सतह के क्षेत्रीय वैभिन्न्य का विषम स्वरूप पृथ्वी को विभिन्न प्रखण्डों में बांट देता है। उदाहरण के लिए, गंगा के मैदान का धरातल, जलप्रवाह, मिट्टियाँ, मानव अधिवास, आदि मिलकर एक विशिष्ट जीवन पद्धति का गठन करते हैं। यह कृषि प्रधान क्षेत्र कहा जा सकता है, सीमांकित किया जा सकता है, क्योंकि इस प्रदेश में जीवन पद्धति की एकरूपता या समरूपता मिलती है। इस समरूपता के आधार पर इसे गंगा-यमुना प्रदेश के नाम से जाना जाता है।

       इसी तरह, पहाड़ी प्रदेश, पर्वतीय क्षेत्र, भूमध्यसागरीय प्रदेश, भूमध्यरेखीय प्रदेश आदि सब एक-दूसरे से भिन्न होते हुए भी अपने आन्तरिक क्षेत्रीय विस्तार में एक रूप होते हैं। इसलिए इन्हें प्रदेश कहते हैं।

     प्रदेश की संकल्पना भूगोल का क्रोड है। प्रदेश की परिभाषा, प्रदेश की पहचान एवं सीमांकन आदि सब अपने आप में विवेचना की विषय-वस्तु हैं। प्रदेश भौगोलिक भी होते हैं तथा प्रदेश की पहचान कराने वाले एक या अधिक तत्वों पर आधारित भी होते हैं। इस तरह प्रदेश अतिव्यापित भी हो सकते हैं।

     भूगोल के सैद्धान्तिक स्वरूप के उपरोक्त दोनों तत्व एक-दूसरे से सम्बन्धित हैं। अन्तर्सम्बन्ध पृथ्वी की सतह के तथ्यों को संसंजित करता है तथा क्षेत्रीय वैभिन्न्य भौगोलिक तथ्यों के स्थानिक प्रसार एवं उनके भौगोलिक व्यक्तित्व एवं अन्तर्निहित समरूपता को स्थापित करता है।

प्रश्न प्रारूप

1. भूगोल में क्षेत्रीय विभेद अथवा विभिन्नता (Areal Differentiation) की संकल्पना को विवेचित कीजिए।

28. स्थानिक या भूवैन्यासिक संगठन (Spatial Organisation) की संकल्पना

28. स्थानिक या भूवैन्यासिक संगठन (Spatial Organisation) की संकल्पना



        मानव समाज के स्थानिक या भूवैन्यासिक संगठन का अध्ययन आर्थिक एवं सामाजिक भूगोल में अध्ययन की मुख्य विषय-वस्तु है। पृथ्वी सतह पर या उसके साथ विभिन्न मानव समाजों की होने वाली अन्तर्क्रिया ही स्थानिक व्यवस्था का आधार है। स्थानिक विश्लेषण का मुख्य उद्देश्य इस स्थानिक व्यवस्था की संरचना और क्रियाविधि का परीक्षण करते हुए मानवीय गतिविधियों के स्थानिक प्रारूपों एवं प्रक्रियाओं को पहचानना है।

         मानवीय गतिविधियों के फलस्वरूप उत्पन्न स्थानिक प्रारूपों को तीन वर्गों में रखा जा सकता है, यथा:

(i) अवस्थिति- जो पृथ्वी सतह पर बिन्दु के रूप में है।

(ii) अन्तर्क्रिया- जो संचरण की रेखाएँ हैं जिनके सहारे माल, मनुष्य, विचारों और सेवाओं का वहन होता है।

(iii) प्रदेश- जो पृथ्वी सतह के समरूपी विशेषता वाले स्वरूपी या कर्मोपलक्षी क्षेत्र हैं।

      इन प्रारूपों को जन्म देने वाली स्थानिक प्रक्रियाएँ बड़ी जटिल हैं जिन्हें स्थानिक अन्तर्क्रिया द्वारा स्पष्ट किया जाता है। इन स्थानिक अन्तर्क्रियाओं में माल और सेवाओं का प्रवाह, प्रवसन, अल्पकालीन संचरण (जैसे- खरीददारी, वासस्थल से कार्यस्थल तक की यात्रा), सामाजिक संचरण, सूचनाओं का प्रसरण, आदि को सम्मिलित किया जाता है।

      इन प्रक्रियाओं के स्पष्टीकरण में मानवीय व्यवहार के अध्ययन पर विशेष जोर दिया जा रहा है। विशेषकर इस बात पर कि मानव व्यवहार उन माध्यमों से कैसे प्रभावित होता है। जिन माध्यमों से उसने अपने स्थान का अवबोध या प्रत्यक्षीकरण किया है। इस प्रकार के प्रारूप एवं प्रक्रियाएँ स्थानिक पर्यावरण में उत्पन्न होते हैं, जो बढ़ती दूरी के साथ घटते प्रभाव के कारण स्थानिक अन्तर्क्रिया को बाधित या नियंत्रित करते हैं, लेकिन जिस स्थान में मानव अपनी गतिविधियों को संचालित करता है, वह स्थान सापेक्षिक है, क्योंकि यह स्थान दूरियों पर आधारित है और दूरी सापेक्षिक होती है तथा निरन्तर परिवर्तनशील है।

        स्थानिक संगठन एक जटिल प्रक्रिया है। मानव प्रतिदिन अपने आवास स्थल से अपने कार्यस्थल को जाता है। यह कार्यस्थल खेत हो सकता है, कार्यालय हो सकता है, कोई कारखाना या शिक्षण संस्थान या व्यावसायिक प्रतिष्ठान आदि हो सकता है। इस संचरण (Movement) के फलस्वरूप मार्गों का निर्माण होता है। इस प्रकार, मनुष्य के आवास एवं कार्यस्थल में पारस्परिक रूप से कर्मोपलक्षी अन्तर्प्रक्रिया प्रारम्भ होती है। कृषि कार्य का क्षैतिज प्रसार अधिक होता है अतः ग्रामीण क्षेत्रों का स्थानिक संगठन ग्रामीण संस्कृति से प्रभावित होता है। उद्योग या व्यापार केन्द्राधारित (Nodal) होते हैं। इन केन्द्रों पर मनुष्य का गमनागमन एक भिन्न प्रतिरूप को जन्म देता है। मार्ग संगम बिन्दुओं पर केन्द्रस्थलों (Central Places) की स्थापना होती है।

           केन्द्रस्थल तृतीयक क्रियाकलापों के केन्द्र होते हैं तथा भूवैन्यासिक संगठन में इनकी प्रमुख भूमिका होती है। गमनागमन के मार्ग पगडंडी, कच्ची सड़क, पक्की सड़क, राज्य मार्ग, राष्ट्रीय राजमार्ग, आदि स्तरों के होते हैं। इनके संगम बिन्दुओं पर स्थापित केन्द्र स्थल भी अपने कर्मोपलक्षी रूप में छोटे एवं बड़े होते हैं। इसे केन्द्र स्थलों का पदानुक्रम (Hierarchy) कहते हैं। यह स्थानिक संगठन की संरचना का आधार होता है। उपभोक्ता अपनी आवश्यकतानुसार किसी केन्द्र स्थल पर आता-जाता है। इसे उपभोक्ता व्यवहार कहते हैं।

           उपभोक्ता किसी केन्द्र स्थल के चयन का निर्णय मनोवैज्ञानिक, सामाजिक एवं आर्थिक दृष्टिकोण से करता है। इसके साथ ही निवास या कार्यस्थल से केन्द्र स्थल की दूरी का प्रभाव भी उपभोक्ता व्यवहार एवं गमनागमन प्रतिरूप पर पड़ता है। यह सार्वभौमिक प्रवृत्ति होती है कि मानव न्यूनतम श्रम (लागत) से अधिकतम लाभ प्राप्त करना चाहता है। साथ ही बढ़ती दूरी के अनुरूप ही केन्द्र स्थलों का प्रभाव घटता भी जाता है। इस प्रकार स्थानिक या भूवैन्यासिक संगठन के मूल तत्व कार्यस्थल, गमनागमन, परिवहन मार्ग, अन्तर्सम्बन्ध, केन्द्र स्थल, पदानुक्रम, दूरी क्षय, आदि हैं।

     स्थानिक संगठन की संरचना गमनागमन की बारम्बारता, केन्द्र स्थल के पदानुक्रमीय वर्ग एवं इनके बीच होने वाली अन्योन्याश्रित प्रक्रिया से सम्बन्धित है। उल्लेखनीय है कि केन्द्र स्थल कर्मोपलक्षी रूप से छोटे एवं बड़े होते हैं। केन्द्र स्थलों का पदानुक्रमीय महत्व गमनागमन प्रतिरूप एवं बारम्बारता को प्रभावित करता है। इसी आधार पर प्रत्येक केन्द्र स्थल के प्रभाव क्षेत्र का निर्धारण किया जाता है। केन्द्र स्थल सिद्धान्त के अनुसार ये कर्मोपलक्षी प्रदेश षटकोणीय होते हैं तथा न्यूनतम श्रम से अधिकतम लाभ के सिद्धान्त का अनुपालन करते हैं। किसी भी क्षेत्र का स्थानिक संगठन वहाँ की भूमि के मूल्य से प्रभावित होता है।

      स्थानिक संगठन की प्रथम अवस्था में कोई गाँव या नगर दूरी पर स्थित होता है। धीरे-धीरे जनसंख्या बढ़ने से उसका प्रमुख कार्यक्षेत्र नगर के मध्य में स्थित होता है तथा जनसंख्या का बहाव बाहर की तरफ बढ़ता जाता है। इससे संलग्न ग्रामीण क्षेत्र की भूमि का उपयोग नगरीय कार्यों में होने लगता है, अतः इसका मूल्य बढ़ने लगता है। मानव अपनी बुद्धि चातुर्य के द्वारा परिवहन और संचार साधनों का विकास कर स्थानिक पर्यावरण को विशिष्टता प्रदान करता है।

        परिवहन और संचार साधनों के विकास द्वारा पृथ्वी सतह पर माल, सेवाओं, मनुष्यों और सूचनाओं के वहन में वृद्धि हुई है। समय और लागत दूरी को कम करके आपूर्ति एवं माँग के क्षेत्रों को समीप लाकर आर्थिक स्थानों में समन्वय स्थापित किया जा सकता है। इसी प्रकार दूरसंचार और शिक्षा द्वारा स्थान के सम्बन्ध में किए गए अवबोधों में विद्यमान अन्तरों में समन्वय स्थापित किया जा सकता है।

     इस प्रकार भूवैन्यासिक संगठन के संकल्पना सूत्र से भौगोलिक चिन्तन को न केवल सुनिश्चित दिशा मिली वरन् भौगोलिक अध्ययन मात्र वर्णनात्मक न रहकर प्रक्रिया विश्लेषण, सामान्यीकरण तथा सिद्धान्त प्रतिपादन के सोपानों से बढ़ता हुआ भविष्य के प्रक्षेपण (Projection) तथा पुनर्गठन के स्तर तक पहुँच गया। सभी गुण किसी विषय के सही अर्थ में वैज्ञानिक होने के दावे को स्थापित करते हैं। स्वाभाविक है कि इस स्तर तक पहुँचने में परम्परागत मानचित्र विवेचन के साथ-साथ सशक्त सांख्यिकीय विश्लेषण एवं प्रक्रियात्मक विवेचन की विधि बड़े पैमाने पर अपनाई गई। अतएव भूगोलवेत्ता क्षेत्रीय आयामयुक्त व्यावहारिक समस्याओं का निराकरण तथा समन्वित क्षेत्रीय विकास में अन्य विशेषज्ञों के साथ हाथ बंटाने में अधिक आत्मविश्वास के साथ अग्रसर हुए।

प्रश्न प्रारूप

1. स्थानिक या भूवैन्यासिक संगठन (Spatial Organisation) की संकल्पना का संक्षिप्त में विवण दीजिए।


27. अमेरिकन भौगोलिक विचारधाराओं पर प्रकाश डालिए।

27. अमेरिकन भौगोलिक विचारधाराओं पर प्रकाश डालिए।



     अमेरीका में स्कूल व कॉलेजों में भूगोल का अध्ययन मध्य उन्नीसवीं सदी में यूरोपियनों द्वारा प्रारम्भ किया गया। हार्वर्ड , डार्टमाउथ, याले, मेरी, कोलम्बिया, प्रिन्स्टन व पेंसिलवेनिया आदि विश्व विद्यालयों में गणितीय भौतिक व ऐतिहासिक भूगोल की शिक्षा वैसे 1795 से दी जाने लगी थी। आरनोल्ड गुयोट (Arnold Guyot) अमेरीका में भूगोल का प्रथम प्रोफेसर था।

     अमेरीकी भूगोलवेत्ताओं ने भूगोल के जिन क्षेत्रों में महत्वपूर्ण योगदान किया है, वे संक्षेप में इस प्रकार हैं:-

(i) मानव भूगोल (Human Geography):-

        मानव भूगोल के क्षेत्र में अमेरीकी भूगोलवेत्ताओं का विशेष योगदान है। अमेरीका में सैम्पुल (E. C. Semple), हंटिंगटन (E. Huntington), बोमैन (I. Bowman), ग्रिफिथ टेलर (G. Tailor) जैसे दिग्गज मानव भूगोलवेत्ता हुए हैं। इन्होंने मानव भूगोल की परिभाषा दी व उसका विषय-क्षेत्र निर्धारित किया।

        सैम्पुल की सबसे प्रसिद्ध पुस्तक Influence of Geographical Environment सन् 1911 में प्रकाशित हुई। यह पुस्तक वातावरण निश्चयवाद का कट्टर समर्थन करती थी। पुस्तक का प्रारम्भ ही इन शब्दों से हुआ है:-

“मनुष्य का जन्म पृथ्वी से हुआ है और वह पृथ्वी का शिशु मात्र ही नहीं है, अर्थात् वह पृथ्वी की धूल का एक पुतला मात्र ही नहीं है वरन् पृथ्वी उसकी माता है, जिसने उसे मातृत्व दिया है, उसका लालन-पालन किया है, उसको भोजन दिया है, उसके कार्यों को नियत किया है, उसके विचारों को निर्देशित किया है, उसके सामने कठिनाइयाँ प्रस्तुत की हैं, जिससे उसका शरीर सुदृढ़ हुआ है तथा उसकी बुद्धि कुशाग्र हुई है।”

      हटिंगटन की प्रसिद्ध पुस्तक Principles of Human Geography है। पुस्तक में हंटिंगटन ने मानव भूगोल की परिभाषा व विषय क्षेत्र निर्धारित करने का प्रयास किया है। साथ ही मानव भूगोल के अन्य पक्षों का भी वर्णन किया है। हंटिंगटन वातावरण निश्चयवाद के समर्थक थे।

   ग्रिफिथ टेलर को मानव भूगोल के क्षेत्र में नव-निश्चयवाद (Neo-Determinism) का प्रवर्तक माना जाता है। उनकी प्रसिद्ध पुस्तक ‘बीसवीं सदी में भूगोल’ (Geography in the Twentieth Century) है।

(ii) भौतिक भूगोल (Physical Geography):-

        भौतिक भूगोल के क्षेत्र में अमेरीकी भूगोलवेत्ता डेविस (William Morris Davis) का नाम प्रसिद्ध है। डेविस ने अपरदन चक्र की संकल्पना (Concept of Cycle of Erosion) का प्रतिपादन किया। यह संकल्पना काफी समय तक आदर्श मानी जाती रही। परन्तु पेंक ने इसकी भारी आलोचना की। फिर भी इस संकल्पना के महत्व को नकारा नहीं जा सकता। रोलिन सैलिसबरी, वेलेस स्टाउड भी उच्चकोटि के भौतिक भूगोलवेत्ता थे।

(iii) जलवायु विज्ञान (Climatology):-

      अमेरीका में जलवायु विज्ञान के क्षेत्र में प्रमुख कार्य जलवायु के वर्गीकरण व जलवायु प्रदेशों के मानचित्र तैयार करने से सम्बन्धित रहा है। थार्नथ्वेट ने 1918 में कोपेन द्वारा प्रस्तुत जलवायु विभाजन की आलोचना की तथा नवीन जलवायु वर्गीकरण प्रस्तुत किया। जलवायु विज्ञान के क्षेत्र में नए वैज्ञानिक यंत्रों से मदद ली गई।

(iv) स्थानीयकरण सिद्धान्त (Locational Theories):-

       कई अमेरीकी भूगोलवेत्ताओं ने स्थानीयकरण सिद्धान्तों में योगदान किया है। सर्वप्रथम 1909 में व्हाइटवेक ने एक शोध पत्र के माध्यम बताया था कि चीनी मिट्टी बर्तनों के उद्योग के लिए मिट्टी की स्थानीय उपलब्धता आवश्यक नहीं। वाल्डर टावर ने 1911 में औद्योगिक स्थानीयकरण को प्रभावित करने वाले कारकों की विवेचना की । हूवर ने वेबर के सिद्धान्त में संशोधन किया।

(v) राजनीतिक भूगोल (Political Geography):-

          राजनीतिक भूगोल में भी अमेरीकी भूगोलवेत्ताओं ने विशेष रुचि प्रदर्शित की। स्कूलों व कॉलेजों में इसे स्थान दिया गया। जार्ज क्रेसी, प्रेस्टन ई. जेम्स, राबर्ट एस. प्लाट व ईसा बोमैन प्रमुख राजनीतिक भूगोलवेत्ता थे।

         ईसा बोमैन की पुस्तक The New World में विभिन्न देशों के आपसी राजनीतिक सम्बन्धों की चर्चा थी। डी. व्हिटलसी ने एक पुस्तक The Earth and State प्रकाशित कराई। वाल्केनबर्ग की पुस्तक Elements of Political Geography में राजनीतिक भूगोल के विषय क्षेत्र की व्याख्या की गई थी।

(vi) कृषि भूगोल (Agricultural Geography):-

      कृषि भूगोल के क्षेत्र में अमेरीका में विशेष कार्य हुआ है। इस दिशा में सर्वप्रथम बरनर सी. फिंच और ओ. ई. वेकर ने महत्वपूर्ण प्रयास किए। 1917 में इन्होंने ‘संसार का कृषि भूगोल’ एटलस प्रकाशित की। वेकर ने 1921 में ‘संयुक्त राज्य अमेरिका के कृषि उत्पादन के अन्तर पर भौतिक कारकों के प्रभाव का महत्व’ लेख प्रकाशित किया।

1936 में व्हिटलसी ने संसार को कृषि प्रदेशों में विभक्त किया। कृषि व डेरी उद्योग से सम्बन्धित अनेक शोध कार्य किए गए।

(vii) नगरीय-भूगोल (Urban Geography):–

      मार्क जैफरसन (Mark Jafferson) प्रथम अमेरीकी-भूगोलवेत्ता थे जिन्होंने नगरों की स्थिति (Location) व जनसंख्या पर कार्य किया। उनकी “प्रधान नगर नियम’ संकल्पना” (Law of Primate City, 1939) ने अनेक विद्वानों को आकर्षित किया। सी. डी. हैरिस तथा उल्मान ने अमरीकी नगरों का कार्यात्मक वर्गीकरण किया।

प्रश्न प्रारूप

1. अमेरिकन भौगोलिक विचाधाराओं प प्रकाश डालिए।


40. उद्योग स्थापना की अवस्थिति को प्रभावित करने वाले कारक

40. उद्योग स्थापना की अवस्थिति को प्रभावित करने वाले कारक



       उद्योगों की स्थापना केवल उन्हीं स्थानों पर होती है, जहाँ इसके विकास के लिए अनुकूल परिस्थितियाँ उपस्थित हों। उद्योगों को प्रभावित करने वाले कारकों में भौगोलिक, आर्थिक तथा राजनीतिक कारक महत्वपूर्ण हैं। अतः उद्योगों को प्रभावित करने वाले कारकों को दो वर्गों में बाँटा जाता जा सकता है:-

(क) भौगोलिक कारक तथा,

(ख) गैर-भौगोलिक कारक।

(क) भौगोलिक कारक (Geographical Factors)

      उद्योगों को प्रभावित करने वाले मुख्य भौगोलिक कारक निम्नलिखित हैं:-

1. कच्चे माल की उपलब्धता:-

       सामान्यतः उद्योग उन्हीं स्थानों पर स्थापित किए जाते हैं, जहाँ कच्चा माल उपलब्ध होता है। कच्चा माल उद्योगों के लिए चुम्बक का कार्य करता है। भारत में लोहा इस्पात उद्योग केवल उन्हीं स्थानों पर स्थापित किया गया है जहाँ इसमें प्रयोग होने वाला कच्चा माल, जैसे-लौह-अयस्क, कोयला, मैंगनीज आदि प्राप्त होते हैं। इसी प्रकार उत्तर प्रदेश तथा बिहार में गन्ने के कारण चीनी उद्योग, महाराष्ट्र तथा गुजरात में कपास के कारण सूती वस्त्र उद्योग, पश्चिम बंगाल में पटसन उद्योग स्थापित किए गए हैं। नाशवान (Perishable) / अल्पकालिक कच्चा माल प्रयोग करने वाले उद्योग तो कच्चे माल के स्रोत से दूर स्थापित हो ही नहीं सकते।

2. शक्ति के साधन:-

     उद्योगों में मशीनें चलाने के लिए शक्ति की आवश्यकता होती है। शक्ति के प्रमुख साधन कोयला, पेट्रोलियम, जल-विद्युत्, प्राकृतिक गैस तथा परमाणु ऊर्जा हैं। लौह-इस्पात उद्योग कोयले पर निर्भर करता है, इसलिए यह उद्योग कोयले की खानों के पास ही स्थापित किया जाता है। दामोदर घाटी का प्रमुख लोहा-इस्पात केन्द्र जमशेदपुर अपनी शक्ति की आवश्यकता झरिया तथा रानीगंज से प्राप्त किए गए कोयले से पूरी करता है।

        पंजाब में औद्योगिक विकास का मुख्य कारण भाखड़ा से प्राप्त की गई जल-विद्युत् ही है। ऐलुमिनियम उद्योग के लिए प्रचुर मात्रा में विद्युत् शक्ति की आवश्यकता होती है, इसलिए यह उद्योग जल-विद्युत अथवा ताप-विद्युत् के स्रोत के निकट ही स्थापित किया जाता है। छत्तीसगढ़ का कोरबा तथा उत्तर प्रदेश का रेनूकूट ऐलुमिनियम उद्योग विद्युत् शक्ति की उपलब्धता के कारण ही स्थापित हुआ है।

3. सस्ते दर पर कुशल श्रमिकों की उपलब्धता:-

    यद्यपि आधुनिक युग में स्वचालित मशीनों तथा कम्प्यूटरों जैसे यंत्रों का प्रचलन बढ़ा है फिर भी औद्योगिक विकास में श्रम का महत्व बराबर बना हुआ है। सस्ते तथा कुशल श्रम की प्रचुर मात्रा में उपलब्धता औद्योगिक विकास का मुख्य कारक है। कुछ उद्योग श्रम पर ही आधारित होते हैं। फिरोजाबाद में शीशा उद्योग, कानपुर में चर्म उद्योग, लुधियाना में हौजरी तथा जालन्धर एवं मेरठ में खेलों का सामान बनाने का उद्योग मुख्यतः सस्ते, कुशल तथा प्रचुर श्रम पर ही निर्भर हैं।

4. परिवहन एवं संचार के साधन:-

      यातायात मार्ग वे शिराएं हैं, जिनमें से होकर उद्योग की धमनियों का रक्त संचार होता है। कच्चे माल को उद्योग केन्द्र तक लाने तथा निर्मित माल को खपत के क्षेत्रों तक ले जाने के लिए सस्ते तथा कुशल यातायात का प्रचुर मात्रा में होना अनिवार्य है। सड़कों तथा रेलों के जंक्शन तथा सागरीय बन्दरगाह अच्छे औद्योगिक केन्द्र बन जाते हैं। मुम्बई, कोलकाता, चेन्नई, दिल्ली जैसे महानगरों में औद्योगिक विकास मुख्यतः यातायात के साधनों के कारण ही हुआ है।

       परिवहन की भांति संचार के साधन, जैसे-डाक, तार टेलीफोन, कम्प्यूटर भी औद्योगिक विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इनमें उद्योग सम्बन्धी सूचनाएँ जल्दी मिलती हैं।

5. विस्तृत बाजार की उपलब्धता:-

     उद्योग का सारा विकास तब तक व्यर्थ है। जब तक निर्मित माल की खपत के लिए बाजार की उपलब्धता न हो। बाजार की निकटता से यातायात का खर्च कम हो जाता है और उपभोक्ता को औद्योगिक उत्पाद सस्ते दाम पर मिल सकते हैं। शीघ्र नष्ट होने वाली वस्तुओं को तो अधिक दूर तक ले जाना असम्भव ही होता है। 

6. सस्ती भूमि तथा जलापूर्ति:-

      उद्योगों की स्थापना के लिए सस्ती भूमि का होना भी आवश्यक है। दिल्ली में भूमि का अधिक मूल्य होने के कारण ही इसके उपनगरों में सस्ती भूमि पर उद्योगों ने द्रुत गति से प्रगति की है। लोहा-इस्पात, वस्त्र-निर्माण तथा रसायन कुछ ऐसे उद्योग हैं, जिनको पर्याप्त मात्रा में जल की आवश्यकता होती है। इसलिए ये उद्योग जल के स्रोत पर स्थापित किए जाते हैं।

7. अनुकूल जलवायु:-

       उद्योग धन्धों में काम करने वाले श्रमिकों की कार्यकुशलता के लिए जलवायु का स्वास्थ्यवर्द्धक होना आवश्यक है। अधिक उष्ण अथवा आर्द्र एवं कठोर शीत जलवायु श्रमिकों के कार्य में बाधा डालती है। उत्तर-पश्चिमी भारत की जलवायु ग्रीष्म ऋतु में अत्यन्त गर्म तथा शीत ऋतु में ठण्डी होती है, जिससे श्रमिकों की कार्य-कुशलता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। इसके विपरीत, पश्चिमी तटीय भाग की जलवायु वर्ष भर सम रहती है, जिससे श्रमिकों की कार्य-कुशलता बनी रहती है। यही कारण है कि देश के 24% आधुनिक कारखाने तथा 30% श्रमिक अकेले महाराष्ट्र-गुजरात क्षेत्र में हैं।

        कुछ उद्योगों के लिए तो जलवायु का विशेष महत्व है। उदाहरणतया, सूती वस्त्र उद्योग के लिए आर्द्र जलवायु चाहिए, क्योंकि शुष्क जलवायु में धागा बार-बार टूटता रहता है। इसलिए सूती वस्त्र बनाने वाली अधिकांश मिलें महाराष्ट्र तथा गुजरात में ही हैं। आजकल कृत्रिम आर्द्र-यन्त्रों (Artificial Humidifiers) की सहायता से देश के अन्य भागों में भी सूती वस्त्र उद्योग लगाए गए हैं, परन्तु यह प्रणाली महंगी है।

(ख) गैर-भौगोलिक कारक (Non-Geographical Factors)

      वैज्ञानिक तथा प्रौद्योगिकी विकास के साथ, उद्योग-धन्धों की अवस्थिति में भौगोलिक कारकों की भूमिका पहले की भांति अधिक दृढ़ नहीं रही। अतः कुछ गैर-भौगोलिक कारक भी महत्वपूर्ण बन गए हैं, जिनमें आर्थिक, राजनीतिक, ऐतिहासिक एवं सामाजिक कारक उल्लेखनीय हैं। कुछ महत्वपूर्ण गैर-भौगोलिक कारक निम्नलिखित हैं:-

1. पर्याप्त पूंजी:-

      कोई भी उद्योग बिना पूंजी के नहीं पनप सकता। बिना पूंजी के उद्योगों की स्थापना की कल्पना  बड़े-बड़े नगरों में पूंजीपति उद्योगों में पूंजी लगाते हैं, जिससे उद्योगों का विकास होता है। इसी कारण मुम्बई, कोलकाता, चेन्नई, दिल्ली, आदि बड़े-बड़े नगरों में उद्योग लगे हुए हैं। मोदीनगर में उद्योग स्थापित होने का मुख्य कारण ही मोदी सेठ द्वारा पूँजी निवेश है।

2. सरकार की नीति:-

     सरकार की नीतियाँ उद्योग-धन्धों की अवस्थिति को काफी हद तक प्रभावित करती हैं। सरकार प्रादेशिक असन्तुलन दूर करने के कई प्रयास कर रही है, जैसे- पिछड़े हुए क्षेत्रों में उद्योग-धन्धों की स्थापना करके, जल, वायु और भूमि के प्रदूषण की रोकथाम द्वारा पर्यावरण का संरक्षण तथा कुछ विकसित प्रदेशों में उद्योग-धन्धों के अतिकेन्द्रण को विकेन्द्रण प्रक्रम द्वारा रोकना आदि। सार्वजनिक क्षेत्र की इकाइयों के नियोजन में इन प्रारूपों का विशेष ध्यान रखा गया है। मथुरा के निकट तेल शोधनशाला, कपूरथला में कोच फैक्ट्री तथा जमशेदपुर में उवर्रक संयन्त्र की स्थापना सरकारी नीतियों का ही परिणाम है।

3. औद्योगिक जड़त्व अथवा प्रारम्भिक संवेग (Industrial Inertia or Momentum of Early Start):-

        कुछ उद्योग भौगोलिक परिस्थितियों के कारण स्थापित हो जाते हैं, परन्तु जब वे भौगोलिक सुविधाएँ वहाँ पर समाप्त हो जाती हैं तब भी वे उद्योग वहाँ पर बने रहते हैं। अलीगढ़ में ताला तथा जबलपुर में बीड़ी बनाने के उद्योग इसके उदाहरण हैं।

4. बैंकिंग सुविधा:-

      उद्योग-धन्धों में रोज करोड़ों रुपए का लेन-देन होता है जो बैंकों द्वारा ही सम्भव है। अतः जिन क्षेत्रों में बैंकों की सुविधा हो, वहाँ उद्योग-धन्धों के विकास में सहायता मिलती है।

5. बीमा की सुविधा:-

     बड़े-बड़े उद्योगों में भारी मशीनों को अचानक क्षति पहुंचने का भय रहता है। इसके अतिरिक्त, श्रमिकों की औद्योगिक दुर्घटना से मृत्यु हो जाती है। इन सब परिस्थितियों को देखते हुए बीमे की सुविधा का होना आवश्यक है।

6. राजनीतिक स्थिरता:-

       उद्योगपति उन्हीं प्रदेशों में उद्योग स्थापित करना पसन्द करते हैं जहाँ राजनीतिक स्थिरता हो।

प्रश्न प्रारूप

1. उद्योग स्थापना की अवस्थिति को प्रभावित कने वाले कारकों की विवेचना कीजिये।


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1. सिन्धु-गंगा-ब्रह्मपुत्र का मैदान (The Indus-Ganga-Brahmaputra Plain)

2. भारत के जनसंख्या वितरण एवं घनत्व (Distribution and Density of Population of India)

3. भारत के प्रमुख जलप्रपात

4.नदियों के किनारें बसे प्रमुख नगर

5. भारत की भूगर्भिक संरचना का इतिहास

6. भारत में गोण्डवानाक्रम के चट्टानों के निर्माण का आधार, वितरण एवं आर्थिक महत्व

7. प्राचीनतम कल्प के धारवाड़ क्रम की चट्टानों का आर्थिक महत्त्व

8. भारत के उच्चावच/भू-आकृतिक इकाई

9. हिमालय के स्थलाकृतिक प्रदेश

10. उत्तर भारत का विशाल मैदानी क्षेत्र

11. गंगा का मैदान

12. प्रायद्वीपीय भारत की संरचना

13. प्रायद्वीपीय भारत के उच्चावच या भूदृश्य

14. प्रायद्वीपीय भारत के पठार

15. भारत का तटीय मैदान एवं द्वीपीय क्षेत्र

16. अपवाह तंत्र (हिमालय और प्रायद्वीपीय भारत) / Drainage System

17. हिमालय के विकास के संदर्भ में जल प्रवाह प्रतिरूप/विन्यास

18. गंगा-ब्रह्मपुत्र नदी तंत्र

19. भारतीय जल विभाजक रेखा

20. मानसून क्या है?

21. मानसून उत्पत्ति के सिद्धांत

22. मानसून उत्पत्ति का जेट स्ट्रीम सिद्धांत

23. एलनीनो सिद्धांत

24. भारतीय मानसून की प्रक्रिया / क्रियाविधि / यांत्रिकी (Monsoon of Mechanism)

25. भारतीय मानसून की प्रमुख विशेषताएँ तथा मानसून की उत्पत्ति संबंधी कारकों की विवेचना

26. मानसून के विकास में हिमालय तथा तिब्बत के पठार का योगदान

27. भारत के आर्थिक जीवन पर मानसून का प्रभाव

28. भारत में शीतकालीन वर्षा का आर्थिक जीवन पर प्रभाव

29. पश्चिमी विक्षोभ क्या है? भारतीय कृषि पर इसका क्या प्रभाव पड़ता है?

30. हिमालय के आर्थिक महत्व पर प्रकाश डालें।

31. भारत में उष्णकटिबंधीय चक्रवात

32. भारत में बाढ़ के कारण, प्रभावित क्षेत्र एवं समाधान

33. भारत में सूखा के कारण, प्रभावित क्षेत्र एवं समाधान

34. भारत की प्राकृतिक वनस्पति

35. भारतीय कृषि की प्रमुख समस्याओं पर प्रकाश

36. भारत में सिंचाई की आवश्यकता क्यों है? 

37. भारत में सिंचाई के विभिन्न साधनों एवं उनके महत्त्व

38. भारत में हरित क्रान्ति का प्रभाव

39. प्रायद्वीपीय भारत और प्रायद्वीपेत्तर भारत की प्रवाह प्रणाली (उत्तर और द० भारत की प्रवाह प्रणाली)

40. उद्योग स्थापना की अवस्थिति को प्रभावित करने वाले कारक

39. प्रायद्वीपीय भारत और प्रायद्वीपेत्तर भारत की प्रवाह प्रणाली (उत्तर और द० भारत की प्रवाह प्रणाली)

39. प्रायद्वीपीय भारत और प्रायद्वीपेत्तर भारत की प्रवाह प्रणाली

(उत्तर और द० भारत की प्रवाह प्रणाली)



       भौतिक दृष्टिकोण से भारत एक विशालकाय देश है। उत्तर में हिमालय, पश्चिम भारत में अरावली पर्वत, मध्य भारत में विन्ध्याचल और सतपुड़ा। पुनः प० भारत में पश्चिमी घाट पर्वत जलविभाजक रेखा का निर्माण करती है। जिसे नीचे के मानचित्र में देखा जा सकता है।

प्रायद्वीपीय भारत और

       यह महान जलविभाजक रेखा भारतीय नदियों को दो भागों में विभक्त कर देती हैं।-

(1) अरब सागार में गिरने वाली नदियाँ

जैसे- सिन्धु, नर्मदा, ताप्ती, माण्डवी, ज्वारी, शरावती, पेरियार, गायत्री इत्यादि।

(ii) बंगाल की खाड़ी में गिरने वाली नदियाँ

जैसे- गंगा, महानदी, गोदावरी, कृष्णा, कावेरी इत्यादि।

        प्रश्नानुसार उत्तर भारत और द० भारत के बीच जल विभाजक का कार्य विन्ध्याचल और सतपुड़ा पर्वत करती है। उत्तर भारत एवं द० भारत के वदियों में निम्नलिखित अन्तर दृष्टिगत होता है-

विशेषता प्रायद्वीपेत्तर भारत की नदी तंत्र या उ० भारत की नदियाँ  प्रायद्वीपीय भारत की नदी तंत्र या द० भारत की नदियाँ 
1. उद्गम क्षेत्र  (i) हिमालय पर्वत तथा 

(ii) प्रायद्वीपीय भारत का उत्तरी क्षेत्र 

(i) प्रायद्वीपीय भारत के प० घाट पर्वत
2. स्रोत  (i) हिमालय क्षेत्र से निकलने वाली नदियों का स्रोत कोई न कोई हिमानी है। जैसे- गंगोत्री से गंगा, यमुनोत्री से यमुना (i) सभी नदियों का स्रोत क्षेत्र झील या तालाब या वर्षा जल से है।
3. जल ग्रहण क्षेत्र बहुत बड़ा-बड़ा है अपेक्षाकृत छोटा है
4. मुहानों की संख्या (i) केवल दो मुहानों का निर्माण करती है:- सिन्धु नदी का मुहाना और गंगा नदी का मुहाना (i) प्रत्येक नदी अलग-अलग मुहाना का निर्माण करती है
5. ज्वारनदमुख (i) यह ज्वारनदमुख का निर्माण नहीं करती है (i) यद्यपि बंगाल की खाड़ी में गिरने वाली नदियाँ ज्वारनद मुख का निर्माण नहीं करती है लेकिन अरब सागर में गिरने वाली नदी ज्वारनद मुख का निर्माण करती है
6. डेल्टा का निर्माण (i) डेल्टा का निर्माण करती है। गंगा, ब्रह्मपुत्र नदी मिलकर विश्व का सबसे बड़ा डेल्टा का निर्माण करती है। (i) यद्यपि बंगाल की खाड़ी में गिरने वाली नदियाँ डेल्टा बनाती है जबकि अरब सागर में गिरने वाली नदियाँ डेल्टा नहीं बनाती है
7. नदी की लम्बाई एवं चौडाई  (i) लम्बाई और चौडाई अधिक होती है (i) लम्बाई और चौडाई कम होती है
8. मार्ग का परिवर्तन (i) उ० भारत की नदियाँ मार्ग परिवतन के लिए प्रसिद्ध है (i) द० भारत की नदियाँ मार्ग परिवतन नहीं करती है
9. सहायक नदियाँ (i) उ० भारत की नदियाँ सिन्धु, गंगा और ब्रह्मपुत्र नामक प्रमुख नदियों में आकर सहायक नदी मिल जाती है  (i) अलग-अलग नदियों के कई सहायक नदी मिलते है
10. उच्छलिका और जलप्रपात (i) उ० भारत की नदियों में केवल स्रोत में झरना एवं उच्छलिका मिलती है (i) द० भारत की नदियों के पुरे मार्ग में इसका प्रमाण मिलता है
11. सदा वाहनीयता (i) उ० भारत की नदियाँ प्राय: सदावाहिनी होती है (i) यह लगभग सभी प्रकार की नदियाँ बरसाती प्रकार की होती है
12. जल का स्तर बढना  (i) मानसून के आगमन के दौरान तथा जून मान में बर्फ के पिघलने से जलस्तर में वृद्धि होती है (i) प्रायद्वीपीय नदियों का जलस्तर द०-प० मानसून और लौटती हुई मानसून के कारण बढ़ती है
13. अवस्था (i) सभी नदियाँ युवावस्था से गुजर रही है (i) यहाँ की नदियाँ प्रौढावस्था और वृद्धावस्था से गुजर रही है
14. अपरदन एवं निक्षेपण की क्षमता  (i) बड़े पैमाने पर अपरदन और निक्षेपण का कार्य होती है। (i) यह कार्य अति अल्प होती है
15. अपवाहतंत्र का प्रतिरूप (i) यहाँ की नदियाँ पर्वतीय क्षेत्र में वृक्षाकार प्रतिरूप, मैदानी क्षेत्री में समानांतर प्रतिरूप और मुहानों पर जाली प्रतिरूप का निर्माण करती है (i) बंगाल की खाड़ी में गिरने वाली नदियाँ वृक्षाकार प्रतिरूप और अरब सागर में गिरने वाली नदियाँ समान्तर प्रतिरूप का निर्माण करती है
16. भ्रंश घटी का निर्माण (i) उ० भारत कि कोई भी नदी भ्रंश घाटी से होकर प्रवाहित नहीं होती है  (i) नर्मदा और ताप्ती नदी को छोडकर कोई भी नदी भ्रंश घाटी से होकर प्रवाहित नहीं होती है 
17. गॉर्ज एवं दर्रा का निर्माण  (i) उ० भारत की नदियाँ गॉर्ज एवं दर्रा का निर्माण के लिए प्रसिद्ध है (i) गोदावरी को छोडकर कोई भी नदी गॉर्ज का निर्माण नहीं करती है

निष्कर्ष :

        उपरोक्त तथ्यों से स्पष्ट है कि उत्तर भारत एवं दक्षिण भात की नदियों पर भौगोलिक कारकों के अलग-अलग प्रभाव के कारण अलग-अलग विशिष्टताएँ पायी जाती है। 


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9. हिमालय के स्थलाकृतिक प्रदेश

10. उत्तर भारत का विशाल मैदानी क्षेत्र

11. गंगा का मैदान

12. प्रायद्वीपीय भारत की संरचना

13. प्रायद्वीपीय भारत के उच्चावच या भूदृश्य

14. प्रायद्वीपीय भारत के पठार

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21. मानसून उत्पत्ति के सिद्धांत

22. मानसून उत्पत्ति का जेट स्ट्रीम सिद्धांत

23. एलनीनो सिद्धांत

24. भारतीय मानसून की प्रक्रिया / क्रियाविधि / यांत्रिकी (Monsoon of Mechanism)

25. भारतीय मानसून की प्रमुख विशेषताएँ तथा मानसून की उत्पत्ति संबंधी कारकों की विवेचना

26. मानसून के विकास में हिमालय तथा तिब्बत के पठार का योगदान

27. भारत के आर्थिक जीवन पर मानसून का प्रभाव

28. भारत में शीतकालीन वर्षा का आर्थिक जीवन पर प्रभाव

29. पश्चिमी विक्षोभ क्या है? भारतीय कृषि पर इसका क्या प्रभाव पड़ता है?

30. हिमालय के आर्थिक महत्व पर प्रकाश डालें।

31. भारत में उष्णकटिबंधीय चक्रवात

32. भारत में बाढ़ के कारण, प्रभावित क्षेत्र एवं समाधान

33. भारत में सूखा के कारण, प्रभावित क्षेत्र एवं समाधान

34. भारत की प्राकृतिक वनस्पति

33. अन्तर्जात एवं बहिर्जात बल (Endogenetic and Exogenetic Forces)

33. भू-आकृति विज्ञान में अन्तर्जात एवं बहिर्जात बल

(Endogenetic and Exogenetic Forces)



अन्तर्जात बल (Endogenetic Forces):-

     पृथ्वी के आन्तरिक भाग अथवा भूगर्भ में सक्रिय बलों को अन्तर्जात बल कहते हैं। इन्हें निर्माणकारी शक्तियाँ (Constructional Forces) भी कहा जाता है। ये बल पृथ्वी में गुप्त रूप से कार्य करते हैं। इनकी उत्पत्ति पृथ्वी के आन्तरिक भाग में होने के कारण इनके विषय में बहुत कम ज्ञान प्राप्त है।

       सम्भवतः इन बलों की उत्पत्ति उष्ण पृथ्वी के क्रमशः शीतल होकर संकुचन, परिभ्रमण गति से ह्रास, रेडियो ऐक्टिव पदार्थों के विघटन से उत्पन्न ताप, संवाहनिक धाराओं, आदि के कारण होती है। पृथ्वी के भीतर उच्च तापमान ही कदाचित भू-पटल में उत्पन्न परिवर्तनों के लिए उत्तरदायी है। तापीय अन्तर के कारण शैलों में प्रसार एवं संकुचन होता है, इससे शैलें स्थानान्तरित होती हैं। परिणामतः अनेक स्थलरूप उत्पन्न होते हैं।

     अन्तर्जात बल दो प्रकार के होते हैं-

(i) क्षैतिज (Horizontal) अन्तर्जात बल तथा

(ii) ऊर्ध्वाधर/लम्बवत (Vertical) अन्तर्जात बल।

        इनके कारण दो प्रकार की संचलन (Movements) या घटनाएँ होती हैं-

(i) आकस्मिक घटनाएँ या ज्वालामुखी एवं भूकम्प (Volcanism and Earthquakes)

       इस बल से भूपटल पर ऐसी आकस्मिक घटनाओं का आगमन होता है जो विनाशकारी परिणाम वाली होती हैं। इसके प्रमुख उदाहरण हैं- भूकम्प, भूस्खलन, एवलांश तथा ज्वालामुखी।

(ii) पटलविरूपणकारी घटनाएँ (Diastrophism)            

       ये बल पृथ्वी के आन्तरिक भाग में अत्यन्त धीमी गति से क्षैतिज तथा लम्बवत दोनों रूपों में क्रियाशील होते हैं जिससे धरातल पर हजारों वर्षों बाद किसी बड़े स्थलरूप का निर्माण हो जाता है। क्षेत्रीय विस्तार की दृष्टि से ये पुन: दो प्रकार के होते हैं-

(अ) महादेशीय संचलन (Epierogenetic Movement)-

        यह संलचन भू-गर्भ में लम्बवत दिशा में क्रियाशील रहता है। इस लम्बवत् संचलन को उत्पन्न करने वाले बल को अरीय बल (Radial Force) कहते हैं, क्योंकि यह पृथ्वी की त्रिज्या की दिशा में ही कार्य करता है। इस संचलन से महाद्वीपीय भागों का निर्माण एवं उसमें उत्थान, निर्गमन तथा निमज्जन की क्रियाएं घटित होती हैं।

        जब महाद्वीपीय भाग या उसका कोई क्षेत्र अपनी सतह से ऊपर उठ जाता है तब उस पर लगने बाले बल को उपरिमुखी संचलन (Upward movement) कहते हैं तथा ऊपर उठने की क्रिया, उभार (Upliftment) के नाम से जानी जाती है।

        इसके विपरीत, जब महाद्वीपीय भागों में धंसाव हो जाता है तो उस पर क्रियाशील बल को अधोमुखी संचलन (Downward Movement) तथा धंसाव की क्रिया को अवतलन (Subsidence) कहा जाता है। धंसाव के दूसरे रूप में स्थलखण्डों का सागरीय जल के नीचे निमज्जन (Submergence) हो जाता है। यह क्रिया तटीय या सागरीय भागों में ही घटित होती है।

(ब) पर्वतीय संचलन (Orogenetic Movement)-

       पृथ्वी के आन्तरिक भाग से क्षैतिज रूप में पर्वतों के निर्माण में सहायक संचलन बल को पर्वतीय संचलन के नाम से जाना जाता है। इस बल को स्पर्शरेखीय बल (Tangential Force) भी कहते हैं। यह बल प्रायः दो रूपों में क्रियाशील होता है-

(i) जब यह बल दो विपरीत दिशाओं में क्रियाशील होता है तो तनाव की स्थिति उत्पन्न हो जाती है, जिसे तनावमूलक बल कहा जाता है। इस बल के परिणामस्वरूप धरातल में भ्रंश (Fault), दरार (Fracture), चटकनें (Cracks), आदि का निर्माण होता है।

(ii) जब पर्वतीय संचलन बल आमने-सामने क्रियाशील होता है तो उससे चट्टानें संपीडित हो जाती हैं। इस बल को संपीडनात्मक बल (Compressional Forces) कहा जाता है। इसके कारण धरातल पर संवलन (Wrap) तथा वलन (Fold) पड़ जाते है।

बहिर्जात बल (Exogenetic Forces):-

        भू-पटल पर अन्तर्जात बलों के सक्रिय होने से अनेक विषमताएँ पैदा हो जाती हैं। इन विषमताओं को दूर करके धरातल को सपाट बनाने की क्रिया भी प्रकृति में सम्पन्न होती रहती है। यह कार्य बहिर्जात बलों द्वारा किया जाता है जिन्हें विध्वंसकारी बल (Destructional Forces) भी कहते हैं। धरातल पर मौजूद स्थलरूपों को काट छांट तथा घिसकर क्षीण बनाने के कारण इन बलों को विनाशकारी बल कहा गया है।

      प्रवाही जल, पवन एवं हिम इसके प्रमुख कारक या साधन (Agents) हैं। इन साधनों को सक्रिय बनाने में तीन प्रमुख कारकों का योगदान हैं-

(i) सूर्यातप (Insolation),

(ii) गुरुत्वाकर्षण (Gravitation) एवं

(iii) पृथ्वी का घूर्णन (Earth’s Rotation)।

      सूर्यातप ही धरातल पर तापमानों के विषम वितरण का कारण है। तापीय भिन्नताओं से वायुदाब में अन्तर आता है तथा वायु विक्षोभ, पवन, आदि उत्पन्न होते हैं। यही नहीं, शैलों के अपक्षय में भी सूर्यातप प्रभावकारी होता है। गुरुत्व तथा पृथ्वी का घूर्णन पवन तथा हिम के प्रवाह को नियंत्रित करते हैं।

          बहिर्जात बलों को सक्रिय बनाने में किसी न किसी गतिशील साधन का योगदान अवश्य होता है। प्रवाही जल, हिम, पवन, आदि गतिशील साधन ही धरातल पर काट-छांट का कार्य करते हैं। शैलों की काट-छांट, घिसने तथा क्षीण बनाने की क्रिया को अनाच्छादन (Denudation) कहते हैं।

मोन्कहाउस (Monkhouse) के अनुसार- “अनाच्छादन में उन सभी साधनों के कार्य सम्मिलित हैं जिनसे भू-पटल के किसी भाग का पर्याप्त विनाश, अपव्यय तथा हानि होती है। इस उपलब्ध पदार्थ का अन्यत्र निक्षेप होता है तथा इनसे अवसादी शैलों का निर्माण होता है।”

    भूपटल के अनाच्छादन में दो प्रक्रम अथवा शक्तियां मुख्य हैं-

(i) स्थैतिक प्रक्रम एवं

(ii) गतिशील प्रक्रम।

1. स्थैतिक प्रक्रम (Static processes):-

       स्थैतिक प्रक्रिया से अभिप्राय शैलों की अपने ही स्थान पर (in situ) टूट-फूट से है। इसके द्वारा शैलें ढीली पड़ती हैं तथा चट्टानों का चूर्ण बनता है। इस क्रिया को अपक्षय (Weathering) कहते हैं। अपक्षय भी दो प्रकार होता है-

         यांत्रिक अपक्षय में चट्टानों के स्वरूप में विघटन होता है और रासायनिक अपक्षय में चट्टानें वियोजन द्वारा परिवर्तित होती हैं।

2. गतिशील प्रक्रम (Mobile Processes):-

      गुरुत्व प्रवाही जल (वर्षा जल, नदी, भूमिगत जल), पवन, हिमानी, लहरें, आदि साधन शैल पदार्थों को तोड़ते-फोड़ते हैं तथा अपक्षयित पदार्थ उठाकर अन्यत्र ले जाकर निक्षेपित कर देते हैं। इस क्रिया के अन्तर्गत वृहत् क्षरण (Mass Movement) तथा अपरदन (Erosion) सम्मिलित हैं। परिवहन एवं निक्षेप भी अपदन से सम्बद्ध हैं।


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38. भारत में हरित क्रान्ति का प्रभाव

38. भारत में हरित क्रान्ति का प्रभाव



         हरित क्रांति शब्द का प्रयोग सर्वप्रथम डब्लू. एस. गौड ने खाद्यान्न उत्पादन में आई क्रांति, जो कि गेहूँ के HYV (High Yielding Varieties- उच्च उत्पादकता किस्में) प्रकार के आविष्कार से संभव हुई थी, के लिए किया था। यह क्रांति भारत, पाकिस्तान एवं विकासशील देशों में विद्यमान खाद्यान्न संकट को दूर करने में अत्यन्त मददगार रही। भारत में मुख्य रूप से भारतीय कृषि वैज्ञानिक एमएस स्वामीनाथन द्वारा निर्देशित थी, जो नॉर्मन ई. बोरलॉग की बड़ी हरित क्रांति पहल का हिस्सा थी, जिसने अविकसित देशों में कृषि उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए कृषि अनुसंधान और प्रौद्योगिकी का उपयोग किया था।

      उन्नत किस्म के बीज के अलावा अच्छी सिंचाई की व्यवस्था, आधुनिक यंत्रों का उपयोग, अच्छे उर्वरक का वैज्ञानिक प्रयोग इत्यादि हरित क्रांति के आधार थे। इसमें सस्ते मूल्य पर बिजली उपलब्ध कराने के साथ-साथ अन्य बैंकिंग एवं बाजार की सुविधा उपलब्ध करायी गयी। हरित क्रांति की सफलता के दो पक्ष रहे, एक सकारात्मक तो दूसरा नकारात्मक।

सकारात्मक पक्ष

     इस क्रांति से खाद्यान्न की उपज में काफी बढ़ोत्तरी हुई। 1950 में भारत में 50 मिलियन टन खाद्यान्न का उत्पादन हुआ था, जो बढ़कर अब 200 मिलियन टन हो चुका है। गेहूँ के उत्पादन में 177 प्रतिशत, चावल में 76 प्रतिशत तथा मक्के में 56 प्रतिशत बढ़ोत्तरी हुई। खाद्यान्न में वार्षिक वृद्धि 2.62 प्रतिशत हो गयी, जो पहली बार जनसंख्या वृद्धि दर से अधिक थी अर्थात् खाद्यान्न संकट दूर हुआ।

      कृषि क्षेत्र में 1961 से 1999 के बीच 13 प्रतिशत की वृद्धि हुई। 1960-61 में यह कुल कृषि क्षेत्र का 72 प्रतिशत था, जो 1970-71 में 78 प्रतिशत हो गया, 1980-81 में 81 प्रतिशत और अब 82 प्रतिशत के करीब है। पिछले तीन दशकों में गेहूँ के क्षेत्र में 150 प्रतिशत की वृद्धि हुई है, जिसमें 82 प्रतिशत सिंचित क्षेत्र है तथा 95 प्रतिशत HYV के अंतर्गत आता है। चावल क्षेत्र में भी 45 प्रतिशत की वृद्धि हुई है।

       भारतीय कृषि पहली बार बाजार में लाभदायक व्यापार के रूप में आई क्योंकि अब किसानों के पास अतिरिक्त अन्न मौजूद था। कृषि उत्पादों पर आधारित उद्योगों का विकास हुआ तथा कृषि में प्रयुक्त होने वाले यंत्रों के निर्माण में भी लौह एवं यांत्रिक उद्योग को बढ़ावा मिला। भारतीय किसानों के दृष्टिकोण में परिवर्तन हुआ, भारतीय किसान बढ़ी पैदावार को देखते हुए नवीन कृषि प्रणाली को अपनाने को तुरंत तैयार हो गये और कृषि सहायता से लाभदायक वाणिज्यिकी में परिणत हो गये।

     खाद्यान्न का आयात रुका तथा भारतीय मुद्रा का विदेश गमन भी नियंत्रित हुआ। भारत जैसे विकासशील देश में यह मुद्रा अधः संरचना के विकास के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण थी। ग्रामीण रोजगार के भी शुभ अवसर पैदा हुए। घरेलू उद्योग धंधों का भी विकास हुआ तथा मजदूरी में बढ़ोतरी हुई।

नकारात्मक पक्ष

     परंतु हरित क्रांति के नकारात्मक पक्ष भी उभर का सामने आये हैं। हरित क्रांति ने उसी क्षेत्र में सफलता पाई, जहाँ पर पूर्व से ही अधः संरचना का विकास हुआ था, किसान बड़े एवं धनी थे, कुल जोत अधिक थी तथा दूसरी भौगोलिक एवं सामाजिक शर्तें पूरी हो रही थीं। अतः यह पंजाब, हरियाणा, पश्चिम उत्तर प्रदेश आदि क्षेत्रों में तो सफल रही, परन्तु उड़ीसा, मध्य प्रदेश आदि में असफल रही, जिससे आर्थिक विकास में असमानता आयी।

     उत्तर प्रदेश के अंदर ही पूर्वी एवं पश्चिमी उत्तर प्रदेश में विकास की विषमता दिखती है। इसी तरह कृष्णा, गोदावरी क्षेत्र एवं तेलंगाना और रायल सीमा क्षेत्र में विषमता दिखती है।

        अंतर्वैयक्तिक विषमता का भी जन्म हो गया। क्योंकि बड़े किसान ही इसका भरपूर फायदा उठा सके जबकि छोटे किसान आर्थिक रूप से असफल ही रह गये। गेहूँ और चावल की उपज एवं उपज क्षेत्र में तो बढ़ोत्तरी हुई, परंतु तिलहन एवं दलहन की उपज एवं उपज क्षेत्र दोनों ही घट गये। अंतर्वैयक्तिक विषमता ने बड़े किसानों के समाज में प्रभुत्व को पूर्वस्थापित कर दिया। छोटे किसान अपनी जमीन को बढ़ी कीमत में बेचने पर प्रलोभित हो गये तथा उनकी आर्थिक दुर्गति बढ़ गयी। कृषि में यांत्रिकी के प्रवेश से रोजगार के अवसर भी घट गये।

         हरित क्रांति के सर्वाधिक दुष्परिणाम पर्यावरणीय दृष्टि से उभर कर सामने आये। कृषि में HYV किस्म की आवश्यकता अधिक रहती है। हरित क्रांति के क्षेत्र में अपवाह प्रणाली बेहद खराब है। अतः नहरों से सिंचित क्षेत्र में जल जमाव एवं कूप तथा नलकूप क्षेत्र में लवणता की समस्या का जन्म हो गया। हरियाणा एवं पंजाब के अर्द्धशुष्क भौगोलिक दशा में लवणता को और बढ़ावा मिला।

        कृषि क्षेत्र को बढ़ाने के लिए वनस्पति का विनाश हुआ, अधिक उर्वरक के प्रयोग से प्राकृतिक उर्वरता का ह्रास तथा कृषि प्रणाली में परिवर्तन (जैसे दलहन का न बोया जाना) आदि प्रयोगों एवं कार्यों से मृदा अपरदन एवं प्रदूषण दोनों बढ़े। एकल कृषि तथा कृषि पारिस्थितिकी पर प्रभाव भी नकारात्मक पड़े। एक ही फसल उपजाने से कृषि पारिस्थतिकी का विनाश हो रहा है।

       रासायनिक खादों के उपयोग से तथा खाद्यान्नों में सीसा, तांबा, जस्ते आदि की मात्रा बढ़ने से यकृत संबंधी रोग तथा जल जमाव से मलेरिया, डेंगू आदि रोग बढ़े। डीडीटी और कीटनाशक दवाओं का दुधारू जानवरों के दूध में पाया जाना भी घातक संकेत है। इस तरह एक तफ तो हरित क्रांति से खाद्यान्न उत्पादन में आशानुरूप वृद्धि हुई तो दूसरी तफ इसने पर्यावरणीय एवं सामाजिक दुर्व्यवस्था को भी जन्म दे दिया।


37. भारत में सिंचाई के विभिन्न साधनों एवं उनके महत्त्व

37. भारत में सिंचाई के विभिन्न साधनों एवं उनके महत्त्व



      भूमि की आवश्यकतानुसार सिंचाई द्वारा पानी उपलब्ध कराने के लिए जिस प्रारूप, संयंत्र तथा तकनीक का इस्तेमाल किया जाता है, उसे ही सिंचाई व्यवस्था कहते हैं। देश के विभिन्न भागों में सिंचाई प्रणाली वहाँ के भू संरचना, जलवायु, जल की उपलब्धता आदि विभिन्न परिस्थितियों द्वारा निर्देशित होती है। इसलिए देश के विभिन्न भागों में सिंचाई की पद्धतियों में पर्याप्त असमानता पायी जाती है, हमारे देश में सिंचाई के जिन विविध साधनों का प्रयोग किया जाता है उनका संक्षिप्त वर्णन एवं महत्व निम्नानुसार है:-

1. कुएं एवं नलकूप

2. तालाब

3. नहरें

4. बहुउद्देशीय सिंचाई परियोजनाएँ

1. कुआँ एवं नलकूप:-

       भारत में पानी के लिए कुओं का प्रयोग प्राचीन समय से ही होता आ रहा है और वर्तमान में भी यह जल प्राप्त करने या सिंचाई का एक महत्वपूर्ण साधन है। वर्तमान में हमारे देश में लगभग 89.6 लाख कुआँ हैं, जो देश के कुल सिंचित क्षेत्र के लगभग 21.1 प्रतिशत भाग की सिंचाई करते हैं, कुआँ प्रमुख रूप से दो प्रकार के होते हैं-

(i) कच्चा कुआँ

(ii) पक्का कुआँ,

      कच्चे कुओं को बनवाने के लिए कम खर्च करना पड़ता है, जबकि पक्के कुओं के निर्माण का खर्च अधिक है, कुआँ सिंचाई का सस्ता एवं सुगम साधन होने के कारण भारतीय किसान इसका उपयोग आमरूप में करता है, कुओं से गुजरात के कुल सिंचित क्षेत्र के 73 प्रतिशत, महाराष्ट्र के 60 प्रतिशत, राजस्थान के 46 प्रतिशत व मध्य प्रदेश के 37 प्रतिशत भाग की सिंचाई की जाती है।

      इस तरह उत्तर प्रदेश के 23.2 प्रतिशत, आन्ध्र प्रदेश के 6 प्रतिशत, तमिलनाडु 11 प्रतिशत, कर्नाटक 3 प्रतिशत तथा केरल के 4 प्रतिशत सिंचित क्षेत्र की सिंचाई कुओं के द्वारा की जाती है, बिहार, पश्चिम बंगाल, पंजाब, उड़ीसा व हरियाणा कुओं द्वारा सिंचाई करने वाले देश के अन्य राज्य हैं।

      ट्यूबवैल या नलकूप सिंचाई का एक नवीनतम साधन है, जिनका प्रयोग 1930 से आरम्भ किया गया था। यह एक अत्यधिक गहरा (30 फीट से 500 फीट तक) एवं संकरा छिद्र होता है (जिसकी खुदाई मशीन के द्वारा की जाती है) जिससे बिशेष यंत्र या विद्युत् मोटरों की सहायता से पानी निकाला जाता है

       ये प्रायः ऐसे कुएँ होते हैं जिनसे निरन्तर जल प्राप्त होता है पश्चिमी उत्तर प्रदेश, उत्तरांचल, पंजाब, हरियाणा, तमिलनाडु, गुजरात नलकूपों द्वारा सिंचाई करने वाले प्रमुख भारतीय राज्य हैं राज्यों के सिंचित क्षेत्र का 51.6 प्रतिशत उत्तर प्रदेश, 26 प्रतिशत पंजाब तथा 20.6 प्रतिशत हरियाणा में नलकूपों द्वारा सिंचाई की जाती है इस प्रकार उत्तर प्रदेश नलकूपों से सिंचाई करने वाला देश का अग्रणी राज्य है।

         पश्चिम बंगाल, बिहार, झारखंड, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, आन्ध्र प्रदेश तथा राजस्थान नलकूपों से सिंचाई करने वाले देश के अन्य प्रमुख राज्य हैं। इस समय ट्यूबवैल या नलकूपों से लगभग 14.3 लाख हेक्टेयर भूमि की सिंचाई होती है, जो देश के कुल सिंचित क्षेत्र का 29.9 प्रतिशत है।

नलकूपों या ट्यूबवैलों का महत्व:-

(i) नलकूपों द्वारा कम वर्षा वाले देश के ऐसे भागों में सिंचाई की जा सकती है, जहाँ का जल स्तर नीचा हो वहाँ सिंचाई के अन्य साधन उपलब्ध न हों

(ii) नलकूपों द्वारा किसान फसलों को इच्छित समय में पानी दे सकता है

(iii) नलकूपों के जल में ऐसे कई रसायन होते हैं, जो फसलों के लिए उपयोगी होते हैं

(iv) नलकूपों के संचालन व्यवस्था का व्यय कम होता है

(v) नलकूपों द्वारा फसलों को आवश्यकतानुसार कम या अधिक जल दिया जा सकता है।

2. तालाब:-

      तालाब से आशय मानव या प्रकृति निर्मित उन जलाशयों से होता है जिसमें वर्षा का जल एकत्रित हो जाता है, तालाबों का आकार छोटे नालों या पोखरों से लेकर बड़ी-बड़ी झीलों के रूप में हो सकता है ये दो प्रकार के हो सकते हैं-

(i) कृत्रिम तालाब,

(ii) प्राकृतिक तालाब।

      कृत्रिम तालाब भूमि खोदकर तथा बांध बनाकर वर्षा का जल एकत्र करके बनाये जाते हैं। ये अपेक्षाकृत छोटे तथा गहरे होते हैं। जब प्राकृतिक गड्ढों में जल एकत्र हो जाता है तो प्राकृतिक तालाब बन जाते हैं, ये बड़े व छिछले होते हैं।

        तालाब द्वारा देश के प्रायद्वीपीय भाग में जहाँ की भूमि पथरीली, असमतल तथा कुएँ एवं नहरों के निर्माण के लिए उपयुक्त नहीं है, इसी साधन से सिंचाई की जाती है। देश के कुल सिंचित क्षेत्र का लगभग 6.8 प्रतिशत भाग की सिंचाई तालाबों द्वारा की जाती है तालाबों द्वारा सिंचाई करने वाले राज्यों में तमिलनाडु, आन्ध्र प्रदेश, कर्नाटक, महाराष्ट्र, उड़ीसा एवं पश्चिमी बंगाल प्रमुख हैं। इसके अलावा दक्षिणी झारखंड, दक्षिणी मध्य प्रदेश, द. छत्तीसगढ़ एवं दक्षिण-पूर्वी राजस्थान के कुछ भागों में तालाबों द्वारा सिंचाई की जाती है।

       इस समय देश में लगभग 5 लाख बड़े और 60 लाख छोटे तालाब है, निजाम सागर (आन्ध्र प्रदेश), कृष्णराज सागर (कर्नाटक), जयसमन्द, उदय सागर एवं फतेह सागर (राजस्थान) आदि सिंचाई तालाबों के प्रमुख उदाहरण हैं जयसमन्द सबसे बड़ा तालाब है।

तालाबों द्वारा सिंचाई से लाभ-

(i) ऐसे भागों में जहाँ भूमि तल कठोर होता है, तालाब बनाना उपयुक्त रहता है।

(ii) इससे वर्षा जल का उचित उपयोग हो जाता है एवं पानी बेकार नहीं जाता।

(iii) तालाबों से सिंचाई के साथ-साथ मत्स्य पालन भी किया जा सकता है, जिससे कुछ सीमा तक खाद्य समस्या हल करने में सहायता मिल सकती है।

(iv) तालाबों द्वारा बिना मोटरों या पम्पों के बिना ही कुछ सीमा तक सिंचाई की जा सकती है।

(v) तालाबों का निर्माण ऐसे भागों में भी किया जा सकता है जहां कुएँ खोदना एवं नहर निकालना सम्भव नहीं होता।

      तालाबों द्वारा सिंचाई केवल वर्षा पर निर्भर रहती है, किसी-किसी वर्ष जब वर्षा कम होती है तो तालाब सूख जाते हैं और फसलों की सिंचाई नहीं हो पाती है।

3. नहरें

       नहरें भारत में सिंचाई का सबसे बड़ा व प्रमुख साधन हैं, जिससे देश की लगभग 35.7 प्रतिशत सिंचित क्षेत्र की सिंचाई की जाती है इस समय देश में लगभग 1 लाख 50 हजार किमी लम्बी नहरें हैं जिससे 163.9 लाख हेक्टेयर भूमि की सिंचाई की जाती है भारत की नहर प्रणाली विश्व की सबसे बड़ी नहर प्रणाली है। नहरों का विस्तार देश में प्रमुख रूप से उत्तरी भारत में मिलता है

        सिंचित क्षेत्रफल की दृष्टि से 20 प्रतिशत नहरों द्वारा सिंचाई केवल उत्तर प्रदेश में होती है आन्ध्र प्रदेश 10 प्रतिशत, मध्य प्रदेश एवं छत्तीसगढ़ 9.8 प्रतिशत, राजस्थान 8.3 प्रतिशत, पंजाब 8 प्रतिशत तथा हरियाणा 8 प्रतिशत, नहरों द्वारा सिंचाई प्राप्त करने वाले देश के अन्य प्रमुख राज्य हैं।

      भारत में नहरें तीन प्रकार की पायी जाती हैं:-

(i) बारहमासी नहरें- ये वे नहरें हैं जो पूरे वर्ष बहती हैं। इनका निर्माण नदियों में बांध बनाकर किया जाता है।

(ii) बरसाती नहरें- इन नहरों में पानी केवल बरसात में ही रह पाता है इनका निर्माण मुख्य रूप से नदियों में बाढ़ के अतिरिक्त जल की निकासी के लिए किया जाता है।

(iii) स्टोरेज वर्क्स- इस प्रकार की नहरें पहाड़ी घाटियों में बांध बनाकर वर्षा का पानी एकत्र करके निकाली जाती हैं इन नहरों का उपयोग तालाबों की तरह ही किया जाता है। इन्दिरा गांधी नहर (राजस्थान), सरहिन्द नहर (पंजाब), ऊपरी गंगा नहर, निचली गंगा नहर, मध्य गंगा नहर, पूर्वी यमुना नहर आदि सिंचाई नहरों के उदाहरण हैं।

नहरों द्वारा सिंचाई से लाभ-

(i) नहरों द्वारा खेतों को पानी देना सस्ता एवं सरल है

(ii) बाढ़ के समय नदियों के पानी को नहरों में छोड़ा जा सकता है और बाढ़ से उत्पन्न संकट से निपटा जा सकता है।

(iii) नहरों को आन्तरिक परिवहन के साधन के रूप में भी प्रयोग किया जा सकता है।

(iv) नहरों के किनारे वृक्षारोपण करके मृदा अपरदन को रोका जा सकता है।

(v) भारत की अधिकांश नहरें बारहमासी हैं, अतः किसान आवश्यकतानुसार कभी भी अपने खेत में सिंचाई कर सकता है।

        नहर सिंचाई से जहाँ एक ओर अनेक लाभ हैं वहीं दूसरी और सिंचित क्षेत्र के जलमग्न होने का भय भूमि की क्षारीयता, अन्तिम छोर में पानी की कमी, पानी सम्बन्धी आपसी विवाद जैसी कई समस्याएँ भी हैं।

4. बहुउद्देशीय सिंचाई परियोजनाएँ-

         भारत में विभिन्न उद्देश्यों जैसे- सिंचाई, बाढ़ नियन्त्रण, पेयजल आपूर्ति, जल विद्युत उत्पादन, नहर परिवहन, पर्यटन और वन्यजीव संरक्षण इत्यादि की पूर्ति बहुउद्देशीय परियोजनाओं के तहत् की जाती है इसलिए भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पं० जवाहर लाल नेहरू ने इन परियोजनाओं को “आधुनिक भारत का मंदिर” की संज्ञा दी है

          भारत की प्रमुख बहुउद्देशीय परियोजनाएँ निम्नलिखित हैं-

(i)  कोसी परियोजना 

(ii) दामोद घाटी परियोजना 

(iii) रिहन्द बाँध परियोजना

(iv) हीराकुण्ड बाँध

(v) भाखड़ा नांगल परियोजना

(vi)  गंडक परियोजना

(vii) तुंग भद्रा परियोजना इत्यादि

36. भारत में सिंचाई की आवश्यकता क्यों है? 

36. भारत में सिंचाई की आवश्यकता क्यों है?



       वर्षा के अभाव में खेतों को कृत्रिम ढंग से जल पिलाने की क्रिया को सिंचाई करना कहा जाता है। भारत एक उष्ण कटिबन्धीय देश है जिसमें कृषि मुख्यतः मानसूनी वर्षा पर ही निर्भर है, किन्तु इस वर्षा की प्रकृति एवं उसके वितरण में कई दोष पाये जाते हैं। इन दोषों को दूर करने एवं नियमित कृषि करने का सर्वोत्तम उपाय सिंचाई की व्यवस्था करना है।

सिंचाई की आवश्यकता के कारण

(1) वर्षा की अनिश्चितता (Uncertainty of Rainfall):-

         भारत में वर्षा समय एवं स्थान की दृष्टि से अनिश्चित होती है तथा विभिन्न क्षेत्रों में उसकी मात्रा भी भिन्न होती है। मोटे तौर पर अनुमान लगाया गया है कि प्रत्येक 7 वर्ष में दो बार सूखा पड़ जाता है। अकाल सम्पूर्ण अर्थव्यवस्था को क्षत-विक्षत कर देते हैं। कभी तो समय से बहुत पहले ही वर्षा हो जाती है और कभी लम्बे अन्तराल पर इसी कारण नियमित रूप में कृषि करने के लिए सिंचाई अनिवार्य है।

(2) वर्षा का असमान वितरण (Unequal Distribution of Rainfall):-

      यद्यपि देश में वर्षा का औसत 100 सेण्टीमीटर है, किन्तु इसका क्षेत्रीय वितरण असमान है। उदाहरण के लिए पश्चिमी तटीय क्षेत्रों और असम प्रदेश में 250 सेण्टीमीटर से भी अधिक वर्षा होती है। उत्तरी मैदान और प्रायद्वीप के पूर्वी भाग में यह 100 से 200 सेण्टीमीटर ही होती है। पंजाब के मैदान और दक्षिण प्रायद्वीप के उत्तर-पश्चिमी भागों में वर्षा की मात्रा केवल 25 से 100 सेण्टीमीटर होती है।

        गंगा नदी के पूर्वी मैदान तथा पश्चिमी समुद्री तट को छोड़ कर अन्य सभी भागों में वर्षा की कमी से सदैव अकाल का संकट बना रहता है। राजस्थान, हरियाणा और दक्षिणी पंजाब में तो बहुत कम वर्षा होने से सिंचाई के बिना खेती करना सम्भव नहीं है। इसी प्रकार दक्षिणी पठार के मध्यवर्ती एवं आन्तरिक भागों में कृषि बिना समुचित सिंचाई के सम्भव नहीं है, क्योंकि इन प्रदेशों में या तो सूखा पड़ता है या फिर वर्षा बहुत कम होती है।

(3) वर्षा का कुछ ही महीनों में सीमित होना (Restriction of Rainfall to few months):-

       भारत के सभी भागों में एक ही मौसम में वर्षा नहीं होती। शीतकाल में केवल दक्षिण-पूर्वी भाग में ही वर्षा होती है और शेष भाग सूखे रहते हैं। वर्षा का 74% जून से सितम्बर के महीनों में दक्षिण-पश्चिमी मानसून द्वारा प्राप्त होता है, शेष का एक भाग शीत ऋतु में उत्तर-पूर्वी मानसून द्वारा एवं उत्तर-पश्चिमी भारत में शीतकालीन चक्रवातों द्वारा ऐसी स्थिति में वनस्पति अथवा कृषि उत्पादन के लिए लम्बे शुष्क काल में सिंचाई आवश्यक हो जाती है।

(4) जनसंख्या में वृद्धि (Growth in Population):-

      भारत में 2011 की जनगणना के अनुसार कुल जनसंख्या 121 करोड़ है। प्रतिवर्ष बढ़ती हुई जनसंख्या के लिए अधिकाधिक मात्रा में खाद्यान्नों की आवश्यकता पड़ती है। देश में इनका उत्पादन कम होने से अभाव के वर्षों में अनाज आयात करना पड़ता है।

           अतः आयात बन्द करने के लिए अतिरिक्त उत्पादन, गहरी खेती और प्रति हेक्टेअर एक से अधिक फसले उगाने से ही सम्भव है। इसके लिए सिंचाई करना अनिवार्य है। ऐसा अनुमान है कि यदि गेहूँ और धान उत्पादक क्षेत्रों में सिंचाई की समुचित व्यवस्था बराबर की जा सके तो इन अनाजों का अतिरिक्त उत्पादन प्रतिवर्ष 1 करोड़ से 1.5 करोड़ टन तक बढ़ाया जा सकता है।

(5) विशेष फसलों के लिए अधिक जल की आवश्यकता (Some Special Crops Require more Water):-

       चावल, गन्ना, जूट, मिर्ची, प्याज, लहसुन, आलू, आदि फसलों के लिए नियमित रूप से अधिक जल की आवश्यकता पड़ती है। इसी प्रकार ग्रीष्म काल की फसलें और बरसीम आदि के लिए प्रतिवर्ष 90 सेण्टीमीटर, रसदार फलों के लिए 100 सेण्टीमीटर तथा कठोर फलों के लिए 75 सेण्टीमीटर अतिरिक्त वर्षा की आवश्यकता पड़ती है। अतः अतिरिक्त जल की पूर्ति सिंचाई द्वारा की जाती है।

(6) मिट्टी की प्रकृति (Nature of Soil):-

       उत्तरी मैदान तथा नदियों के डेल्टाओं में उपजाऊ कांप मिट्टी पायी जाती है। जिससे थोड़ी सिंचाई करने से ही उत्पादन बढ़ जाता है। अन्य भागों में बलुई और दोमट मिट्टी अधिक समय तक जल रोकने में असमर्थ रहती है, अतः उसे कृषि योग्य बनाए रखने के लिए बार-बार सिंचाई करना आवश्यक हो जाता है।

(7) चारागाहों के विकास के लिए (For Development (of Pastures):-

        पशु पालन और दुग्ध व्यवसाय को प्रोत्साहन देने के लिए प्राकृतिक चारागाहों की रक्षा करना आवश्यक है तथा नए चारागाहों के लिए पर्याप्त मात्रा में जल की उपलब्धता होना आवश्यक है।

(8) व्यावसायिक फसलों में वृद्धि के लिए (For Increas- ing Commercial Crops):-

         कृषि के अन्तर्गत कुल क्षेत्र के 20% पर व्यावसायिक फसलें पैदा की जाती हैं, जिनसे कृषि उत्पादन के कुल मूल्य का 35% प्राप्त होता है। इन फसलों के अन्तर्गत केवल 16% भाग को ही सिंचाई की सुविधाएँ उपलब्ध हैं। चूंकि व्यावसायिक फसलों के निर्यात द्वारा भारत को प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष रूप में लगभग 9% विदेशी मुद्रा प्राप्त होती है और देश के उद्योगों के लिए कच्चा माल मिलता है, अतः इनके उत्पादन में वृद्धि करने के लिए सिंचाई की विशेष आवश्यकता पड़ती है।

(9) भारत में वर्षा प्रायः तेज बौछारों के रूप में होती है जो कृषि के लिए हितकर नहीं है। इससे वर्षा का जल भूमि में रिस नहीं पाता और भूमि प्यासी रह जाती है। निरन्तर फसलों के उत्पादन के लिए तब सिंचाई कना अनिवार्य हो जाता है।


प्रश्न प्रारूप

1. भारत में सिंचाई की आवश्यकता क्यों है? विवेचना कीजिये।

35. भारतीय कृषि की प्रमुख समस्याओं पर प्रकाश

35. भारतीय कृषि की प्रमुख समस्याओं पर प्रकाश



        भारत एक कृषि प्रधान देश है, परन्तु यहाँ कृषि की दशा संतोषजनक नहीं है। भारत की जनसंख्या का लगभग 70% भाग कृषि कार्य में लगा हुआ है लेकिन इसके उपरान्त भी भारतीय कृषक की दशा अच्छी नहीं है। निम्न स्तर पर सीमित विकास के बावजूद आज भी भारतीय कृषक परम्परावादी हैं।

        भारतीय किसान कृषि कार्य को एक व्यवसाय के रूप में नहीं करता है, बल्कि जीविकोपार्जन के लिए करता है। कृषि की पुरानी विधियों, पूँजी की कमी, भूमि सुधार की कमी, विपणन एवं वित्त सम्बन्धी कठिनाइयों आदि के कारण भारतीय कृषि की उत्पादकता अत्यन्त न्यून है। अब नई पीढ़ी में शिक्षा एवं कृषि को कमाई का साधन मानने की प्रवृत्ति से भी कृषि एवं कृषक की आर्थिक दशा में कुछ सुधार आने लगा है। भारतीय कृषि की कुछ प्रमुख समस्याएँ निम्नलिखित हैं, जिनसे भारतीय कृषि शताब्दियों से पीड़ित है-

(1) भूमि पर जनसंख्या का निरन्तर बढ़ता हुआ भार:-

     भारत में जनसंख्या तीव्र गति से बढ़ रही है, अतः भूमि पर जनसंख्या का भार निरन्तर बढ़ता जा रहा है। जनसंख्या वृद्धि के कारण प्रतिव्यक्ति उपलब्ध भूमि का औसत कम होता जा रहा है। 1921 में यह 0.8 हेक्टेयर था, 1931 में 0.72, 1941 में 0.64, 1951 में 0.75 तथा 1981 में घटकर यह 0.18 एवं 2011 में 0.12 हेक्टेयर हो गया, जबकि विश्व का यह औसत 0.2 हेक्टेयर प्रति व्यक्ति है। विश्व के कुछ देशों में जैसे- कनाडा में 2.12 है, अर्जेन्टाइना में 1.25 है, रूस में 1.03 है, सं. रा. अमेरीका में 0.89 तथा आस्ट्रेलिया में 3.39 हेक्टेयर प्रति व्यक्ति है।

(2) भूमि का असमान वितरण:-

       भारत में भूमि का वितरण बहुत ही असमान एवं असन्तुलित है। देश में आज भी 62 प्रतिशत कृषि भूमि केवल 10 प्रतिशत किसानों के पास है तथा शेष 38 प्रतिशत भाग ही 90 प्रतिशत किसानों के पास है। इस तरह एक ओर जहाँ बड़े किसान अपनी भूमि क्षमता का समुचित उपयोग नहीं कर पाते वहीं दूसरी ओर छोटे किसान अपनी गुजर बसर करने में असमर्थ रहते हैं। यद्यपि भारत में 1952 में जमींदारी प्रथा का उन्मूलन किया जा चुका है, लेकिन स्थिति में आशाजनक सुधार अभी तक नहीं हो पाया है।

(3) कृषि जोतों का बिखराव एवं भूमि का विभाजन:-

       भारत में उत्तराधिकार के नियमों के कारण भूमि का बंटवारा होता रहता है। इस कारण खेतों का आकार बहुत छोटा हो गया है। छोटे-छोटे खेत एक स्थान पर न होकर अनेक स्थानों पर बिखरे हुए रहते हैं। इस कारण आधुनिक यंत्रों के द्वारा उन्नत कृषि नहीं की जा सकती है।

(4) कृषि की न्यून उत्पादकता:-

       1970 तक देश के अधिकांश भागों में औसत उत्पादन स्तर अधिकांश विकसित व कई विकासशील देशों (मैक्सिको, ब्राजील, फिलीपीन्स) से भी काफी कम रहा, लेकिन अब हरित क्रांति एवं सरकारी प्रयत्नों से स्थिति में कुछ सुधार अवश्य हुआ है। गेहूँ, चावल, तिलहन, दलहन आदि फसलों के प्रति हेक्टेयर उत्पादन में वृद्धि हुई है।

(5) सिंचाई के साधनों की कमी:-

       भारतीय कृषि अधिकतर मानसूनी वर्षा पर ही निर्भर है और मानसून हमेशा अनियमित बना रहता है। ऐसी स्थिति में सिंचाई के साधनों की अत्यधिक आवश्यकता होती है, किन्तु दुर्भाग्य है कि आज भी सिंचाई के पर्याप्त साधनों का अभाव है। सिंचाई के साधनों के अभाव में आधुनिक ढंग से कृषि कार्य करना कठिन होता है। अतः आज भी भारतीय कृषि की दशा में सुधार नहीं हो सकी।

(6) कृषि आदानों का अभाव:-

       भारतीय कृषकों के पास कृषि आदानों (कृषि सामाग्रियों) का हमेशा अभाव बना रहता है, जिससे वे अच्छे बीज, खाद, सिंचाई, कृषि यंत्र आदि का उपयोग नहीं कर पाते हैं। इन साधनों के अभाव में कृषि कार्य करने पर प्रति हेक्टेयर उत्पादन कम होता है।

(7) साख सुविधाओं की कमी:-

        भारतीय कृषकों की आर्थिक स्थिति कमजोर है, इस कारण उनके सामने हमेशा आर्थिक संकट बना रहता है। ग्रामीण क्षेत्रों में साख-सुविधाओं का आज भी अभाव है। अतः कृषकों को वित्त पूर्ति के लिए गांव के महाजन एवं साहूकारों पर ही निर्भर रहना पड़ता है। साहूकार ऊँची ब्याज दर वसूल करता है एवं कृषकों के साथ धोखाधड़ी करता रहता है। इस प्रकार एक बार जो कृषक साहूकार के चंगुल में फंस जाता है फिर उसका बाहर निकलना कठिन होता है। ये देशी महाजन बड़ी मात्रा में कृषकों का शोषण करते हैं, फलतः कृषक अपनी दीन-हीन दशा के कारण कृषि के विकास की ओर ध्यान नहीं दे पाता।

(8) मृदा अपरदन:-

        मृदा अपरदन के कारण कृषि भूमि को क्षति पहुंचती है, जिससे भूमि की उपजाऊ शक्ति कम हो जाती है। जहां प्रतिवर्ष विस्तृत क्षेत्रों में भूमि का ह्रास हो जाता है वहां भूमि कृषि योग्य नहीं रहती है।

(9) धार्मिक एवं सामाजिक कारण:-

      भारतीय कृषक भाग्यवादी एवं अंधविश्वासी होता है। वह कृषि के विकास पर व्यय करने की अपेक्षा शादी, मृत्यु-भोज, सामाजिक रीति-रिवाजों व त्योहारों पर अपनी क्षमता से अधिक खर्च करता है। इस प्रकार कृषि के विकास की ओर ध्यान नहीं दिया जाता है।

(10) कृषि बीमा का अभाव:-

        भारत में कृषि बीमा का अभाव है। किसानों को किसी-किसी वर्ष बाढ़, सूखा एवं विभिन्न प्रकार के कृषि रोगों से कृषि उत्पादन में भारी क्षति उठानी पड़ती है, यहाँ तक कि उस आय से वह उत्पादन का खर्च भी प्राप्त नहीं कर पाता और उनकी स्थिति इतनी दयनीय हो जाती है कि वे आत्महत्या तक के लिए विवश हो जाते हैं। ऐसी अनिश्चितताओं के कारण भारतीय किसान फसलों का व्यावसायिक उत्पादन करने से डरता है, यदि देश में कृषि बीमा का सर्वव्यापीकरण हो जाए तो कृषि उत्पादन में वृद्धि हो सकती है।

(11) विपणन व्यवस्था का अभाव:-

        विपणन व्यवस्था का अभाव भारतीय किसान की एक महत्वपूर्ण समस्या है, क्योंकि इसके अभाव में किसान को अपने फसल उत्पादों का उचित मूल्य प्राप्त नहीं हो पाता है। विपणन की व्यवस्था नगरों या कस्बों तक सीमित है, जबकि फसलों का अधिकांश उत्पादन गाँव में ही होता है। अतः उसे अपना माल मण्डियों तक ले जाने के लिए अतिरिक्त परिवहन व्यय की आवश्यकता पड़ती है, विवश होकर वह अपना माल गाँव में कम मूल्य पर ही बिचौलियों को बेच देता है जिससे उसे कम लाभ प्राप्त होता है।

निष्कर्ष:

      इस प्रकार भारतीय कृषि अनेक समस्याओं से ग्रस्त है, और आज भी विकसित देशों की तुलना में काफी पिछड़ी स्थिति में है, इसके विकास के लिये अनेकानेक कारग कदम उठाने की आवश्यकता है।

प्रश्न प्रारूप

1. भारतीय कृषि की प्रमुख समस्याओं पर प्रकाश पर प्रकाश डालिए।


32. भारत में बाढ़ के कारण, प्रभावित क्षेत्र एवं समाधान

32. भारत में बाढ़ के कारण, प्रभावित क्षेत्र एवं समाधान



      राष्ट्रीय बाढ़ आयोग के अनुसार “बाढ़ वह स्थिति है जब नदी का जल खतरे के निशान से ऊपर बहने लगती है।” खतरे का निशान स्तर 50 वर्षों के औसत प्रवाह का स्तर है। संपूर्ण भारत में 80 नदियों के जलस्तर के गहन अध्ययन के बाद खतरे का निशान का निर्धारण किया गया है।

      बाढ़ के लिए अनेक भौगोलिक कारक जिम्मेदार है जिसकी चर्चा नीचे के शीर्षक में किया जा रहा है-

(i) मानसून की अनिश्चिता-

          मानसून अपने अनिश्चिता के लिए विश्व प्रसिद्ध है। अति अनुकूल मानसून के स्थिति में भारी वर्षा होती है और बाढ़ की स्थिति उत्पन्न करती है। मानसून के अनिश्चितता की व्याख्या करने के लिए तापीय सिद्धांत, पछुआ हवा सिद्धांत, जेट स्ट्रीम सिद्धांत और एल-नीनो सिद्धांत दिया गया है। लेकिन अंतिम दो सिद्धांत ज्यादा प्रासंगिक है।

(ii) वनों का विनाश और मृदाक्षरण-

        वनों के विनाश से सतह की मिट्टी कमजोर होती है और कमजोर होने की स्थिति में वर्षा के बाद मिट्टी का तेजी से अपरदन होता है जिससे चट्टानें नग्न अवस्था में आ जाती है। जिसके परिणामस्वरूप नग्न चट्टानों में ग्राहय क्षमता निम्न हो जाती है। ऐसी स्थिति में जब पुनः वर्षा होती है तो बहाव तेज हो जाता है और बेसिन क्षेत्र में बाढ़ की स्थिति उत्पन्न होती है। शिवालिक प्रदेश में और मुख्यतः हिमाचल प्रदेश में जलस्तर का गिरना और पंजाब में बाढ़ आने की समस्या इससे जुड़ी हुई है।

       उत्तर-पूरब भारत और गढ़वाल क्षेत्र में भी इसी के कारण गंभीर समस्या उत्पन्न हुई है। हाल के वर्षों में राजस्थान और गुजरात आदि जैसे राज्यों में भी बाढ़ की स्थिति उत्पन्न होती रही है। यह निम्न वर्ष का क्षेत्र है लेकिन जब आकस्मिक तीव्र वर्षा होती है तो नग्न चट्टानों पर जल का बहाव तेजी से होता है और आकस्मिक बाढ़ की स्थिति को उत्पन्न करता है।

(iii) नदी के ताली में मालवों का जमाव-

          खास करके मैदानी भारत में नदियों का ढाल अत्यंत ही निम्न है। ऐसी स्थिति में चौड़ी घाटी के तली पर मलवे का जमा हो जाता है और मानसून ऋतु में जलस्तर तेजी से ऊपर उठ जाता है और उसके आसपास के क्षेत्रों में बाढ़ की स्थिति उत्पन्न हो जाती है। पूर्वी उत्तर प्रदेश, बिहार, पश्चिम बंगाल और असम में आने वाले बाढ़ इसे महत्वपूर्ण कारण माना जाता है।

(iv) नदियों के स्रोत क्षेत्र में भारी वर्षा का होना-

      हिमालय का दक्षिणी ढाल पर वर्षा अत्यधिक होती है। इसका परिणाम यह है कि मैदानी क्षेत्र में कम वर्षा के बावजूद बाढ़ की स्थिति उत्पन्न होती है। जैसे वर्षा नेपाल में होने के कारण उत्तर बिहार में बाढ़ की स्थिति उत्पन्न होती है।

(v) नदियों के मोड़दार प्रवाह-

       मोड़दार नदियों के प्रवाह से भी बाढ़ की स्थिति उत्पन्न होती है। यह स्थिति मुख्यत: पूर्वी गंगा के मैदान में देखने को मिलती है। पश्चिमी पंजाब और हरियाणा में समानांतर बहने वाली नदियों का जल वृहत क्षेत्र में नहीं फैलता है जबकि पूर्वी भारत की मोड़दार नदियां जल को बहुत क्षेत्र में फैला देती है।

(vi) उच्च ज्वार-

      तटवर्ती क्षेत्रों में चक्रवात के साथ आने वाले उच्च ज्वार भी बाढ़ की स्थिति उत्पन्न करती है। ऐसी स्थिति में नदी का मुहाना बंद हो जाता है और नदी का जल पीछे धकेला जाने लगता है जिससे नदियों के जलस्तर में उछाल आता है। उठता हुआ जल वृहत क्षेत्र में फैल जाता है और बाढ़ की स्थिति उत्पन्न करती है। इसी प्रक्रिया से गोदावरी, महानदी, कृष्ण, कावेरी आदि के बेसिन क्षेत्रों में बाढ़ की स्थिति उत्पन्न करती है।

(vii) भूस्खलन-

       उत्तरी-पूर्वी भारत के हिमाचल प्रदेश में भू-स्खलन से भी बाढ़ की स्थिति उत्पन्न होती है। इसमें बड़े-बड़े चट्टानी टुकड़े भूस्खलित होकर नदियों में चली जाती है और मार्गों को अवरुद्ध कर देती है जिससे नदियों के ऊपरी भाग में पानी फैल कर बाढ़ की स्थिति उत्पन्न करती है। हिमाचल प्रदेश में तिब्बत की ओर से आने वाली पारछु नदी के कारण कुछ वर्ष पहले ही गंभीर बाढ़ की समस्या उत्पन्न हुई थीपरिछु नदी

(viii) नदियों के द्वारा मार्ग परिवर्तन-

          पृथ्वी के घूर्णन गति के प्रभाव के कारण मैदानी भारत की नदियां मार्ग परिवर्तन करती रहती है क्योंकि उत्तर भारत की नदियां प्राय: उत्तर से दक्षिण की तरफ बहती है लेकिन घूर्णन गति पश्चिम से पूर्व की ओर होती है। ऐसी स्थिति में बड़ी नदियों के जाल में घूर्णन के विपरीत दिशा में प्रवाह की प्रवृत्ति विकसित होती है, जिसे नदियों के पश्चिमी तट का अपरदन अधिक होता है। ऐसी स्थिति में नदी में स्थानांतरण की प्रवृत्ति होती है जिससे कई नदियों के द्वारा पुराना मार्ग का निर्माण हो जाता है। वहां वर्षा के दिनों में जल जमाव की स्थिति होती है जो की बाढ़ की स्थिति का दो तक द्योतक है।

(ix) पठारीय स्थित-

        पठारीय क्षेत्रों से निकलने वाली नदियों में भी बाढ़ आती है। यहां धरातल पर अगम्य चट्टानों की उपस्थिति तथा तीव्र वर्षा के कारण बार की स्थिति उत्पन्न होती है। लेकिन बाढ़ की अवधि लंबी नहीं होती है। नदियों के ढाल तीव्र होते हैं, इसलिए पानी तुरंत बह जाती है।

(x) गंगा द्वारा सहायक नदी के जल स्रोतों में अवरोध-

         गंगा मैदानी भारत की रीढ़ के समान एक विशाल नदी है जिसमें उत्तर एवं दक्षिण दिशा से आकर अनेक नदियां मिलती है। जब गंगा का जलस्तर खतरे के निशान को पार कर रहा होता है, ठीक उसी समय अगर सहायक नदियों का भी जलस्तर ऊपर उठने लगता है तो सहायक नदी के जल को गंगा ग्रहण नहीं कर पाती है जिसके परिणामस्वरुप सहायक नदियों में बाढ़ की स्थिति उत्पन्न होती है। इसी तरह नदियों के संगम वाले स्थान पर सहायक नदी गंगा के स्वतंत्र जल के प्रवाह को बाधित करती है, जिसके कारण ऊपरी क्षेत्रों में बाढ़ की स्थिति उत्पन्न होती है।

(xi) उत्तर भारत के मैदानी क्षेत्र की बनावट-

         उत्तर भारत का मैदानी क्षेत्र हिमालय और प्रायद्वीपीय भारत के बीच कभी टेथिस सागर का गर्त रहा है। इसी में मालवा के जमाव से मैदानी क्षेत्र का यहाँ निर्माण हुआ है। यह क्षेत्र आज भी टेथिस सागर के छाड़न क्षेत्र के रूप में जो वर्षा ऋतु में अस्थाई समुद्र में बदलकर बाढ़ की स्थिति उत्पन्न करती है।

(xii) मानवीय कारण-

         मानव निर्मित बड़े-बड़े बांधों का जलस्तर जब ऊपर उठने लगता है तो अचानक जल को छोड़ दिया जाता है जिसके कारण निम्न मैदानी क्षेत्रों में बाढ़ की स्थिति उत्पन्न होती है। फरक्का बांध के कारण बांग्लादेश में बाढ़ आती है। मैटूर डैम के कारण कावेरी के डेल्टाई क्षेत्रों में बाढ़ आती है। टिहरी के कारण उत्तर प्रदेश और बिहार में बाढ़ आने की संभावना रहती है।

         आधुनिक युग में नगरीय बाढ़ की समस्या भी उत्पन्न होने लगी है जो पूर्ण रूपेण मानवीय कर्ण के कारण उत्पन्न होती है। जैसे नगरों में मकानों के जंगल कंक्रीट के द्वारा खड़ा किया जा रहा है। जल रिचार्ज वाले क्षेत्रों पर मकान बना दिए गए हैं। नालियों में पॉलिथीन के जमाव के कारण प्रवाह रुक जाने से आकस्मिक वर्षा होने पर बाढ़ की स्थिति उत्पन्न होती है।

बाढ़ वाले क्षेत्रों का वितरण

        राष्ट्रीय बाढ़ आयोग के अनुसार भारत में 342 मिलियन हेक्टेयर भूमि बाढ़ से प्रभावित है। बाढ़ प्रभावित क्षेत्र मुख्यतः पूर्वी भारत में स्थित है। गहनता के दृष्टि से असम सर्वाधिक प्रतिकूल क्षेत्र है लेकिन वास्तविक हानी के दृष्टि से उत्तर प्रदेश और बिहार राज्य प्रमुख है।

     राष्ट्रीय बाढ़ आयोग के अनुसार पूर्वी उत्तर प्रदेश, बिहार, बंगाल, असम और आंध्र प्रदेश ऐसे राज्य है जहां प्रतिवर्ष बाढ़ आते हैं। कुल हानि का दो-तिहाई भाग उत्तर प्रदेश, बिहार और आंध्र प्रदेश में होता है। 60% बाढ़ प्रभावित क्षेत्र गंगा-ब्रह्मपुत्र नदी तंत्र में स्थित है और बाढ़ के विभिषका के लिए कभी कोसी, दामोदर, ब्रह्मपुत्र आदि नदियां प्रसिद्ध थी। कभी कोसी बिहार का शोक तो दामोदर को बंगाल का शोक कहा जाता था लेकिन वर्तमान समय में कुछ नवीन नदियां भी बाढ़ प्रभावित क्षेत्र को विस्तार दिए हैं जिसमें महानदी और तीस्ता नदी प्रमुख है।

          बाढ़ के प्रभाव का समय सभी क्षेत्रों में एक समान नहीं होता है। सबसे लंबी अवधि ब्रह्मपुत्र के मैदान में होती है जहां प्रतिवर्ष बाढ़ का प्रभाव 6 सप्ताह तक या अधिक रहता है। उत्तर प्रदेश, बिहार और बंगाल में इसका प्रभाव 4 से 6 सप्ताह होते होता है।

       पूर्वी तटवर्ती मैदानी और डेल्टाई क्षेत्रों में इसका प्रभाव 1 से 3 सप्ताह तक रहता है तथा पंजाब, नर्मदा और ताप्ती के घाटियों में सामान्यत: इसका प्रभाव एक सप्ताह होता है और आकस्मिक बाढ़ वाले क्षेत्रों में गुजरात, राजस्थान और पूर्व के पर्वतीय क्षेत्र में इसका प्रभाव एक सप्ताह से कम होता है। लेकिन उत्तर-पूर्वी भारत में बाढ़ के बारंबारता अधिक होने के कारण कुल प्रभाव का समय 4 सप्ताह से अधिक हो जाता है। बाढ़ प्रणव क्षेत्र को नीचे के मानचित्र में देखा जा सकता है।-

भारत में

समाधान हेतु किया गया प्रयास-

           आजादी के पूर्व इस दिशा में कोई प्रयास नहीं किया गया था। जो भी प्रयास हुए हैं वह आजादी के बाद के हैं। इन प्रयासों में नदी घाटी प्रदेश के विकास की एकीकृत योजना सबसे प्रमुख है। इसके अंतर्गत बहुउद्देशीय नदी घाटी योजना सबसे प्रमुख है। यह ऐसी योजना है जो बाढ़ और सुखे दोनों ही समस्या का समाधान प्रस्तुत करता है। दामोदर पर डीवीसी और कोसी पर हनुमान नगर में, गंडक पर भैंसा लोटन में बांध बनाकर बाढ़ की समस्या एवं प्रभाव को कम किया गया है।

         इस योजना के साथ वनों का विकास, वृक्षारोपण तथा मृदा संरक्षण जैसी भी एकत्रित योजनाएं चल रही है। सामाजिक वानिकी का कार्यक्रम संपूर्ण भारत में चलाया जा रहा है। वन रोपण कार्यक्रम में नदी के स्रोत क्षेत्र में प्रमुख रूप से वृक्ष लगाए जा रहे हैं ताकि मृदा कटाव को रोककर बार की समस्या को कम कर सके।

      बाढ़ नियंत्रण के लिए अनेक विशिष्ट कार्यक्रम भी चलाए जा रहे हैं। ऐसे कार्यक्रमों में मृदा संरक्षण हेतु बेडिंग तथा कंटूर कृषि का विकास किया जा रहा है। बेडिंग के तहत छोटी-छोटी सरिताओं के प्रवाह को बाधित करने का प्रयास किया जाता है जबकि कन्टूर कृषि के तहत पहाड़ी क्षेत्रों में समोच्च रेखा के सहारे जुताई का कार्य किया जाता है ताकि मृदा का अपरदन न हो सके।

      भारत में पर्वतीय क्षेत्रों एवं वन्य क्षेत्रों में झूम कृषि के द्वारा वनों का विनाश हो रहा है। अतः इसे रोकने के लिए 1976 ई० में ही “झूम प्रीवेंशन फार्मिंग एक्ट” का निर्माण किया गया था। इससे वनों का संरक्षण होगा और बंजर भूमि का विकास नहीं होगा इससे बाढ़ जैसी स्थिति उत्पन्न नहीं होगी।

       बाढ़ के प्रभाव को रोकने के लिए बाढ़ के पूर्व सूचना देने का भी प्रयास किया जा रहा है और इस दिशा में विशेष कार्य भारतीय बाढ़ आयोग और भारतीय मौसम विज्ञान ने किया है। वर्तमान समय में कृत्रिम उपग्रहों का सहारा लेकर सात केन्द्रों पर बड़े और 147 स्थानों पर छोटे भविष्यवाणी केंद्र स्थापित किए गए हैं। इनका 57% भविष्यवाणी सही रहता है। बड़े केंद्र के रूप में है- भुवनेश्वर में महानदी पर, दिल्ली में यमुना नदी पर, गुवाहाटी में ब्रह्मपुत्र नदी पर, जलपाईगुड़ी में तीस्ता नदी पर, लखनऊ में गोमती नदी पर, पटना में गंगा पर और सूरत में ताप्ती नदी पर स्थापित किया गया है।

          बाँध, तटबंध, विशिष्ट प्रकार के खुले पूल और जल निकासी का विकास कार्य भी वृहत स्तर पर किया गया है। जिसका मुख्य उद्देश्य बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों की सुरक्षा है। इन बचाव कार्यक्रम के तहत 1954 से 1987 के बीच 14511 किलोमीटर तटबंधों का निर्माण किया गया था। 2838 किलोमीटर जल निकासी का विकास किया गया था।

          नदी के तली से मलवों को निकालने का कार्यक्रम बहुत खर्चीला है। सामान्यत: यह कार्य उन क्षेत्रों में किया जा रहा है जहाँ नदी का उपयोग नावों के लिए किया जाता है।

        ऊपर वर्णित कार्यक्रमों के लिए प्रत्येक पंचवर्षीय योजनाओं में बाढ़ हेतु विशिष्ट राशियों का आवंटन होता है। जैसे प्रथम पंचवर्षीय योजना में 13.77 करोड रुपए आवंटित किए गए थे। जबकि आठवीं में 1623 करोड रुपए जारी किए गए थे।

        बाढ़ की समस्या से निपटने हेतु कई तात्कालिक कार्यक्रम भी चलाए जा रहे हैं। इसके लिए पैसों का आवंटन वार्षिक बजट में किया जाता है। आठवीं वित्त आयोग के अनुसार हानि की समीक्षा का कार्य केंद्र सरकार का होगा। केंद्र द्वारा समीक्षा कर केंद्रीय सहयोग शुरू किया जाएगा। सरकार बाढ़ संभावित वाले क्षेत्र से बचाकर सुरक्षित स्थानों पर ले जाती है।

        बाढ़ आ जाने पर बाढ़ राहत कार्यक्रम चलती है। हेलीकॉप्टर, गोताखोरों, प्लास्टिक बोट का सहारा लेती है। भोजन के पैकेट का वितरण करती है। पेयजल हेतु जलापूर्ति किया जाता है। मवेशियों हेतु चारा उपलब्ध कराए जाते हैं। बाढ़ समाप्त होने पर अनेक संक्रामक बीमारियों से बचाव हेतु टीका, दवा का प्रबंध करती है। जल निकासी, संचार व्यवस्था और परिवहन आदि का प्रबंध किया जाता है। केंद्र एवं राज्य सरकारों के अलावे स्वंय सेवी संस्थाओं का भी सहारा लिया जाता है।

सुझाव-

        यद्यपि बाढ़ की समस्या से निपटने हेतु कई प्रयास किया जा रहा है फिर भी समस्या लगभग यथावत है। अतः इस समस्या से निपटने हेतु और अधिक पेनिट्रेटिव योजनाओं की जरूरत है। पुनः टिकाऊ विकास नीति के अंतर्गत ऐसी योजनाओं की जरूरत है जिसमें पर्यावरण के असंतुलन किए बगैर इन समस्याओं का समाधान किया जा सके।

      बाढ़ एवं जल जमाव वाले क्षेत्रों में ऐसी कृषि का विकास किया जाए जो बाढ़ के स्थिति में भी उग सके। जैसे चावल के ऐसे किस्म विकसित किए जाए जो 15 से 20 दिन तक चल मग्न रहने पर भी स्वस्थ रहें। द्वितीय जल कृषि का विकास किया जाए। इसके लिए मखाने, सिंघाड़े की खेती किया जा सकता है तथा बड़े पैमाने पर मछली का पालन किया जा सकता है।

        बाढ़ वाले क्षेत्रों में निर्माण तकनीक को विकसित किया जाए। बाढ़ वाले क्षेत्रों में सीमेंट एवं ईट से मकान निर्माण की गतिविधि को प्रोत्साहित किया जाए।

       बाढ़ वाले क्षेत्रों में ऐसे पुल निर्माण तकनीक पर बल दिया जाए जिससे जल ऊपर एवं नीचे दोनों से आसानी से बह सके। इसके लिए खुला पुल का निर्माण सर्वाधिक उपयोगी होगा। इसके साथ ही वानिकी कार्यक्रम और अन्य विकास कार्यक्रम को भी तीव्रता से लागू करने की आवश्यकता है।

         भारत में बाढ़ नियंत्रण में सबसे बड़ी बाधा नेपाल से आने वाली नदियों के जल को रोका जाना है। अतः इस कार्य के लिए भारत को अंतर्राष्ट्रीय कानून को पालन करना पड़ता है। ऐसे में भारत सरकार एवं राज्य सरकारें नेपाल से आने वाली नदियों को अनेक चैनलों में विभाजित कर गंगा नदी में जल को गिराकर समाधान का प्रयास करना चाहिए।

      बाढ़ प्रणव वाले क्षेत्रों में कृत्रिम उपग्रह के माध्यम से सूचना तंत्र को और प्रभावी बनाए जाने की आवश्यकता है।

       भूमि जल रिचार्ज करने वाले तकनीक को पुनर्जीवित करने की आवश्यकता है। इसके लिए जोहार, आहरा, कच्चे कुआं एवं तालाब, पाइन इत्यादि को पुर्नोद्धार किया जाए।

        बाढ़ राहत कार्यक्रम को भ्रष्टाचार से मुक्त कर सही तरीके से चलाया जाए। अंततः क्रांति के तहत नदी जोड़ो कार्यक्रम को अतितीव्र गति से कार्य रूप दिया जाए। जहां आवश्यक हो वहां पर बड़े बांध और छोटे बांधों का निर्माण किया जाए। नगरों में “वाटर हार्वेस्टिंग” को अनिवार्य गतिविधि के रूप में शामिल किया जाए।

प्रश्न प्रारूप

1. भात में बाढ़ के काण, प्रभावित क्षेत्र, समाधान के दिशा में किया गया प्रयास एवं सुझाव की चर्चा करें।

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