14. Sindri Fertilizer Industries (सिन्दरी उर्वरक उद्योग)

14. Sindri Fertilizer Industries

(सिन्दरी उर्वरक उद्योग)



Sindri Fertilizer Industries

प्रश्न प्रारूप

Q. सिन्दरी उर्वरक उद्योग एक वृहत केन्द्र के रूप में व्याख्या कीजिए।

     सिन्दरी एकीकृत बिहार राज्य की एक प्रमुख उर्वरक उद्योग का एक महान् केन्द्र रहा है जो वर्तमान समय में झारखण्ड राज्य के धनबाद जिला में अवस्थित है। यह औद्योगिक केन्द्र धनबाद से 82 किमी० दक्षिण में अवस्थित है। यह छोटानागपुर खनिज औद्योगिक प्रदेश के दामोदर नदी घाटी में अवस्थित है। इसकी व्यापना 1951 ई० में किया गया था। यहाँ उर्वरक निर्माण के तीन इकाई है-

1. फर्टिलाइजर्स कारपोरेशन ऑफ इण्डिया लिमिटेड (FCIL)-

    यह अमोनियम सल्फेट, अमोनियम नाइ‌ट्रेट और आमोनिया कार्बोनेट नामक उर्वरक का उत्पादन करता है।

2. बिहार स्टेट सुपर फॉस्फेट (BBSF)-

     यह इकाई सुपर फॉस्फेट नामक उर्वरक का उत्पादन करता है।

3. गैनुलर फर्टिलाइजर्स फैक्ट्री-

      यह दामोदर उर्वरक का उत्पादन करता है।

     सिन्दरी को महान उर्वरक उत्पादन केन्द्र के रूप में विकसित करने पीछे कई भौगोलिक कारक उत्तरदायी रहे है। जैसे-

(i) सिन्दरी भारत के महान कोयला संचित भण्डार क्षेत्र में स्थित है। इसे झरिया क्षेत्र से कोयला की प्राप्ति हो जाती है।यहाँ कोयला से ही उर्वरक का उत्पादन होता है।

(ii) परिवहन मार्ग की सुविधा- सिन्दरी धनबाद से पुरुलिया जाने वाली राष्ट्रीय राजमार्ग पर अवस्थित है। यह रेलवे लाइन ये भी जुड़ी हुई है। रेगवे लाइन धनबाद, कोलकाता, मुम्बई, दिल्ली जैसे महानगरों से जुड़े हुए हैं। सिन्दरी में ही मंझोले एयरपोर्ट का भी निर्माण किया गया है। कालकोता एवं पारादीप बंदरगाह पास में ही अवस्थित है।

(iii) श्रमिक उपलब्धता- सिन्दरी सघन जनसंख्या वाले प्रदेश में अवस्थित है। कुशल इंजीनियरों की आपूर्ति हेतु सिन्दरी में ही बिहार इंजीनियरिंग कॉलेज की स्थापना की गई थी।

(iv) सिन्दरी को दामोदर और उसके सहायक नदी बराकर से पर्याप्त मात्रा में जल उपलब्ध हो जाती है।

(v) विद्युत आपूर्ति हेतु चन्द्रपुरा और सिन्दरी थर्मल प्लाण्ट से विद्युत मिल जाती है। आकस्मिक बिजली इसे दामोदर भैली कारपोरेशन (DVC) से मिल जाती है।

(vi) किसी उद्योग के विकास हेतु एवं पथरीली भूमि की आवश्यकता होती है जो सिन्दरी उर्वरक कारखाना को आसानी से उपलब्ध है।

(vii) सिन्दरी प० बंगाल और बिहार के मैदानी क्षेत्र के जंक्शन पर अवस्थित है जहाँ नाइट्रोजन एवं फॉस्फेटयुक्त उर्वरक की भारी माँग है। इस तरह इसे विस्तृत बाजार की सुविधा भी उपलब्ध है।

     उपरोक्त भौगोलिक कारकों के अलावे आधुनिक तकनीक का अभाव, पूँजी की कमी, बिजली की आपूर्ति न किये जाने, कर्मचारियों के द्वारा अक्सर के द्वारा अक्सर हड़ताल एवं तालाबंदी किये जाने, इंजीनियरिंग कॉलेज की बिगड़ती स्थिति, झारखण्ड की बिग‌ड़ती राजनीतिक अस्थिरता, बेहतर प्रबंधन के अभाव में उर्वरक की यह महान केन्द्र रुग्ण स्थिति में बदल चुका है। लेकिन उपरोक्त समस्याएँ सामयिक दिखाई पड़‌ती है। ज्यों-ही इन परिस्थितियों में थोड़ी बहुत बदलाव आती है तो सिन्दरी पुनः महान उर्वरक केन्द्र के रूप में तब्दील हो जायेगी। सरकार ने सिन्दरी उर्वक संयंत्र से निकलने वाले कचड़ों से सीमेंट का निर्माण प्रारंभ कर दिया है तथा इसे हल्दिया गैस पाइप लाइन से भी जोड़ने का निर्णय लिया गया है।

      इससे स्पष्ट होता है कि आने वाला समय में इनकी महानता पुनः स्थापित हो के हेगी।



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2. बिहार का प्राकृ‌तिक प्रदेश / भौतिक इकाई

3. बिहार की जलवायु

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5. बिहार की मिट्टियाँ

6. बिहार में सूखा

7. बिहार में बाढ़

8. बिहार का औद्योगिक पिछड़ापन

9. बिहार के आर्थिक पिछड़ेपन के कारण

10. बिहार का औद्योगिक प्रदेश

11. बिहार का कृषि प्रदेश

12. बिहार में कृषि आधारित उद्योग

13. बिहार में चीनी उद्योग

14. सिन्दरी उर्वरक उद्योग

15. बिहार की जनजातीय समस्या एवं समाधान

16. बिहार में ग्रामीण बस्ती प्रतिरूप

17. पटना नगर नियोजन/पटना का मास्टर प्लान

18. बिहार में नगरीकरण

19. बिहार में ग्रामीण बाजार केन्द्र

20. महत्वपूर्ण वस्तुनिष्ट प्रश्नोत्तर

7. Flood in Bihar (बिहार में बाढ़)

7. Flood in Bihar

(बिहार में बाढ़)



प्रश्न प्रारूप

Q. Describe the flood problems in Bihar.

(बिहार में बाढ़ से सम्बन्धित समस्याओं का वर्णन करें।)

उत्तर- बिहार एक कृषि प्रधान राज्य है। यहाँ की 80 या 85 प्रतिशत से अधिक जनसंख्या कृषि पर निर्भर है। बिहार से झारखण्ड राज्य के अलग होने के कारण यहाँ केवल कृषि का ही क्षेत्र रह गया है। अब बिहार की आर्थिक उन्नति केवल कृषि पर निर्भर है। बिहार में कई समस्याओं के कारण कृषि सम्पदा से परिपूर्ण बिहार आज भी अपनी निर्धनता के लिए देश में विख्यात है। अतः इन समस्याओं के निदान के बगैर इसकी आर्थिक उन्नति असंभव है।

बाढ़ की समस्या:-

     बाढ़ एक प्राकृतिक आपदा है। बाढ़ नदियों में अत्यधिक जल के कारण आती है। यहाँ की नदियाँ सदियों से विनाशकारी बाढ़ के लिए प्रसिद्ध रही है। एक सर्वेक्षण के अनुसार बिहार के कुल बाढ़ग्रस्त क्षेत्र का लगभग 64 लाख हेक्टेयर है। इसका अधिकतर क्षेत्र उत्तरी बिहार में पड़ता है। उत्तर बिहार में अधिकतर नदियाँ हिमालय से निकलती है। इन नदियों में कोसी, कमला, बागमती, गण्डक, बूढ़ी गण्डक आदि सम्मिलित हैं।

     ये सभी नदियाँ हिमालय के अतिवृष्टि के क्षेत्र से निकलने के कारण काफी जलराशि लाती है, इनका जलग्रहण क्षेत्र भी काफी विस्तृत है। इन नदियों में बाढ़ का मुख्य कारण हिमालय के तराई क्षेत्र में अत्यधिक वृष्टि है। इस भाग की कोसी तथा गण्डक नदियों का जलक्षेत्र ऊँचे हिमालय के शिखर पर है।

      इस भाग में अधिक वर्षा से यहाँ बाढ़ की स्थिति उत्पन्न हो जाती है। इसी कारण कोसी नदी में जल का प्रवाह काफी तीव्र है। इसका क्षेत्र बाढ़ प्रभावित रहता है। यह नदी मार्ग परिवर्तन के लिए भी विख्यात है। विगत 200 वर्षों से 150 किलोमीटर पश्चिम की ओर खिसक गई है और बार-बार खिसकने से पुरानी धारा जल प्लावन को बढ़ावा देती है। वर्षाऋतु में पूर्णिया से दरभंगा तक का क्षेत्र बाढ़ की विभीषिका से प्रभावित रहता है। अतः इस नदी को ‘बिहार का शोक’ (‘Sorrow of Bihar’) कहा जाता है। परन्तु कोसी परियोजना के कार्यान्वयन से अब कुछ राहत मिली है।

     हिमालय से जब नदियाँ बिहार के मैदान में प्रवेश करती है तो इनके द्वारा लायी गयी जलोढ़ मिट्टी यहाँ के समतल मैदान पर बिछाकर उथला बना देती है और कहीं-कहीं पर अवरोध भी उत्पन्न कर देती हैं। इसके फलस्वरूप नदी अपने दोनों किनारे पर जल फैला देती है। मन्द ढाल के कारण छाड़न झीलें, दलदली भूमि तथा चौर आदि का निर्माण करती हैं।

      इसी प्रकार बूढ़ी गण्डक, कमला, बागमती तथा महानन्दा अपने किनारे पर जल फैलाकर बाढ़ उत्पन्न करती हैं। जल की निकासी ठीक से नहीं होती है। इस प्रकार महीनों पानी भरा रहता है और फसलों को क्षति होती है। उत्तरी बिहार के अररिया, सुपौल, मधेपुरा, खगड़िया, सहरसा, मधुबनी, दरभंगा, समस्तीपुर, बेगुसराय, सीतामढ़ी, मुजफ्फरपुर, वैशाली, छपरा आदि जिलों में भयंकर बाढ़ आती है।

      दक्षिण बिहार की नदियाँ पठारी भाग से निकलकर गंगा में गिरती हैं। इस प्रदेश की प्रमुख नदियाँ, सोन, पुनपुन, फल्गु, मोरहर, पैमार, पंचाने, सकरी, मोहाने, कर्मनाशा आदि है। इस भाग में वर्षा के कारण कुछ महीनों के लिए बाढ़ की समस्या बनी रहती है।

    जब गंगा नदी स्वयं जलमग्न रहती है तो सोन, पुनपुन, सकरी, फल्गू आदि नदियों के पानी के निकास को अवरूद्ध कर देती है। इसके फलस्वरूप नदियों के प्रवाह क्षेत्र में भयंकर बाढ़ आ जाती है। इन नदियों से भी दलदली भूमि, दियारा भूमि, तालभूमि, चऊर भूमि, तथा जल प्रदेश बन जाते है। वर्षाऋतु में पटना से मोकामा तक का क्षेत्र जलप्लावित रहता है। दक्षिण बिहार के मैदान में पटना, उत्तरी नालन्दा, उत्तरी मुंगेर, लक्खीसराय तथा उत्तरी भागलपुर के जिले बाढ़ से प्रभावित होते हैं।

Flood in Bihar

बाढ़ की समस्याओं का निदान-

     बिहार में बाढ़ से निपटने के लिए अनेक प्रयास किये गये हैं। इसमें केन्द्र एवं राज्य सरकार द्वारा भी कई प्रयास किये गये हैं। इधर बिहार की नदियों पर बाँध बनाकर बाढ़ को नियंत्रित किया गया है। इससे जल की निकासी हो जाती है और बाढ़ की विभीषिका से बचाव भी हो जाता है। सोन नदी पर भी बाँध बनाया गया है। इसके अलावे गंगा तट पर कोइलवर बक्सर बाँध, भूतहीबलान बाँध मधुबनी, वैशाली जिले में हाजीपुर-बाजीपुर बाँध, कोसी के किनारे बदलाघाट-नगरपाला बाँध, त्रिमुहानी कुरसेला बाँध, पुनपुन नदी बाँध, बेतवा नहर बाँध, फल्गु नदी पर उदेरास्थान बाँध आदि है।

        बाँध निर्माण के अलावा बाढ़ नियंत्रण के लिए और भी कई उपाय किये गये हैं। पेड़-पौधे लगाक बाढ़ से बचाव किया गया है। इसका प्रयास भी हो हा है।


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20. महत्वपूर्ण वस्तुनिष्ट प्रश्नोत्तर


11. The Agricultural Region of Bihar (बिहार का कृषि प्रदेश)

11. The Agricultural Region of Bihar

(बिहार का कृषि प्रदेश)



प्रश्न प्रारूप

Q. Divide Bihar into agricultural regions and discuss their salient characteristics.

(बिहार को कृषि प्रदेशों में विभाजित करें तथा प्रत्येक की प्रमुख विशेषताओं का वर्णन करें।)

उत्तर- बिहार की कृषि विभिन्न प्राकृतिक तत्वों पर निर्भर करती है। ये तत्व तापमान, वर्षा, स्थलाकृति, मिट्टी, सिंचाई के साधन आदि हैं। इन्हीं भौगोलिक दशाओं पर कृषि तथा फसलों के प्रकार निर्भर करते हैं। इन्हीं भौगोलिक दशाओं को आधार मानकर बिहार की कृषि को बाँटा गया है। इन्हीं तत्वों पर फसलों का उत्पादन निर्भर करता है। इन्हीं तत्वों से फसलें प्रभावित होती हैं। जिन भागों में जिस प्रकार की दशाएँ हैं, वहाँ की फसल उगाई जाती है।

      उदाहरणार्थ, उत्तरी बिहार में उपजाऊ मिट्टी, 40 सेमी० से अधिक वर्षा, समतल भूमि तथा अधिक जनसंख्या मिलती है। अतः वहाँ इन्हीं भौगोलिक दशाओं के अनुरूप धान की फसल लगाई जाती है। इस क्षेत्र के लिए यही फसल सबसे अधिक उपयुक्त है। भौगोलिक दशाओं की अनुकूलता के कारण प्रति एकड़ उत्पादन भी अधिक होता है। इसी कारण बिहार के उत्तरी सीमान्त क्षेत्र में धान की खेती की अधिकता है, यह पट्टी का निर्माण करता है। इस प्रकार बिहार के कृषि क्षेत्र को निम्नलिखित कृषि पट्टियों में बाँट सकते हैं-

1. उत्तर का आर्द्र निम्न धनहर क्षेत्र

2. भीठ एवं दियारा क्षेत्र

3. दक्षिणी गंगा के सिंचित प्रदेश

4. छोटानागपुर के पठारी प्रदेश

1. उत्तर का आर्द्र निम्न धनहर क्षेत्र:-

        बिहार का यह कृषि प्रदेश बूढ़ी गंडक नदी के उत्तर-पूर्व में स्थित है। यह मुख्य रूप से बिना सिंचाई के धान का क्षेत्र है। यह प्रदेश उत्तर पश्चिम में संकीर्ण तथा पूर्व में चौड़ा होता गया है। यह भूमि निम्न है और यहाँ मकई और रबी की भी खेती की जाती है। यह पूरा क्षेत्र समतल है। इस भाग में अनेक नदियों में प्रतिवर्ष बाढ़ आ जाती है।

     यहाँ की मिट्टी जलोढ़ है। जिसमें नमी रखने की क्षमता अधिक है। इस भाग में वर्षा अधिक होती है। जिसके कारण आर्द्रता अधिक रहती है। कोशी नदी के क्षेत्र में बाढ़ अधिक आती है। जिसके फलस्वरूप धान की फसल को हानि होती है। सामान्य रूप से सम्पूर्ण क्षेत्र में धान की ही खेती की जाती है। इस प्रदेश में मुजफ्फरपुर, दरभंगा, सहरसा, पूर्णिया आदि जिले सम्मिलित हैं। इस भाग में चावल कूटने की मिलें स्थित हैं।

2. भीठ एवं दियारा क्षेत्र:-

     यह प्रदेश उत्तर गंगा में धनहर क्षेत्र के दक्षिण में स्थित है तथा गंगा के दक्षिण का छोटा-सा भाग इसमें सम्मिलित है। इसमें दो तरह की भूमि आती है। पहली भूमि ऊँची है। जिस पर बाढ़ का प्रभाव नहीं पड़ता है। इसे दियारा भी कहते हैं।

       दूसरी भूमि निम्म् भूमि है जो वर्षा के दिनों में जल से भरी रहती है। दोनों ही भूमि पर भदई फसल मकई एवं रबी की फसल होती है। रबी फसलों में गेहूँ, चना, जौ, दलहन एवं तेहलन होता है। कहीं-कहीं पर धान भी होता है। इसकी भूमि भी उपजाऊ है और वर्षा भी अच्छी हो जाती है। गंगा के दक्षिण में मोकामा-बड़हिया के क्षेत्र में गेहूँ और चना काफी होता है।

3. दक्षिणी गंगा का सिंचित प्रदेश:-

     यह दक्षिणी गंगा के मैदानी भाग का पूर्व प्रदेश है। यह पश्चिम में पुराना शाहाबाद जिला (आरा, रोहतास, बक्सर, कैमूर) से लेकर पूरब में भागलपुर तक फैला है। इस भाग में कृषि की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यहाँ की कृषि सिंचाई पर आश्रित है। इसी भाग में सोन एवं सकरी नदियों पर नहरें बनाई गई हैं और इस भाग में आहर तथा पईन के द्वारा भी सिंचाई की सुविधा प्रदान की गई है। इन्हीं सुविधाओं के कारण यहाँ सघन कृषि की जाती है।

      इस भाग की सबसे महत्त्वपूर्ण कृषि की फसल धान ही है। आरा एवं रोहतास जिलों में सोन नहर से सिंचाई के कारण धान की अच्छी खेती की जाती है। गया, जहानाबाद, पटना तथा नालन्दा जिलों में भी इसकी खेती की जाती है। धान के अलावे इस भाग में गेहूँ, आलू, चना, दलहन, तेलहन तथा अन्य फसलें होती हैं।

4. छोटानागपुर पठारी क्षेत्र:-

       छोटानागपुर की स्थलाकृति तथा मिट्टी की दशाएँ उत्तर बिहार से बिल्कुल भिन्न है। अतः इस भाग की कृषि “प्रणाली” भी भिन्न हैं। इस भाग में पठारी भूमि एवं अनुपजाऊ मिट्टी के कारण कृषि कम होती है। कृषि की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि नदी घाटियों में धान की खेती की जाती है तथा ऊपरी पठारी भागों पर मकई, मडुआ, दलहन आदि की खेती की जाती है।

      मिट्टी की कमी के कारण खेती करने में अधिक कठिनाई है। नदी घाटी के आर्द्र भागों में खेती अधिक की जाती है। वहाँ सिंचाई की भी थोड़ी सुविधा उपलब्ध होती है। इसके अलावे इस भाग में कृषि सिंचाई एवं मिट्टी की कमी के काण सीमित है। 


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17. पटना नगर नियोजन/पटना का मास्टर प्लान

18. बिहार में नगरीकरण

19. बिहार में ग्रामीण बाजार केन्द्र

20. महत्वपूर्ण वस्तुनिष्ट प्रश्नोत्तर


20. Causes, consequences and related conservation measures of environmental degradation (पर्यावरण निम्नीकरण के कारण, परिणाम और संबंधित संरक्षण के उपाय)

20. Causes, consequences and related conservation measures of environmental degradation

(पर्यावरण निम्नीकरण के कारण, परिणाम और संबंधित संरक्षण के उपाय)



प्रश्न प्रारूप

Q. पर्यावरण निम्नीकरण के कारणों, परिणामों की चर्चा कीजिए और संबंधित संरक्षण के उपाय पर प्रकाश डालें।

    पर्यावरणीय निम्नीकरण केवल भारत की ही नहीं बल्कि पूरे विश्व की गंभीर समस्यायों में एक है। यह आज की उपभोक्तावादी जीवन, औद्योगिकीकरण, नगरीकरण, अनियोजित विकास, इत्यादि की देन है। प्रत्येक पर्यावरण में जैविक एवं अजैविक घटकों के बीच प्राकृतिक संतुलन का संबंध होता है। जब इस संतुलन में नाकारात्मक परिवर्तन होता है तो उसे ‘पर्यावरणीय निम्नीकरण’ कहते हैं।

पर्यावरणीय निम्नीकरण के कारक

    पर्यावरणीय निम्नीकरण के कई कारण है जिन्हें हम दो प्रमुख वर्गों में बाँटकर अध्ययन करते हैं।

पर्यावरणीय निम्नीकरण के कारण

1. प्राकृतिक कारण

(ⅰ) भारी वर्षा, आकिस्मक वर्षाः

(ii) भूस्खलन, हिमस्खलन;

(iii) भूकंप, सूनामी;

(iv) ज्वालामुखी उद्‌गार;

(V) बाढ़, सूखाड़, अकाल;

(1) चक्रवात, हिमपातः

(vii) वायु इत्यादि।

2. मानवीय कारण

(i) वनों की कटाई,

(ii) वृहद बांधों का निर्माण,

(iii) खनन

(iv) औद्योगिकीकरण,

(v) नगरीकरण,

(vⅰ) संचार एवं परिवहन क्रांति

(vii) कीटनाशक एवं उर्वरक के प्रयोग,

(viii) अवैज्ञानिक कृषि,

(ix) अति पशुचारण,

(x) अनियोजित विकास इत्यादि।

1. प्राकृतिक कारण

     भारी या आकस्मिक वर्षा के कारण तीव्र ढाल एवं उबड़-खाबड़ प्रदेशों में तेजी से मृदा अपरदन होती है। जैसे- भारत के चम्बल घाटी क्षेत्र में रील एवं अवनलिका अपरदन के कारण मृदा का क्षरण हुआ है। जबकि महान हिमालय, लघु हिमालय में तीव्र ढाल एवं गुरुत्वाकर्षण के कारण मृदा ह्रास हुआ है।

     भूस्खलन एवं हिमस्खलन से पर्वतीय प्रदेशों में जैविक ह्रास, मृदा क्षरण, स्थलाकृतिक स्वरूप में परिवर्तन जैसे पर्यावरणीय निम्नीकरण की समस्या उत्पन्न होती है। हिम स्खलन से बेड़-2 हिम और भूस्खलन से छोटे-बड़े चटानें ढाल के सहारे गुरुत्वारण के कारण नीचे गिरते हैं। इससे कई वनस्पति, जीव-जन्तु इत्यादि दब कर नष्ट हो जाते हैं जो पर्यावरणीय निम्नीकरण का एक कारण है।

    भूकंप के दौरान कई पेड़-पौधे उखड़ जाते हैं, कितने जीवों की जानें चली जाती हैं जो पर्यावरण निम्निकारण के कारण है। ज्वालामुखी उद्‌गार के समय लावा, राख, जलवाष्प गैस इत्यादि निकलती है जो पर्यावरण को प्रदूषित कर देती हैं। हिमालय क्षेत्र में अधिकतम भूकम्प आते हैं। 1934 में मुंगेर और दरभंगा का भूकम्प, 2001 में कच्छ की भूकम्प इत्यादि उल्लेखनीय है। हिमालय प्रदेश और बैरन द्वीप में ज्वालामुखी की घटना देखने को मिलती है जिससे पर्यावरण निम्नीकरण होती है।

    बाढ़, सूखाड़ और अकाल पर्यावरण निम्नीकरण को जन्म देते हैं। बाढ़ एवं सूखाड़ की बारम्बारता से खाद्य पदार्थ, पेयजल और चारे में कमी आ जाती है। महामारी, अकालमृत्यु, पशुमृत्यु दर बढ़ जाता है। भारत के वृष्टिछाया प्रदेश, द० बिहार, द०-प० उड़ीसा इत्यादि में सूखे के कारण और असम, उत्तरी बिहार इत्यादि में बाढ़ के कारण यह समस्या उत्पन्न हुई होती है।

     चक्रवात के दौरान वायु की तेज झोंका और तीव्र वर्षा से वृक्ष का गिरना, बड़े भूभाग का जलमग्न होना, बाढ़ आना इत्यादि जैसे पर्यावरणीय निम्नीकरण की समस्या उत्पन्न होती है। यह घटना भारत के तटवर्ती क्षेत्रों में देखने को मिलती है।

     प्राकृतिक वायु मरुस्थलीय क्षेत्रों से धुलकण को उड़ाकर बाहरी क्षेत्रों में जमा करते रहती है जिसके कारण मरुस्थलीय क्षेत्रों का लगातार विस्तार होता जा रहा है। राजस्थान के थार मरुस्थल से वायु द्वारा धूल कण, बालू उड़ाकर पंजाब, हरियाणा, UP के सीमावर्ती क्षेत्रों में जमा करते रहने से यह समस्या उत्पन्न हो रही है।

2. मानवीय कारण

     वनों की कटाई पर्यावरणीय निम्नीकरण का एक प्रमुख कारण है। बढ़ती हुई आबादी के कारण कृषि एवं अधिवास के लिए वनों की कटाई की जा रही है। इसके कारण वनस्पति के विभिन्न प्रजातियों का विलोपीकरण, जैविक विविधता में ह्रास हो रही है और आहार-श्रृंखला पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। भूमिगत जल स्तर तेजी से नीचे गिरता है।

       वृहत बांधों के निर्माण भी कई पर्यावरणीय निम्नीकरण को जन्म देते हैं। जैसे- बांधो के पीछे बनाये गये जलाशयों में वनीय भूमि, अधिवासीय क्षेत्र के आ जाने से उनका ह्रास होता है। आस-पास के क्षेत्रों में भूमिगत जलस्तर बढ़ जाने से पेयजल प्रदूषित हो जाता है। खनन से न केवल ऊर्जा संसाधनों का बल्कि अनेक प्रकार के खनिजों का दोहन किया जा रहा है। उन खनिजों पर कई छोटे-बड़े उद्योगों का विकास किया गया है। इससे वायु प्रदूषण, जल प्रदूषण, ध्वनि प्रदूषण, मृदा प्रदूषण इत्यादि की समस्या उत्पन्न हुई हैं।

     औद्योगिकीकरण और नगरीकरण साथ-2 चलने वाली प्रक्रिया है। आज विश्व के कई नगर महानगर में बदल चुके हैं। केवल भारत में ही 35 महानगर पाये जाते हैं। ये नगर अत्याधिक जनसंख्या दबाव वाले क्षेत्र है। इन नगरों में जहाँ एक ओर ध्वनि और वायु प्रदूषण की गंभीर समस्या है। वहीं अवशिष्ट पदार्थी के जलाशयों में छोड़ दिये जाने से जल प्रदूषण की गंभीर समस्या उत्पन्न हो रही है।

     संचार एवं परिवहन क्रांति के युग में सड़कों पर परिवहन साधनों का बाढ़ आ चुका है। ये परिवहन साधन जीवाश्म ऊर्जा का उपयोग करते हैं जिससे ग्रीन हाउस गैसों का बड़े पैमाने पर उत्सर्जन हो रहा है। इसके कारण अनेक प्रकार के पर्यावरणीय निम्नीकरण की समस्या उत्पन्न हो रही है।

     रासायनिक उर्वरक एवं किटनाशकों का प्रयोग खाद्यान्न उत्पादन एवं उत्पादकता बढ़ाने हेतु किया जा रहा है। इसके चलते मृदाक्षरण, जल प्रदूषण, सूक्ष्मजीवों के ह्रास की समस्या उत्पन्न हो रही है।

    अवैज्ञानिक कृषि, अतिपशुचारण, अनियोजित विकास, मिसाइल तकनीक, आण्विक तकनीक, अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी इत्यादि के कारण अनेक गंभीर पर्यावरणीय निम्नीकरण की समस्या उत्पन्न हो रही है।

परिणाम

    उपरोक्त पाकृतिक एवं मानवीय कारणों से पर्यावरणीय निम्नीकरण की कई गंभीर समस्याएँ उत्पन्न हुई है। जैसे-

Causes

   इस प्रकार स्पष्ट है कि पर्यावरण निम्नीकरण एक गंभीर परिणाम के रूप में उभर रहे हैं। इसलिए पर्यावरण का संरक्षण करना अति आवश्यक है। इस दिशा में 1992 ई० में विश्व स्तर पर महत्त्वपूर्ण कदम रियो द जेनरियो में हुए पृथ्वी शिखर सम्मेलन में उठाये गये। भारत सरकार भी पर्यावरण संरक्षण की दिशा में महत्त्वपूर्ण कार्य कर रही है। इसके लिए उन्होंने वन एवं पर्यावरण मंत्रालय की स्थापना किया है जो कई कामक्रमों के माध्यम से इस दिशा में महत्त्वपूर्ण कार्य कर रही है। इसके अलावे निम्नलिखित उपाय सुझाए जा सकते हैं:-

(i) वनोन्मूलन से बचाव हेतु वनीय नीति और वन संरक्षण कानून के क्रियान्वयन पर सख्ती से ध्यान दिया जाय। सामाजिक वानिकी, कृषि वानिकी, वृक्षारोपण को बढ़ावा दिया जाय।

(ii) वन्य जीवों के शिकार पर कठोर प्रतिबंध लगायी जाय।

(iii) खेतों में रासायनिक उर्वरक की जगह पर जैविक खाद का प्रयोग किया जाय।

(iv) जीवाश्म ऊर्जा के जगह पर सौर ऊर्जा, विद्युत ऊर्जा एवं अन्य वैकल्पिक ऊर्जा के प्रयोग पर जोर दिया जाय।

(v) ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन को कम से कम किया जाय।

(vi) विस्फोट पदार्थों का कम से कम प्रयोग किया जाय।

(vii) वैज्ञानिक कृषि पर जोर दिया जाए।

(viii) विकास का कार्य सतत् विकास की अवधारणा पर किया जाय।

(ix) पर्यावरण संरक्षण की दिशा में जन-जागरण बढ़ायी जाय इत्यादि।

     उपरोक्त तथ्यों के विश्लेषण से स्पष्ट है कि पर्यावण निम्नीकरण एक गंभीर समस्या है। यह कई प्रकृतिक एवं मानवीय कारणों से उत्पन्न होती है। इसके कई भयानक परिणाम आ रहे हैं। इसलिए ‘पर्यावरण संरक्षण’ की दिशा में कई कार्य किये जा रह हैं और कई कार्य और भी किये जाने की आवश्यकता है। लेकिन इसकी पूर्ण सफलता आमलोगों की सहभागिता, राजनीतिक एवं प्रशासनिक प्रतिबद्धता पर भी निर्भर कती है।

2. Climate of Bihar (बिहार की जलवायु)

2. Climate of Bihar

(बिहार की जलवायु)



प्रश्न प्रारूप

Q. Explain Climate of Bihar.

(बिहार की जलवायु का विस्तृत वर्णन करें।)

उत्तर-  बिहार की जलवायु उष्णार्द्र मानसूनी है। यह जलवायु अल्प वर्षाकाल तथा दीर्घ शुष्ककाल के मानी जाती है। यहाँ की जलवायु में महाद्वीपीयता के लक्षण मिलते हैं, लेकिन अधिक आर्द्रता के कारण यहाँ संशोधित महाद्वीपीय जलवायु है। उत्तर की ओर हिमालय की हिमाच्छादित श्रेणियाँ इसको मध्य एशिया की ओर से आने वाली शीतल वायु से बचाकर महाद्वीपीय जलवायु का स्वरूप प्रदान करती है। इस जलवायु की मुख्य विशेषताएँ इस प्रकार हैं-

(i) न्यून दैनिक ताप परिसर

(ii) ताप परिसर की समानता

(iii) वायु में अधिक आर्द्रता

(iv) वर्षा का न्यूनाधिक रूप में सर्वत्र होना

(v) ऋतु परिवर्तन होना

      बिहार की जलवायु निम्नलिखित भौगोलिक तत्त्वों से प्रभावित होती है-

(i) अक्षांशीय विस्तार

(ii) हिमालय पर्वत की स्थिति

(iii) स्थलाकृति का प्रभाव

(iv) बंगाल की खाड़ी से निकटता

(v) नारवेस्टर तथा अन्य ग्रीष्मकालीन तूफान

(vi) दक्षिण-पश्चिम मानसून की क्रियाशीलता

      मॉनसूनी जलवायु की सबसे बड़ी विशेषता यहाँ के मौसमी परिवर्तन की हैं। यहाँ की ऋतुएँ ऐसी है जो लयबद्ध रूप में आती है। ग्रीष्मकाल की भीषण गर्मी से उबने के बाद वर्षाकाल की फुहारे वातावरण में प्रसन्नता पैदा करती है। जब वर्षाकाल की उमस से मन उब जाता है, तो शरदकालीन ठण्डक से राहत मिलती है। जबकी शीत लहर से मन घबरा जाता है और जन-जीवन अस्त-व्यस्त हो जाता है तो ग्रीष्म ऋतु राहत पहुँचाती है। इस प्रकार बिहार की जलवायु में तीन ऋतुएँ स्पष्ट अनुभव की जाती है। अतः यहाँ तीन ऋतुएँ निम्नलिखित हैं-

1. ग्रीष्म ऋतु- मध्य मार्च से मध्य जून तक

2. वर्षा ऋतु- मध्य जून से मध्य अक्टूबर तक

3. शरद ऋतु-मध्य अक्टूबर से मध्य मार्च तक

1. ग्रीष्म ऋतु:-

       यह ऋतु मध्य मार्च से प्रारम्भ होता है। इस माह के बाद तापमान धीरे-धीरे बढ़ने लगता है मई के अन्त तक तापमान बहुत बढ़ जाता है। अधिक गर्मी से सापेक्षित आर्द्रता बहुत घट जाती है। मई-जून में कुछ स्थानों का तापमान 46°C तक पहुँच जाता है। बिहार के पश्चिमी भाग के क्षेत्रों में अधिक तापमान रहता है। पछुआ हवा के कारण हवा बहुत ही गर्म हो जाती है। जिसे ‘लू’ कहा जाता है। इसकी तुलना में पूर्वी भाग के क्षेत्रों में तापमान कम रहता है।

     इस ऋतु में अधिक गर्मी के कारण हवा का दबाव कम हो जाता है, हवा के निम्नदाब के कारण बिहार के पूर्वी भाग में चक्रवाती तूफान आता है, जिससे वर्षा होती है, इस तूफान से पूर्णियाँ, कटिहार में 4 से 8 सेमी० वर्षा होती है। इस भयंकर तूफान को ‘काल वैशाखी’ कहते हैं। इस आर्द्रयुक्त हवा से वर्षा होती है, जिसे नारवेस्टर या मैंगोसाँवर कहते हैं। इस वर्षा से आम एवं लीची फसलों को फायदा पहुँचती है। इस मौसम में गया शहर का तापमान सबसे ऊँचा 47°C तक चला जाता है।

(2) वर्षा ऋतु:-

         ग्रीष्मकाल से भीषण गर्मी के कारण एक विशाल निम्न भार का कटिबन्ध कायम हो जाता है। इस निम्न भार को भरने के लिए बंगाल की खाड़ी से मुड़कर दक्षिण-पश्चिम हवाएँ स्थल की ओर चलने लगती हैं। बिहार में मानसूनी हवा का प्रवेश पूर्व से जानेवाली मानसूनी धारा के रूप में होता है। यह हिमालय के समानान्तर चलती है। सामान्यतः 15-20 जून तक बिहार में मानसून का आगमन हो जाता है। इस मानसून के आगमन से तापमान में कमी होती है और सापेक्ष आर्द्रता बढ़ जाती है। धीरे-धीरे तापमान में कमी होती है और उमस बढ़ जाती है। जुलाई-अगस्त में काफी वृष्टि होती है।

      राज्य के पूर्वी भाग में वर्षा अधिक तथा पश्चिम में वर्षा कम होती है। पूर्व में स्थित कुछ प्रमुख शहरों की औसत वार्षिक वर्षा तथा पश्चिम में स्थित राज्य के कुछ प्रमुख शहरों की औसत वार्षिक वर्षा से यह बात स्पष्ट हो जाती है। जैसे- पूर्णियाँ 107.5 सेमी०, सहरसा 138.5 सेमी०, दरभंगा 125 सेमी०, पटना 117 सेमी०, गया 99.2 सेमी० इस आँकड़े से पूर्व से पश्चिम आने पर वर्षा में कमी आती जाती है।

      बिहार में अधिकतर वर्षा ग्रीष्मकालीन मौनसून से होती है। इसे दक्षिण-पश्चिम मानसून भी कहते हैं।

     मानसून की वापसी तापमान की कमी के कारण अक्टूबर माह में प्रारम्भ होती है। इस काल में वर्षा की स्थिति नहीं बन पाती है। इस समय केवल हथिया नक्षत्र में थोड़ी वर्षा हो जाती है। इस समय रबी की फसल की बुआई शुरू हो जाती है।

3. शरद ऋतु:-

    वर्षा ऋतु के समाप्त होने पर सितम्बर महीने से तापमान में गिरावट शुरू हो जाती है। इसके फलस्वरूप नवम्बर से फरवरी तक की अवधि में शीत शुष्क में बदल जाती है। इस ऋतु में मौसम अच्छा रहता है। यहाँ का औसत तापमान 10°C से नीचे चला जाता है। इस समय पश्चिमी चक्रवात से थोड़ी वर्षा हो जाती है। वर्षा की मात्रा 1 से 2 सेमी० से अधिक नहीं होती है। इस ऋतु में पटना का औसत तापमान 6.1°C, गया का 5.8°C तथा पूर्णियाँ का 4.4°C रहता है। शद के अन्तिम चण में तापमान धीरे-धीरे बढ़ने लगता है।

13. Sugar Industry in Bihar (बिहार में चीनी उद्योग

13. Sugar Industry in Bihar

(बिहार में चीनी उद्योग)



प्रश्न प्रारूप

Q. बिहार में चीनी उद्योग की स्थिति, समस्या एवं समाधान पर एक संक्षिप्त टिप्पणी लिखें।

    बेबर के अनुसार चीनी उद्योग एक वजन ह्रास उद्योग है। इसलिए ऐसे उद्योगों की स्थापना कच्चे माल के क्षेत्र में की जाती है। विश्व प्रसिद्ध गन्ना की पेटी बिहार के मुजफ्फरपुर से UP के मुजफ्फरनगर के बीच अवस्थित है। इसी गन्ना की पेटी में बिहार के अधिकांश चीनी मील अवस्थित थे।

    1960 के दशक तक बिहार भारत का दूसरा सबसे बड़ा चीनी उत्पादक राज्य था। लेकिन वर्तमान समय में प्रथम पाँच राज्य में बिहार की स्थान नहीं है। उत्तरी बिहार की भूमि और परम्परागत कृषि पद्धति चीनी उद्योग के लिए समुचित आधार प्रदान करती है। यही कारण है कि मेहरौरा (छपड़ा) नामक स्थान पर 1903 ई० में प्रथम चीनी का कारखाना स्थापित किए गया था।

      आज यह उद्योग रुग्ण अवस्था से गुजर रही है। बिहार में कुल 33 चीनी मीलें थी। इनमें से 17 चीनी मीलें पूर्णत बन्द हो चुके है। 33 चीनी मील में से 28 मील स्वतंत्रता से पूर्व ही स्थापित हुए थे। गौरतलब है कि स्वतंत्रता के पूर्व 56 मील भारत में थी उनमें से 28 मील केवल बिहार में स्थापित है।

      स्वतंत्रता के बाद सरकारी उदासीनता, प्रशासनिक भ्रष्टाचार, किसानों की घटती हुई अभिरुचि, खाद्यान्न फसल के साथ गन्ना उद्योग की प्रतिस्पर्द्धा इत्यादि के कारण चीनी का उत्पादन लगातार घटता गया। इसी संदर्भ में बिहार विभाजन के बाद JJ ईरानी की अध्यक्षता में पहली औद्योगिक विकास का गठन किया गया तो उसने सिफारिश किया कि झारखण्ड निर्माण के बाद बिहार को औद्योगिक मान‌चित्र पर लाने के लिए चीनी उद्योगों विकास अनिवार्य है।

     दर असल गन्ना एक नकदी फसल है। जिसका उत्पादन और उत्पादकता दोनों बढ़ा है लेकिन रणनीति के अभाव में बिहार का यह उद्योग लगातार पिछड़ रहा है। इसके पिछड़ेपन के निम्न‌लिखित कारण हैं:-

बिहार में चीनी उद्योग के पिछड़ापन के कारण

(1) गन्ना का उचित मूल्य नहीं:-

    गन्ना एक वर्षीय एवं नगदी फसल है। इसके उत्पादन के पीछे किसानों की मानसिकता और पर्याप्त लाभ की प्राप्ति रहती है अगर चीनी मील मालिक गन्ना उत्पादकों को उचित मूल्य समय पर दे देते हैं तो अगली बार किसान गन्ना की खेती करते हैं अन्यथा नहीं।

(2) अधिकांश गन्ना का उपयोग गुड़ एवं खण्डसारी उद्योग में:-

     बिहार के अधिकांश गन्ना चीनी मील तक नहीं पहुंच पाती है बल्कि उनका उपयोग गुड़ एवं खण्डसारी उद्योग में होता है। सम्पूर्ण भारत का 50% गन्ना उपयोग गुड़ एवं खण्डसारी उद्योग में ही प्रयुक्त हो जाता है।

(3) समुद्र से अधिक दूरी:-

     समुद्र से अधिक दूर होने के कारण बिहार के गन्ना में रस की मात्रा अपेक्षाकृत कम पायी जाती है। जैसे महाराष्ट्र में कुल गन्ना वजन का 12-15% रस प्राप्त होता है जबकि बिहार में 8-9% रस प्राप्त होता है।

(4) अधिकांश मील पुरानी:-

     बिहार के अधिकांश चीनी मील पुरानी हो चुकी है जिसके कारण उत्पादन की क्षमता अत्याधिक कम हो गयी है।

(5) वर्षभर चीनी मिलें चालू नहीं:-

    दक्षिण भारत की चीनी मील सांलो भर चलती रहती है क्योंकि इससे प्राप्त होने वाला ‘खोई’ आधारित कागज उद्योग मोलास पर आधारित शराब उद्योग का विकास किया गया है। वहीं जिस मौसम में गन्ने की आपूर्ति नहीं होती है उस मौसम में वहाँ की चीनी मीलें तेलहन की पेराई करते हैं।

     इस तरह दक्षिण भारत की मीलें सालोंभर किसी-न-किसी रूम में चलते रहती हैं लेकिन बिहार में इस तरह के उद्योग के अभाव में कुछ माह ही उद्योग चल पाते हैं।

(6) सरकारी उदासीनता और भ्रष्टाचार:-

     सरकारी उदासीनता और प्रशासनिक भ्रष्टाचार के कारण चीनी उद्योगों से संबंधित अनुसंधान कार्य ठीक तरीके से नहीं हो पा रहे हैं।

(7) प्रतिकूल चीनी औद्योगिक नीति:-

     चीनी उद्योग का लाइसेन्सीकरण 40% लेबी और 15 किमी० के दायरे में 2 चीनी मील नहीं लगाने की नीति इत्यादि के कारण चीनी उद्योग के विकास में बाँधा पहुंची है।

(8) हरित क्रांति का आगमन:-

     बिहार में हरित क्रांति के आगमन के बाद गन्ना क्षेत्र में खाद्यान्न फसलों का घुसपैठ बढ़ा है जिसके कारण गन्ना उत्पादक क्षेत्र लगातार सिकुड़ते जा रहे है।

(9) सहकारिता का अभाव:-

      इन समस्याओं के परिप्रेक्ष्य में सरकार ने समय-2 पर महत्वपूर्ण सुधारों की घोषणा करती रही है। जैसे-1998 ई० में सरकार ने लाइसेन्सी करण की नीति रद्द कर दिया। इसके बाद 40% की लेबी को घटाकर 15% कर दिया। वैश्विक स्तर पर WTO की स्थापना हो जाने के बाद अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर निर्यात करने की मार्ग प्रशस्त हो चुकी है। सरकार ने यह निर्णय लिया है कि गन्ने के उपउत्पादकों को गैसहोल के रूप में किया जायेगा।

     उपरोक्त कदम उठाये जाने के बाद भी बिहार में पुनः चीनी उद्योग नहीं पनप पा रहे हैं क्योंकि किसानों को नकदी और गन्ना का उचित मूल्य नहीं मिल पा रहा है। किसानों के फसलों का बीमाकरण नहीं हो पा रहा है।

      पुनः न्यूनतम समर्थन मूल्य और बाजार मूल्य में काफी अन्तर दिखायी दे रहा है। रुग्ण मील तकनीकी सुधार नहीं कर पा रहे हैं। अपने कर्मचारियों को पिछला भुगतान नहीं कर पाये हैं। जब तक इन समस्याओं का समाधान नहीं होगा। तब तक इनका विकास संभव नहीं है।

    इसके अलावे बिहार की घरेलू बाजार अन्तरर्राष्ट्रीय बाजार को मजबूत करते हुए चीनी उद्योग पर आधारित बिहार को विशिष्ट पहचान स्थापित की जा सकती है। मॉरीशस, क्यूबा, फिजी जैसे छोटे-2 द्वीपीय देश प्रबंधन के बल पर ही अगर वैश्विक पहचान खते हैं तो बिहार ऐसा क्यों नहीं क सकता है?


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1. बिहार : सामान्य जानकारी

2. बिहार का प्राकृ‌तिक प्रदेश / भौतिक इकाई

3. बिहार की जलवायु

4. बिहार के भौगोलिक इकाई का आर्थिक विकास पर प्रभाव

5. बिहार की मिट्टियाँ

6. बिहार में सूखा

7. बिहार में बाढ़

8. बिहार का औद्योगिक पिछड़ापन

9. बिहार के आर्थिक पिछड़ेपन के कारण

10. बिहार का औद्योगिक प्रदेश

11. बिहार का कृषि प्रदेश

12. बिहार में कृषि आधारित उद्योग

13. बिहार में चीनी उद्योग

14. सिन्दरी उर्वरक उद्योग

15. बिहार की जनजातीय समस्या एवं समाधान

16. बिहार में ग्रामीण बस्ती प्रतिरूप

17. पटना नगर नियोजन/पटना का मास्टर प्लान

18. बिहार में नगरीकरण

19. बिहार में ग्रामीण बाजार केन्द्र

20. महत्वपूर्ण वस्तुनिष्ट प्रश्नोत्तर


2. Natural Region of Bihar (बिहार का प्राकृतिक प्रदेश)

2. Natural Region of Bihar

(बिहार का प्राकृतिक प्रदेश/भौतिक इकाई)



प्रश्न प्रारूप

Q. वर्तमान बिहार के प्राकृतिक प्रदेश की चर्चा करें।

      भारत के पूर्वी भाग में स्थित बिहार राज्य क्षेत्रफल के दृष्टिकोण से भारत का 13वाँ सबसे बड़ा राज्य है। इसका भौगोलिक विस्तार 24ºN से 27°N अक्षांश और 83ºE से 88°E देशान्तर के बीच फैला हुआ है। इसका कुल क्षेत्रफल 94,163 किमी०² है। पूरब से पश्चिम इसकी लम्बाई 483किमी० तथा उत्तर से दक्षिण इसकी चौड़ाई 345 किमी० है।

    बिहार राज्य के उत्तर में नेपाल, दक्षिण में झारखण्ड, पूरब में प० बंगाल और पश्चिम में उत्तर प्रदेश अवस्थित है। इस राज्य का आकार लगभग आयताकार है। भारत के कुल क्षेत्रफल का 2.85% भाग बिहार के पास है। बिहार राज्य मुख्यतः मध्य गंगा के मैदानी क्षेत्र में फैला हुआ है। समुद्रतल से बिहार की औसत ऊँचाई 53 मी० है। भौतिक बनावट और संरचना के दृष्टि से बिहार को तीन प्राकृतिक प्रदेश में बाँटते हैं:-

1.  उत्तर का शिवालिक पर्वत पदीय प्रदेश

2. गंगा का मैदानी क्षेत्र

3. दक्षिण का सीमान्त पठारी क्षेत्र

Natural Region of Bihar

चित्र: बिहार का प्राकृतिक प्रदेश/भौतिक इकाई

1.  उत्तर का शिवालिक पर्वत पदीय प्रदेश

      यह बिहार के उ०-प० भाग में (प० चम्पारण) अवस्थित है। यह शिवालिक पर्वत का ही एक भाग है। इसका विस्तार 546 किमी०² पर हुआ है। इसकी औसत ऊंचाई 160 मी० निर्धारित है। इस पहाड़ी क्षेत्र में दो स्पष्ट पर्वतीय श्रृंखलाएं हैं और दोनों पर्वत एक-दूसरे के समानान्तर उ०-प० दिशा से द०-पू० दिशा में नेपाल की सीमा के सहारे फैला हुआ है। इस पर्वत पदीय प्रदेश के सम्पूर्ण भाग को तीन भाग में बाँटकर अध्ययन करते है-

(i) रामनगर दून की पहाड़ी

(ii) सोमेश्वर की पहाड़ी

(iii) दून क्षेत्र

     रामनगर दून की पहाड़ी 214 km2 क्षेत्र पर फैला हुआ है। इसकी अधिकतम ऊंचाई 240 मी० है। इसकी अधिकतम चौड़ाई संतपुर के पास है। रामनगर दून 6-8 km चौड़ा है। यहाँ पर दक्षिणी श्रेणी के रूप में फैला हुआ है।

    सोमेश्वर श्रेणी त्रिवेणी नहर के शीर्ष भाग से शुरू होकर पूरब में भिखना थोरी दर्रा तक बिहार में फैला हुआ है। इसकी लम्बाई 74 किमी० और चौड़ाई 4.6 से 6.4 किमी० तक है। इसकी औसत ऊँचाई 457 मी० है। इस पर्वत में नदियों के द्वारा कई दर्दो का निर्माण हुआ है। जैसे सोमेश्वर दर्रा, भिखनाथोरी दर्रा, हरहा दर्रा इत्यादि प्रमुख हैं।

दून क्षेत्र-

    रामनगर दून और सोमेखर पहाड़ी के बीच में 22.5 किमी० लम्बा और समुद्रतल से 152 मी० ऊँचा एक घाटी है। जिसे दून घाटी से सम्बोधित करते हैं। उल्लेखनीय है कि विभाजित बिहार की सबसे ऊंची चोटी “सोमेश्वर की पहाड़ी” (874 मी०) है।

2.  गंगा का मैदानी भाग

     इसे बिहार का मैदान भी कहा जाता है। इसका विस्तार 90,650 km² भूभाग पर हुआ है। इस मैदान के उत्तर में शिवालिक पर्वत श्रृंखला और दक्षिण में छोटानागपुर का पठार अवस्थित है। पश्चिम में इसकी चौड़ाई अधिक है जबकि पूरब में कम। इस मैदान का निर्माण हिमालय तथा प्रायद्वीय पठार से निकलने वाली नदियों के द्वारा लायी गयी मालवा के निक्षेपण से हुआ है। गंगा नदी इस मैदान के मध्य से होकर पश्चिम से पूरब दिशा में प्रवाहित होती है। इसका तात्पर्य है कि इस मैदान का सामान्य ढाल पश्चिम से पूरब दिशा की ओर हुआ है। गंगा नदी बिहार के मैदान को दो भागों में बाँट देती है।

(i) गंगा के उत्ती मैदानी भाग

(ii) गंगा के दक्षिणी मैदानी भाग

(i) गंगा का उत्तरी मैदानी भाग

      गंगा नदी के उत्तर में पूरब से पश्चिम दिशा में फैला एक चौरस मैदान है जिसका क्षेत्रफल 57000 km2 है। इस मैदान का सामान्य ढाल उत्तर से दक्षिण दिशा की ओर है। इसकी औसत ऊँचाई 76.2 मी० से भी कम है। इसका निर्माण गण्डक, बागमती, कोशी और महानन्दा नदी के द्वारा लायी गयी मिट्टी के निक्षेपण से हुआ है। यह मैदान गण्डक के मैदान, बागमती का मैदान (मिथिला का मैदान), कोशी के मैदान के नाम से भी जाना जाता है। इस मैदान में निम्नलिखित संरचना दिखाई देते हैं-

(a) भावर प्रदेश-

    इसका विस्तार नेपाल और बिहार के सीमामर्ती क्षेत्रों में हुआ है। इसक निर्माण नदियों के द्वारा लायी गई “बोल्डर क्ले” के निक्षेपण से हुआ है। इसकी चौड़ाई 8-16 किमी० के बीच है।

(b) तराई प्रदेश

    यहां का दूसरा महत्वपूर्ण संरचना तराई प्रदेश है। इसक विस्तार भावर के दक्षिणी भाग में हुआ है। इस प्रदेश में जगह-जगह पर दलदली भूमि भी मिलते हैं। इसी भूभाग पर विश्व की प्रसिद्ध गन्ना की पेटी अवस्थित है।

(c) बाँगड़ और खादर मृदा प्रदेश 

    गंगा नदी और उसके सहायक नदियों के द्वारा यहाँ कई अन्य स्थलाकृतियों का विकास हुआ है। जैसे- बाँगड़ और खादर मृदा प्रदेश।

    बाँगड़ प्रदेश वे हैं जहाँ नदियों के द्वारा लायी गयी मलवा निक्षेपण का कार्य बंद हो चुका है और खादर संरचना वह है जहाँ पर मलवा का निक्षेपण आज भी जारी है।

      गंगा के उत्तरी मैदान में कई जगह प्राकृतिक बाँध, चौर, नदी दोआब का भी प्रमाण मिलता है। प्राकृतिक बाँध ऐसी स्थलाकृति है जो नदियों के तट के सहारे विकसित होती है। बाढ़ के दिनों में लोग इस पर आकर शरण लेते हैं।

    उत्तरी बिहार की नदियाँ मार्ग परिवर्तन के लिए प्रसिद्ध है। नदियों के पुराने मार्ग को ही चौर कहा जाता है। दो नदियों के मध्यवर्ती भूभाग को नदी दोआब कहा जाता है। नदियों के बीच-2 में बालू के निक्षेपण से दियरा क्षेत्र का भी विकास हुआ है।

(ii) गंगा के दक्षिणी मैदान

     इसका कुल क्षेत्रफल 33,670 किमी०² है। यह उत्तरी बिहार की तरह समतल नहीं है। इस मैदान के दक्षिणी भाग में छोटानागपुर का पठार और उसके कई छोटे-2 पहाड़ियाँ दिखाई देती हैं। पहाड़ी के रूप में कैमूर की पहाड़ी, राजगीर की को पहाड़ी, खड़गपुर की पहाड़ी, राजमहल की पहाड़ी, बांका की पहाड़ी, बराबर की पहाड़ी इत्यादि प्रमुख है। इस मैदान के दक्षिणी सीमा पर रोहतास का पठार, डुमरिया उच्च भूमि इत्यादि अवस्थित है। इस मैदान का निर्माण छोटानागपुर के पठार से निकलने वाली नदियों के द्वारा हुआ है। पश्चिम से पूरब की ओर जाने पर क्रमश: कर्मनाशा, सोन, पुनपुन, फल्गू, किऊल जैसी नदि‌याँ मिलती है।

    इस मैदान का सामान्य ढाल दक्षिण से उतर की ओर हुआ है। सोन का मैदान, मगध का मैदान, बिहारशरीफ- लखीसराय का मैदान और भागलपुर के मैदान के रूप में विभक्त है। गंगा नदी के किनारे जल्ला, टाल क्षेत्र का विकास हुआ है। इनके अलावे गंगा नदी पटना के पास प्राकृतिक बाँध का निर्माण करती है। पटना सिटी के पास जल्ला क्षेत्र, मोकामा क्षेत्र और मोकामा के पास टाल क्षेत्र का विकास हुआ है। इस मैदान में ही आरा और बक्सर के बीच में सहार-संदेश क्षेत्र का निर्माण हुआ है।

3. दक्षिण का सीमान्त पठारी प्रदेश

      बिहार के दक्षिणी सीमान्त भूगाग में विन्ध्यन श्रेणी का पूर्वी भाग और छोटानागपुर पठार का उत्तरी भाग अवस्थित है। छोटानागपुर के पठार के अधिकांश भाग ग्रेनाइट, नीस और शिष्ट जैसे चट्टानों से निर्मित है। विन्ध्यन श्रेणी का बिहार में विस्तृत श्रेणी कैमूर की श्रेणी कहलाती है जिसमें चूना पत्थर संरचना का विकास हुआ है।

   दक्षिण का सीमान्त पठारी प्रदेश में कई छोटी पहाड़ि‌याँ मिलती हैं। जैसे- बराबर की पहाड़ी, गया की पहाड़ी, जेटठियन की पहाड़ी, राजगीर की पहाड़ी, शेखपुरा की पहाड़ी, खड़गपुर की पहाड़ी, बिहार शरीफ एवं जमालपुर की पहाड़ी इत्यादि प्रसिद्ध है। छोटानागपुर तथा कैमूर के पठार का अपरदित भाग ही बिहार में अवस्थित है। जिसकी औसत ऊँचाई 150-300 मी० है। यह भाग पूर्णतः विषम क्षेत्र है। छोटानागपुर पठार से निकलने वाली नदियाँ इसी सीमान्त प्रदेश को छोड़‌कर मैदानों में प्रविष्ट करती है। रोहतास से लेकर राजमहल की पहाड़ी तक कटक के रूप में यह ‌भाग अवस्थित है। कोडरमा की घाटी, चतरा की घाटी और कैमूर की घाटी छोटानागपुर पठार में प्रवेश हेतु द्वार उपलब्ध करवाती है।

निष्कर्ष:

      इस तरह ऊपर के तथ्यों से स्पष्ट है कि बिहार का अधिकांश भाग मध्यवर्ती गंगा के मैदानी क्षेत्र में अवस्थित है। इसका उत्तरी भाग हिमालय को तथा दक्षिणी भाग प्रायद्वीपीय भात को छूती है। इस तह से यहाँ पर्वतों, पठारों एवं मैदानों का विषम संयोग पाया जाता है।


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6. बिहार में सूखा

7. बिहार में बाढ़

8. बिहार का औद्योगिक पिछड़ापन

9. बिहार के आर्थिक पिछड़ेपन के कारण

10. बिहार का औद्योगिक प्रदेश

11. बिहार का कृषि प्रदेश

12. बिहार में कृषि आधारित उद्योग

13. बिहार में चीनी उद्योग

14. सिन्दरी उर्वरक उद्योग

15. बिहार की जनजातीय समस्या एवं समाधान

16. बिहार में ग्रामीण बस्ती प्रतिरूप

17. पटना नगर नियोजन/पटना का मास्टर प्लान

18. बिहार में नगरीकरण

19. बिहार में ग्रामीण बाजार केन्द्र

20. महत्वपूर्ण वस्तुनिष्ट प्रश्नोत्तर


12. The Agro based industries in Bihar (बिहार में कृषि आधारित उद्योग)

12. The Agro based industries in Bihar

(बिहार में कृषि आधारित उद्योग)



प्रश्न प्रारूप

Q. कृषि आधारित उद्योग तथा बिहार में उसका महत्त्व की चर्चा करें।

     बिहार एक कृषि प्रधान राज्य है। कृषि का तात्पर्य विभिन्न प्रकार फसल, पशुपालन और मत्स्यन से है। यहाँ कृषि पर आधारित कई उद्योगों का विकास किया गया है। जैसे-

1. चावल उद्योग:-

     बिहार एक प्रमुख चावल उत्पादक राज्य है। चावल प्राप्त करने के लिए धान को कूटकर तथा भूसा से अलग किया जाता है। सामान्यत‌या यह कार्य ग्रामीण इलाकों में घर-घर होता रहता है। लेकिन विद्युत चालित मीलों ने इसे औद्योगिक रूप दे दिया है। उत्तरी बिहार में इन मीलों की संख्या अधिक है क्योंकि गंगा के मैदानी भाग में धान की अच्छी उपज होती है। इस‌के अतिरिक्त बिहार के सभी जिलों में काफी संख्या में चावल मीले स्थापित की गई हैं।

2. चीनी उद्योग:-

       चीनी उद्योग बिहार का सबसे पुराना उद्योग है। उत्तर एवं मध्य बिहार में गन्ना उपजाने योग्य उपयुक्त मिट्टी एवं जलवायु है। गन्ना एक ह्रासमान उद्योग है। इ‌सीलिए चीनी उद्योग की अधिकतर मीले उत्पादन के क्षेत्रों में स्थापित किये गये हैं।

    बिहार में चीनी उद्योग के प्रमुख केन्द्र मोतीहारी, सुगौली, मझौलिया, चनपटिया, नरकटियागंज, मढ़ौरा, पंचरुखी, सासामुसा, गोपालगंज, हथुआ, मोतीपुर, डालमियानगर, सारण, समस्तीपुर, चम्पारण, दरभंगा इत्यादि हैं। बिहार में कुल चीनी मीलें 28 है लेकिन इनमें अधिकांशतः जर्जर एवं बीमार हो चुकी हैं तथा कुछ बंद भी हो गयी हैं। वर्तमान में बिहार में कुल चीनी मिलों की संख्या 11 है।

3. सूतीवस्त्र उद्योग:-

      बिहार में सूतीवस्त्र उद्योग गया, फुलवारी शरीफ में केन्द्रित हैं। इसकी अन्य छोटी-2 मीलों मुजफ्फरपुर, मुंगेर, भागलपुर, किशनगंज, बिहारशरीफ तथा मधुबनी में है। रेशमी वस्त्र उद्योग का विकास भागलपुर में हुआ है। ओबरा (औरंगाबाद) में बने दरी और कालीनों का विदेशों में निर्यात किया जाता है।

4. जुट उद्योग:-

     पूर्णिया, कटिहार, सहरसा, किशनगंज और दरभंगा में 8.3 लाख टन से अधिक जूट का उत्पादन होता है। यहाँ इस उद्योग के लिए कच्चा माल तथा स्थानीय रूप से श्रमिक उपलब्ध है। कटिहार जूट उद्योग का प्रमुख केन्द्र है। इसके अतिरिक्त समस्तीपुर, चम्पारण, दरभंगा और सहरसा में जूट उद्योगों का विकास हुआ है।

5. तंबाकू उद्योग:-

     तम्बाकू उत्पादन में पूर्णिया, सहरसा, दरभंगा और मुंगेर का स्थान आता है। मुंगेर में एक सिगरेट का कारखाना, व्यापित है। सिगरेट के अतिरिक्त बीड़ी उद्योग का भी विकास राज्य के विभिन्न जिलों में हुआ है। बीड़ी निर्माण में मुंगेर, पटना तथा गया के प्रमुख स्थान हैं। इसके अतिरिक्त उत्तरी बिहार में भी बीड़ी उद्योग का विकास हुआ है।

6. रबड़ उद्योग:-

      बिहार में आरा से 3 किमी० दूर जमीरा में और पटना, गया तथा मुजफ्फरपुर में कुछ रबड़ की कारखाने स्थापित हैं। यहाँ से छोटे पैमाने पर साइकिल और रिक्शा के टायरों का उत्पादन किया जाता है। इनके अतिरिक्त अन्य फसल आधारित उद्योगों में आटा मील, तेलधानी, हथकरघा, गुड़, खांडसारी, बेकरी इत्यादि आते हैं।

Agro based industries in Bihar

बिहार में पशुपालन

     बिहार जैसे कृषि प्रधान राज्य की अर्थव्यवस्था में पशुधन का महत्त्वपूर्ण स्थान है। बिहार की पशुओं में मानव, गाय, बैल, भैंस, घोड़ा, गधा, सूअर, भेड़, बकरी और कुक्कुट प्रमुख है। इन पशुओं पर आधारित यहाँ कई उद्योगों का विकास हुआ है। जैसे-

(i) शिक्षण संस्थान उद्योग

(ii) डेयरी उद्योग,

(iii) माँस उद्योग,

(iv) चमड़ा उद्योग,

(v) परिवहन उद्योग इत्यादि।

बिहार मत्स्यन पालन

      बिहार में आन्तरिक जलस्रोतों में मत्स्यन पालन का कार्य होता है। यहाँ गंगा तथा उसकी सहायक नदियों से मछलियाँ पकड़ी जाती हैं। इसके अलावा छोटे-2 नदियों, तालाबों, तालों, पोखरो आदि में भी मत्स्यपालन होता है। बिहार सरकार 1975 ई० से मछलियों के अण्डों का उत्पादन तथा मत्स्यपालन के वैज्ञानिक पद्धति को अपनाकर मत्स्यपालन को प्रोत्साहित कर रही है। वर्तमान समय में भी बिहार सरकार मत्स्य पालन के लिए ऋण उपलब्ध करा रही है। मछुआरों को प्रशिक्षित कर रही है।

     बिहार की प्रमुख मछलियों में मांगुर, रोहू, कतला एवं भाखुर है। इसके साथ ही झींगा मछली, बचवा, पर्च, लोच, पयास, बुलेटस, गरई आदि मछलियों की माँग देश-विदेश में है। इसलिए आज निर्धन वर्ग ही नहीं बल्कि सम्पन्न वर्ग ने भी मतस्यपालन को उद्योग के रूप में अपनाया है।

बिहार में कृषि आधारित उद्योग का महत्व

        बिहार जैसे पिछड़े राज्य में कृषि आधारित उद्योगों का काफी महत्व है। यहाँ की अर्थव्यवस्था में इसका काफी योगदान होता है। उपर्युक्त उद्योगों में कई बेरोजगारों को रोजगार मिलती हैं। इनसे उनकी आर्थिक स्थिति में सुधार होती है। इन उद्योगों के उत्पादों से यहाँ के कई स्थानीय माँगों की पूर्ति होती है। जैसे- चावल, आटा, दाल, तेल, दुध, माँस, मछली, वस्त्र, बीड़ी, गुड़, चीनी इत्यादि।

निष्कर्ष:

     बिहार में कृषि आधारित उद्योगों के विकास भी अपार संभावनाएँ हैं। लेकिन यहाँ इनका विकास धीमी गति से हो रही है। इन उद्योगों के विकास में यहाँ कई बाधाएँ हैं। जैसे- पूँजी का अभाव, विद्युत का अभाव, अपराधिक घटनाएँ, रंगदारी, राजनीतिक अस्थिरता, भ्रष्टाचार इत्यादि। आवश्यता इस बात की है कि इन बाधाओं को दूर कर बिहार सरका को कृषि आधारित उद्योग के विकास प ध्यान देना चाहिए।


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1. बिहार : सामान्य जानकारी

2. बिहार का प्राकृ‌तिक प्रदेश / भौतिक इकाई

3. बिहार की जलवायु

4. बिहार के भौगोलिक इकाई का आर्थिक विकास पर प्रभाव

5. बिहार की मिट्टियाँ

6. बिहार में सूखा

7. बिहार में बाढ़

8. बिहार का औद्योगिक पिछड़ापन

9. बिहार के आर्थिक पिछड़ेपन के कारण

10. बिहार का औद्योगिक प्रदेश

11. बिहार का कृषि प्रदेश

12. बिहार में कृषि आधारित उद्योग

13. बिहार में चीनी उद्योग

14. सिन्दरी उर्वरक उद्योग

15. बिहार की जनजातीय समस्या एवं समाधान

16. बिहार में ग्रामीण बस्ती प्रतिरूप

17. पटना नगर नियोजन/पटना का मास्टर प्लान

18. बिहार में नगरीकरण

19. बिहार में ग्रामीण बाजार केन्द्र

20. महत्वपूर्ण वस्तुनिष्ट प्रश्नोत्तर


10. Industrial Region of Bihar (बिहार का औद्योगिक प्रदेश)

10. Industrial Region of Bihar

(बिहार का औद्योगिक प्रदेश)



प्रश्न प्रारूप

Q. बिहार को औद्योगिक प्रदेशों में विभाजित कीजिए तथा उन पर संक्षिप्त टिप्पणी दीजिए।

      बिहार के विभिन्न भागों में विभिन्न प्रकार के औद्योगिक कच्चे माल पाये जाते हैं। इन संसाधनों पर आधारित एक ही प्रकार के उद्योगों का एक विशेष क्षेत्र में समूहीकरण हुआ है और औद्योगिक सघनता विकसित हो गई है।

    उद्योगों के इस समूहीकरण के आधार पर इस राज्य को निम्नलिखित सात औद्योगिक प्रदेशों में विभाजित किया जा सकता है।-

1. चावल मिल का प्रदेश

2. चीनी उद्योग का प्रदेश

3. जुट उद्योग का प्रदेश

4. पश्चिमी मध्यवर्ती औद्योगिक प्रदेश

5. पूर्वी मध्यवर्ती औद्योगिक प्रदेश

6. सोन घाटी औद्योगिक प्रदेश

7. गया-गुरारु औद्योगिक प्रदेश

Industrial Region of Bihar

चित्र: बिहार उद्योग एवं औद्योगिक प्रदेश

1. चावल मिल का प्रदेश मानचित्र:-

     चावल मील उद्योग के रूप में पूरे राज्य में पाया जाता है फिर भी बिहार के उत्तरी सीमावर्ती क्षेत्र में इस उद्योग का बड़े पैमाने पर विकास हुआ है। धान का उत्पादन क्षेत्र मुख्यतः उत्तरी बिहार के मैदान तथा नेपाल की तराई क्षेत्र है। इसके आधार पर पश्चिम में रामनगर से लेकर पूर्व में किशनगंज तक चावल मिलों का विकास हुआ है।

मुख्य केन्द्र- रामनगर, नरकटियागंज, रक्सौल, अदापुर, बैरगनिया, सीतामढ़ी, जनकपुर रोड, जयनगर, झंझारपुर, जोगबनी और फारबीसगंज है।

    जनसंख्या की सघनता इन क्षेत्रों में होने के कारण उत्पादन का अत्यधिक खपत इन क्षेत्रों में ही हो जाता है।

2. चीनी उद्योग का प्रदेश:-

विस्तार- बिहार के उत्तरी-पश्चिमी मैदानी क्षेत्र।

      यह बिहार का सर्वप्रमुख गन्ना उत्पादक प्रदेश है जो बागमती नदीं के पश्चिम और गंगा नदी के उतर में अवस्थित है। चीनी उद्योग का कच्चा माल गन्ना जो ह्रासमान पदार्थ है जिसके कारण चीनी उद्योग उत्पादन क्षेत्र में ही स्थित है।

मुख्य केन्द्र- प० और पूर्व चम्पारण, सिवान, गोपालगंज, सारण इत्यादि जिले आते है। वर्तमान में बिहार के 28 उद्योगों में से कार्यरत 11 मील यहाँ ही है। इसके अलावे अन्य मील भी है।

     इनके अलावा बिहार के भागलपुर तथा साहेबगंज क्षेत्र में 11 गुड़ के मिलें है तथा विभिन्न भागों में खाँडसारी का भी उत्पादन होता है।

    राज्य बँटवारे के बाद गन्ना आधारित अद्योग ही सबसे बड़ा उद्योग बन गया है। गन्ना उत्पादन पर ही चीनी उद्योग के साथ-साथ गुड़, खंडसारी, कागज, इथेनॅाल, पशु आहार एवं विद्युत-ऊर्जा, कार्बनिक खाद जैसे कई अन्य उद्योग निर्भर करते है।  चीनी उद्योग एक सामयिक उद्योग है जिनमें साल में करीब 145 दिनों तक काम होता है एवं राज्य में ईख उत्पादकों की संख्या लगभग 5 लाख है।

3. जुट उद्योग का प्रदेश:-

विस्तार- बिहार के उतरी-पूर्वी भाग में स्थित।

मुख्य केन्द्र- पूर्णिया, कटिहार, किशनगंज और अररिया जिले आते है। समीपवर्ती सहरसा, मधेपुरा और खगड़िया जिलों में जूट की खेती होती है।

     जूट उद्योग का विकास मुख्य रूप से पूर्णिया एवं कटिहार में हुआ है। जहाँ जूट से टाट, बोरे इत्यादि बनाये जाते है।

4. पश्चिमी मध्यवर्ती औद्योगिक प्रदेश:-

विस्तार- यह गंगा के किनारे स्थित पश्चिमी औद्योगिक प्रदेश है जिसका विस्तार बक्सर से मोकामा-बरौनी तक है। इसके अन्तर्गत मुख्य रूप से गंगा का दक्षिणी तटीय भाग आता है। गंगा नदी के उत्तर स्थित बरौनी और हाजीपुर भी क्रमशः राजेन्द्र पुल और महात्मा गाँधी सेतु के द्वारा इस क्षेत्र से जुड़ पाये है। 

मुख्य केन्द्र- बरौनी सर्वाधिक महत्वपूर्ण औद्योगिक केन्द्र है, जहाँ तेल- शोधक कारखाने, पेट्रो रसायन, ताप विद्युत रासायनिक खाद और दुग्ध उद्योग विकसित है।

      मोकामा में चमड़ा इत्यादि, हाजीपुर, पटना, फतुहा में स्कूटर तथा फुलवारीशरीफ में सूतीवस्त्र उद्योग का विकास हुआ है। इस सबके अलावे इन सब क्षेत्रों में चीनी उद्योग, प्लास्टिक उद्योग इत्यादि का भी विकास हुआ है।

5. पूर्वी मध्यवर्ती औद्योगिक प्रदेश:-

विस्तार- गंगा नदी के किनारे स्थित पूर्वी औद्योगिक प्रदेश है जिसका विस्तार मुंगेर, जमालपुर से लेकर कहलगाँव तक है।

मुख्य केन्द्र- मुंगेर, जमालपुर तथा कहलगाँव है। मुंगेर में बंदूक और सिगरेट, जमालपुर में वर्कशॉप, नाथनगर तथा भागलपुर में रेशम तथा तसर, कहलगाँव में सुपर ताप विद्युत (1994 ई०) स्थित है। इससे औद्योगिक विकास को लाभ मिला है। इस उद्योगों के अतिरिक्त इन प्रदेशों में आटा, चावल और दाल की मिले तथा लकड़ी उद्योगों का विकास हुआ है।

6. सोन नदी-घाटी औद्योगिक प्रदेश:-

विस्तार:- बिहार के दक्षिण-पश्चिमी भाग में सोन नदी के तटीय क्षेत्र में स्थित है। इसका विस्तार, जपला से डालमियानगर तक है।

     यहाँ सीमेंट उद्योग, कागज उद्योग, लकड़ी उद्योग, पेपर बोर्ड उद्योग क्रमशः जपला, रोहतास, डालमियानगर में स्थित है। इसके अलावे इस औद्योगिक क्षेत्र में चीनी, रसायन, वनस्पति, चावल उद्योग इत्यादि का भी विकास हुआ है। यहाँ रेल सड़क और जल परिवहन की विशेष सुविधा है। सस्ते श्रमिक भी उपलब्ध है।

7. गया-गुरारू औद्योगिक प्रदेश:-

विस्तार- यह छोटा औद्योगिक प्रदेश है जिसके अन्तर्गत गया और गुरारू आते है।

मुख्य केन्द्र- गया इसका प्रमुख औद्योगिक केन्द्र है जहाँ जूट और सूती वस्त्रोद्योग हस्तकरघा, कलात्मक मूर्तियाँ बनाने के उद्योगों का विकास हुआ है। गया और बोधगया के धार्मिक स्थल के कारण यहाँ होटल उद्योग भी स्थापित है। इन सब के अलावे इस क्षेत्र में अन्य उद्योगों का विकास भी हुआ है पर वे सीमित एवं औद्योगिक लाभ के दृष्टि से वे गौण है।

निष्कर्ष:

   बिहार का औद्योगिक प्रदेश बिहार के किसी एक ही भाग में न स्थित होकर के वरन पूरे क्षेत्र में विस्तृत है। वैसे तो प्रत्येक का अपना-2 महत्व है पर औद्योगिक लाभ के दृष्टिकोण से कम है जिसका कारण पूँजी का अभाव है अर्थात पूँजी एवं सरका की नीति का सहयोग हे तो बिहार के उद्योगों का अविष्य और भी उज्जवल हो सकता है। वर्तमान मुख्यमंत्री नीतिश की सरकार में यह हमें संभव दिखायी देता है।



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8. बिहार का औद्योगिक पिछड़ापन

9. बिहार के आर्थिक पिछड़ेपन के कारण

10. बिहार का औद्योगिक प्रदेश

11. बिहार का कृषि प्रदेश

12. बिहार में कृषि आधारित उद्योग

13. बिहार में चीनी उद्योग

14. सिन्दरी उर्वरक उद्योग

15. बिहार की जनजातीय समस्या एवं समाधान

16. बिहार में ग्रामीण बस्ती प्रतिरूप

17. पटना नगर नियोजन/पटना का मास्टर प्लान

18. बिहार में नगरीकरण

19. बिहार में ग्रामीण बाजार केन्द्र

20. महत्वपूर्ण वस्तुनिष्ट प्रश्नोत्तर

9. Cause of Economic Backwardness of Bihar (बिहार के आर्थिक पिछड़ेपन के कारण)

9. Cause of Economic Backwardness of Bihar

(बिहार के आर्थिक पिछड़ेपन के कारण)



प्रश्न प्रारूप

Q1. बिहार क्यों प्राकृतिक संसाधनों के बावजूद अविकसित है? व्याख्या कीजिए।

Q2. समृद्ध संसाधनों के बावजूद बिहार में औद्योगिक विकास धीमी क्यों है?

Q3. बिहार को पिछड़ा या गरीब राज्य क्यों माना जाता है?

      विभाजन के बाद बिहार मूलतः एक कृषि प्रधान राज्य हो गया है। यहाँ के 80% भूमि पर कृषि का कार्य किया जाता है और लगभग 87.7 % जनसंख्या गाँवों में निवास करती है। अतः यहाँ ग्रामीण अर्थव्यवस्था और संस्कृति अभी भी व्याप्त है।

      ग्रामीण जनसंख्या का उच्च अनुपात, कृषि पर जनता की अधिक निर्भरता और प्रति व्यक्ति निम्न आय, बाढ़ तथा सिंचाई की समस्या ज‌हाँ बिहार के औद्योगिक पिछड़ेपन के सूचक है वहीं विशाल मानव संसाधन, सस्ते श्रम, जलविद्युत की उपलब्धता, सिंचाई कि अपार संभावनाएँ, नेपाल से लगती हुई अन्तरर्राष्ट्रीय सीमा बिहार में आर्थिक विकास की आशाएँ जगाती हैं। इन दोनों विचारों के चलते यह कहा जाता है कि “बिहार एक धनी राज्य है लेकिन यहाँ के लोग निर्धन है।” बिहार की अर्थव्यवस्था पिछड़े होने के निम्नलिखित कारण है-

1. बाढ़ और सूखे की समस्या:-

     गंगा का उत्तरी भाग बाढ़ की समास्या से पीड़ित है जबकि दक्षिणी भाग सूखे की समस्या से ग्रसित है। बिहार को एक अनोखा राज्य माना जाता है क्योंकि बिना बरसात हुए ही यहाँ बाढ़ की समस्या उत्पन्न होती है। इसक मुख्य कारण नेपाल से आने वाली सदावाहिनी नदियाँ है। बिहार के 38 में से 26 जिलें बाढ़ के समस्या से पीड़ित रहते हैं। गण्डक, बूढ़ी गण्डक, बागमती, कोसी, कमला बगान नदी घाटी क्षेत्र में प्रत्येक वर्ष फसल तो लहललाते हैं लेकित बाढ़ के चलते किसान उन फसलों को घरों तक नहीं ला पाते हैं।

     पुनः गंगा के दक्षिणी भाग में प्रायद्वीपीय भारत से निकलने वाली बर‌साती नदियाँ प्रवाहित होती है। इन नदियों पर जल संग्रहण का उपाय नहीं किये जाने के कारण सभी जल बेकार चले जाते हैं। पुनः सिंचाई की पूर्ण व्यवस्था नहीं होने के कारण किसान अपनी खड़ी फसलों को बचा नहीं पाते हैं। इसलिए बिहार का एक भाग जब बाढ़ की समस्या से जूझ रहा होता है तो दूसरी भाग सूखे की समस्या से जूझ रहा होता है।

2. सड़क बिजली को अपर्याप्तता:-

     बिहार का अधिकांश भाग बाढ़ प्रभावित क्षेत्र में आते हैं। यहाँ प्रति इकाई सड़क बनाने का खर्च बहुत अधिक आता है और जो सड़के बनती भी है, वे साल भर के अन्दर ही टूट-फूट जाती है। इसका एक कारण भौगोलिक है। लेकिन दूसरे कारण भी कम गंभीर नहीं है। जैसे- विमर्माण के क्रम में अनुसंधान का नहीं किया जाना, पैसों की बंदरबांट और घटिया सामग्री का इस्तेमाल इत्यादि।

    बिहार की बिजली कई घण्टों तक गायब रहती है। बिहार के आज भी कई क्षेत्र हैं जो लालटेन युग में जी रहे हैं। दूसरी ओर जिन क्षेत्रों में बिजली उपलब्ध है वहाँ तार काट लिये जाते हैं और जहाँ तार बच जाती है वहाँ बिजली चोरी किये जाते हैं और जो लोग बिजली का कनेक्शन लिए हुए हैं वे लोग समय पर बिल नहीं चुकाते हैं।

     बिहार में कोयला संसाधन का अभाव है और जो नदियाँ उपलब्ध हैं उस पर जल विद्युत् परियोजनाओं का निर्माण नहीं किला गया। फलतः बिहार राज्य को बिजली के लिए दूसरे राज्य के दया-दृष्टि पर निर्भर रहना पड़ता है।

3. प्रति व्यकि आय का नगण्य होना:-

       बिहार के प्रति व्यक्ति की आय राष्ट्रीय औसत आय से निम्न है। निम्न आय के कारण बचत की क्षमता भी काफी निम्न और धीमी है। अतः निम्न आय वर्ग के लोग प्रतिभाशाली और व्यापार में दक्ष होने के बावजूद अपनी योजनाओं को अंजाम नहीं दे पाते हैं।

4. औद्योगिक निष्क्रियता:-

    बिहार में नवीन औद्योगिक नीति का अभाव, खनिज एवं वन आधारित उच्चे माल का अभाव, पिछड़ी मानसिकता, भ्रष्टाचार एवं लाल-फीताशाही, संस्थागत एवं संरचनात्मक सुविधाओं का अभाव, राजनीतिक निष्क्रियता, जातिवाद, रंगदारी में उलझी हुई समाज इत्यादि कुछ ऐसे कारण हैं जिसके चलते बिहार में औद्योगिक विकास नहीं हो रहा है। इसके आलावे जो यहाँ उद्योग है वे बंद होते जा रही है।

5. रोजगारोन्मुख शिक्षण और प्रशिक्षण का अभाव:-

    जापान एक ऐसा देश है जहाँ प्राकृतिक संसाधनों का जबड़दस्त अभाव है फिर भी यह विश्व का एक विकसित राष्ट्र है। अगर इसी तर्ज पर सोचा जाए तो बिहार को क्यों नहीं एक विकसित राज्य बनाया जा सकता है? बिहार में कृषि आधारित उद्योगों को चलाने के लिए प्रशिक्षण केन्द्रों का जबड़दस्त अभाव है।

     बिहार के विश्वविद्यालयों में 70% विद्यार्थी कला विषय लेकर पढ़ाई कर रहे हैं। ऐसे में वैज्ञानिक सोच का विकास कैसे हो सकता है। यहाँ रोजगारों उन्मुख शिक्षा, कम्प्यूटर, टाईपिंग, आउट सोर्सिंग, BPO आधारित शिक्षा का अभाव है। यहाँ पोलिटेक्नीक स्कूल, ट्रेनिंग स्कूल, प्रबंधन संस्थान नगण्य है। 

6. जनसंख्या विस्फोट:-

      बिहार भारत का तीसरा सबसे बड़ा जनसंख्या वाला राज्य है। लेकिन यहाँ की जनसंख्या गरीबी, बेरोजगारी, कुपोषण और निरश्वरता से त्रस्त है। यहाँ के अधिकांश लोग कुशल एवं भाग्य प्रधान है। फलतः मानवीय संसाधन प्रचुर होने के बावजूद बिहार एक उपभोक्तावादी राज्य बन जाता है।

7. राजनीति अपराधीकरण का गठबंधन:-

    बिहार अपराधी राज्य का एक पर्याय बन चुका है। किडनैपिंग उद्योग का रूप ले चुका है। मेहनतकश इंसान दिनभर अगर श्रम करता है और शाम होते-2 अगर वह घर लौटता है तो इसकी गारंटी सरकार नहीं दे सकती है अर्थात यहाँ कानून और न्यायिक व्यवस्था काफी जर्जर है। राजनीतिक पार्टियाँ जाति के दुष्चक्र में फंसे रहने के कारण विकास की बात नहीं कर पाती है। राजनीतिक पार्टियों में इच्छा शक्ति का जबड़दस्त अभाव देखा जा सकता है।

अन्य कारण :-

     बिहार के पिछड़ेपन के पीछे कई अन्य कारण भी रहे हैं। जैसे-

     बिहार का एक भूमि बद्ध राज्य होना, समुद्री सीमा एवं बंदरगाहों का अभाव, बिहार में प्रत्यक्ष पूँजी निवेश की कमी, देशी विदेशी अप्रवासी भारतीयों की बिहार में कम रुचि, कला-संस्कृति का अभाव। जातिवादी एवं रूढ़ीवादी मानसिकता, ज्ञान-पर्यटन-मानव आधारित उद्योग के विकास पर ध्यान नहीं दिया जाना इत्यादि कुछ ऐसे करण हैं जो बिहार को एक पिछड़ा राज्य बनाते है।

    इस तरह ऊपर के तथ्यों से स्पष्ट है कि बिहार के आर्थिक पिछड़ेपन के पीछे कई कारण सक्रिय है। लेकिन बिहार के लोगों को इसे नियति मानकर नहीं चलना चाहिए क्योंकि हमारा इतिहास गवाह है कि जब-2 बिहार के लोग जागे हैं तब-2 भारत “सोने की चिड़ियाँ” कहलाया है।

    अतः वक्त आ चुका है कि बिहा के सभी जाति, धर्म के लोग एकजूट होकर बिहा के छवि को बदलने का प्रयास करें।



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18. बिहार में नगरीकरण

19. बिहार में ग्रामीण बाजार केन्द्र

20. महत्वपूर्ण वस्तुनिष्ट प्रश्नोत्तर

8. Industrial Backwardness of Bihar (बिहार का औद्योगिक पिछड़ापन)

8. Industrial Backwardness of Bihar

(बिहार का औद्योगिक पिछड़ापन)



प्रश्न प्रारूप

Q. बिहार के औद्योगिक पिछड़ेपन के कारणों का वर्णन करें।

      एकीकृत बिहार प्राकृतिक संसाधनों से समृद्ध था। बिहार विभाजन के बाद खनिज संसाधन, ऊर्जा संसाधन और वनीय संसाधन झारखण्ड राज्य में चले गये। प्राकृतिक संसाधन के रूप में बिहार में समतल भूमि, संदावाहिनी नदियाँ और प्रचुर मानवीय संसाधन बच गये हैं। बिहार विभाजन के बाद सभी बड़े उद्योग झारखण्ड में चले गये। बड़े उद्योग के रूप में मात्र बरौनी औद्योगिक संकुल बचा रह गया है। यह भी रुग्ण अवस्था के दौर से गुजर रहा है।

     बिहार की अधिकांश चीनी मीले बंद हो गयी हैं। डालमियानगर और बंजारी का सीमेंट कारखाना बंद हो चुका है। फतुहा में स्कूटर, मोकामा में चमड़ा उद्योग, पूर्णिया में कीटनाशक, गया, भागलपुर, डुमराँव (भोजपुर) का लालटेन और बाल्टी उद्योग, समस्तीपुर का अशोक पेपर मिल्स इत्यादि बन्द हो चुके हैं। इसका तात्पर्य यह है कि भारत के औद्योगिक मानचित्र के ऊपर से बिहार का औद्योगिक मानचित्र हट चुका है। स्वतंत्रता के पश्चात् जो भी बड़े उद्योग लगे वे सभी दक्षिण बिहार में थे। बिहार विभाजन के बाद प्राकृतिक संसाधनों के साथ-2 सभी बड़े उधोग भी झारखण्ड में चले गये।

      उपरोक्त विश्लेषण से स्पष्ट होता है कि बिहार उद्योग के मामले में काफी पिछड़ चुका है लेकिन, ऐसा नहीं है कि बिहार में उद्योगों की स्थापना नहीं की जा सकती है। बिहार राज्य में उद्योगों की स्थापना हेतु अनुकूल जलवायु उपलब्ध है। सस्ता श्रम, राष्ट्रीय एवं अन्तरर्राष्ट्रीय बाजार उपलब्ध है। यहाँ कृषि के विकास की पूरी-2 संभावना है।

     बिहार में कृषि आधारित उद्योग, ज्ञान आधारित उद्योग, पर्यटन उद्योग, तकनीकी उद्योग, फूललुज उद्योग (चूड़ी, श्रृंगार, इलेक्ट्रॉनिक्स) इत्यादि का विकास कर पुनः औद्योगिक मानचित्र पर लाया जा सकता है लेकिन कई ऐसे कारण यहाँ मौजूद हैं जिसके कारण बिहार एक औद्योगिक रूप से पिछड़ा हुआ राज्य है। इन कारणों की चर्चा नीचे के शीर्षकों में की जा रही है:-

औधोगिक पिछड़ेपन के कारण

1. लघु उद्योगों की उपेक्षा:-

     स्वतंत्रता के बाद एकीकृत बिहार में बड़े-2 उद्योग विकसित किये गये जबकि पंजाब, हरियाणा जैसे राज्यों में कृषि और उससे संबंधित उद्योगों के विकास पर जोर दिया गया। छोटे एवं लघु उद्योगों से प्रत्यक्षत: राज्य की आम जनता लाभान्वित होती है लेकिन बड़े-बड़े उद्योगों से राज्य की कुछ ही जनता लाभान्वित हो पाती है।

    बिहार में लघु एवं कुटीर उद्योगों के विकास पर जोर व दिये जाने के कारण औद्योगिक स्थिति काफी खराब है।

2. आधारभूत भूसंरचनाओं की कमी:-

     उद्योगों के विकास हेतु सड़क, पानी, बिजली, इत्यादि पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध होना चाहिए। बिहार में सड़‌के तो है। लेकिन अच्छी सड़‌कों का जबड़दस्त अभाव है। पुनः पटना जैसे महानगर में भी लगातार 24 घण्टे बिजली उपलब्ध नहीं हो पाती है। ऐसे में यहाँ उद्योगों का विकास कैसे हो सकता है। बिहार में पर्याप्त मात्रा में जल उपलब्ध है लेकिन ये जल अनियंत्रित एवं बाढ़ के रूप में उपलब्ध है जिसका प्रबंधन आसान नहीं है।

3. कुप्रबंधन:-

    स्वतंत्रता के बाद बिहार में कई उद्योग स्थापित किये गये थे जिसकी चर्चा ऊपर की गई है लेकिन कुप्रबंधन के कारण सभी उद्योग या तो रुग्ण हो गये भा बन्द पड़े हैं।

4. पूंजी एवं बाजार की कमी:-

    बिहार में एक ओर औद्योगिक क्षेत्र में पूंजी निवेश की वातावरण का अभाव है। यहाँ प्रत्यक्ष पूँजी निवेश नहीं हो पा रही है। दूसरी ओर बिहार में कृषि आधारित अर्थव्यवस्था और गरीबी के कारण औद्योगिक वस्तुओं की माँग बहुत कम है अर्थात् बिहार के लोगों की क्रय क्षमता बहुत ही कम है। उपरोक्त कारणों के चलते बिहार में उद्योगों का विकास नहीं हो पा रहा है।

5. औद्योगिक वातावरण का अभाव:-

      नक्सलवाद, सामन्तवाद, भ्रष्टाचार, अशिक्षा जैसे सामाजिक कारण बिहार में औद्योगिक विकास हेतु वातावरण नहीं बनने देते है।

6. खनिज संसाधनों का अभाव:-

     बिहार में खनिज आधारित उद्योगों के विकास हेतु कच्चे माल का अभाव है। यहाँ पर लौह इस्पात, एल्यूमीनियम उधोग इत्यादि का विकास संभव नहीं है। इसी तरह वनों के अभाव में वनीय कच्चे माल पर आधारित वनीय उद्योगों का विकास संभव नहीं है।

7. पुरानी मशीन एवं तकनीक:-

    बिहार का जूट एवं चीनी उद्योग प्रमुख उद्योग रहा है लेकिन इनके मशीन और तकनीक काफी पुराने हो चुके हैं। सरकार के द्वारा तकनीकी उन्मूलन का कोई सकारात्मक प्रयास धरातल पर उतरता हुआ दिखाई नहीं दे रहा है जिसके कारण पुराने उद्योग भी बंद हो गये हैं।

8. औद्योगिक नीति के अभाव:-

      बिहार राज्य में प्रारंभ से ही दूरदर्शी और विकासशील औद्योगिक नीति के अभाव रहा है।

निष्कर्ष:

   उपरोक्त बिन्दुओं के अध्ययन से स्पष्ट होता है कि बिहार में औद्योगिक पिछड़ेपन के कई कारण हैं। अतः सरकारी स्तर पर इस तरह के प्रयास किए जाने चाहिए कि उपरोक्त समस्याओं पर विचार कर ऐसा औद्योगिक वातावण बनाया जाना चाहिए कि उद्योगपति औ पूँजीपति उद्योग लगाने के लिए स्वतः उन्मुख हो।



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19. बिहार में ग्रामीण बाजार केन्द्र

20. महत्वपूर्ण वस्तुनिष्ट प्रश्नोत्तर

5. Drought in Bihar (बिहार में सूखा)

5. Drought in Bihar

(बिहार में सूखा)



प्रश्न प्रारूप

Q. सूखा से आप क्या समझते है? बिहार में सूखा के कारण, परिणाम तथा समस्या के समाधान में किये गये कार्यो की चर्चा करें।

    भारतीय मौसम आयोग (IMO) ने बताया कि मई माह के मध्य से अक्टूबर माह के मध्य लगातार 4 सप्ताह तक वर्षा की मात्रा 5 cm या उससे कम हो तो सूखा की स्थिति कहलाती है। यह समयावधि मानसून के आगमन का है। इसलिए इसे सूखा का पैमाना बनाया गया है यानी मानसून के कमजोर होने पर सूखा की स्थिति लगभग तय है। भारत का दो-तिहाई क्षेत्र सूखा पीड़ित है। देश के एक तिहाई क्षेत्र में सूखा प्रकोप ज़्यादा गंभीर है, जहाँ 75 cm से कम वर्षा होती है।

     बिहार में दक्षिणी बिहार के कैमूर, रोहतास, गया, औरंगाबाद, नवादा, मुंगेर, जमुई, शेखपुरा, लखीसराय, भागलपुर, पटना, नालंदा और जहानाबाद के कुछ इलाके सूखा पीड़ित हैं। इनमें कई जिले बाढ़ एवं सूखा दोनों से पीड़ित हैं। जैसे टाल क्षेत्र वाले जिले बाढ़ से पीड़ित है और उनके दक्षिणी इलाके मानसून की असमानता में सूखे से भी पीड़ित हो जाते हैं। कुल मिलाकर बिहार का 20% क्षेत्र सूखा से पीड़ित है जिसे नीचे के रेखाचित्रों में देखा जा सकता है-

Drought in Bihar

बिहार में सूखा के कारण एवं समस्या

          बिहार में सूखा के मुख्य कारण निम्नलिखित है:-

(i) मानसून की अनिश्चिता एवं परिवर्तनशीलता

(ii) वर्षा का असमान वितरण

(iii) ढालयुक्त एवं पथरीली भूमि

(iv) वनों की कटाई

(v) बरसाती नदियाँ 

(vi) जल प्रबंधन का अभाव

     बिहार में सूखा ग्रस्त होने का मुख्य कारण मानसून की अनिश्चितता एवं परिवर्तनशीलता है। मानसून के कमजोर पड़ने से इन क्षेत्रों में कृषि करना कठिन हो जाता है। दक्षिण बिहार का मैदान ही सूखाग्रस्त है क्योंकि गर्मी के दिनों में यहाँ बहने वाली नदियाँ सूख जाती हैं जबकि हिमालय से बहने वाली नदियों में सालोंभर पानी रहता है। चूंकि दक्षिण बिहार की नदियाँ पठार के वर्षा प्रतिरूप पर निर्भर करती है। अतः यह जरूरी है कि पठारी भागों में इन नदियों को बांधकर जल संग्रह कर लिया जाता और गर्मी में उसका प्रयोग किया जाता।

     बेहतर जल प्रबंधन और इच्छा शक्ति के अभाव ने भी दक्षिणी बिहार के मैदान को सूखाग्रस्त बना दिया है। दक्षिणी बिहार के मध्य में जैसे पटना, नालंदा, जहानाबाद, औरंगाबाद, गया, नवादा तथा मुंगेर के कुछ इलाकों में वर्षा 100 cm से कम होती है। यह भी एक कारण है कि जिससे इन इलाकों को सूखाग्रस होने की संभावना बढ़ जाती है।

      गंगा के दक्षिणी मैदान की भूमि ढालयुक्त और पथरीली है। वहाँ की मिट्टी भी छिछली है जिनमें भूमिगत जल नहीं जा पाता और वर्षा का जल ऊपर से शीघ्र बहकर निकल जाता है। भूमिगत जल के कम होने के कारण गर्मी के दिनों में जल संकट गहरा हो जाता है। इस क्षेत्र में वनों के अतिशय कटने से भी मृदा में नमी की कमी हो गयी है जिससे कृषि प्रभावित होती है और सूखा का प्रकोप बढ़ जाता है।वनों के कटने से भी वर्षा की मात्रा कम हो गयी है।

सूखे से निपटने के उपाय

    सूखे से निपटने के लिए भारत एवं बिहार सरकार के द्वारा कई स्तरों पर प्रयास किये गये हैं लेकित सूखे की समस्या आज भी राष्ट्रीय समस्या के रूप में कायम है। पथरी क्षेत्रों में प्रतिवर्ष 120 cm से अधिक वर्षा होती है जहाँ से दक्षिणी बिहार के मैदानी नदियों में जल आता है। मानसून के समय यह जल व्यर्थ ही गंगा में मिल जाता है। अगर इसे संग्रह कर लिया जाये तो बिहार में सूखे की समस्या नहीं रहेगी।

     दक्षिण बिहार के मैदानी भागों में धरातल थोड़ा उबड़-खाबड़ है। इन इलाकों के बेसिन क्रम में तालाब बनाकर पानी को संरक्षित रखा जा सकता है। इससे जहाँ-जहाँ एक ओर भूमिगत जल का भंडार जमा हो सकता है वहीं दूसरी ओर गर्मी में कृषि कार्य के लिए प्रयोग किया जा सकता है।

    आज अधिक पेनेट्रेटिव गोजनाओं, पर्यावरण हितैषी, टिकाऊ विकास नीति, मानसून का सही आकलन पर विशेष जोर देने की जरूरत है। नदी-जोड़ योजना में तेजी लाने की आवश्यकता है। वनीकरण बहुत आवश्यक है। स्थानीय जल सुविधा व वर्षा जल संक्षण प विशेष ध्यान व जागरुकता लाने की जरूरत है।



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