4. The problem of regional imbalances into India (भारत के विकास में क्षेत्रीय असन्तुलन की समस्या)

4. The problem of regional imbalances into India

(भारत के विकास में क्षेत्रीय असन्तुलन की समस्या)       problem of regional

           भारत में क्षेत्रीय असन्तुलन बड़े पैमाने पर पाया जाता है, हमारे देश में गरीबी एक अभिशाप है किन्तु इससे भी बुरी बात है-आय का असमान वितरण, आर्थिक विकास प्रयत्नों ने जहाँ आय की विषमता को बढ़ाया है, वहीं नियोजित विकास के द्वारा असंतुलन को कम करने के प्रयास भी किये हैं।

        योजनाओं का अन्तिम लक्ष्य समाजवाद की स्थापना करना, किन्तु योजनाओं के कार्यक्रमों का आधार क्रियान्वयन की विधि व संगठन तंत्र इस प्रकार के रहे कि सामाजिक लक्ष्यों की उपलब्धि सम्भव न हो सकी, प्रमुख असफलता आय के वितरण के रूप में सामने आयी, रिजर्व बैंक ऑफ इण्डिया द्वारा किये गये सर्वेक्षण अनुसार ग्रामीण क्षेत्र में निम्नतम 20 प्रतिशत जनसंख्या की कुल आय का 9 प्रतिशत प्राप्त होता है, जबकि 5 प्रतिशत की कुल आय का 17 प्रतिशत, जनसंख्या के उच्चतम अर्द्धभाग को कुल आय का 60 प्रतिशत, जबकि निम्नतम अर्द्धभाग को कुल आय का केवल 31 प्रतिशत प्राप्त होता है।

      हमारे देश में जनसंख्या का वितरण बहुत असमान है, यहाँ जनसंख्या घनत्व में भी बहुत असमानता है। देश का जनघनत्व 325 व्यक्ति प्रति वर्ग किलोमीटर है। जनघनत्व की दृष्टि से पश्चिम बंगाल प्रथम स्थान पर है, जहाँ जनघनत्व 903 व्यक्ति प्रति वर्ग किलोमीटर है, जबकि अरुणाचल प्रदेश में जनघनत्व 13 व्यक्ति प्रति वर्ग किलोमीटर है। इसी भाँति यहाँ जनसंख्या का लिंगानुपात तथा साक्षरता में भी बहुत असमानता पायी जाती है।

       लिंगानुपात की दृष्टि से प्रथम स्थान पर केरल है, जहाँ लिंगानुपात 1058 है, जबकि राजस्थान में लिंगानुपात सबसे कम है, जो 922 है, साक्षरता की दृष्टि से केरल प्रथम स्थान पर है, जहाँ साक्षरता 90.92 प्रतिशत है, इसके विपरीत सबसे कम साक्षरता वाला राज्य बिहार है, जहाँ साक्षरता 47.0 प्रतिशत है।

        यहाँ कृषि, उद्योग, परिवहन, व्यापार आदि में भी पर्याप्त असन्तुलन पाया जाता है। देश में व्याप्त असन्तुलनों से अनेकानेक सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक समस्याएँ उत्पन्न होती है, जिसे निम्नलिखित रूप में देख सकते हैं-

सामाजिक समस्याएँ:

        क्षेत्रीय असन्तुलन के कारण विभिन्न प्रकार की सामाजिक समस्याएँ उत्पन्न होती हैं जो अग्रलिखित हैं-

(1) आय एवं सम्पत्ति की असमानता:-

      क्षेत्रीय असन्तुलन से ग्राम एवं नगरों के मध्य आय तथा सम्पत्ति वितरण में असमानता बहुत है। यह असमानता राज्यों में भी बहुत है। अखिल भारत की प्रति व्यक्ति आय 29,642 (वर्तमान कीमतों पर) रुपये है, जबकि गोवा 70,112 रुपये, दिल्ली में 61,676 रुपये, महाराष्ट्र में 37,081 रुपये है।

       राष्ट्रीय औसत से अधिक आय वाले राज्य केन्द्रशासित गोआ, अरुणाचल प्रदेश, दिल्ली, गुजरात, हरियाणा, हाराष्ट्र मिजोरम एवं पंजाब, चण्डीगढ़, केरल आदि राज्य है, जबकि शेष राज्यों के प्रति व्यक्ति आय राष्ट्रीय औसत से कम है।

(2) असामाजिक कृत्यों को बढ़ावा:-

       क्षेत्रीय असन्तुलन से असामाजिक कृत्यों को बढ़ावा मिलता है, क्योंकि जब लोग समाजिक नहीं होते हैं अर्थात् उनमें ऊँच-नीच दिखाई देती है, तो स्वाभाविक है कि असामाजिक कृत्यों को बढ़ावा मिलता है।

      क्षेत्रीय असन्तुलनों से किसी क्षेत्र विशेष की ओर श्रमिकों का प्रवास बढ़ने लगता है, जिससे भीड़-भाड़ की समस्या, आवास व्यवस्था की समस्या, जलापूर्ति समस्या, बिजली की समस्या तथा गन्दी बस्ती समस्या उत्पन्न होती है। सभी लोगों को रोजगार न मिलने से उनमें रोष व्याप्त होता है, जिससे असामाजिक कृत्यों को बढ़ावा मिलता है।

(3) सामाजिक लागतों में वृद्धि:-

         क्षेत्रीय असन्तुलन होने से किसी क्षेत्र विशेष में औद्योगीकरण अधिक होता है, जबकि किसी में बहुत कम। ऐसी स्थिति में जहाँ औद्योगीकरण अधिक होता है, वहाँ प्रदूषण की समस्या भी उत्पन्न हो जाती है। प्रदूषण वाले क्षेत्रों में निवास करने वाले श्रमिकों में विभिन्न प्रकार की बीमारियाँ होने लग जाती हैं, जिसके उपचार हेतु अतिरिक्त लागत वहन करनी पड़ती है।

आर्थिक समस्याएँ:

        क्षेत्रीय असन्तुलन से निम्न प्रकार की आर्थिक समस्याएँ उत्पन्न होती हैं-

(1) साधनों का अपूर्ण उपयोग:-

       क्षेत्रीय असन्तुलन की सबसे बड़ी समस्या यह रहती है कि इससे देश के संसाधनों का पूर्ण उपयोग नहीं हो पाता है। इसका कारण यह है कि जहाँ विकास होता है, वहाँ के संसाधनों का उपयोग हो जाता है किन्तु अनेकानेक दुर्गम क्षेत्र के संसाधनों का उपयोग नहीं हो पाता है।

(2) बेरोजगारी में वृद्धि:-

       सभी क्षेत्रों में सन्तुलित विकास न होने से कुछ क्षेत्रों में तो रोजगार के अवसर अच्छे होते हैं, जबकि अन्य क्षेत्रों में रोजगार का अभाव पाया जाता है। यदि सभी क्षेत्रों में समान रूप से विकास हो तो रोजगार के अवसर भी समान रूप से मिलेंगे, फलतः बेरोजगारी कम होगी।

(3) साधनों का अनुचित उपयोग:-

       प्राकृतिक संसाधन सीमित मात्रा में होते हैं। अतः उनका उपयोग विवेकपूर्ण ढंग से करना चाहिए तथा उनके संरक्षण पर भी ध्यान देना चाहिए। औद्योगिक विकास होने से संसाधनों का अधिकाधिक उपयोग हो जाता है, जिससे संसाधनों के समाप्त होने की समस्या उत्पन्न हो रही है।

(4) जीवन स्तर में भिन्नता:-

     क्षेत्रीय असन्तुलन से कुछ क्षेत्रों के लोगों की आय अधिक होती है, जबकि अन्य बहुत कम आय वाले होते हैं। ऐसी स्थिति में उनके जीवन-स्तर में पर्याप्त भिन्नता देखने को मिलती है। क्षेत्रीय असन्तुलन होने से यह बहुत गम्भीर समस्या उत्पन्न होती है।

राजनैतिक समस्याएँ:

        क्षेत्रीय असन्तुलन से निम्नांकित राजनैतिक समस्याएँ उत्पन होती हैं-

(1) राजनीतिक अस्थिरता:-

       क्षेत्रीय असन्तुलन से राजनीति में भी स्थिरता नहीं है। जहाँ राजनीतिक अस्थिरता है, वहाँ असन्तुलन है, इस प्रकार दोनों का बड़ा घनिष्ठ सम्बन्ध है। 

(2) क्षेत्रवाद की समस्या:-

      जब किसी क्षेत्र का विकास अधिक तथा किसी का कम होता है तो विभिन्न प्रकार की समस्याएँ उत्पन्न होती हैं, जिनमें क्षेत्रवाद की समस्या भी बहुत बड़ी है। ऐसे में क्षेत्रीय भावना जागृत होती है, जो किसी-न-किसी रूप में हानिकारक है।

(3) सुरक्षात्मक समस्या:-

      क्षेत्रीय असन्तुलन से सुरक्षा पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है जो क्षेत्र अधिक विकसित हो जाते हैं, उन पर अन्य पिछड़े क्षेत्रों के गरीब व बेरोजगा हमला बोल देते हैं, वहाँ से धन प्राप्त कते हैं। इससे वहाँ का जन-जीवन असुरक्षित हो जाता है।

4. Major Agriculture Systems in The World (विश्व में प्रचलित प्रमुख कृषि पद्धतियाँ)

4. Major Agriculture Systems in The World

(विश्व में प्रचलित प्रमुख कृषि पद्धतियाँ)



        Major Agriculture  

         मिट्टी को जोतने-गोड़ने तथा फसल उगाने एवं पशुपालन की कार्यप्रणाली, कला एवं विज्ञान को कृषि कहते हैं। कृषि मनुष्य का सबसे महत्वपूर्ण व्यवसाय है, क्योंकि इससे समस्त संसार के भोजन, वस्त्र तथा आवास की आवश्यकताएँ पूरी होती हैं। विद्वानों का विचार है कि कृषि का आरम्भ दक्षिण-पश्चिमी एशिया में लगभग 4000 ईसा पूर्व हुआ।

          कुछ विद्वानों का मत है कि मनुष्य कृषि कार्य पाषाण युग से ही करता आया है।

         कृषि ने मनुष्य को स्थायी आवास की सुविधा दी। कृषि का मशीनीकरण हो जाने से उत्पादन में वृद्धि हुई और कृषि उत्पादों का अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार शुरू हो गया। आज संयुक्त राज्य अमेरिका, कनाडा, आस्ट्रेलिया तथा रूस बड़ी मात्रा में कृषि उत्पादों का निर्यात करते हैं जबकि ग्रेट ब्रिटेन, नीदरलैण्ड, डेनमार्क तथा जापान इन वस्तुओं का आयात करते हैं।

कृषि पद्धतियाँ (Agricultural Systems):-

          भूतल पर विभिन्न प्रदेशों में विभिन्न प्रकार की भौतिक, आर्थिक तथा सामाजिक परिस्थितियाँ पाई जाती हैं जिस कारण अलग-अलग भागों में अलग-अलग कृषि पद्धतियाँ अपनाई जाती हैं। इनका संक्षिप्त विवरण निम्नलिखित है:

1. जीविकोपार्जी अथवा जीविका कृषि

(Subsistence Agriculture)

2. आधुनिक कृषि

(Modern Agriculture)

3. विस्तृत कृषि

(Extensive Agriculture)

4. वाणिज्य कृषि

(Commercial Farming)

5. मिश्रित कृषि अथवा व्यापारिक फसल एवं पशुपालन

(Mixed Farming or Commercial Crops and Livestock)

6. डेरी फार्मिंग

(Dairy Farming)

7. ट्रक कृषि

(Truck Farming)

8. उद्यान कृषि

(Horticulture)

1. जीविकोपार्जी अथवा जीविका कृषि (Subsistence Agriculture):-

         इस कृषि में कृषक अपनी तथा अपने परिवार के सदस्यों की उदरपूर्ति के लिए फसलें उगाता है। कृषक अपने उपभोग के लिए वे सभी फसलें पैदा करता है जिनकी उसे आवश्यकता होती है। अतः इस कृषि में फसलों का विशिष्टीकरण नहीं होता। इनमें धान, गेहूँ, दलहन तथा तिलहन  सभी का समावेश होता है। विश्व में जीविकोपार्जी कृषि के दो रूप पाए जाते हैं:

(क) आदिम जीविकोपार्जी कृषि जो स्थानान्तरी कृषि के समरूप है।

(ख) गहन जीविकोपार्जी कृषि जो पूर्वी तथा मानसून एशिया में प्रचलित है।

      चावल सबसे महत्वपूर्ण फसल है। कम वर्षा वाले क्षेत्रों में गेहूँ, जौ, मक्का, ज्वार, बाजरा, सोयाबीन, दालें तथा तिलहन बोये जाते हैं। यह कृषि भारत, चीन, उत्तरी कोरिया तथा म्यांमार में की जाती है। इस कृषि के महत्वपूर्ण लक्षण निम्नलिखित हैं :

(i) जोत बहुत छोटे आकार की होती हैं।

(ii) कृषि भूमि पर जनसंख्या के अधिक दबाव के कारण भूमि का गहनतम उपयोग होता है।

(iii) कृषि की गहनता इतनी है कि वर्ष में दो, तीन तथा कहीं-कहीं चार फसलें भी ली जाती हैं।

(iv) मशीनीकरण के अभाव तथा अधिक जनसंख्या के कारण मानवीय श्रम का बड़े पैमाने पर उपयोग होता है।

(v) कृषि के उपकरण बड़े साधारण तथा परम्परागत होते हैं, परन्तु पिछले कुछ वर्षों से जापान, चीन तथा उत्तरी कोरिया में मशीनों का प्रयोग भी होने लगा है।

(vi) अधिक जनसंख्या के कारण मुख्यतः खाद्य फसलें ही उगाई जाती हैं और चारे की फसलों तथा पशुओं को विशेष स्थान नहीं मिलता।

(vii) गहन कृषि के कारण मिट्टी की उर्वरता का ह्रास हो जाता है। मिट्टी की उपजाऊ शक्ति बनाए रखने के लिए हरी खाद, गोबर, कम्पोस्ट तथा रासायनिक उर्वरकों का प्रयोग किया जाता है। जापान में प्रति हेक्टेअर रासायनिक उर्वरकों की खपत सर्वाधिक है।

2. आधुनिक कृषि (Modern Agriculture):-

        इस कृषि में आधुनिक ढंग से फसलें उगाई जाती हैं। कृषि के विभिन्न कार्यों के लिए भिन्न-भिन्न मशीनों का प्रयोग किया जाता है। अधिक उपज लेने के लिए उन्नत बीज, उर्वरक, कीटनाशक दवाइयाँ तथा सिंचाई की उत्तम सुविधा का प्रयोग किया जाता है। विस्तृत कृषि, वाणिज्य कृषि, मिश्रित कृषि, डेयरी फार्मिंग उद्यान कृषि,आदि आधुनिक ढंग से की जाती है। 

3. विस्तृत कृषि (Extensive Agriculture):-

      विस्तृत कृषि एक मशीनीकृत कृषि है जिसमें खेतों का आकार बड़ा, मानवीय श्रम कम, प्रति हेक्टेअर उपज कम और प्रति व्यक्ति तथा कुल उपज अधिक होती है। यह कृषि मुख्यतः शीतोष्ण कटिबन्धीय कम जनसंख्या वाले प्रदेशों में की जाती है। इन प्रदेशों में पहले चलवासी चरवाहे पशुचारण का कार्य करते थे और बाद में यहाँ स्थायी कृषि होने लगी। इन प्रदेशों में वार्षिक वर्षा 30 से 60 सेमी होती है। जिस वर्ष वर्षा कम होती है उस वर्ष फसल को हानि पहुँचती है। यह कृषि उन्नीसवीं शताब्दी के आरम्भ में शुरू हुई।

        इस कृषि का विकास कृषि-यन्त्रों तथा महाद्वीपीय रेलमार्गों के विकसित हो जाने से हुआ है। विस्तृत कृषि मुख्यतः रूस तथा यूक्रेन के स्टेपीज (Steppes), कनाडा तथा संयुक्त राज्य अमेरिका के प्रेयरीज (Prairies), अर्जेण्टीना के पम्पास (Pampas of Argentina) तथा आस्ट्रेलिया के डाउन्स (Downs of Australia) में की जाती है।

       विस्तृत कृषि के मुख्य लक्षण निम्नलिखित है:

(i) खेत बहुत ही बड़े आकार के होते हैं। इनका क्षेत्रफल प्रायः 240 से 1600 हेक्टेअर तक होता है।

(ii) बस्तियाँ बहुत छोटी तथा एक-दूसरे से दूर स्थित होती हैं। 

(iii) खेत तैयार करने से फसल काटने तक का सारा काम मशीनों द्वारा किया जाता है। ट्रैक्टर, ड्रिल, कम्बाइन, हार्वेस्टर, थ्रेशर और विनोअर मुख्य कृषि यंत्र हैं।

(iv) मुख्य फसल गेहूँ हैं। अन्य फसलें हैं- जौ, जई, राई, फ्लैक्स तथा तिलहन।

(v) खाद्यान्नों को सुरक्षित रखने के लिए बड़े-बड़े गोदाम बनाए जाते हैं जिन्हें साइलो या एलीवेटर्स कहते हैं। 

(vi) यान्त्रिक कृषि होने के कारण श्रमिकों की संख्या कम होती है।

(vii) प्रति हेक्टेअर उपज कम तथा प्रति-व्यक्ति उपज अधिक होती है।

      जनसंख्या में निरन्तर वृद्धि के कारण विस्तृत कृषि का क्षेत्र घटता जा रहा है। पूर्वी संयुक्त राज्य अमेरिका, ब्यूनस आयर्स, आस्ट्रेलिया के तटीय भागों तथा यूक्रेन जैसे घनी जनसंख्या वाले क्षेत्रों से लोग विस्तृत कृषि के क्षेत्रों में आकर बसने लगे हैं जिससे कृषि का क्षेत्र कम होता जा रहा है। इस प्रकार 19वीं शताब्दी में शुरू हुई यह कृषि अब बहुत ही सीमित क्षेत्रों में की जाती है।

4. वाणिज्य कृषि (Commercial Farming):-

      इस कृषि में फसलों को बेचने के लिए पैदा किया जाता है। अतः उत्पादन में फसल विशिष्टीकरण इसकी मुख्य विशेषता है। विश्व में यह दो रूपों में पाई जाती है-

(i) मध्य अक्षांशों में वाणिज्य अन्न कृषि तथा

(ii) उष्ण कटिबन्ध में रोपण कृषि।

(i) मध्य अक्षांशों में वाणिज्य अन्न कृषि:-

        मध्य अक्षांशों में गेहूँ के उत्पादन में विशिष्टीकरण इस कृषि का मुख्य उदाहरण है। उत्तरी अमेरिका के प्रेयरी क्षेत्र, यूक्रेन क्षेत्र, पश्चिमी यूरोप, अर्जेण्टीना, आस्ट्रेलिया के दक्षिणी भागों तथा भारत के पंजाब, हरियाणा व पश्चिमी उत्तर प्रदेश में इस प्रकार की कृषि की जाती है।

      इस कृषि में अधिकांश कार्य मशीनों से किया जाता है। संयुक्त राज्य अमेरिका में गेहूँ के कृषि क्षेत्रों में कृषक बाहर से आते जाते हैं। इनके लिए साइडवाक कृषक तथा सूटकेस कृषक शब्दों का प्रयोग किया जाता है। भारत में वाणिज्य कृषि बड़े पैमाने पर तो नहीं, परन्तु किसी हद तक की जाती है। यहाँ पर मशीनीकरण भी सीमित ही हुआ है।

(ii) उष्ण कटिबन्ध में रोपण कृषि:-

       रोपण कृषि का विकास उष्ण कटिबन्धीय क्षेत्रों में उपनिवेश काल में यूरोपीय देशों द्वारा किया गया। इसका मुख्य उद्देश्य यूरोपीय देशों को वे कृषि उपजें उपलब्ध कराना था जो केवल उष्ण कटिबन्धीय जलवायु में ही होती हैं। अतः यह एक व्यापारिक कृषि बन गई जिसमें फसलों का विक्रय किया जाता है। भारत में असम व दार्जिलिंग तथा श्रीलंका के चाय बागान, मलेशिया के रवर बागान, ब्राजील के कॉफी बागान इस कृषि के मुख्य उदाहरण हैं।

       प्रारम्भ में पूँजी निवेश उपनिवेशी देशों द्वारा किया गया था। बागानों का प्रबन्ध भी उपनिवेशी देशों के हाथों में ही था, परन्तु बड़े पैमाने पर श्रम स्थानीय मजदूरों या बाहर से लाए गए भाड़े या बन्धुआ मजदूरों द्वारा उपलब्ध कराया गया। इस कृषि में उत्पाद को भी बागान पर ही संसाधित किया जाता है। क्योंकि रोपण कृषि की उपजें मुख्यतः निर्यात के लिए ही होती हैं इसलिए इस कृषि के विकास के लिए सस्ते परिवहन का होना अति आवश्यक है। यही कारण है कि विश्व की अधिकांश रोपण कृषि तटीय भागों में विकसित हुई है या वह सस्ते परिवहन द्वारा तट से जुड़ी हुई है।

      रोपण कृषि के बागान प्रायः बड़े आकार के होते हैं और कम जनसंख्या वाले क्षेत्रों में पनपते हैं। सामान्यतः इनका आकार 4 से 40 हेक्टेअर तक होता है, परन्तु कहीं-कहीं ये बागान बहुत बड़े होते हैं। उदाहरणतः लाइबेरिया में हरबल नामक स्थान पर फायस्टोन कम्पनी का रबर का बागान 54.4 हजार हेक्टेअर भूमि पर फैला हुआ है।

      उपनिवेशवाद की समाप्ति पर उपनिवेश स्वतन्त्र हो गए और रोपण कृषि की विशेषताओं में परिवर्तन आ गया। उदाहरणतः बागानों का स्वामित्व तथा प्रबन्ध उपनिवेशी देशों से हटकर स्थानीय अधिकारियों के हाथों में आ गया। अब ये बागान अपनी उपजों को निर्यात करने के साथ-साथ स्थानीय बाजारों में भी बेचते हैं।

5. मिश्रित कृषि अथवा व्यापारिक फसल एवं पशुपालन (Mixed Farming or Commercial Crops and Livestock):-

        इस कृषि में फसलें उगाने तथा पशुओं को पालने का कार्य एक साथ किया जाता है। यह मिश्रित बुआई से भिन्न है। मिश्रित बुआई में एक ही खेत में एक ही समय पर कई फसलें बोई जाती हैं जबकि मिश्रित कृषि में फसलें उगाने के साथ-साथ पशुपालन का कार्य भी किया जाता है। मिश्रित कृषि यूरोप में आयरलैण्ड से रूस तक, उत्तरी अमेरिका के पूर्वी भाग, अर्जेण्टीना के पम्पास, दक्षिण-पूर्वी आस्ट्रेलिया, दक्षिणी अफ्रीका और न्यूजीलैण्ड में की जाती है।

      संयुक्त राज्य अमेरिका का मिश्रित कृषि क्षेत्र मक्के की पेटी है। मक्का खिलाकर पशुओं को मोटा किया जाता है। इसके अतिरिक्त जई, गेहूँ तथा घास भी पैदा की जाती है। अब यहाँ पर सोयाबीन की फसल भी पैदा की जाने लगी है। यह एक प्रोटीनयुक्त फसल है जिसका विस्तार दिन-प्रतिदिन बढ़ता जा रहा है। यह कृषि अधिकतर बड़े-बड़े नगरों के आस-पास की जाती है जिससे इसकी उपजों की बिक्री में कोई कठिनाई नहीं होती। उत्तम कृषि विधियाँ, उत्तम परिवहन, शहरी बाजार की निकटता तथा विश्वसनीय वर्षा से इस कृषि को बड़ी सहायता मिलती है।

6. डेरी फार्मिंग (Dairy Farming):-

      डेरी फार्मिंग कृषि का वह विशिष्ट ढंग है जिसमें दूध देने वाले पशुओं के प्रजनन, पशुचारण और नस्ल सुधारने की ओर विशेष ध्यान दिया जाता है। दुधारू पशुओं, विशेषतया गायों को पाला जाता है। दूध तथा दुग्ध पदार्थ, जैसे- मक्खन, पनीर, क्रीम, संघनित दूध और पाउडर दूध इस कृषि के मुख्य उत्पाद हैं।

डेरी फार्मिंग के क्षेत्र:-

     डेरी फार्मिंग यूरोप (ब्रिटेन, आयरलैण्ड, डेनमार्क, नीदरलैण्ड्स, बेल्जियम, नार्वे, स्वीडन, स्विटजरलैण्ड, फ्रांस, यूक्रेन, लाटविया, लिथुआनिया तथा एस्टोनिया), उत्तरी अमेरिका की विशाल झीलों का क्षेत्र, दक्षिण-पूर्वी आस्ट्रेलिया तथा न्यूजीलैण्ड में विकसित है।

     भारत में डेरी कृषि का विकास सहकारी समितियों द्वारा किया जाता है। | गुजरात की अमूल डेयरी इसका सबसे अच्छा उदाहरण है। अधिकांश राज्यों में डेयरी विकास बोर्ड बनाए गए हैं। झांसी में चारा शोध संस्थान तथा करनाल में डेरी शोध संस्थान का भी गठन किया गया है। भारत में अधिकांश दूध गायों से नहीं बल्कि भैंसों से प्राप्त किया जाता है।

डेरी फार्मिंग की विशेषताएँ

(i) दुधारू पशुओं को पालना डेरी फार्मिंग की सबसे बड़ी विशेषता है। पशुओं के स्वास्थ्य और उनकी नस्ल पर विशेष ध्यान दिया जाता है। होलिस्टीन, रेनडेन, जर्सी, गोर्नसे तथा आयर शायर जैसी उच्चकोटि की नस्लों वाली गायें पाली जाती हैं।

(ii) पशुओं की देखभाल वैज्ञानिक तरीकों से की जाती है।

(iii) दूध दोहने और उसे संसाधित करने की क्रियाओं को मशीनों द्वारा किया जाता है।

(iv) डेरी फार्मिंग घने औद्योगिक नगरों की मांग पर आश्रित है इसलिए अधिकांश डेरी फार्मिंग शहरी क्षेत्रों के निकट ही पनपा है।

(v) दूध और दुग्ध पदार्थों को मांग के क्षेत्रों तक पहुंचाने के लिए तीव्र यातायात का प्रयोग किया जाता है।

(vi) नियोजित आवास, मशीन, चारे की मिलों, प्रशीतन तथा संचयन के लिए अधिक पूँजी की आवश्यकता होती है।

7. ट्रक कृषि (Truck Farming):-

     यह एक विशेष प्रकार की कृषि है जिसमें साग-सब्जियों की कृषि की जाती है। इन वस्तुओं को प्रतिदिन ट्रकों में भरकर निकटवर्ती नगरीय बाजारों में ले जाकर बेचा जाता है। बाजार से कृषि क्षेत्र की दूरी इस बात पर निर्भर करती है कि ट्रक द्वारा रात-भर चलने में कितनी दूरी तय होती है। इसीलिए इस कृषि का नाम ट्रक कृषि रखा गया है।

प्रदेश- ट्रक कृषि एवं उद्यान कृषि मुख्यतः उत्तर-पश्चिमी यूरोप (ब्रिटेन, डेनमार्क, बेल्जियम, नीदरलैण्ड्स, जर्मनी और फ्रांस), संयुक्त राज्य अमेरिका (उत्तर-पूर्वी भाग, केलीफोर्निया, फ्लोरिडा प्रायद्वीप तथा पूर्वी तटीय भाग) एवं कनाडा के पूर्वी भाग में की जाती है। इन प्रदेशों के शहरी तथा औद्योगिक क्षेत्रों में ताजी सब्जियों की भारी मांग रहती है और ये वस्तुएँ इन प्रदेशों को ट्रक कृषि से ट्रकों द्वारा प्राप्त होती हैं। अतः इस कृषि का नगरीकरण से गहरा सम्बन्ध है।

      भारत में वातावरण अनुकूल तथा वर्धनकाल लम्बा होने के कारण लगभग सभी भागों में सब्जियाँ उगाई जाती हैं। यहां पर अधिकांश जनसंख्या शाकाहारी है और मांस का मूल्य अधिक होने के कारण सब्जियों की मांग अधिक रहती है। इसलिए इस कृषि पर अधिक बल दिया जाता है।

विशेषताएँ- ट्रक कृषि एवं उद्यान कृषि की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं:

(i) ट्रक एवं उद्यान कृषि के खेत छोटे होते हैं।

(ii) परिवहन की सुविधा अच्छी रहती है।

(iii) गहन कृषि की जाती है।

(iv) सिंचाई की अच्छी व्यवस्था होती है।

(v) खादों का प्रयोग बड़ी मात्रा में किया जाता है।

(vi) अधिकांश कार्य हाथों से किया जाता है।

(vii) पेड़ों तथा पौधों को बीमारियों से बचाने के लिए दवाइयों का प्रयोग बड़ी मात्रा में किया जाता है।

8. उद्यान कृषि (Horticulture):-

        यह लगभग ट्रक कृषि जैसी ही है, अन्तर केवल इतना है कि इसमें साग-सब्जी के स्थान पर फलों तथा फूलों की कृषि की जाती है। फलों और फूलों की मांग नगरों में बहुत होती है।

फल-

       नगरीय क्षेत्रों में फलों की मांग बहुत होती है जिससे कृषक को पर्याप्त आय हो जाती है। विभिन्न क्षेत्रों में विभिन्न प्रकार के फल उगाए जाते हैं। उष्ण कटिबन्धीय क्षेत्रों में केला, आम, जामुन, नारियल, काजू, आदि। शीतोष्ण कटिबन्धीय क्षेत्रों में सेब, आडू, अखरोट, नाशपाती एवं रसबेरी, आदि तथा भूमध्यसागरीय देशों में खट्टे फल, जैसे- सन्तरा, मौसमी, नीबू, आदि मुख्य फल हैं।

फूल-

      फलों की भांति फूलों की भी नगरीय क्षेत्रों में काफी मांग रहती है और फूलों की बिक्री से कृषक को काफी धन प्राप्त होता है। फूलों का अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार भी होता है। जार्जिया तथा आर्मीनिया में पैदा किए गए गुलाब के फूल मास्को तथा रूस के अन्य नगरों में भेजे जाते हैं।

        शीत ऋतु में इथोपिया प्याज के फूलों का निर्यात यूरोपीय देशों को करता है। नीदरलैण्ड्स में ट्यूलिप की कृषि विशेष रूप से की जाती है। यहाँ से इनका निर्यात वायुयानों द्वारा यूरोप तथा अमेरिका के बड़े-बड़े नगरों को किया जाता है। भारत में गुलाब तथा गेंदे के फूल अधिक पैदा किए जाते हैं।

       अजमेर के निकट पुष्कर घाटी गुलाब की कृषि के लिए विशेष रूप से प्रसिद्ध है। दिल्ली के आस-पास के क्षेत्रों में भी फूलों की खेती की जाती है। कश्मीर घाटी में विभिन्न प्रकार के फूल उगाए जाते हैं। यहाँ कटेवा भूमि पर केसर की खेती होती है। कन्नौज, जौनपु तथा लखनऊ में फूलों प आधारित सुगन्धित तेल बनाए जाते हैं।

प्रश्न प्रारूप

विश्व में प्रचलित प्रमुख कृषि पद्धतियों (Agriculture Systems) का वर्णन करें।

22. Multiple Nuclei Theory (बहुनाभिक सिद्धांत)

22. Multiple Nuclei Theory (बहुनाभिक सिद्धांत)



Multiple Nuclei       

       यद्यपि संकेन्द्रित क्षेत्र और खण्ड क्षेत्र सिद्धान्त को अपनी आकर्षक सरलता का लाभ मिला, किन्तु अधिकांश नगरों की संरचना में इतनी अधिक जटिलता एवं विविधता पाई जाती है कि उसका सरलीकरण या सामान्यीकरण नहीं किया जा सकता है। 1945 में सी. डी. हैरिस और ई. एल. उल्मान ने नगरीय संरचना के विविध प्रारूपों पर लागू होने वाले बहुनाभिक सिद्धान्त का प्रतिपादन किया।

         इस सिद्धान्त के अनुसार नगर का भूमि उपयोग प्रतिरूप एक ही केन्द्र या नाभि के चारों ओर विकसित न होकर प्रायः कई अलग-अलग केन्द्रों के चारों ओर विकसित होता है। इस प्रकार के विकास से नगर की संरचना कोशिकीय (Cellular) हो जाती है। इस कोशिकीय संरचना का निर्धारण नगर के अवस्थान (Site) सम्बन्धी विलक्षण कारकों और ऐतिहासिक कारकों द्वारा होता है। हैरिस एवं उल्मान के अनुसार भिन्न-भिन्न केन्द्र या नाभिक कुछ नगरों में उत्पत्ति के समय ही अस्तित्व में आ जाते हैं जबकि कुछ नगरों में इनका विकास नगर की वृद्धि के साथ-साथ होता रहता है। नगरों में भिन्न-भिन्न केन्द्रों या नाभि तथा उन पर निर्भर भूमि उपयोग कटिबन्धों का बनना निम्नलिखित चार कारकों के संयोजन का परिणाम होता है:

(i) कुछ मानवीय क्रियाकलापों को विशिष्ट सुविधाओं की आवश्यकता होती है, जैसे- खुदरा व्यापार का क्षेत्र नगर में परिवहन की दृष्टि से सर्वाधिक गम्य स्थान के पास, बन्दरगाह अनुकूल सागरीय तट पर तथा विनिर्माण उद्योग विस्तृत भू-भाग और जल, स्थल तथा रेल मार्गों से संयोजित होने जैसी सुविधाओं पर ही विकसित होते हैं।

(ii) कुछ क्रियाएँ साथ-साथ पाई जाती हैं, क्योंकि उन्हें सम्बद्धता से लाभ प्राप्त होता है। जैसे, वित्तीय संस्थान एवं कार्यालयों के क्षेत्र यातायात एवं संचार सुविधाओं की उपलब्धता पर निर्भर होते हैं।

(iii) कुछ भिन्न प्रकृति की क्रियाएं एक-दूसरे के लिए हानिकारक होती हैं। इस दृष्टि से औद्योगिक क्षेत्र एवं उच्च श्रेणी आवासीय क्षेत्र का विरोधाभास सर्वविदित है। खुदरा व्यापार क्षेत्र में पैदल चलने वालों, दो पहिया वाहनों और कारों का भारी जमाव पाया जाता है, जो कि थोक व्यापार क्षेत्र के लिए आवश्यक रेल मार्ग सुविधाओं, विस्तृत स्थान एवं भारी सामान को लादने एवं उतारने जैसी क्रियाओं के प्रतिकूल है।

(iv) कुछ क्रियाएँ सर्वाधिक वांछनीय स्थलों को ऊँचा किराया या मूल्य देने में असमर्थ होती हैं। यह कारक इन क्रियाओं के अन्यत्र संयोजन का कार्य करता है। जैसे, थोक व्यापार एवं भण्डारण जैसी क्रियाओं के लिए अधिक कमरों या बहुत अधिक स्थान की आवश्यकता होती है, जो कि केन्द्र के निकट सम्भव नहीं है। इसी प्रकार निम्न आय वर्ग के आवास ऊंचे भूमि मूल्यों के कारण उच्च आय वर्ग के आवासीय क्षेत्र में स्थापित नहीं होते हैं।

        नाभिकों या केन्द्रों की संख्या विभिन्न नगरों में भिन्न-भिन्न होती है। इनकी संख्या ऐतिहासिक विकास तथा अवस्थिति शक्तियों का परिणाम होती है। नगर जितना बड़ा होता है, उसमें उतने ही अधिक एवं विशिष्ट केन्द्र मिलते हैं। हैरिस एवं उल्मान के अनुसार नगरों में केन्द्रों के चारों ओर विकसित होने वाले क्षेत्र निम्नलिखित हैं:

1. केन्द्रीय व्यापार क्षेत्र (Central Business District)

2. थोक व्यापार एवं हल्का विनिर्माण औद्योगिक क्षेत्र (Wholesale and Light Manufacturing)

3. भारी उद्योग क्षेत्र (Heavy Manufacturing)

4. उपनगर एवं अनुषंगी नगर (Suburb and Satellite)

5. लघु नाभि केन्द्र (Minor Nuclei)

6. आवासीय क्षेत्र (Residential)

7. भारी व्यापारिक पेटी (Heavy Business District)

8. रिहाइशी उपनगर (Residential Suburb)

9. औद्योगिक उपनगर (Industrial Suburb)

1. केन्द्रीय व्यापार क्षेत्र:-

       यह क्षेत्र अन्तरानगरीय यातायात सुविधाओं के केन्द्र में स्थित होता है। यह नगर के विभिन्न भागों से यातायात द्वारा जुड़ा होता है और नगर के सभी भागों से गम्य होता है। यहाँ भूमि का मूल्य सर्वाधिक होता है। डिपार्टमेण्टल स्टोर, वेरायटी स्टोर, रेडीमेड वस्त्र स्टोर, सर्वाधिक खुदरा व्यापार एवं सर्वाधिक ग्राहक संख्या इसकी प्रमुख विशेषताएँ हैं।

      छोटे नगरों में वित्तीय संस्थान और कार्यालय भवन भी खुदरा व्यापार की दुकानों के साथ मिले जुले रूप में मिलते हैं जबकि बड़े नगरों में इनका क्षेत्र खुदरा क्षेत्र के पास, किन्तु अलग स्थित होता है। अधिकांश बड़े नगरों की विषम वृद्धि के कारण केन्द्रीय व्यापार क्षेत्र अब सामान्यतः नगरों के क्षेत्रीय केन्द्र में स्थित न होकर वास्तव में किसी एक किनारे के पास मिलता है।

2. थोक व्यापार एवं हल्का विनिर्माण औद्योगिक क्षेत्र:-

      थोक व्यापार क्षेत्र प्रायः केन्द्रीय व्यापार क्षेत्र के निकट (किन्तु उसके चारों ओर नहीं) यातायात मार्गों के सहारे सहारे स्थित होता है। यद्यपि इसको कुछ आधार स्वयं नगर से प्राप्त होता है, किन्तु यह प्रमुख रूप से पड़ोसी क्षेत्रों को सेवाएँ प्रदान करता है। अनेक प्रकार के हल्के विनिर्माण उद्योगों के विशिष्ट भवनों की आवश्यकता नहीं होती है। इन उद्योगों को तो अच्छे रेल एवं सड़क यातायात सम्पर्क, बड़े भवनों की उपलब्धि तथा स्वयं नगर के बाजार एवं श्रम से निकटता जैसी सुविधाएँ इन्हें आकर्षित करती हैं।

3. भारी उद्योग क्षेत्र:-

       यह क्षेत्र नगर के वर्तमान या पूर्ववर्ती बाह्य किनारों के निकट स्थित होता है। भारी उद्योगों को भूमि के बड़े भाग तथा अच्छी रेल, सड़क एवं जल यातायात सुविधाओं की आवश्यकता होती है। जो कि उन्हें नगर के केन्द्रीय भाग की अपेक्षा सीमावर्ती भाग में आसानी से उपलब्ध होती है। इसके अतिरिक्त भारी मशीनों से उत्पन्न ध्वनि प्रदूषण, उद्योगों द्वारा छोड़े जाने वाले हानिकारक अपशिष्टों और जान-माल के अन्य खतरों की वजह से भारी उद्योगों को नगर केन्द्र से दूर स्थित होने के लिए बाध्य करते हैं। यही कारण है कि नगरों की बाहरी सीमा पर भारी उद्योगों का स्थानीयकरण मिलता है।

4. उपनगर एवं अनुषंगी नगर:-

       उपनगर चाहे वह आवासीय हो या औद्योगिक, अधिकांश बड़े नगरों की प्रमुख विशेषता है। उपनगर एवं अनुषंगी नगर भी नगरों के विकास में केन्द्रों या नाभि के रूप में कार्य करते हैं। मोटर यातायात तथा उपनगरीय रेल सेवाओं के विकास ने उपनगरीकरण की प्रक्रिया को प्रोत्साहित किया है। अनुषंगी नगर केन्द्रीय नगर से कई किमी दूर तथा सामान्य रूप से दैनिक अभिगमन की मात्रा भी कम होने के कारण उपनगर से भिन्न होते हैं। अनुषंगी नगरों की आर्थिक क्रियाएं उनकी केन्द्रीय नगर से निकटता प्रदर्शित करती है।

5. लघु नाभि केन्द्र:-

         नगर के विभिन्न भागों में छोटे-छोटे केन्द्र पाए जाते हैं जैसे, सांस्कृतिक केन्द्र, बाह्यवर्ती व्यापार केन्द्र तथा छोटे औद्योगिक केन्द्र, आदि। एक विश्वविद्यालय भी किसी नगर में स्वतन्त्र रूप से नाभि या केन्द्र के रूप में कार्य कर सकता है। पार्क एवं अन्य मनोरंजन के क्षेत्र भी, जो कि बेकार पड़ी हुई भूमि को अधिग्रहीत किए हुए होते हैं, कभी-कभी उच्च श्रेणी के आवासीय क्षेत्र के केंद्र के रूप में विकसित हो जाते हैं। बाह्यवर्ती व्यापारिक क्षेत्र भी कालान्तर में प्रमुख केन्द्र बन जाते हैं, किन्तु छोटी संस्थाओं और हल्के विनिर्माण उद्योगों की व्यक्तिगत इकाइयों जैसे, बेकरी में ऐसी क्षमता नहीं होती है।

6. आवासीय क्षेत्र:-

        सामान्यतः उच्च श्रेणी के आवास अच्छा जल प्रवाह रखने वाले ऊंचे स्थलों पर तथा शोर, धुआं, दुर्गन्ध, रेलमार्ग, आदि से दूर स्थापित होते हैं। निम्न श्रेणी के आवास प्रायः कारखानों तथा रेलमार्गों के निकट स्थापित होते हैं। नगर के अधिक पुराने आवासीय क्षेत्रों जहाँ कि अधिकांश भवनों का ढाँचा जर्जर अवस्था में होता है, में भी निम्न वर्ग के लोगों के आवास होते हैं। यह वर्ग नगर के अन्य भागों में अधिक किराया देने में असमर्थ होता है। उच्च और निम्न श्रेणी के आवासीय क्षेत्रों के बीच में मध्यम श्रेणी के लोगों का रिहायशी क्षेत्र बन जाता है।

निष्कर्ष:

        यद्यपि वर्तमान समय में कोई भी एक सिद्धान्त नगरों पर पूर्णतया लागू नहीं होता है, किन्तु अधिकांश नगरों में तीनों ही प्रकार के यथा, संकेन्द्रित वलय, खण्ड क्षेत्र और बहुनाभिक क्षेत्र का कोई न कोई रूप अवश्य देखने को मिलता है।

     वस्तुतः एक नगर के विकास के विभिन्न कालों में कार्यरत विभिन्न शक्तियों के कारण ही एक नगर में उपरोक्त वर्णित तीनों सिद्धान्तों का सामंजस्य देखने को मिलता है।

      नगर की प्रारम्भिक वृद्धि केन्द्रीय क्षेत्र और नाभि केन्द्रों के चारों ओर होती है। कालान्तर में होने वाली वृद्धि परिवहन मार्गों के सहारे होती है। यह वृद्धि खण्ड प्रारूप को जन्म देती है। अन्त में भूमि मूल्यों के अनुसार भूमि का उपयोग जो नग के केन्द्र से दूरी के अनुसा निर्धारित होता है, नगरीय भूमि उपयोग को संकेन्द्रित प्रारूप प्रदान करता है।

प्रश्न प्रारूप

1. नगरीय आकारिकी के सम्बन्ध में प्रतिपादित बहुनाभिक सिद्धांत (Multiple Nuclei Theory) का वर्णन कीजिए।

21. Sector Theory (खंड सिद्धांत)

21. Sector Theory (खंड सिद्धांत)



      Sector Theory

        1939 में अमेरिकी नगरीय अर्थशास्त्री होमर हॉयट ने संयुक्त राज्य अमेरिका के कुल 142 नगरों के भूमि उपयोग आंकड़ों के आधार पर नगरों की आन्तरिक संरचना एवं विकास के सम्बन्ध में खण्ड सिद्धान्त प्रस्तुत किया। हॉयट ने बर्गेस के संकेन्द्रित क्षेत्र सिद्धान्त में रही कुछ कमियों को दूर करते हुए अपने इस सिद्धान्त का प्रतिपादन किया है। इस सिद्धान्त के अनुसार नगरीय भूमि उपयोग का प्रारूप परिवहन मार्गों के विन्यास के अनुरूप विकसित होता है।

       नगर के केन्द्र से विभिन्न दिशाओं में जाने वाले परिवहन मार्गों के सहारे भूमि उपयोग और किराया-मूल्यों का प्रारूप खण्डीय रूप (Sectoral Pattern) में विकसित होता है। विकसित हुआ यह खण्ड प्रारूप पुनः नगरीय भूमि उपयोग प्रारूप को प्रभावित करता है।

       हॉयट के अनुसार नगर के एक खण्ड में विद्यमान सर्वाधिक किराया वाले आवासीय क्षेत्र का विस्तार उसी खण्ड में बाह्य भाग की ओर होता है। इसी प्रकार निम्न किराया वाले आवासीय क्षेत्रों का विकास बाह्य भाग की ओर होता है, लेकिन विभिन्न दिशाओं में हो सकता है।

       हॉयट के अनुसार भूमि उपयोग की दृष्टि से नगर कई खण्डों में बंटा होता है, जो कि नगर के केन्द्र से बाहर की ओर फैले रहते हैं। नगर केन्द्र के निकट जिस प्रकार का भूमि उपयोग मिलता है, बाहर की ओर भी उसी दिशा में उसी प्रकार का भूमि उपयोग मिलता है, जैसे नगर के पूर्वी भाग में उच्च आवासीय क्षेत्र नगर के पूर्वी भाग की बाह्य सीमा की ओर ही बढ़ेगा।

       हॉयट के अनुसार नगर में पांच प्रकार के खण्ड पाए जाते हैं:-

1. केन्द्रीय व्यापारिक क्षेत्र,

2. थोक व्यापार एवं हल्का विनिर्माण क्षेत्र,

3. निम्न श्रेणी आवासीय क्षेत्र,

4. मध्यम श्रेणी आवासीय क्षेत्र,

5. उच्च श्रेणी आवासीय क्षेत्र।

       केन्द्रीय व्यापारिक क्षेत्र की स्थिति संकेन्द्रित क्षेत्र सिद्धान्त की भांति ही नगर के केन्द्र में होती है। थोक व्यापार एवं हल्का विनिर्माण क्षेत्र केन्द्रीय व्यापारिक क्षेत्र से प्रारम्भ होकर दो विभिन्न खण्डों में परिधि की सीमा तक फैला हुआ होता है। निम्न श्रेणी के आवासीय क्षेत्र भी विनिर्माण उद्योग खण्ड के सन्निकट दोनों ओर फैले त्रिज्या खण्डों में एवं केन्द्रीय व्यापारिक क्षेत्र के एक ओर सीमा पर पाए जाते हैं।

      मध्यम वर्ग के आवासीय क्षेत्र उच्च श्रेणी के आवासीय खण्ड के सहारे दोनों तरफ तथा निम्न श्रेणी आवासीय खण्ड के बाहर की ओर पाए जाते हैं। उच्च श्रेणी आवासीय क्षेत्र एक या एक से अधिक खण्डों की बाहर की सीमा पर बसा मिलता है। आर्थिक स्तर के अनुसार विभिन्न वर्गों के आवासीय क्षेत्र स्थिर न होकर परिवर्तनशील होते हैं, किन्तु सामान्यतः उसी खण्ड की बाह्य सीमाओं की ओर बढ़ते हैं।

      हॉयट के अनुसार श्रेणी के आवासीय क्षेत्रों के बढ़ने की प्रवृत्ति निम्नलिखित भागों में पाई जाती है:

(i) अपने उत्पत्ति बिन्दु से प्रमुख मार्गों के सहारे या भवनों की अन्य विद्यमान नाभि या व्यापारिक केन्द्रों की ओर,

(ii) बाढ़ से सुरक्षित ऊंचे धरातल या झील, खाड़ी, नदी और महासागरीय सीमान्त की ओर,

(iii) नगर के उस क्षेत्र की ओर जो खुला हुआ हो,

(iv) सामुदायिक नेताओं और विशिष्ट व्यक्तियों के घरों की ओर,

(v) तीव्रतम यातायात मार्गों के सहारे।

      हॉयट के अनुसार सुसज्जित उच्च आवासीय फ्लेट वाले क्षेत्र, पुराने आवासीय क्षेत्र के व्यापारिक केन्द्र के निकट भी स्थापित होने की प्रवृत्ति रखते हैं। साथ ही जायदाद एवं भूमि सम्पदा व्यवसायी भी उच्च श्रेणी आवासीय क्षेत्रों की वृद्धि की दिशा को मोड़ सकते हैं।

        उच्च किराया आवासीय क्षेत्र हॉयट के सिद्धान्त का आधार है जिसे हॉयट ने 30 अमेरिकी नगरों के उच्च आवासीय क्षेत्रों के आरेखों द्वारा पुष्ट किया है। उच्च किराया आवासीय क्षेत्र नगरीय भूमि उपयोग संरचना के आकार निर्धारण में मुख्य भूमिका निभाता है। हॉयट ने अपने सिद्धान्त में संकेन्द्रित सिद्धान्त के प्रति उठाई गई आपत्तियों जैसे, उद्योगों की स्थिति एवं यातायात मार्गों पर पूरा ध्यान दिया है साथ ही नगर के भावी विकास एवं विस्तार का भी ध्यान रखा है।

        डब्ल्यू. फायरे ने बोस्टन के भूमि उपयोग का अध्ययन करके खण्ड सिद्धान्त में विद्यमान कमियों को उजागर किया है। इनका कहना है कि धरातलीय दशाएँ और जलीय भाग खण्ड प्रतिरूप को विकृत कर सकते हैं तथा भूमि उपयोग को निर्धारित करते समय सिद्धान्त में सामाजिक एवं सांस्कृतिक कारकों के योगदान को पर्याप्त महत्व नहीं दिया गया है।

        फायरे ने बोस्टन के बेकोनहिल उच्च श्रेणी आवासीय क्षेत्र का उदाहरण देकर बताया है कि इसके विकास का कारण इसकी अवस्थिति नहीं है, अपितु सामाजिक काण है। नगरों की सम्पूर्ण संरचना के स्थान प हॉयट ने अपने सिद्धान्त को मात्र आवासीय वृद्धि जैसे विशिष्ट सन्दर्भ में ही लागू किया है। स्वयं हॉयट ने अपने सिद्धान्त का पुनर्मूल्यांकन आधुनिक यातायात के साधनों एवं अन्य परिवर्तनों के सन्दर्भ में 1964 में किया।

प्रश्न प्रारूप

नगरों की आन्तरिक संरचना एवं विकास के संबंध में प्रतिपादित खंड सिद्धांत (Sector Theory) का समालोचनात्मक वर्णन कीजिए।

20. Concentric Zone Theory (सकेंद्रित पेटी सिद्धांत)

20.  Concentric Zone Theory

(सकेंद्रित पेटी सिद्धांत)


        Concentric Zone Theory

        नगरों की सामान्य संरचना अथवा आकारिकी के सम्बन्ध में सिद्धान्त का प्रतिपादन सर्वप्रथम ई. डब्ल्यू. बर्गेस ने 1927 में किया, जिसे संकेन्द्रित क्षेत्र सिद्धान्त के नाम से जाना जाता है। यह सिद्धान्त इस धारणा पर आधारित है कि एक नगर का विकास केन्द्र से बाहर की ओर संकेन्द्रित क्षेत्रों (पेटियों) की शृंखला बनाते हुए होता है। ये पेटियाँ नगर की वृद्धि के साथ-साथ बाहर की ओर खिसकती जाती है।

        यह सिद्धान्त आदर्श दशाओं में ही लागू होता है अन्यथा प्रतिक्रियात्मक कारकों जैसे, यातायात मार्गों और धरातलीय अवरोध (नदी, झील, समुद्र, हिमनद, खाइयां) के उपस्थित होने पर अपने मूल रूप में लागू नहीं होता है। इस प्रकार बर्गेस का यह सिद्धान्त एक आदर्श संकल्पना है। बर्गेस ने शिकागो का उदाहरण प्रस्तुत करते हुए नगर के संरचनात्मक विकास को निम्नलिखित पांच संकेन्द्रित क्षेत्र (पेटियों) द्वारा समझाया है।

1. केन्द्रीय व्यापार क्षेत्र (Central Business District)

2. संक्रमण क्षेत्र (Transition Zone)

3. कार्यशील लोगों के घरों का क्षेत्र (Zone of Workingmen’s Homes)

4. बेहतर आवासीय भवनों का क्षेत्र (Zone of Better Residences)

5. अभिगमनकर्ताओं का क्षेत्र (Commuter’s Zone)

1. केन्द्रीय व्यापार क्षेत्र:-

         नगर के केन्द्र में प्रथम पेटी के रूप में केन्द्रीय व्यापारिक क्षेत्र स्थित होता है। यह नगर का हृदय क्षेत्र होता है। यह नगर के वाणिज्य, व्यापार और यातायात का केन्द्र होता है। गगनचुम्बी इमारतें, प्रमुख शोरूम, एम्पोरियम, थिएटर, होटल, नाचघर, क्लब एवं वाणिज्यिक संस्थानों के कार्यालय इसी क्षेत्र में स्थित होते हैं। इसका अधिकांश भाग गैर-आवासीय कार्यों के लिए प्रयुक्त होता है।

      शिकागो में इस भाग को लूप (Loop), न्यूयार्क में डाउन टाउन (Down Town) तथा पिट्सबर्ग में गोल्डन टेम्पल (Golden Temple) कहते हैं। बर्गेस ने केन्द्रीय व्यापार क्षेत्र को भी दो भागों में बांटा है- पहला क्षेत्र केन्द्र में स्थित खुदरा व्यापार क्षेत्र है जो कि वृत्ताकार होता है, दूसरा इसके चारों ओर बाहर की ओर स्थित थोक व्यापार क्षेत्र होता है।

2. संक्रमण क्षेत्र:-

        यह क्षेत्र केन्द्रीय व्यापार क्षेत्र के चारों ओर फैला हुआ होता है। इसमें व्यापारिक, औद्योगिक और आवासीय उपयोग के क्षेत्र पाए जाते हैं अतः इसे संक्रमण क्षेत्र कहते हैं। इसके आन्तरिक भाग में व्यापारिक संस्थान एवं हल्के विनिर्माण उद्योग का क्षेत्र होता है, तो बाहर की ओर आवासीय क्षेत्र होता है। इसमें अधिकांश भवन पुराने, छोटे एवं गन्दे होते हैं तथा कुछ भागों में गन्दी बस्तियां (Slum) भी होती हैं।

      इस क्षेत्र में निवास करने वाले अधिकांश लोगों का सामाजिक स्तर निम्न होता है। यह क्षेत्र अधिकांशतः आप्रवासियों द्वारा आवासित होता है।

3. कार्यशील लोगों के घरों का क्षेत्र:-

          संक्रमण क्षेत्र को घेरे हुए कार्यशील लोगों के घरों का क्षेत्र होता है। इसमें औद्योगिक श्रमिकों की संख्या अधिक होती है। ये लोग संक्रमण क्षेत्र में तो रहना पसन्द नहीं करते हैं, लेकिन अपने कार्यस्थल की समीपता को ध्यान में रखते हुए इस क्षेत्र में रहते हैं अर्थात् इस क्षेत्र में रहने वाले अधिकांश लोग संक्रमण क्षेत्र से ही इस क्षेत्र में आते हैं। इस क्षेत्र में दूसरी पीढ़ी के आप्रवासी लोगों की संख्या अधिक पाई जाती है। शिकागो में यह क्षेत्र दो मंजिलें भवनों वाला है।

4. बेहतर आवासीय भवनों का क्षेत्र:-

       बेहतर आवासीय भवनों अथवा मध्यम या उच्च-मध्यम श्रेणी के लोगों का यह निवास क्षेत्र कार्यशील लोगों के घरों के क्षेत्र के चारों ओर फैला हुआ होता है। यह एक उपनगरीय क्षेत्र जैसा होता है। अधिकांश व्यक्ति व्यावसायिक कार्यों में संलग्न होते हैं। इस क्षेत्र में होटल, एक परिवार वाले आवासीय भवन तथा उच्च श्रेणी के फ्लेट वाले भवन मिलते हैं। सभी भवनों में पर्याप्त खुला क्षेत्र होता है।

5. अभिगमनकर्ताओं का क्षेत्र:-

       नगर की बाह्य सीमा पर तीव्र यातायात सुविधाओं के कारण उपनगरीय क्षेत्रों तथा अनुषंगी नगरों का एक क्षेत्र बन जाता है। इसमें उच्च श्रेणी के आवासीय क्षेत्र नियमित न होकर बिखरे हुए रूप में होते हैं। यह क्षेत्र नगर के आवासीय क्षेत्रों से हरित पट्टी (Green Belt) द्वारा पृथक् होता है। यह पूर्ववर्ती गाँवों का ही क्षेत्र होता है जो कार्यात्मक दृष्टि से नगरीय विशेषताओं से युक्त होता है। इस क्षेत्र में निवास करने वाले अधिकांश व्यक्ति दिन में काम करने के लिए केन्द्रीय व्यापार क्षेत्र में जाते हैं तथा रात्रि में पुनः यहां लौट आते हैं अतः इन्हें शयन नगर (Bed-Room Town) भी कहते हैं।

आलोचना

        बर्गेस के संकेन्द्रित क्षेत्र सिद्धान्त की कुछ सामान्य विशेषताएं शिकागो तथा कुछ अन्य नगरों (भारतीय नगरों में मुजफ्फरपुर का नगर संकेन्द्रित सिद्धान्त के अनुरूप है) में पाई गईं जो कि सिद्धान्त को पुष्ट करती हैं, किन्तु कई विद्वानों ने अधिकांश नगरों पर सिद्धान्त लागू न होने के कारण इसकी आलोचना की है। सिद्धान्त में रही कमियों को आलोचना के रूप में स्पष्ट किया गया है। ये कमियां निम्नलिखित हैं :

(i) एक मात्र संक्रमण क्षेत्र में स्थित कुछ हल्के उद्योगों के अतिरिक्त संकेन्द्रित सिद्धान्त में किसी भी क्षेत्र में उद्योगों एवं औद्योगिक पेटी की स्थिति नहीं बताई गई है। आशय यह है कि औद्योगिक क्रियाकलाप किसी भी पेटी में मिल सकते हैं।

(ii) केन्द्रीय व्यापारिक क्षेत्र गोलाकार न होकर प्रायः अनियमित या आयताकार अधिक होता है। आर. ई. डिकिन्सन ने अपने अध्ययन के आधार पर बताया है कि पेरिस, आदि नगर वृत्ताकार प्रतिरूप नहीं रखते हैं। इसी प्रकार थोक व्यापार क्षेत्र कुछ मात्रा में ही केन्द्रीय व्यापारिक क्षेत्र के किनारे पर मिलते हैं। अधिकांशतः इनकी स्थिति रेलमार्गों के निकट होती है।

(iii) नगर में खुदरा व्यापार का एकमात्र क्षेत्र ही नहीं होता है बल्कि नगर के विस्तार एवं तीव्र परिवहन साधनों के कारण अन्यत्र भी छोटे-छोटे व्यापारिक केन्द्र विकसित हो जाते हैं।

(iv) निम्न आय वर्ग के आवासीय क्षेत्र एवं गन्दी बस्तियां भी मात्र संक्रमण क्षेत्र में केन्द्रित न होकर नगर के विभिन्न भागों जैसे- औद्योगिक इकाइयों एवं रेलमार्गों के निकट अधिक पाई जाती हैं।

(v) भूमि उपयोग स्वरूप के निर्धारण में परिवहन मार्गों की भूमिका की सिद्धान्त में उपेक्षा की गई है। नगर से निकलने वाली मुख्य सड़कों के किनारे विकसित हुए व्यापार तथा उसके साथ बढ़ते हुए भूमि मूल्यों को बर्गेस ने अपने सिद्धान्त में कोई स्थान नहीं दिया है।

(vi) नगर के बहिवर्ती भाग में जनसंख्या का जमाव प्रमुख मार्गों के सहारे होता है फलतः नगर का आकार संकेन्द्रित न होकर तारानुमा होता है।

(vii) धरातलीय अवरोधों के कारण संकेन्द्रित क्षेत्रों के विकास में बाधा उत्पन्न होती है। बर्गेस का सिद्धान्त बीसवीं शताब्दी के तीसरे दशक की दशाओं पर आधारित है तथा आदर्श दशाओं के अन्तर्गत ही लागू होता है।

         अतः इस सिद्धान्त को अत्यधिक सामान्यीकृत रूप में ही देखा जाना चाहिए। तीव्र परिवहन साधनों का विकास एवं नगरों में पुनर्विकास जैसी योजनाओं के कारण भी नगरों के भूमि उपयोग स्वरूप में अत्यधिक परिवर्तन आया है। अत्यधिक आलोचना के उपरान्त भी नगरों की आन्तरिक संरचना के सम्बन्ध में प्रथम सिद्धान्त होने के कारण इसका अपना महत्व है।

प्रश्न प्रारूप 

1. नग की आकारिकी अथवा सामान्य संचना के संबंध में प्रतिपादित सकेंद्रित क्षेत्र/पेटी सिद्धांत (Concentric Zone Theory) की विवेचना कीजिये।

29. Minerals (खनिज) तथा खनिजों और चट्टानों के बीच अंतर

29. Minerals (खनिज)



खनिजMinerals

          खनिज निश्चित अनुपात में रासायनिक एवं भौतिक विशिष्टताओं के साथ निर्मित एक प्राकृतिक पदार्थ है। दूसरे शब्दों में, खनिज निश्चित रासायनिक संयोजन एवं विशिष्ट आंतरिक परमाणविक रचना वाले ठोस प्राकृतिक पदार्थ को कहा जाता है। संक्षेप में खान से निकाले गए पदार्थ को खनिज कहते है। जैसे- कोयला, पेट्रोलियम, सोना, लौह अयस्क, अभ्रक, जिप्सम इत्यादि।

        इस प्रकार पृथ्वी में खनिज घटक शामिल हैं जो या तो अकेले या अनेकों प्रकार के संयोजनों में मौजूद हैं जिन्हें यौगिक कहा जाता है। एक खनिज एक परमाणु या अणु से बना होता है जो प्राकृतिक रूप से पाया जाता है एवं इसकी एक विशिष्ट रासायनिक संरचना व संगठित परमाणु संरचना होती है।

खनिजों की विशेषताएँ-
⇒ खनिजों का वितरण असमान होता है। 
⇒ अधिक गुणवत्ता वाले खनिज कम तथा कम गुणवत्ता वाले खनिज अधिक मात्रा में पाये जाते हैं।
⇒ खनिज समाप्य संसाधन है। एक बार उपयोग करने के बाद पुन: उपयोग नहीं किया जा सकता है। 
खनिजों के प्रकार
         खनिज मुख्यतः दो प्रकार के होते हैं-
(i) धात्विक खनिज- 
          वैसे खनिज जिसमें धातु होती है, उसे धात्विक खनिज कहा जाता है। जैसे लौह अयस्क, ताँबा, निकेल, मैंगनीज आदि। पुनः इसे दो भागों में बाँटा जा सकता है
(क) लौहयुक्त खनिज- 
            जिन धात्विक खनिज में लोहे का अंश अधिक पाया जाता है उसे लौहयुक्त खनिज कहते हैं, जैसे- लौह अयस्क, निकेल, टंगस्टन।
(ख) अलौहयुक्त खनिज-
           जिन धात्विक खनिज में लोहे की मात्रा न्यून होती है या नहीं होती है, अलौहयुक्त खनिज कहलाते हैं। जैसे- सोना, चाँदी, शीशा, बॉक्साइट ताँबा।
(ii) अधात्विक खनिज-
            वैसे खनिज जिसमें धातु की  मात्रा  नहीं होती है उसे  अधात्विक खनिज कहते है। जैसे-चूना पत्थर, अभ्रक, जिप्सम आदि। अधात्विक खनिज भी दो प्रकार के होते हैं-
(क) कार्बनिक खनिज-
         इसमें जीवाश्म होते हैं, ये पृथ्वी में दबे प्राणी, पादप जीवों के परिवर्तन से बनते हैं। जैसे-कोयला, पेट्रोलियम इत्यादि।
(ख) अकार्बनिक खनिज-
           इसमें जीवाश्म नहीं होते हैं। जैसे- अभ्रक, ग्रेफाइट।
खनिजों के संरक्षण के उपाय:-
     खनिज क्षयशील एवं अनवीकरणीय संसाधन है। इनकी मात्रा सीमित है। इनका पुनर्निर्माण असंभव है। खनिज उद्योगों का आधार है, किन्तु औद्योगिक विकास के लिए खनिजों का अतिशय दोहन एवं उपयोग उनके अस्तित्व के लिए संकट है। अतः खनिजों का संरक्षण एवं प्रबंधन आवश्यक है। खनिज संसाधन के विवेकपूर्ण उपयोग तीन बातों पर निर्भर है-
(i) खनिजों के निरंतर दोहन पर नियंत्रण, 
(ii) उनका बचतपूर्वक उपयोग एवं
(iii) कच्चे माल के रूप में सस्ते विकल्पों की खोज।

        खनिजों पर नियंत्रण के अलावे उनके विकल्पों को खोजना, खनिजों के अपशिष्ट पदार्थों को बुद्धिमतापूर्ण उपयोग, पारिस्थितिकी पर पड़ने वाले कुप्रभाव पर नियंत्रण, खनिज निर्माण के लिए चक्रीय पद्धति को अपनाना प्रबंधन कहलाता है। अगर खनिजों के संक्षण के साथ-साथ प्रबंधन प ध्यान दिया जाए तो खनिज संकट से निबटा जा सकता है।

धात्विक एवं अधात्विक खनिजों के बीच अंतर एवं तुलना

         धात्विक एवं अधात्विक खनिजों के बीच निम्नलिखित अंतर एवं तुलना किया जा सकता है:-

धात्विक अधात्विक
1. धात्विक खनिजों की रासायनिक संरचना में धातुएँ होती हैं। अधात्विक खनिजों की रासायनिक संरचना में धातुएँ नहीं होती है।
2. ये कठोर एवं चमकदार होते हैं। ये चमकदार नहीं होते हैं।
3. ये आग्नेय एवं रूपांतरित चट्टानों में पाए जाते हैं। ये तलछटी चट्टानों में पाए जाते हैं।
4. धात्विक खनिजों को पिघलाकर/गलाकर धातुएँ प्राप्त की जा सकती है। इन खनिजों को पिघलाकर/गलाकर धातुएँ प्राप्त नहीं की जा सकती है।
5. ये खनिज लचीले होते हैं। ये खनिज लचीले और भंगुर नहीं होते हैं।
6. धात्विक खनिज ऊष्मा और विद्युत के अच्छे संवाहक होते हैं। अधात्विक खनिज ऊष्मा और विद्युत के कुचालक होते हैं।
7. इन खनिजों का गलनांक उच्च होता है। इन खनिजों का गलनांक बहुत कम होता है।
8. लोहा, एल्युमीनियम, सोना, चाँदी आदि के अयस्क धात्विक खनिजों के उदाहरण हैं। हीरा, स्लेट, पोटाश आदि गैर-धात्विक खनिजों के उदाहरण हैं।
9. इन्हें पीटकर तार बनाया जा सकता है। ये पीटने पर टूटते नहीं हैं। ये पीटने पर चूर-चूर हो जाते हैं।
10. इन्हें खानों से निकालने के बाद साफ करने की आवश्यकता होती है। इन्हें साफ करने की आवश्यकता नहीं होती है।
11. ये प्रायः अयस्क (ore) के रूप में पाए जाते है। ये अयस्क के रूप में नहीं पाए जाते हैं

♣ चट्टानों और खनिजों के बीच निम्नलिखित अंतर है-

क्र.सं. चट्टानों खनिजों
1. चट्टानों को उस ठोस द्रव्यमान के रूप में परिभाषित किया जाता है जो भौगोलिक सामग्रियों से बना होता है। दूसरी ओर, खनिजों को अकार्बनिक रासायनिक यौगिकों के रूप में परिभाषित किया जाता है जो प्राकृतिक रूप से बनते हैं।
2. चट्टानें खनिजों से बनी होती हैं। खनिज चट्टानों से नहीं बनते।
3. चट्टानें अपनी बनावट में एक समान नहीं होती हैं। खनिज अपनी बनावट में एक समान होते हैं।
4. जेडाइट, रेड बेरिल, ब्लैक ओपल, मसग्रेवाइट आदि चट्टानें कुछ दुर्लभ चट्टानें हैं। पेनाइट एक दुर्लभ खनिज है।
5. चट्टानें सूक्ष्म अर्थात् प्रकृति में छोटी होती हैं। खनिज सूक्ष्मदर्शी नहीं होते और इन्हें आसानी से पहचाना जा सकता है।
6. पृथ्वी पर चट्टानें ठोस रूप में मौजूद हैं। खनिज पदार्थ पृथ्वी पर खनिज भंडार के रूप में मौजूद हैं।
7. चट्टानों की एक परमाणु संरचना होती है। खनिजों में क्रिस्टलीय और रासायनिक संरचना होती है।
8. चट्टानों का उपयोग सड़क, भवन आदि निर्माण कार्यों के लिए किया जाता है। खनिजों का उपयोग विभिन्न उद्देश्यों जैसे प्रौद्योगिकी, फैशन, निर्माण आदि के लिए किया जाता है।
9. चट्टानों के मौलिक गुण हैं:-

⇒ चट्टानों

⇒ आकार

⇒ रंग

⇒ आभा

⇒ नमूना

⇒ बनावट

खनिजों के मौलिक गुण हैं:-

⇒ रंग

⇒ क्रिस्टल

⇒ कठोरता

⇒ भंग

⇒ तप

⇒ गुरुत्वाकर्षण

10. चट्टानों का कोई निश्चित आकार या रंग नहीं होता है। खनिजों का एक निश्चित रंग और आकार होता है।
11. उदाहरण:-

⇒ रेत

⇒ कंकड़

⇒ टुकड़े टुकड़े

⇒ गोले

उदाहरण:-

⇒ जीवाश्म ईंधन

⇒ कोयला

⇒ पेट्रोलियम


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7. आन्तरिक प्रवास को प्रभावित करने वाले कारक एवं इसके प्रकारों का वर्णन

7. आन्तरिक प्रवास को प्रभावित करने वाले कारक एवं इसके प्रकारों का वर्णन



      आन्तरिक प्रवास 

      आन्तरिक प्रवास एक राष्ट्र के भीतर स्थान परिवर्तन करने को कहते हैं। इसमें जनसंख्या अपने राष्ट्र की राजनीतिक सीमा को पार नहीं करती है, बल्कि वह अपने मूल स्थान से अन्य सुविधाजनक या इच्छित स्थान पर रहने लगती है, तो ऐसा प्रवास आन्तरिक प्रवास कहलाता है।

प्रो. डोनाल्ड बोग के अनुसार, “जब कोई व्यक्ति राष्ट्रीय सीमाओं के अन्तर्गत अपने मूल निवास को छोड़कर दूसरे स्थान पर रहने लगता है, तो ऐसे प्रवास को आन्तरिक प्रवास कहते हैं। यह अन्तर्गमन अन्तर्प्रवास या अन्तर-देशान्तरण (In-migration) कहलाता है।

आन्तरिक प्रवास को प्रभावित करने वाले कारक (FACTORS AFFECTING THE INTERNAL MIGRATION)

        आन्तरिक प्रवास प्रमुखतया आन्तरिक विषमताओं का परिणाम होता है। जब किसी राष्ट्र में आर्थिक स्तर पर असमानताएँ, भौगोलिक व सामाजिक परिस्थितियों में भिन्नता स्थापित हो जाती हैं, तो आन्तरिक प्रवास को प्रोत्साहन मिलने लगता है। लोगों की आर्थिक व सामाजिक दशा प्रवास की यात्रा व दिशा को प्रभावित करती है। आन्तरिक प्रवास को प्रभावित करने वाले निम्नलिखित कारक महत्वपूर्ण है:

1. भूमि पर जनसंख्या का असामान्य दबाव (Abnormal pressure of population on land):-

       देश के जिन भागों में जनसंख्या का अत्यधिक दबाव होता है, तो उन क्षेत्रों के निवासी ऐसे क्षेत्रों में जाकर बसना पसन्द करते हैं, जहाँ जनसंख्या का कम दबाव हो तथा भूमि उत्पादन के लिए सुलभ हो। जहाँ भूमि सुधार की सम्भावना हो, लोग वहाँ जाकर रहने लगते हैं।

2. भूमि मूल्य (Land value):-

       जिन भागों में भूमि का मूल्य इतना अधिक हो जाए, कि वह लोगों की वहन शक्ति से अधिक हो जाए तो ऐसी दशा में लोग सस्ती भूमि वाले भू-भागों की ओर प्रवास कर जाते हैं। नगर के भीतरी भाग में जब रिहाइशी भूमि का मूल्य लोगों की क्रय शक्ति के बाहर हो जाता है, तो लोग नगर के बाहरी क्षेत्रों की ओर प्रवास कर जाते हैं।

3. सामाजिक परिस्थितियां एवं जाति, धर्म संपर्क (Social conditions and caste, religion conflict):-

       देश के वह भाग जहाँ छुआछूत, वर्ग संघर्ष, जाति संघर्ष, धार्मिक भिन्नता, व्यक्तिगत दुश्मनी, आदि बुराइयों के कारण लोगों का रहना कठिन हो जाता है तो यहाँ से लोग उन क्षेत्रों की ओर प्रवास कर जाते हैं जहाँ यह नफरत करने वाली सामाजिक बुराइयाँ नही होती अथवा इन सामाजिक बुराइयों का प्रभाव बहुत कम होता है। ग्रामीण क्षेत्रों से लोग ग्रामीण रूढ़िवादिता के कारण नगरों में जाकर बस जाते हैं।

4. पारिवारिक व्यवस्था (Family system):-

        जब परिवार बड़े-बड़े हो जाते हैं तथा उनका एक स्थान पर मिलकर रहना सम्भव नहीं होता है, तब परिवार के कुछ लोग अन्य स्थानों पर रहना प्रारम्भ कर देते हैं। वर्तमान समय में बड़े ग्रामीण परिवारों के वह लोग जो शिक्षा प्राप्त करने, नौकरी करने के लिए नगरों में जाते हैं, वहीं जाकर बस जाते हैं। पारिवारिक कलह के कारण भी बड़े-बड़े परिवार टुकड़ों में बंट जाते हैं तथा परिवार के कुछ लोग अन्यत्र जाकर बस जाते हैं।

5. विवाह (Marriage):-

        भारतीय समाज में विवाह आन्तरिक प्रवास का एक प्रबल कारक है। विवाह के बाद लड़की को लड़के के पैतृक निवास स्थान पर रहना पड़ता है, अतः लड़कियाँ निश्चित तौर पर विवाह के बाद पैतृक निवास स्थान को छोड़कर अपने पति के घर पर जाकर रहने लगती हैं, तो ऐसा प्रवास भी आन्तरिक प्रवास कहलाता है।

6. ऋणग्रस्तता एवं निम्न आर्थिक स्तर (Indebtness and low economic standard):-

       जिन ग्रामीण क्षेत्रों में आर्थिक विकास की सम्भावनाएँ कम होती हैं, लोगों पर ऋण काफी अधिक हो जाता है, रोजगार में स्थायित्व नहीं होता है, तो ऐसे लोग आर्थिक दृष्टि से सम्पन्न क्षेत्रों में जाकर बस जाते हैं। ग्रामीण व पिछड़े क्षेत्रों से नगरों की ओर पलायन इसी प्रवास का परिणाम है।

7. औद्योगिक नगरों का स्थापन (Establishment of industrial towns):-

        नई-नई औद्योगिक इकाइयों के स्थापन के कारण, जहाँ एक ओर नगरों का विस्तार होने लगता है वहीं दूसरी ओर नए-नए नगर व उपनगर बस जाते हैं और लोग ऐसे स्थानों पर अन्य क्षेत्रों से आकर बसने लगते हैं। मुम्बई, चेन्नई, कोलकाता के उपनगरों तथा नए-नए औद्योगिक नगरों के स्थापन जैसे मोदीपुरम्, रानीपुर के कारण लोग अन्यत्र स्थानों से आकर वहाँ रहने लगते हैं।

8. प्राकृतिक आपदाएं, मानव निवास की विपरीत परिस्थितियां बन जाना:-

      आँधी, तूफान, भूकम्प, ज्वालामुखी का फटना, सूखा पड़ जाना, अति वृष्टि के कारण बाढ़ आ जाना, आदि प्राकृतिक आपदाएँ लोगों को अन्यत्र बसने को मजबूर कर देती है। यह स्थान मानव निवास के अनुकूल नहीं रह पाते है और लोग सुरक्षित स्थानों में जाकर बसना पसन्द करते हैं। मई 2000 में गुजरात में सूखे के प्रभाव से लोगों को अपने स्थानों को छोड़ना पड़ा।

आन्तरिक प्रवास के प्रकार (TYPES OF INTERNAL MIGRATION)

       भारत में होने वाले आन्तरिक प्रवास को आधार मानकर इसको छः प्रकारों में रखा जा सकता है:-

1. अन्तर्राज्यीय प्रवास (Inter state migration)

2. ग्राम से ग्राम को प्रवास (Migration from rural to rural)

3. ग्राम से नगर को प्रवास (Migration from rural to urban)

4. नगर से नगर को प्रवास (Migration from urban to urban)

5. नगर से समीपवर्ती ग्रामीण क्षेत्रों को प्रवास (Migration from urban to adjoining rural areas)

6. सम्बद्धताजन्य प्रवास (Interrelated migration)

1. अन्तर्राज्यीय प्रवास:-

        जब एक देश की सीमाओं के भीतर उस देश के नागरिक अपना राज्य छोड़कर अन्य किसी राज्य में रोजगार, सुरक्षा या विवाद सम्बन्धी कारणों से जाकर बस जाते हैं तो ऐसा प्रवास अन्तर्राज्यीय प्रवास कहलाता है। राजस्थान से अनेक मारवाड़ी परिवार व्यापार के कारण पश्चिम बंगाल और असम में जाकर बस गए। यह इस प्रवास का एक उदाहरण है।

2. ग्राम से ग्राम को प्रवास:-

        ग्रामीण क्षेत्रों में यह प्रवास वर्तमान में काफी महत्व रखता है। छोटे-छोटे गांवों से लोग अपने निकट के उन गांवों, जो केन्द्रीय सुविधाजनक स्थिति होने के कारण अनेक प्रकार की सेवाएँ व सुविधाएँ एकत्रित कर लेते हैं, आकर रहने लग जाते हैं। धीरे-धीरे यह गाँव ग्रामीण सेवा केन्द्र का रूप ले लेते हैं। भारत के ग्रामीण भूदृश्य पर ऐसे केन्द्रों का तेजी से विकास हो रहा है।

3. ग्राम से नगर को प्रवास:-

      वर्तमान समय की एक महत्वपूर्ण घटना नगरीकरण है, जिसका एक कारण ग्रामीण जनसंख्या का रोजगार की सुविधा तथा जीवनोपयोगी सेवाओं का लाभ मिलने की वजह से नगरों में आकर बसना है। वर्तमान में देश के बड़े-बड़े बृहत् महानगरों में जनसंख्या की आकार वृद्धि में इस तरह के प्रवास का महत्वपूर्ण योगदान है।

4. नगर से नगर को प्रवास:-

        भारत के कुल आन्तरिक प्रवास में नगर से नगर की ओर प्रवास का योगदान लगभग 12% रहता है। इस प्रकार का प्रवास प्रायः छोटे नगरों से बड़े नगरों की ओर होता है। लोग बड़े-बड़े नगरों में नौकरी, व्यापार, प्रशासकीय कार्यालयों की सुविधा, आदि के कारण, वहाँ आकर बस जाते हैं। दिल्ली, मुम्बई, बंगलौर, कोलकाता, हैदराबाद, चेन्नई जैसे महानगरों में लोग अनेक छोटे-छोटे नगरों से आकर बस गए हैं। चण्डीगढ़ नगर इसी प्रकार के प्रवास का उदाहरण है। यहाँ की सारी जनसंख्या आन्तरिक प्रवास के फलस्वरूप बसी है। अनेक समीपवर्ती नगरों से लोग यहाँ आकर बस गए।

5. नगर से समीपवर्ती ग्रामीण क्षेत्रों को प्रवास:-

     नगरों में जब जनसंख्या इतनी बढ़ जाती है कि लोगों का वहाँ रहना दूभर हो जाता है, क्योंकि वहाँ पर्यावरण का प्रदूषित होना, भूमि व मकानों की कीमतों में भारी वृद्धि होना, आदि समस्याएँ पनप जाती हैं। जिनके कारण नगर के लोग नगर की बाहरी सीमा पर स्थित ग्रामीण क्षेत्र के खुले वातावरण में रहना पसन्द करते हैं। यह क्षेत्र नगर के समीप भी होते हैं तथा समस्या रहित होते हैं। लोग यहाँ भूमि सस्ती होने के कारण मकान बनाकर रहने लगते हैं। धीरे-धीरे ऐसे मकानों का समूह एक उपनगर का रूप ले लेता है और समय के साथ नगर का अंग बन जाता है।

6. सम्बद्धताजन्य प्रवास:-

        जब एक व्यक्ति ग्रामीण क्षेत्र से नगर में जाकर बस जाता है तो वह अपने आश्रितों को अपने पास बुला लेता है। यह आश्रित तथा उसके परिवार से सम्बन्धित सभी सदस्य नगर में शिक्षा, स्वास्थ्य, व्यापार, परिवहन, मनोरंजन, आदि की सुविधा के कारण वहाँ रहने लगते हैं, तो ऐसे प्रवास को सम्बद्धताजन्य प्रवास कहते हैं।

      भारत में कृषि के विकास ने कृषक परिवारों में इस प्रकार की भावना उत्पन्न कर दी है कि उनके एक परिवार का मुखिया नगर में मकान बनाकर रहने लगता है तथा अन्य मुखिए गाँव में खेती का कार्य देखते हैं। इन सब मुखियों के आश्रित नगर में उपरोक्त आकर्षण के कारण रहने लगते हैं। इस प्रका के प्रवास का प्रचलन वर्तमान में तीव्र गति के साथ बढ़ हा है।

28. Representation of Relief

Representation of Relief

       किसी भी धरातल या स्थान का उच्चावच (Terrain या relief) उस धरातल की ऊँचाई-निचाई से बनने वाले प्रतिरूप या आकार को कहते हैं। क्षेत्रीय स्तर पर उच्चावच भू-आकृतिक प्रदेशों के रूप में व्यक्त होता है और छोटे स्तर पर यह एक स्थलरूप या स्थलरूपों के एक संयुक्त समूह का प्रतिनिधित्व करता है।

    विभिन्न ढालों की समोच्च रेखाएँ एवं अनुप्रस्थ काट या पार्शिवका बनाने की विधियों के बाद यहाँ कुछ स्थल रूपों की सरलीकृत आकृतियों की समोच्च रेखाएँ बनायी जाती है।

ढाल के प्रकार:

     ढालों को मुख्यतः धीमा/मंद, तीव्र/खड़ा, अवतल, उत्तल, सम एवं विषम भागों में वर्गीकृत किया जा सकता है। विभिन्न प्रकार के ढालों की समोच्च रेखा एक विशिष्ट अंतराल की पद्धति को दर्शाता है। ढाल को डिग्री या कोण में भी व्यक्त किया जाता है।

(i) धीमा/मंद ढाल /Gentle Slope:

    जब किसी स्थलाकृति के ढाल की डिग्री या कोण बहुत कम होता है, तब ढाल मंद होता है। इस प्रकार की ढालों की समोच्च रेखाओं के बीच की दूरी बहुत अधिक होती हैं।

Representation of Relief

(ii) तीव्र/खड़ी ढाल/Steep/Sharp Slope :

      जब किसी स्थलाकृति के ढाल का कोण अधिक होता है, तो इनकी समोच्च रेखाओं के बीच की आपसी दूरी बहुत कम होती है. तथा ये खड़ी ढाल को इंगित करते हैं।

(iii) अवतल/नतोदर ढाल/Concave Slope:-

          जब उच्चावच स्थलाकृति का निचला भाग मंद ढाल वाला एवं ऊपरी भाग खड़े ढाल वाला हो, तो उसे अवतल ढाल कहा जाता है। इस प्रकार के ढाल में समोच्च रेखाएँ निचले भाग में दूर-दूर तथा ऊपरी भाग में पास-पास होती हैं।

(iv) उत्तल/उन्नतोदर ढाल/Convex Slope:-

        अवतल ढाल के विपरीत, उत्तल ढाल का ऊपरी भाग मंद एवं निचला भाग खड़ा होता है। इसके परिणामस्वरूप ऊपरी भाग में समोच्च रेखाएँ दूर-दूर तथा निचले भाग में पास-पास होती हैं।

(v) सम ढाल/Uniform Slope और (vi) विषम ढाल/ Uneven Slope / Irregular Slope:-

          दोनों ही ढालों में से प्रत्येक धीमा या तेज कोई भी हो सकते हैं। दोनों की समोच्च रेखाओं में केवल इतना ही अन्तर है कि प्रथम में समोच्च रेखाएँ समान दूरी पर होती है, जबकि द्वितीय में इनकी दूरी का क्रम सर्वत्र असमान रहता है। विषम ढाल में एक साथ तेज एवं धीमा दोनों ही ढाल बिना किसी क्रम के दर्शाये जा सकते हैं, जबकि सम ढाल में ढाल का क्रम सर्वत्र प्राय: एक-सा रहता है।

(vii) सीढ़ीनुमा ढाल/Stepped Slope:-

          ऐसे ढाल में थोड़ी-थोड़ी दूरी पर सीढ़ियों की तरह प्रवणता बढ़ने से समोच्च रेखाएँ बीच-बीच में समीप आ जाती है। नदी व हिमानी की घाटी में ऐसा ढाल पाया जाता है।

स्थ्लाकृतियों के प्रकार

1. शंक्वाकार पहाड़ी (Conical Hill):-

       समुद्र से 600 मी० ऊँचे खण्ड को पहाड़ी कहते हैं। इनकी समोच्च रेखा बन्द होती है। सभी दशाओं में शंक्वाकार पहाड़ी का ढाल समान होता है, इन रेखाओं की दूरी समान होती है। एक शंक्वाकार पहाड़ी, उसकी समोच्च रेखाएँ एवं विभिन्न ऊँचाई पर घिरे धरातल को दर्शाया गया है। सभी ओर ढाल समान होने से समोच्च रेखाएँ प्रायः वृत्ताकार बनी है। पहाड़ी के शिखर की ऊँचाई मध्य में बिन्दु या त्रिकोण बनाकर भी अंकित की जा सकती है।

       शंक्वाकार पहाड़ियों की भाँति ही अन्य पहाड़ियों की समोच्च आकृति खींची जाती है। पहाड़ी के जिस भाग में ढाल तेज होगा, वहाँ समोच्च रेखाएँ पास-पास एवं ढाल धीमा होने पर दूर-दूर खींची जाती है। चित्र में एक विषम ढाल वाली पहाड़ी का समोच्च रेखाचित्र बनाया गया है। यहाँ चित्र में पहाड़ियों के साथ-साथ उनका अनुप्रस्थ काट (Cross Section) भी स्पष्टता के लिये खींच दिया गया है-

विभिन्न ढाल वाली एक पहाड़ी

2. पठार/Plateau:-

         एक विस्तृत चपटा उठा हुआ भूभाग, जिसकी ढाल अपेक्षाकृत पार्श्वो पर खड़ी होती है तथा जो आसपास के मैदान या समुद्र से ऊँची उठी होती है, पठार कहलाती है। पठारों को दर्शाने वाली समोच्च रेखाएँ सामान्यतः किनारों पर पास-पास तथा भीतर की ओर दूर होती हैं। मध्यवर्ती भाग समोच्च रेखाओं रहित होता है।

3. जलप्रपात/Waterfall:-

        किसी नदी तल पर काफी ऊंचाई से पानी का अचानक उर्ध्वाधर गिरना जलप्रपात कहलाता है। कभी-कभी जलप्रपात सोपानी धारा के रूप में गिरता है, जिसे रैपिड कहा जाता है। मानचित्र पर नदी को पार करती हुई समोच्च रेखाओं के परस्पर मिल जाने से जलप्रपात को पहचाना जा सकता है तथा रैपिड को अपेक्षाकृत दूर स्थित समोच्च रेखाओं के द्वारा।

4. भृगु/Cliff:

       यह अत्यधिक तीव्र ढाल या खड़े पार्श्वों वाली भू-आकृति है। मानचित्र पर भृगु की पहचान एक-दूसरे के बहुत पास स्थित समोच्च रेखाओं (Contour Lines) से की जाती है। जब समोच्च रेखाएँ अत्यधिक पास-पास होती हैं, तो यह क्षेत्र बहुत तीव्र ढाल को दर्शाता है।

5. V-आकार की घाटी/V-shaped Valley:-

      यह ‘V’ अक्षर की तरह दिखाई देती है। V-आकार की घाटी पर्वतीय क्षेत्रों में पायी जाती है। V-आकार की घाटी का निचला भाग भीतरी समोच्च रेखाओं के द्वारा दिखाया जाता है, जो पास-पास स्थित होते हैं तथा जिनके समोच्च का मान कम होता है। बाहर की ओर स्थित समोच्च रेखाओं का मान एकसमान रूप से बढ़ता है।

6. U-आकार की घाटी/U-shaped Valley:-

          ऊँचाई पर स्थित हिमानियों के पार्श्व अपरदन के कारण इस प्रकार की घाटी का निर्माण होता है। इसका निचला तल चौड़ा एवं चपटा तथा किनारे खड़े होते हैं, जिसके कारण इसका आकार ‘U’ अक्षर के समान प्रतीत होता है। U-आकार की घाटी के सबसे निचले हिस्से को सबसे भीतर स्थित समोच्च रेखाओं के द्वारा दर्शाया जाता है तथा इसके दोनों किनारों के बीच का अंतर अधिक होता है। बाहर की ओर स्थित दूसरी समोच्च रेखाओं के लिए एकसमान अंतराल के साथ समोच्च रेखाओं का मान बढ़ता जाता है।

7. महाखड्ड (गार्ज)/Gorge:-

     उच्च भागों में, जहाँ नदियों के द्वारा पार्श्व अपरदन की अपेक्षा ऊर्ध्वाधर अपरदन की क्रिया तीव्र होती है, वहाँ तंग घाटी का निर्माण होता है। ये गहरी तथा संकरी नदी घाटियाँ होती हैं, जिनके दोनों किनारों का हाल बहुत तीव्र होता है। तंग घाटी को पास पास स्थित समोच्च रेखाओं के द्वारा दर्शाया जाता है, जिसमें भीतरी समोच्च रेखाओं के बीच का अंतर बहुत कम होता है, जो इसके दोनों किनारे को दिखाता है।

8. पर्वतस्कंध/Spur:-   

      पर्वत श्रृंखला या ऊँचे भू-भाग से घाटी की ओर निकली हुई लंबी, संकरी तथा ढाल वाली उत्तल भू-आकृति को पर्वतस्कंध (Spur) कहा जाता है। यह सामान्यतः दो घाटियों या जल-निकासी तंत्रों के बीच स्थित ऊँचा भाग होता है, जो घाटी की ओर आगे बढ़ता है।

     समोच्च मानचित्र (Contour Map) पर पर्वतस्कंध को सामान्यतः V अथवा U आकार की समोच्च रेखाओं द्वारा प्रदर्शित किया जाता है। इसमें V का शीर्ष (नुकीला भाग) नीचे की ओर अर्थात घाटी की दिशा में होता है, जबकि V की दोनों भुजाएँ ऊँचे भू-भाग की ओर फैली होती हैं।



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27. समोच्च रेखाएँ (Contour Lines)

27. समोच्च रेखाएँ (Contour Lines)



समोच्च रेखाएँ

      समुद्र तल से समान ऊँचाई पर स्थित बिन्दुओं को मिलाने वाली काल्पनिक रेखा को समोच्च रेखा कहा जाता है, इसे समतल रेखा भी कहा जाता है। समोच्च रेखा स्थलाकृतिक मानचित्र पर जमीन की ऊँचाई या अवसाद को इंगित करने के लिए खींची गई एक काल्पनिक रेखा है।

समोच्चरेखीय अंतराल :

        दो उत्तरोत्तर समोच्च रेखाओं के बीच का अंतर को समोच्चरेखीय अंतराल कहा जाता है। इसे ऊर्ध्वाधर अंतराल भी कहते हैं। यह प्रायः अंग्रेजी के अक्षरों द्वारा लिखा जाता है। किसी भी मानचित्र पर प्राय: इसका मान स्थिर होता है।

        समोच्च रेखाएँ माध्य समुद्र तल के ऊपर विभिन्न ऊर्ध्वाधर अंतरालों (VI), जैसे- 20, 50, 100 मीटर पर खींची जाती हैं। इसे समोच्च रेखाओं का अंतराल कहा जाता है। किसी भी दिए गए मानचित्र पर प्रायः यह नियत होता है। इसे सामान्यतः मीटर में व्यक्त किया जाता है। एक स्थान से दूसरे स्थान पर ढाल की प्रकृति के अनुसार दो समोच्च रेखाओं के बीच की क्षैतिजीय दूरी में अंतर होता है जबकि उनके बीच का ऊर्ध्वाधर अंतराल अचल होता है। क्षैतिज दूरी, जिसे क्षैतिज तुल्यांक (HE) के नाम से भी जाना जाता है, मंद ढाल के लिए अधिक एवं तीव्र ढाल के लिए कम होती है।

समोच्च रेखाओं द्वारा धरातल प्रदर्शन (Relief Representation by Contour Lines)

      बाह्य तथा आन्तरिक शक्तियों के कारण धरातल पर परिवर्तन होते हैं तथा ढाल में भी परिवर्तन होते हैं, जिससे आकृतियाँ भी परिवर्तित हो जाती है। इन ढालों को समोच्च रेखाओं द्वारा दिखाया जाता है। जिस प्रकार धरातल पर नदी, हिमानी, वायु और लहरों के प्रभाव से निश्चित आकृतियाँ बनती है, उसी भाँति ऐसी प्रत्येक निश्चित आकृति की समोच्च रेखाएँ भी विशेष स्वरूप वाली होगी। इस विशेषता के कारण थोड़े से अध्ययन के बाद ही अध्यानकर्त्ता आसानी से समोच्च मानचित्रों में उनकी आकृतियों को देखकर धरातल की प्रकृति का अनुमान लगा सकता है।

       ऐसे समोच्च मानचित्र के माने गये दो बिन्दुओं को जोड़कर उनके बीच के भूतल की प्रकृति का वास्तविक रेखाचित्र या अनुप्रस्थ काट (Cross Section) बनाया जा सकता है। इससे अध्ययन कक्ष में ही दो स्थानों के बीच की अन्तःदृश्यता या पारदृश्यता (Intervisibility) ज्ञात करके कई समस्याओं का आसानी से समाधान ढूँढा जा सकता है।

समोच्च रेखाओं के कुछ मूल लक्षण :-

समोच्च रेखाएँ समान ऊँचाइयों वाले स्थान को दर्शाती हैं।

⇒ समोच्च रेखाएँ एवं उनकी आकृतियाँ स्थलाकृति के ढाल एवं ऊँचाई को दर्शाती हैं।

⇒ पास-पास खींची, अधिक घनी समोच्च रेखाएँ तीव्र ढाल को तथा दूर-दूर खींची हुई, कम घनी समोच्च रेखाएँ मंद ढाल को प्रदर्शित करती हैं।

⇒ दो या दो से अधिक समोच्च रेखाओं के एक-दूसरे से मिलने से ऊर्ध्वाधर वाली आकृतियाँ, जैसे- भृगु अथवा जलप्रपात प्रदर्शित होते हैं।

⇒ विभिन्न ऊँचाई वाली दो समोच्च रेखाएँ सामान्यतः एक-दूसरे को नहीं काटती हैं।

      समोच्च रेखाएँ खींचते समय ध्यान रखने योग्य निम्नलिखित बातें:-

1. समोच्च रेखाएँ खण्डित एवं कटी हुई रेखाएँ नहीं होती। इनमें निरन्तरता (Continuity) रहती है।

2. एक मानचित्र की सभी समोच्च रेखाओं का मध्यान्तर समान रहता है अर्थात् उसमें कहीं भी दो समोच्च रेखाओं के बीच ऊर्ध्वाधर अन्तर (VI) नहीं बदलेगा।

3. कुछ विशेष धरातलीय लक्षण; जैसे- पहाड़ी, पर्वत शिखर, श्रेणी का ऊपरी भाग रेतीले या अन्य टीले और गर्तों की समोच्च रेखाएँ बन्द वक्र (Closed Curves) रेखाएँ होती हैं।

4. धीमे ढाल वाले क्षेत्र में समोच्च रेखाएँ दूर-दूर और ढाल की प्रवणता या तीव्रता बढ़ने के साथ-साथ ये अधिक पास-पास आती जाती है।

5. नदी घाटी और पहाड़ी के अगले भाग या पर्वत प्रक्षेप (स्पर) की समोच्च रेखाओं का आकार प्रायः समान रहता है। इन दोनों में ऊँचाइयों का क्रम एक-दूसरे के विपरीत रहता है चित्र (A) एवं (B)। इसी भाँति पहाड़ी एवं झील की बन्द समोच्च रेखाओं में ऊँचाइयाँ ढाल की विलोम प्रकृति के कारण विपरीत दिशा में अंकित की जाती है।

6. पर्वत श्रेणी के निचले ढालों, हिमानी या नदी घाटी के पाश्र्व एवं पठारी किनारों के ढाल को दर्शाने वाली समोच्च रेखाएँ प्रायः समानान्तर दिखायी देती है।

7. समोच्च रेखाएँ प्रवाह मार्गों को आड़ी काटती हुई बनायी जाती है। इन मार्गों को काटते समय वे घाटी तल के आकार के अनुसार (V या U आकार में) ऊपर की ओर मुड़ जाती है।

8. प्रत्येक समोच्च रेखा पर मध्यान्तर के अनुसार फीट, मीटर या माप की अन्य इकाई में ऊँचाई अवश्य अंकित की जाती है। यह अन्त बढ़ती हुई ऊँचाईयों की ओ लिया जाता है जैसा कि चित्र में दर्शाया गया है।

समोच्च रेखाएँ

26. अनुप्रस्थ काट (Cross Section)

26. अनुप्रस्थ काट (Cross Section)



अनुप्रस्थ काट

        किसी समोच्च मानचित्र में अंकित किसी रेखा के सहारे त्रिमितीय धरातल का द्विमितीय (लम्बाई एवं ऊंचाई) पार्श्व चित्र ही अनुप्रस्थ काट (Cross Section) कहलाता है।

       अनुप्रस्थ काट सामान्यतः निम्नलिखित विधियों से खींचें जाते हैं।

⇒ सीधी रेखा के सहारे (Along a Straight Line)-

(i) लम्ब डालकर, एवं

(ii) कागज की पट्टी विधि।

(i) लम्ब डालकर (By drawing perpendiculars):-

       मानचित्र पर समोच्च रेखाएँ इस विधि द्वारा बनायी जाती है। समोच्च मानचित्र में एक AB रेखा को बाह्य सीमा के समानान्तर खीचा। मानचित्र के बाहर नीचे की ओर AB के समानान्तर एवं बराबर लम्बी CD रेखा खींच लें।

        अब जितनी समोच्च रेखाओं को AB रेखा काटती है, उतनी ही लम्बवत् रेखाएँ नीचे की CD रेखा की ओर अनुकूल दूरी पर खींच लें। CD के दोनों ओर लम्ब डालकर उसे पेन्सिल से AB से मिला दें। अब इस लम्बवत् AC रेखा के निचले भाग के बाहर की ओर धरातल की प्रकृति के अनुसार एवं समोच्च रेखाओं के फैलाव या मान के अनुसार ऊँचाइयाँ अंकित कर CD के समानान्तर या आड़ी रेखाएँ खीच लें।

     अतः वह रेखा जिसके सहारे अनुप्रस्थ काट का पार्श्व चित्र (Cross Section) खींचा जाता है, उसे अनुदैर्ध्य रेखा (Line of Profile) कहते हैं। AB रेखा समोच्च रेखाओं को जिन बिन्दुओं पर काटती हुई जाती है, उनसे CD की ओर कटी हुई रेखाओं की तरह लम्ब डालते हुए उन्हें सम्बन्धित ऊँचाई वाली आड़ी रेखा पर मिलाया।

       इस विधि से जो बिन्दु मानचित्र के नीचे के रेखाचित्र पर आये, उन्हें एक गहरी रेखा द्वारा मिला दें। यही आकृति AB रेखा के सहारे आने वाली समोच्च आकृति का अनुप्रस्थ काट है। इसमें मानचित्र एवं अनुप्रस्थ काट दोनों ही की रेखाएँ समानान्तर एवं बराबर लम्बी होने से शुद्ध होगी। इससे आसानी से क्षैतिज और लम्बवत् दोनों ही मापनियों का अनुपात निश्चित किया जा सकता है। प्रायः लम्बवत् मापनी क्षैतिज मापनी से कई गुना अधिक होती है।

(ii) कागज की पट्टी विधि द्वारा (By Strip Mehtod):-

        व्यवहार में समोच्च रेखाओं से बनी आकृतियों का अनुप्रस्थ काट प्रायः तिर्यक् या तिरछी रेखा खींचकर बनाना होता है। ऐसे मानचित्रों का अनुप्रस्थ काट यदि तिरछी रेखा पर ही लम्ब डालकर खींचा जायेगा तो वहाँ दूरी सिकुड़ जाने से पूर्णतः गलत होगा।

        इसमें धरातल की समानुपातिक लम्बाई भी सही-सही नहीं बताई जा सकती। अतः ऐसी तिरछी या तिर्यक रेखा के सहारे आने वाले धरातल का सही अनुप्रस्थ काट खींचने के लिये एक मुड़ी हुई साफ कागज की पट्टी लेकर उसे चित्र (B) की भाँति तिर्यक रेखा के सहारे सटाते हुए इस प्रकार रखेंगे कि यह पट्टी पूरी रेखा पर आ जाय।

        इस पट्टी को जिस ऊँचाई की समोच्च रेखा जहाँ-जहाँ पर छूती है, वहाँ-वहाँ पर छोटे-छोटे चिह्न पट्टी पर अंकित कर उन पर बीच-बीच में ऊँचाई लिख दी जाती है। चोटियों व सबसे निम्न भागों में सुविधा के लिए ढाल के अनुसार तीर खींच दें।

      अब मानचित्र के बाहर सुविधाजनक स्थान पर कागज की पट्टी के दोनों पर्श्वीय बिन्दुओं की लम्बाई के बराबर सीधी रेखा खींचकर उसके दोनों किनारे पर लम्ब डाल दें। इन लम्बों पर 1″ या सुविधाजनक दूरी लेकर ऊँचाइयाँ अंकित करने हेतु तल रेखा के समानान्तर अन्य रेखाएँ खींच लें।

       अब जिस पट्टी पर ऊँचाइयाँ अकित की गई है, उस कागज की पट्टी को पुनः तल रेखा पर रखकर उस पर अंकित चिह्नों की ऊँचाई के अनुसार ऊपर की ओर लम्ब खींचे। इन लम्बों के शीर्ष बिन्दुओं को जोड़ते हुए एक गहरी रेखा खींच लें, इस रेखा को खींचते समय शीर्ष और निम्न स्थल के पास लगे तीरों को ध्यान में रखना चाहिये। अतः यही तिर्यक रेखा के सहारे खींचा गया सही अनुप्रस्थ काट है। यहाँ इस आकृति की आधार रेखा की लम्बाई तिर्यक अनुदैर्ध्य रेखा के बराबर है।

⇒ लम्बवत् मापनी एवं लम्बवत् अभिवृद्धि (Vertical Scale and Vertical Exaggeration):-

      समोच्च मानचित्र में धरातल जटिल बना रहता है, अतः इससे अनुप्रस्थ काट (Cross Section) बनाते समय लम्बवत् मापनी की ओर भी ध्यान रखा जाना चाहिये। क्षैतिज विस्तार एवं लम्बवत् अभिवृद्धि के बीच मापनी के आधार पर अन्तः सम्बन्ध रहता है। इसमें धरातल के स्वरूप- मैदान, पहाड़ी, पठार, पर्वत, आदि के ढाल को ध्यान में खा जाता है।

अनुप्रस्थ काट

अन्य उदहारण


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25. खनिजों के भौतिक गुण एवं पहचान (Properties and Identification of Minerals)

25. खनिजों के भौतिक गुण एवं पहचान

(Properties and Identification of Minerals)


      खनिजों की पहचान उनकी भौतिक विशेषताओं या गुणों के आधार पर कर सकते हैं। खनिजों के मुख्य गुण इस प्रकार हैं-

1. रंग (Colour)

2. चमक (Lustre )

3. विशिष्ट गुरुत्व (Specific gravity)

4. कठोरता (Hardness)

5. दरार (Cleavage)

6. धारी (Streak)

7. विशेष गुण (Special characteristics)

1. रंग (Colour):-

    किसी खनिज का सबसे स्पष्ट गुण उसका रंग है। खनिजों के रंग का निर्धारण उनकी परमाणविक संरचना से तथा कुछ में अशुद्धियों के कारण होता है। वैसे तो कई खनिजों का रंग एक जैसा होता है। उदाहरण के लिए, कई खनिज हरे रंग के होते हैं। जैसे- ओलिवाइन, एपिडोट और एक्टिनोलाइट आदि। लेकिन यदि रासायनिक संरचना में अशुद्धियाँ हैं, जैसे कि क्वार्ट्ज तो एक खनिज कई अलग-अलग रंग ले सकता है, जो स्पष्ट, धुएँ के रंग का गुलाबी, बैंगनी या पीला हो सकता है।

       खनिजों के रंग का विशिष्ट निदान नहीं होने का एक कारण यह है कि क्रिस्टल संरचना और संरचना के कई घटक हैं जो रंग उत्पन्न कर सकते हैं। लौह जैसे कुछ तत्वों की उपस्थिति से सदैव एक रंगीन खनिज बनता है, लेकिन लौह अपने ऑक्सीकरण की स्थिति के आधार पर विभिन्न प्रकार के रंग उत्पन्न कर सकता है। ये रंग आमतौर पर काला, लाल या हरा होता है।

       कुछ खनिजों की क्रिस्टल संरचना में रंग-उत्पादक तत्व होते हैं। जैसे ओलिवाइन (Fe2SiO4), जबकि अन्य उन्हें क्वार्ट्स (SiO2) जैसी अशुद्धियों के रूप में शामिल करते हैं। यह सारी परिवर्तनशीलता किसी खनिज की पहचान के लिए केवल रंग का उपयोग करना कठिन बना देती है। हालाँकि, क्रिस्टल रूप जैसे अन्य गुणों के संयोजन में, रंग संभावनाओं को कम करने में सहायता कर सकता है। उदाहरण के लिए, हॉर्नब्लेंड, बायोटाइट एवं मस्कोवाइट सभी आमतौर पर ग्रेनाइट जैसी चट्टानों में पाए जाते हैं।

       हॉर्नब्लेंड और बायोटाइट दोनों काले हैं, लेकिन उन्हें उनके क्रिस्टल रूप से उनकी पहचान आसानी से की जा सकती है क्योंकि बायोटाइट शीट में होता है, जबकि हॉर्नब्लेंड मजबूत प्रिज्म बनाता है। मास्कोवाइट और बायोटाइट दोनों शीट में बनते हैं, लेकिन वे अलग-अलग रंग के होते हैं। वास्तव में मस्कोवाइट रंगहीन होता है।

2. चमक या आभा (Lustre):-

    प्रत्येक खनिज की अपनी चमक होती है, जैसे- मेटैलिक, रेशमी, ग्लॉसी आदि। चमक या आभा शब्द से तात्पर्य प्रकाश की मात्रा एवं गुणवत्ता से है जो किसी खनिज की बाहरी सतहों से परावर्तित होती है। चमक इस बात का आंकलन प्रदान करती है कि खनिज सतह कितनी ‘चमकती’ है।

       किसी खनिज की चमक वह तरीका है जिससे वह प्रकाश को प्रतिबिंबित करता है। एक खनिज जो कांच की तरह प्रकाश को परावर्तित करता है, उसमें काँच (Vitreous) जैसी या ग्लासी चमक होती है।

      एक खनिज जो क्रोम की तरह प्रकाश को परावर्तित करता है उसमें धात्विक (Metallic) चमक होती है। चमक के लिए विभिन्न प्रकार की अन्य संभावनाएँ भी हैं, जिनमें मोती (pearly), मोमी (waxy) एवं राल (resinous) शामिल है। जो खनिज हीरे की तरह अदम्य या शानदार परावर्तक होते हैं उनमें अदम्य चमक होती है। थोड़े से प्रयास से, चमक को आसानी से पहचाना जा सकता है साथ ही यह अत्यन्त विशिष्ट होते हैं। विशेषकर उन खनिजों के लिए जो जैसे कई रंगों में होते हैं।

(i) धात्विक या चमकदार (Metallic or splendent):-

        खनिजों में पॉलिश धातु की चमक होती है और आदर्श सतहें परावर्तक सतहों के रूप में काम करती है, जैसे गैलेना, पाइराइट एवं मैग्नेटाइट।

(ii) विट्रियस (Vitreous):-

     यह शब्द लैटिन भाषा के ग्लास, विट्रियम से लिया गया है। यह चमक का एक ऐसा प्रकार है जो खनिजों में सबसे अधिक देखा जाता है और अपेक्षाकृत कम अपवर्तक सूचकांक वाले पारदर्शी या पारभासी खनिजों में होती है। जैसे- कैल्साइट, क्वार्ट पुखराज, बेरिल, टूमलाइन और फ्लोराइट आदि।

(iii) रालयुक्त (Resinous):-

      रालयुक्त चमक की सतह पर राल जैसी चमक होती है। ऐसी सामग्रियों का अपवर्तनांक 2.0 से अधिक होता है। स्पैलेराइट (ZnS) एक रालयुक्त चमक प्रदर्शित करता है।

(iv) फीके या मटमैले (Dull or Earthy):-

   फीके या मटमैले चमक वाले खनिज, प्रकाश को बहुत खराब तरीके से परावर्तित करते हैं एवं चमकते नहीं हैं। ऐसी चमक अक्सर उन खनिजों में देखी जाती है जो छोटे-छोटे दानों के समूह से बने होते हैं।

(v) मोती (Pearly):-

   मोती की चमक इंद्रधनुषी, ओपेलेसेंट या मोती जैसी दिखाई देती है। यह सामान्यतः खनिज सतहों द्वारा प्रदर्शित होता है जो पूर्ण दरार के विमानों के समानांतर होते हैं। टैल्क जैसे परत सिलिकेट अक्सर दरार वाली सतहों पर मोती जैसी चमक प्रदर्शित करते हैं।

(vi) चिकनाई (Greasy):-

     एक सतह जिसमें चिपचिपी चमक होती है वह तेल की एक पतली परत से ढकी हुई प्रतीत होती है। एक प्रकाश प्रकीर्णन सतह जो थोड़ी खुरदरी होती है, चिकनाई वाली चमक प्रदर्शित कर सकती है, जैसे- नफाइना।

(vii) रेशमी (Silky):-

     जब प्रकाश बारीक समानांतर रेशों के समुच्चय से परावर्तित होता है तो उत्पन्न चमक रेशमी चमक होती है। मैलाकाइट और सर्पेन्टाइन दोनों रेशमी चमक प्रदर्शित कर सकते हैं।

(viii) एडमैंटाइन या ब्रिलियंट (Adamantine or brilliant):-

      हीरे का चमकदार प्रतिबिंब एडमेंटाइन के रूप में जाना जाता है। एडामेंटाइन चमक वाले खनिजों में उच्च अपवर्तक सूचकांक (1.9-2.6) होते हैं और ये अत्यधिक फैलाव वाले और पारभासी होते हैं।

3. कठोरता (Hardness):-

      खनिज कठोर एवं कोमल दोनों प्रकार के होते हैं, लेकिन अधिकांश खनिज कठोर ही होते हैं। कठोरता की डिग्री तुलानात्मक रूप से आसानी या कठिनाई को देखकर निर्धारित की जाती है किसी खनिज की कठोरता का परीक्षण कई तरीकों से किया जा सकता है। आमतौर पर खरोंच परीक्षण का उपयोग करके खनिजों की तुलना ज्ञात कठोरता की वस्तु से की जाती है।

       उदाहरण के लिए यदि कोई कील क्रिस्टल को खरोंच सकती है, तो कील उस खनिज की तुलना में कठोर है। 1800 के दशक की शुरुआत में लगभग 1812 में प्रसिद्ध भूविज्ञानी और खनिजविज्ञानी फ्रेंडरिक मोहस ने स्क्रैच परीक्षण के आधार पर एक सापेक्ष कठोरता पैमाना विकसित किया। उन्होंने प्रत्येक खनिज को पूर्णांक संख्याएँ दी, जहाँ 1 सबसे नरम और 10 सबसे कठोर है।

     यद्यपि इनका यह पैमाना रैखिक नहीं है (कोरंडम वास्तव में क्वार्ट्ज की तुलना में 4 गुना अधिक कठोर है), और अन्य तरीकों ने अब कठोरता के अधिक कठोर माप प्रदान किए हैं। मोहस पैमाने में सटीकता की कमी के बावजूद, यह आज भी उपयोगी बना हुआ है क्योंकि यह सरल याद रखने में आसान एवं परीक्षण करने में आसान है।

     पॉकेटनाइफ का स्टील (भूवैज्ञानिकों के लिए क्षेत्र में ले जाने के लिए एक सामान्य उपकरण) लगभग ठीक मध्य में पड़ता है, इसलिए ऊपरी आधे हिस्से को निचले आधे से अलग करना आसान होता है। उदाहरण के लिए, क्वार्ट्ज और कैल्साइट बिल्कुल एक समान दिखते हैं। दोनों रंगहीन एवं पारभासी हैं, और विभिन्न प्रकार की चट्टानों में पाए जाते हैं। लेकिन एक साधारण स्क्रैच परीक्षण उन्हें अलग बता सकता है।

      कैल्साइट को पॉकेटनाइफ या पत्थर के हथौड़े से खरोंचा जाएगा और क्वार्ट्ज को नहीं। जिप्सम भी काफी हद तक कैल्साइट जैसा दिख सकता है, लेकिन यह इतना नरम होता है कि इसे नाखून से खरोंचा जा सकता है। कठोरता में भिन्नता खनिजों को विभिन्न प्रयोजनों के लिए उपयोगी बनाती है।

       कैल्साइट की कोमलता इसे मूर्तिकला के लिए, एक लोकप्रिय सामग्री बनाती है (संगमरमर पूरी तरह से कैल्साइट से बना होता है) जबकि हीरे की कठोरता का मतलब है कि इसका उपयोग चट्टान को चमकाने के लिए अपघर्षक के रूप में किया जाता है।

खनिज कठोरता
Tak 1
Gypsum 2
Calcite 3
Fluorite 4
Apatite 5
Feldspar 6
Quartz 7
Topaz 8
Corundum 9
Diamond 10

4. क्रिस्टल रूप (Crystal form):-

    किसी खनिज क्रिस्टल अर्थात् कणों का ब्राह्मरूप (बाहरी आकार या उसका क्रिस्टल रूप) बहुत सीमा तक उसकी आंतरिक परमाणु संरचना द्वारा निर्धारित होता है, जिसका अर्थ है कि यह गुण अत्यधिक नैदानिक हो सकता है। खनिजों के कण घनाकार, अष्टभुजाकार या षट्भुजाकार भी हो सकते हैं। विशेष रूप से, क्रिस्टल के रूप को क्रिस्टल चेहरों के बीच कोणीय सम्बन्धों द्वारा परिभाषित किया जाता है। कुछ खनिज, जैसे हेलाइट (NaCl या नमक) और पाइराइट (FeS) का घन रूप (cubic form) होता है।

     अन्य जैसे टूमलाइन प्रिज्मीय (prismatic) है। कुछ खनिज जैसे अजुराइट और मैलाइट, जो दोनों ताँबे के अयस्क हैं, नियमित क्रिस्टल नहीं बनाते हैं, और अनाकार (amorphous) होते हैं।

   दुर्भाग्य से, हमें सदैव क्रिस्टल का रूप देखने को नहीं मिलता। हम पूर्ण क्रिस्टल तभी देख पाते हैं जब उन्हें किसी गुहा में विकसित होने का अवसर मिलता है, जैसे कि जियोड में। हालांकि, जब ठंडा मैग्मा के संदर्भ में क्रिस्टल बढ़ते हैं, तो वे अन्य सभी क्रिस्टल के साथ जगह के लिए प्रतिस्पर्धा कर रहे होते हैं जो बढ़ने का प्रयास कर रहे होते हैं और वे जितनी भी जगह भर सकते हैं, भर लेते हैं। क्रिस्टल का आकार उपलब्ध स्थान की मात्रा के आधार पर काफी भिन्न हो सकता है, लेकिन क्रिस्टल फेस के मध्य का कोण सदैव समान रहता है।

5. घनत्व (Density):-     

       खनिजों का घनत्व व्यापक रूप से लगभग 1.01 ग्राम / सेमी से लेकर लगभग 17.5 ग्राम/सेमी तक भिन्न होता है। पानी का घनत्व 1 ग्राम / सेमी है, शुद्ध लोहे का घनत्व 7.6 ग्राम/सेमी है, शुद्ध सोने का घनत्व 17.65 ग्राम सेमी है। इसलिए, खनिज पानी एवं शुद्ध सोने के मध्य घनत्व की सीमा पर होते हैं।

       किसी विशिष्ट खनिज के घनत्व को मापने के लिए समय लेने वाली तकनीकों की आवश्यकता होती है, और अधिकांश भूवैज्ञानिकों ने “सामान्य” घनत्व क्या है, इसके आकार के लिए असामान्य रूप से भारी क्या है, और असामान्य रूप से हल्का क्या है। इसके लिए अधिक सहज ज्ञान विकसित किया है। किसी चट्टान को “तौल” करके अनुभवी भूविज्ञानी आमतौर पर अनुमान लगा सकते हैं कि चट्टान किन खनिजों से बनी है।

6. दरार (विदलन) और फ्रैक्चर (Cleavage and Fracture):-

        खनिज विज्ञान में क्रिस्टलीय सामग्रियों की निश्चित क्रिस्टलोग्राफिक संरचनात्मक विमानों के साथ विभाजित होने की प्रवृत्ति है। सापेक्ष कमजोरी के ये स्तर क्रिस्टल में परमाणुओं और आयनों के नियमित स्थान का परिणाम हैं, जो चिकनी दोहराव वाली सतह बनाते हैं जो माइक्रोस्कोप और नग्न आँखों दोनों में दिखाई देते हैं। दरार क्रिस्टलोग्राफिक विमानों के समानांतर बनती है।

        इसे ऐसे भी समझा जा सकता है, कि अधिकांश खनिजों में उनकी परमाणु संरचनाओं के भीतर अंतर्निहित कमजोरियाँ होती हैं एक ऐसा तल जिसके साथ बंधन की ताकत आसपास के बंधनों से कम होती है। जब हथौड़े से मारा जाता है या अन्यथा तोड़ दिया जाता है, तो खनिज पहले से मौजूद कमजोरी के उस स्तर पर टूट जाएगा। इस प्रकार के टूटने को दरार कहा जाता है, और दरार की गुणवत्ता बंधन की ताकत के साथ बदलती रहती है।

         खनिजों में विदलन प्रकृति दिशा द्वारा निश्चित होती है। खनिज एक या अनेक दिशाओं में एक-दूसरे से कोई भी कोण बनाकर टूट सकते हैं। 

(i) बेसल या पिनाकोइडल दरार तब होती है जब केवल एक दरार तल होता है, जैसे-ग्रेफाइट, अभ्रक (Mica) (मास्कोवाइट या बायोटाइट)। यही कारण है कि अभ्रक को छीलकर पतली शीट में बदला जा सकता है।

(ii) क्यूबिक दरार तब होता है जब तीन दरार तल 90 डिग्री पर एक-दूसरे को काटते हैं। जैसे- हेलाइट, गैलेना।

(iii) अष्टफलकीय बिदलन तब होता है जब एक क्रिस्टल में चार विदलन तल होते हैं। अर्धचालकों के लिए अष्टफल्कीय विदलन सामान्य है। जैसे-हीरा, फ्लोराइट।

(iv) रौम्बोहेड्रल दरार तब होती है जब तीन दरार तल ऐसे कोणों पर एक-दूसरे को काटते हैं जो 90 डिग्री नहीं होते हैं जैसे-कैल्साइट।

(v) प्रिज्मीय दरार तब होती है जब एक क्रिस्टल में दो दरार तल होते हैं, जैसे- स्पोडुमिन।

(vi) डोडेकाहेड्रल दरार तब होती है जब एक क्रिस्टल में छह दरार तल होते हैं, जैसे स्पेलराइट।

7. खनिज वर्गीकरण प्रणाली (Mineral Classification Systems):-

       मध्य युग से 1800 के दशक के मध्य तक खनिजों के वर्गीकरण के लिए भौतिक गुण मुख्य आधार थे। खनिजों को कठोरता के अनुसार समूहीकृत किया गया था, जिसमें हीरा एवं कोरन्डम खनिज एक ही वर्ग में थे। जैसे-जैसे खनिजों की रासायनिक संरचना निर्धारित करने की क्षमता विकसित हुई, वैसे-वैसे एक नई वर्गीकरण प्रणाली भी विकसित हुई हैं।

      कई वैज्ञनिकों ने खनिज रासायनिक सूत्रों की खोज में योगदान दिया, लेकिन 1850 से 1892 तक येल विश्वविद्यालय के खनिज विज्ञानी जेम्स ड्वाइट डाना ने रासायनिक संरचना के आधार पर खनिजों के लिए वर्गीकरण प्रणाली विकसित को जो आज तक चल रही है। उन्होंने खनिजों को उनके आयनों के अनुसार समूहीकृत किया। एक रासायनिक वर्गीकरण प्रणाली का मतलब था कि जिन खनिजों को सैद्धांतिक रूप से एक साथ समूहीकृत किया गया था, वे भी चट्टानों में एक-दूसरे के साथ दिखाई देते थे क्योंकि वे समान भू-रासायनिक परिस्थितियों में विकसित होते थे।

        अभी भी भौतिक गुण खनिजों की पहचान के लिए मुख्य साधन हैं, हालांकि, अब उनका उपयोग खनिजों को समूहित करने के लिए नहीं किया जाता है। एक संरचना आधारित समूहन कुछ सामान्य खनिज संघों पर प्रकाश डालता है जो भूवैज्ञानिकों को एक त्वरित नजर से भी इस बारे में शिक्षित अनुमान लगाने की अनुमति देता है कि चट्टान में कौन से खनिज मौजूद हैं।

     अब तक सबसे आम खनिज सिलिकेट हैं, जो पृथ्वी की परत का 90% भाग बनाते हैं। सैकड़ों नामित सिलिकेट खनिजों में से केवल आठ ही सामान्य हैं, जिनमें से एक क्वार्ट्ज है। हालांकि, असामान्य खनिज महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि उनमें आर्थिक रूप से महत्वपूर्ण जैसे गैलेना, जो सीसा के लिए प्राथमिक अयस्क हैं, और ऐपेटाइट, फॉस्फोरिक एसिड के लिए खनन किया जाने वाला फॉस्फेट शामिल हैं, जिसे उर्वरकों में जोड़ा जाता है।

8. धारियाँ ( Streak):-

      खनिजों में विभिन्न रंगों के मिश्रण के कारण धारियाँ होती हैं। किसी खनिज की धारियाँ उस पाउडर के रंग की होती है जो तब उत्पन्न होता है जब इसे किसी अपक्षयित सतह पर खींचा जाता है। किसी खनिज के स्पष्ट रंग के विपरीत, जो अधिकांश खनिजों के लिए काफी भिन्न हो सकता है, बारीक पिसे हुए पाउडर के निशान में आमतौर पर अधिक सुसंगत विशेषता वाला रंग होता है और इस प्रकार यह खनिज पहचान में एक महत्वपूर्ण नैदानिक उपकरण है। यदि कोई लकीर बनी नहीं दिखती है, तो खनिज की लकीर सफेद या रंगहीन मानी जाती है। अपारदर्शी और रंगीन सामग्रियों के निदान के रूप में स्ट्रीक विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण है।

(i) कुछ खनिज अपने प्राकृतिक रंगों के समान एक धारियाँ छोड़ते हैं, जैसे सिनेबार और लाजुराइट।

(ii) अन्य खनिज आश्चर्यजनक रंग छोड़ते हैं, जैसे फ्लोराइट, जिसमें हमेशा एक सफेद लकीर होती है। हालांकि यह बैंगनी, नीले, पीले या हरे क्रिस्टल में दिखाई दे सकता है।

(iii) हेमेटाइट, जो दिखने में काला होता है, एक लाल लकीर या चेरी लाल छोड़ता है जो इसके नाम का कारण बनता है, जो ग्रीक शब्द “हैमा” से आया है जिसका अर्थ है “रक्त”

(iv) गैलेना, जो दिखने में हेमेटाइट के समान हो सकता है, अपनी भूरे रंग की लकीर से आसानी से पहचाना जा सकता है।

खनिज संसाधनों को उपयोग (Uses of Mineral Sources)-

      खनिज संसाधनों के उपयोग में से कुछ हैं-

1. भवनों, पुलों एवं आवास निर्माण के उपयोग किया जाता है।

2. उद्योगों एवं मशीनरी के विकास में इसका उपयोग किया जाता है।

3. मुख्य रूप से कोयला, पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस का उपयोग ऊर्जा उत्पादन के लिए किया जाता है।

4. रक्षा उपकरणों के विकास के लिए उपयोग किया जाता है।

5. टेलीफोन, तार, केबल, इलेक्ट्रॉनिक उपकरण आदि जैसे संचार के क्षेत्र में उपयोग किया जाता है।

6. विभिन्न प्रयोजनों के लिए मिश्र धातुओं का निर्माण।

7. आभूषणों के निर्माण के लिए उपयोग किया जाता है जैसे सोना, हीरा, चाँदी आदि के आभूषण।

8. उर्वरकों, कवकनाशी आदि के संश्लेषण के लिए उपयोग किया जाता है।


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3. वॉन थ्यूनेन के कृषि स्थानीयकरण सिद्धान्त 

3. वॉन थ्यूनेन के कृषि स्थानीयकरण सिद्धान्त



        कृषि उत्पादन का कार्य विस्तृत क्षेत्र पर होता है, इसीलिए साधारणतया इसमें स्थानीयकरण सम्बन्धी कोई समस्या प्रथम दृष्टया नजर नहीं आती, किन्तु जिस तरह किसी उद्योग के किसी स्थान विशेष पर स्थानीयकरण की समस्या उत्पन्न होती है, उसी तरह यह समस्या कृषि उत्पादन में भी होती है। इस समस्या के समाधान हेतु 1826 में सर्वप्रथम वॉन थ्यूनेन ने प्रयास किया।

      जॉन हेनरिज वॉन थ्यूनेन (1783-1850) एक जर्मन विद्वान थे। सन् 1810 में वे रोस्टोक नगर के नजदीक मैकलनबर्ग में टेलो कृषि फार्म के मैनेजर बने। थ्यूनेन जीवनपर्यन्त 40 सालों तक बड़ी ही कुशलता एवं सफलता के साथ अपना पद सम्भाले रहे।

       अपने जीवन के अन्तिम 40 वर्षों में उन्होंने अपना फार्म चलाने के लिए लागत तथा उत्पादन की छोटी से छोटी जानकारी का अध्ययन किया। उन्होंने अपने कृषि अवलोकनों के माध्यम से एक विशेष तरह के परस्पर सम्बन्ध को ढूँढ निकाला, जो कि तुलनात्मक लाभ के सिद्धान्त पर आधारित था।

      वॉन व्यूनेन के उस कृषि स्थानीयकरण सिद्धान्त पर विचार करने से पहले उनके द्वारा प्रयुक्त कुछ शब्दाबलियों से परिचित होना आवश्यक है:

(अ) आर्थिक लगान (Economic Rent)- आर्थिक लगान वस्तुतः वह सापेक्षिक लाभ है, जो किसी फसल को बाजार के नजदीक की भूमि पर उपजाने से प्राप्त होता है।

(ब) लगान शून्य भूमि (No Rent Land)- ऐसी सीमान्त क्षेत्र की भूमि जहां फसल उत्पादन से कोई लाभ प्राप्त नहीं होता, लगान शून्य भूमि कहते हैं।

     वॉन थ्यूनेन ने अपने जटिल सिद्धान्त को सरल रूप देने के लिए कुछ मान्यताओं की एक सूची तैयार की, ताकि सम्बन्धित बाधाओं पर अंकुश रखा जा सके। इनकी मान्यताएँ निम्न प्रकार थीं:

1. सर्वप्रथम उन्होंने एक ऐसे विलग प्रदेश (Isolated (State) की कल्पना की, जिसके केन्द्र में एक ही नगर स्थित हो और उस नगर के चतुर्दिक विस्तृत क्षेत्र हो। वह नगर उस प्रदेश का एकमात्र क्रय-विक्रय स्थल (बाजार) हो। उस प्रदेश से न तो कृषि उत्पाद बाहर बेचा जाता हो और न ही वह नगर अन्य प्रदेश से आयात करता हो।

2. केन्द्रीय नगर को छोड़कर सम्पूर्ण क्षेत्र में ग्रामीण आबादी हो। ग्रामीण आबादी अधिकतम लाभ प्राप्ति की इच्छुक हो और नगर में मांग के अनुरूप फसलों की किस्मों में फेरबदल करने में सक्षम हो।

3. उस विलग प्रदेश में भूतल समान हो तथा सर्वत्र समान भौतिक दशाएँ हों, अर्थात् धरातल, जलवायु, मृदा की उत्पादन क्षमता, आदि सर्वत्र समान हो तथा फसलोत्पादन के अनुकूल हो।
4. सम्पूर्ण प्रदेश में उत्पादन एवं परिवहन की लागत समान हो। साथ ही कृषि उत्पादन में प्रदेश आत्मनिर्भर भी हो।

5. इस विलग प्रदेश में एक ही प्रकार का परिवहन साधन घोड़ा गाड़ी उपलब्ध हो।

6. परिवहन व्यय दूरी एवं भार के अनुपात में वृद्धिमान हो।

        इन मान्यताओं के पश्चात् थ्यूनेन ने कहा कि उक्त प्रकार अनुकूल दशाओं वाले विलग प्रदेश में केन्द्रीय नगर के चारों की तरफ नगर से बढ़ती दूरी के अनुरूप विभिन्न फसलों का उत्पादन पृथक्-पृथक् संकेन्द्रीय वृत्तखण्डों (Concentric Zones) में होगा।

      नगर के निकटतम प्रथम वृत्तखण्ड में फल, शाक-सब्जी व दूध का उत्पादन होगा, क्योंकि इन वस्तुओं की मांग नगर में अधिक रहती है और ये जल्दी खराब भी हो जाती हैं। इस पेटी का क्षेत्रीय विस्तार नगर की जरूरतों पर निर्भर करता है। अगर नगरीय जनसंख्या में इन चीजों की मांग अधिक होगी, तो यह पेटी अधिक दूरी तक विस्तृत होगी।

      द्वितीय वृत्तखण्ड में ईंधन के लिए लकड़ी का उत्पादन कार्य होगा। लकड़ी के भारी होने के कारण यद्यपि परिवहन व्यय अधिक होगा, परन्तु शाक-सब्जी व दूध के परिवहन व्यय से कम ही होगा, अतः इन्हें द्वितीय वृत्तखण्ड में ही स्थान दिया जाएगा।

     तृतीय वृत्तखण्ड की भूमि में गहन कृषि द्वारा अन्नोत्पादन किया जाएगा। गहन अन्नोत्पादन की वजह से पशुचारण के लिए परती जमीन नहीं छोड़ी जाएगी, किन्तु चतुर्थ वृत्तखण्ड में विस्तृत कृषि प्रणाली द्वारा अन्नोत्पादन होगा और साथ ही पशुपालन भी। परिवहन व्यय की सापेक्षिक दर के अनुसार ही पंचम वृत्तखण्ड में तीन खेत प्रणाली अपनाई जाएगी। अन्त में, षष्टम खण्ड में मांस तथा दूध प्राप्ति हेतु पशुपालन होगा। मांस वाले पशुओं को पैदल ही नगर को भेज दिया जाएगा, किन्तु दूध को परिवर्तित स्वरूप में अर्थात् मक्खन, पनीर, आदि के रूप में बाजार में भेजा जाएगा।

वॉन थ्यूनेन

चित्र-1

1. फल तथा सब्जी

2. ईंधन के लिए लकड़ी

3. गहन कृषि

4. कृषि और पशुपालन

5. तीन खेती प्रणाली

6. विस्तृत पशुपालन (मांस तथा दुग्ध प्राप्ति हेतु पशुपालन)  

       इस तरह, वॉन थ्यूनेन के अनुसार नगर के चारों तरफ छह संकेन्द्रीय वृत्तखण्डों में विभिन्न फसलों का उत्पादन होगा। उन वृत्तखण्डों अनुसार का सीमांकन अधिकतम लगान के सिद्धान्त के होगा। दूसरे शब्दों में, इस विलग प्रदेश में नगर से बढ़ती दूरी के अनुसार विभिन्न वृत्तखण्डों में विभिन्न फसलों का उत्पादन स्पष्टतः परिवहन व्यय के अनुरूप निर्धारित होगा, जिसे निम्न सूत्र से स्पष्ट किया जा सकता है:

P= S – (E+T)

जहाँ, P = किसान को फसल विक्रय से लाभ

S  = फसल का विक्रय मूल्य

E = उत्पादन लागत

T = परिवहन व्यय

      अर्थात् किसी फसल का उत्पादन नगर से उतनी दूरी तक ही हो सकेगा, जितनी दूरी तक उसके उत्पादन लागत और बाजार में पहुंचने तक के व्यय का योग उस फसल के प्रचलित मूल्य के बराबर हो। इस तरह अब तक हम इस निष्कर्ष पर पहुंचे हैं कि कृषि पेटी की बाह्य दूरी परिवहन लागत के कारण घटते हुए लाभ के द्वारा निर्धारित होती है, परन्तु सिर्फ ऐसा ही नहीं है, वॉन थ्यूनेन के विचार से परिवहन व्यय तो मुख्य निर्धारक घटक है ही, साथ ही विभिन्न फसलों से प्राप्त ‘सापेक्षिक लाभ’ भी प्रभाव डालता है।

      अतः उन्होंने कहा कि किसी कृषि वृत्तखण्ड में आन्तरिक क्षेत्र में उसी फसल का उत्पादन किया जाएगा, जिससे किसान को अपेक्षाकृत अधिक आर्थिक लगान प्राप्त हो। इस तथ्य को थ्यूनेन ने संलग्न चित्र 2 के माध्यम से समझाया है।

वॉन थ्यूनेन

चित्र 2

चित्र में ‘क’, ‘ख’, ‘ग’ तथा ‘घ’ फसलों हेतु आर्थिक लगान और बाजार से दूरी का सम्बन्ध प्रदर्शित है, जबकि अन्य तथ्य समान माने गए हैं। कोई फसल बाजार से जितनी दूर उत्पादित की जाएगी, स्पष्टतः उस पर परिवहन व्यय उसी अनुपात में बढ़ जाएगा और लगान घटता चला जाएगा। यही कारण है कि लगान व दूरी का सम्बन्ध प्रदर्शित करती सरल रेखाएं झुकती हुई दिखाई गई हैं। चूंकि सभी फसलों की परिवहन दशाएं समान नहीं हैं, अतः ढाल प्रवणता में भिन्नता दृष्टिगोचर होती है।

       ग्राफ में ‘क’ फसल का उत्पादन 4.5 मील तक हो सकता है। इसी प्रकार ‘ख’ फसल का 10 मील, ‘ग’ का 25 मील तथा ‘घ’ का 40 मील तक उत्पादन हो सकता है, क्योंकि क्रमशः इन्हीं दूरियों तक इन फसलों के उत्पादन से कुछ-न-कुछ आर्थिक लगान जरूर प्राप्त होगा, परन्तु सापेक्षिक लाभ के सिद्धान्त के आधार पर देंखे तो ‘क’ फसल (शाक-सब्जी-दूध) का उत्पादन विक्रय स्थल (नगर) से 1.7 मील की दूरी तक ही हो सकता है, क्योंकि उसके आगे इससे प्राप्त लगान ‘ख’ फसल से कम हो जाता है।

       इसी तरह ‘ख’ फसल (ईंधन हेतु लकड़ी) का उत्पादन 5 मील तक, ‘ग’ फसल (गहन कृषि) 19 मील तथा ‘घ’ फसलोत्पादन (विस्तृत कृषि) 40 मील की दूरी तक हो सकता है।

       इसके बाद की भूमि पर मांस व दूध के लिए पशुपालन होगा। अगर विक्रय स्थल (नगर) को केन्द्र मानकर इन्हीं दूरियों की त्रिज्या से वृत्त खींचे जाएं, तो नगर के चारों ओर इन विभिन्न फसलों के उत्पादन वाले संकेन्द्रीय वृत्तखण्ड बन जाते हैं।

वॉन थ्यूनेन

चित्र-3

      समय गुजरने के साथ-साथ वॉन थ्यूनेन द्वारा प्रतिपादित संकेन्द्रीय वृत्तखण्ड में फसल उत्पादन की आलोचना होने लगी। लोगों द्वारा यह प्रश्न उठाया जाने लगा कि यदि परिवहन के साधनों में बदलाव हो जाए, तो क्या संकेन्द्रीय वृत्तखण्ड का स्वरूप बरकरार रह सकेगा? थ्यूनेन को भी लगा कि उनके सिद्धान्त में कहीं कुछ कमी है।

       अतः सिद्धान्त को संशोधित करने के लिए उन्होंने एक नौ-परिवहन योग्य नदी को भी परिवहन के साधन के रूप में माना और कहा कि इससे माल ढुलाई तीव्र गति से होगी एवं धरातलीय परिवहन की तुलना में इस पर मात्र 10 प्रतिशत लागत आएगी।

      दूसरे, उन्होंने एक वैकल्पिक विक्रय स्थल को भी इस मॉडल में स्थान दिया, जिसमें प्रतियोगिता की पर्याप्त गुंजाइश हो। तीसरा परिवर्तन उन्होंने भूमि की समरूप उर्वरता शक्ति वाली मान्यता में किया। इन सब परिवर्तनों का प्रभाव यह हुआ कि आज के भूमि उपयोग विन्यास की भांति थ्यूनेन के संशोधित मॉडल का भी स्वरूप अनियमित दिखने लगा।

        वर्तमान में कृषि स्थानीयकरण सिद्धान्त को व्यावहारिक रूप से चरितार्थ करने में थ्यूनेन की काल्पनिक मान्यताएं खरी नहीं उतरतीं। आज के युग में विविध प्रकार के तथा तीव्रगामी परिवहन के साधनों का विकास हो गया है। उत्तरोत्तर प्राविधिक विकास के फलस्वरूप परिवहन के साधनों के अलावा अन्य सामाजिक-आर्थिक कारक यथा- कृषि उत्पादन की वैज्ञानिक तकनीक, आदि भी किसी प्रदेश के भूमि उपयोग को प्रभावित करने लगे हैं।

     19वीं सदी में, जब इस सिद्धान्त का जन्म हुआ था, नगरों में लकड़ी का महत्व अधिक था। खाना पकाने के अतिरिक्त घरों को गर्म रखने के लिए लकड़ी जलाई जाती थी, जबकि आज खाना पकाने हेतु रसोई गैस या मिट्टी के तेल का उपयोग होता है और घरों को गर्म रखने के लिए विद्युत् चालित रूम हीटर का।

      वायुयान, रेल जैसे तीव्रगामी एवं शीत-प्रशीतकों से परिवहन साधनों का विकास हो जाने के कारण फल, ‘युक्त शाक-सब्जी, दूध, आदि शीघ्र खराब होने वाले पदार्थों को बहुत दूर उत्पादित कर भी उन्हें शीघ्र शहर भेजना सम्भव है।

      अब किसी क्षेत्र में फसल के क्रय-विक्रय हेतु मात्र एक विक्रय स्थल (बाजार) न होकर कई विक्रय स्थल उपलब्ध हैं। तीव्रग्रामी परिवहन साधनों के विकसित हो जाने के कारण परिवहन व्यय दर भी भार तथा दूरी के अनुसार नहीं बढ़ती। थ्यूनेन ने विलग प्रदेश में एक समान प्राकृतिक वातावरण की कल्पना की थी, जो असम्भव है।

       अगर एकाकी प्रदेश में केन्द्रीय नगर के एक तरफ धरातल अधिक समतल व उपजाऊ है, तो स्वाभाविक सी बात है कि संकेन्द्रीय वृत्तखण्ड का एक ओर विस्तार अधिक होगा और दूसरी ओर कम, फलतः संकेन्द्रीय वृत्त का वास्तविक आकार नहीं बनेगा और उसका रूप विकृत हो जाएगा।

     इस तरह वर्तमान समय में विलग प्रदेश में पाई जाने वाली विभिन्नताएं कई नगर, उपनगर व केन्द्रीय नगरों की उपस्थिति, वैज्ञानिक व तकनीकी ढंग से कृषि का होना, परिवहन के विविध आधुनिक साधन, परिवहन व्यय में भिन्नता तथा प्राकृतिक वातावरण में विभिन्नता के फलस्वरूप कृषि के स्थानीयकरण में क्रमबद्धता का पाया जाना कठिन है। तथापि इस मॉडल का सारा कुछ अप्रासंगिक हो गया हो, ऐसा भी नहीं है। इसके ऐतिहासिक पक्ष को नजरअन्दाज कर इसकी आलोचना करना अवैज्ञानिक है।

        वॉन थ्यूनेन ने इस सिद्धान्त का विवेचन बड़े तार्किक व वैज्ञानिक ढंग से किया है। अनेक त्रुटियों के होते हुए भी उनके सिद्धान्त का विशेष महत्व है, क्योंकि इस सिद्धान्त ने कृषि भूगोल के अध्ययन में एक नवीन अध्याय का शुभारम्भ किया औ अनेक विद्वानों का ध्यान अपनी तफ आकर्षित किया।



उत्तर लिखने का दूसरा तरीका



वॉन थ्यूनेन के कृषि स्थानीयकरण सिद्धांत की आलोचनात्मक व्याख्या करें तथा वर्तमान में इसकी क्या प्रासंगिकता है। इसकी भी चर्चा करें।

        वॉन थ्यूनेन एक जर्मन अर्थशास्त्री थे जिन्होंने 1826 ई० में कृषि स्थानीयकरण का सिद्धांत प्रस्तुत किया। इनका सिद्धांत “सकेन्द्रीय वलय सिद्धांत” के नाम से जाना जाता है। हालांकि यह सिद्धांत 198 वर्ष पूर्व दिया गया था, लेकिन इसकी चर्चा आज भी भूगोल में की जाती है। वर्तमान समय में कृषि का प्रारूप बदल गया है। इसके बावजूद भी इनका सिद्धांत आर्थिक भूगोल में मान्यता रखता है।

मान्यताएँ:-

        वॉन थ्यूनेन का कृषि स्थानीयकरण सिद्धांत एक चिर सम्मतकालीन सिद्धांत (Classical theory) है जो निम्नलिखित मान्यताओं पर आधारित है।

(1) भौगोलिक प्रदेश एकाकी (पृथक) होना चाहिए।

(2) भौगोलिक प्रदेश के बीच में एक केन्द्रीय बाजार होना चाहिए।

(3) इसकी भौगोलिक प्रदेश में सभी भौतिक परिस्थितियाँ (जैसे – स्थलाकृति, जलवायु, मृदा और वनस्पति) एक समान हो।

(4) केन्द्रीय बाजार की एकाकी भौगोलिक प्रदेश में क्रय-विक्रय का केन्द्र हो।

(5) केन्द्रीय बाजार निश्चित बाजार मूल्य पर क्रय-विक्रय का कार्य करता हो।

(6) सम्पूर्ण एकाकी प्रदेश में कृषि उत्पादन लागत एक समान हो, लेकिन दूरी के अनुसार परिवहन मूल्य में परिवर्तन होता हो।

(7) कृषकों को बाजार का पूर्ण ज्ञान हो।

(8) एकाकी भौगोलिक प्रदेश में घोड़ागाड़ी और नौका का प्रयोग परिवहन के रूप में किया जाता हो।

(9) दूरी और भार में वास्तविक वृद्धि के अनुसार परिवहन मूल्य में वृद्धि होता हो।

        ऊपर वर्णित मान्यताएँ जिन भौगोलिक प्रदेशों में लागू होती है वहीं वॉन थ्यूनेन के कृषि अवस्थिति सिद्धांत लागू होता है।

परिकल्पनाएँ:-

        वॉन थ्यूनेन ने निम्नलिखित दो प्रमुख परिकल्पनाओं का निर्धारण किया है।

(1) केन्द्रीय नगर से ज्यों-2 दूर जाते हैं त्यों-2 फसल विशेष की गहनता में क्रमिक रूप से कमी आती है।

(2) केन्द्रीय नगर से दूरी में ज्यों-2 वृद्धि होती है त्यों-2 भू-उपयोग प्रारूप में संकेन्द्रीय पेटी के रूप में परिवर्तन होता है।

सकेन्द्रीय वलय सिद्धांत

       वॉन थ्यूनेन के अनुसार केन्द्रीय नगर के चारों तरफ कृषि भूमि उपयोग की 6 संकेन्द्रीय वलय पेटियों का विकास होता है। वॉन थ्यूनेन ने नगरों के चारों ओर विकसित सकेन्द्रीय वलय पेटियों को समझाने हेतु दो मॉडल प्रस्तुत किया है:-

(1) सैद्धांतिक मॉडल

(2) व्यवहारिक मॉडल

        सैद्धांतिक मॉडल पूर्णतः ज्यामितीय है जबकि व्यवहारिक मॉडल पूर्णतः संशोधित है। वॉन थ्यूनेन ने संशोधन के लिए दो करकों को जिम्मेदार ठहराया है।

(1) अधिकतर नगर नदी के किनारे होते हैं और नदी परिवहन प्रभाव के कारण सकेन्द्रीय वलय पेटियाँ पूर्णतः गोल न होकर नदी प्रवाह की तरफ प्रक्षेपित हो जाती है।

(2) बड़े नगरों के बाहरी क्षेत्रों में भी छोटे केन्द्रीय बस्तियों का विकास हो जाता है जिसके कारण भी सकेन्द्रीय वलय पेटियाँ निरूपित हो जाती है।

        वॉन थ्यूनेन के द्वारा प्रस्तुत सैद्धांतिक मॉडल एवं व्यवहारिक मॉडल नीचे के चित्र में देखा जा सकता है-

चित्र:- वॉन थ्यूनेन का सैद्धांतिक मॉडल

चित्र:- वॉन थ्यूनेन का व्यवहारिक मॉडल

         वॉन थ्यूनेन के अनुसार नगरों के चारों ओर निम्नलिखित सकेन्द्रीय वलय पेटी का विकास होता है:-

1. फल, सब्जी एवं दुग्ध 

2. ईंधन के लिए लकड़ी/वन

3. गहन खाद्यान कृषि

4. कृषि और पशुपालन

5. तीन खेती प्रणाली

6. पशुपालन (चारागाह)

        वॉन थ्यूनेन ने बताया कि नगर के तत्काल बाहर फल, सब्जी और दुग्ध की कृषि की जाती है क्योंकि ये दैनिक आवश्यकता की वस्तु है तथा शीघ्र विनष्ट होने की प्रवृ‌ति रखते हैं। अगर इसकी खेती नगरों से दूर किया जाता है तो वे बर्बाद हो सकते हैं।

      दूसरी पेटी में जलावन की लकड़ी या वन का विकास होता है क्योंकि यह कम मूल्य का भारी वस्तु है। अत: दूर से इसका परिवहन मंहगी होती है।

     तीसरी पेटी में खाद्यान्न फसल पेटी का विकास होता है क्योंकि फल, सब्जी, दुग्ध मिलने के बाद खाद्य फसल अनिवार्य वस्तु है। नगरों में खाद्यान्न की मांग बहुत अधिक होती है। इसलिए किसान तीसरी पेटी में खाद्यान्न फसल का विकास करते हैं।

       चौथी पेटी में खाद्यान्न फसल, परती भूमि और पशुचारण साथ-2 की जाती है। चौथी पेटी में खाद्यान्न फसल की खेती गहनता से नहीं की जाती है क्योंकि एक ओर बाजार से जहाँ दूरी बढ़ जाती है वहीं खाद्यान्न फसलों की माँग में कमी आने लगती है। चौथी पेटी में निवास करने वाले किसान समय-समय पर परती भूमि को छोड़‌ते रहते हैं तथा पशुचारे की कृषि भी करते हैं।

     पाँचवी पेटी में कृषि भूमि का तीन भागों में विभाजन होता है। इसलिए इस पेटी को तीन कृषि पद्धति वाली पेटी कहते हैं। 5वीं पेटी का किसान अपने कुल भूमि के 1/3 भाग पर खाद्यान्न के उत्पादन, 1/3 भूमि पर पशुपालन और शेष 1/3 भूमि परती भूमि के रूप में उपयोग करता है। कृषि भूमि का यह विभाजन फसल चक्र के नियम पर आधारित होता है अर्थात इस पेटी के किसान अपने भूमि पर लगातार 2-3 वर्षों तक कृषि करते है। उसके बाद उसे परती भूमि के रूप में छोड़ देते हैं।

       छठी पेटी में पशुपालन का कार्य बड़े पैमाने पर किया जाता है क्योंकि छठी पेटी में जनसंख्या का दबाव बहुत कम होता है और नगर से दूरी बहुत अधिक होती है। किसानों के पास अधिक भूमि रहने के कारण पशुपालन को प्रमुखता प्रदान करते हैं।

सकेन्द्रीय वलय पेटी के निर्धारण की विधि

      वॉन थ्यूनेन महोदय ने एक ग्राफ के माध्यम से सकेन्द्रीय वलय पेटियों का निर्धारण किया है। उन्होंने परिकल्पना में कहा है कि नगर से बढ़ती दूरी के साथ-साथ फसलों की गहनता में कमी आते-जाती है। अतः वह बिन्दु जहाँ आर्थिक लगान किसी भी अन्य फसल की तुलना में अधिक होता है वही बिन्दु उस सकेन्द्रीय वलय पेटी की अंतिम सीमा होती है। इसे नीचे के ग्राफ से समझा जा सकता है।

आलोचनात्मक मूल्यांकन

         वर्तमान समय में कृषि तकनीक का विकास नगरीकरण में वृद्धि और जनसंख्या में तेजी से वृद्धि होने के बावजूद वॉन थ्यूनेन के सिद्धांत में कोई आधारभूत परिवर्तन नहीं हुआ है।

        1925 में जॉनसन महोदय ने स्टॉकहोम (स्वीडेन) को केन्द्र मानकर और 1932 ई० में बाल्केनबर्ग महोदय ने नगर में उ०-पश्चिमी यूरोप को एक केन्द्र मानकर इनके सिद्धांत को पुष्ट किया। दोनों ने अपने अध्ययन में बताया है कि वॉन थ्यूनेन के मुताबिक ही यहाँ सकेन्द्रीय पेटियों का विकास हुआ है। इन पेटियों में थोड़ा बहुत परिवर्तन देखा जा सकता है। जैसे:- पहली पेटी में आज भी दुग्ध और सब्जी की खेती होती है। दूसरी पेटी में खाद्यान्न फसल, तीसरी पेटी में पशुपालन और चौथी पेटी में वानिकी का कार्य होता है। इस परिवर्तन का कारण बताते हुए कहा है कि जीवाश्म ऊर्जा के विकास के कारण ईंधन की लकड़ी का महत्त्व घट गया है, इसलिए यह पेटी अब खिसकर बाहरी क्षेत्र में चला गया है।

भारत के संदर्भ में वॉन थ्यूनेन की कृषि स्थानीयकरण सिद्धांत

        कई भारतीय भूगोलवेत्ताओं ने भी इनके मॉडल का अध्ययन किया है। 1972 ई० में भी प्रोमिला कुमार ने भोपाल नगर के संदर्भ में इसका अध्ययन किया और पाया कि वॉन थ्यूनेन सिद्धांत के अनुरूप ही सकेन्द्रीय वलय पेटियों का विकास हुआ है। अलीगढ़ विश्वविद्यालय के अली मुहम्मद सहित कई लोगों ने UP नगरों के संदर्भ में, जशबीर सिंह (हरियाणा) के संदर्भ में, BL शर्मा (राजस्थान) के संदर्भ में इस मॉडल का अध्ययन किया और पाया कि वॉन थ्यूनेन के सिद्धांत के अनुसार ही प्रथम पेटी और तीसरी पेटी का विकास हुआ है लेकिन दूसरी पेटी खिसककर बाहर चला गया है।

      सैद्धांतिक तौर पर इनका सिद्धांत एक आदर्शवादी सिद्धांत प्रतीत होता है। लेकिन इस सिद्धांत की आलोचना कई आधारों पर की जाती है।

आलोचना

(1) वॉन थ्यूनेन ने अपनी संकल्पना (मान्यता) में एकाकी प्रदेश की संकल्पना प्रस्तुत किया है जो गलत है क्योंकि कोई भी प्रदेश वर्तमान समय में एकाकी प्रदेश नहीं रह सकता।

(2) किसी भी प्रदेश में केन्द्रीय नगर ही खरीद-बिक्री का एकमात्र केन्द्र नहीं हो सकता।

(3) भौगोलिक कारकों में समरूपता असंभव है।

(4) बाजार से बढ़ती दूरी के अनुसार वस्तुओं का मूल्य एक समान वृद्धि होना असंभव है।

(5) वर्तमान समय में आधु‌निक परिवहन के साधन विकसित हो चुके हैं। इसलिए नाव एवं घोड़ागाड़ी अव्यवहारिक हो चुका है।

(6) वॉन थ्यूनेन ने कहा है कि फल एवं सब्जी पेटी का विकास नगर के ठीक बाहरी क्षेत्रों में होता है। लेकिन वर्तमान समय में नगर से हजारों किमी० दूर फल, सब्जी एवं दुग्ध की कृषि की जा रही है और नगरों में आपूर्ति की जाती है। जैसे:- अमेरिका के झील प्रदेश में कैलिफोर्निया तथा फ्लोरिडा राज्य से फल एवं सब्जी की आपूर्ति की जाती है।

(7) वॉन थ्यूनेन के अनुसार दूसरी पेटी में ईधन लकड़ी की खेती की जाती है। लेकिन व्यवहारिक रूप में यह पेटी कहीं नहीं पायी जाती।

(8) वॉन थ्यूनेन के अनुसार व्यवहारिक सिद्धांत मॉडल में दो कारणों से संसोधन होता है- (i) नदी एवं (ii) छोटे नगर के कारण। लेकिन वर्तमान समय में उपजाऊ भूमि, नवीन तकनीक, रेल एवं सड़‌क परिवहन इत्यादि भी सकेन्द्रीय वलय पेटी में संशोधन लाते हैं।

निष्कर्ष

    अतः उपर्युक्त तथ्यों से स्पष्ट है कि वर्तमान समय के संदर्भ में इस सिद्धांत में कई त्रुटियाँ है। इन त्रुटियों के बावजूद कृषि स्थानीयकरण के संबंध में प्रस्तुत किया गया यह पहला सिद्धांत था, इसीलिए यह आज भी मान्यता रखता है।

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